बुधवार, 12 मार्च 2025

खुनी होली: ट्रक ड्राइवर की आपबीती|| VK HORROR|| Trunk driver||

 खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती"



मेरा नाम है सुरेश यादव।

उम्र लगभग 38 साल।

मैं राजस्थान के छोटे से गांव चूरू का रहने वाला हूं।


गरीबी ने मुझे बचपन से ही सिखा दिया था —


"अगर पेट भरना है, तो सड़क पर उतरना ही पड़ेगा..."


घर में बीमार मां,

दो छोटे बच्चे,

और बीवी जो हमेशा कहती थी —


"कुछ भी कर लो सुरेश, बस महीने की राशन मत रुकवाना..."


मैंने 18 साल की उम्र में पहली बार ट्रक चलाया।

धीरे-धीरे सड़कों का साथी बन गया




...धीरे-धीरे सड़कों का साथी बन गया।


सर्द रातों में जब लोग रजाई में सोते,

तब मैं अपने पुराने ट्रक "कालीचरण" के साथ हाइवे पर अकेला दौड़ता।


कालीचरण... हां, यही नाम रखा था मैंने अपने ट्रक का।

क्योंकि ये ट्रक ही तो था जिसने मुझे और मेरे परिवार को जिंदा रखा था।


"रात-रात भर डीजल की महक, सिगरेट का धुआं और रास्तों की तन्हाई ही मेरे साथी थे।"


पर एक बात हमेशा अंदर से डराती थी —

"हाइवे की रातें कभी खाली नहीं होतीं... कभी न कभी कुछ न कुछ ऐसा जरूर देख लेता था, जो दिमाग में अटक जाता था।"


लेकिन क्या करूं...

घर के हालात ऐसे थे कि डर को भी जेब में डालना पड़ता।

कई बार तो ऐसी-ऐसी सुनसान जगहों से निकलना पड़ता कि लगता —


"अगर कुछ हो गया, तो ये दुनिया मुझे ढूंढ भी नहीं पाएगी।"


पर अब आदत हो गई थी।

हफ्तों घर से बाहर, ट्रक की सीट ही बिस्तर।

सड़कें ही जिंदगी।


लेकिन...

उस होली की रात कुछ ऐसा हुआ जो मेरी पूरी जिंदगी को बदल कर रख देगा।

कुछ ऐसा, जिसे सोचते ही आज भी रूह कांप जाती है...




(सुरेश की नज़रों से...)


"रात के करीब 11 बज रहे थे।

होली की रात थी, लेकिन मैं... हमेशा की तरह ट्रक लेकर राजस्थान के सुनसान हाइवे पर था।"


"कालीचरण" की पुरानी सीट पर बैठा मैं, स्टीयरिंग को कसकर पकड़े हुए आगे बढ़ रहा था।


चारों ओर अजीब सा सन्नाटा था।

रास्ते के दोनों तरफ सूखे पेड़...

और दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं।


"मेरे बीवी-बच्चे घर पर होली मना रहे होंगे,

पर मैं... बस इस ट्रक की आवाज और रात की खामोशी के बीच फंसा था।"


धीरे-धीरे हाइवे पर धुंध बढ़ने लगी।


"अजीब सी धुंध, जो अचानक सामने आ गई थी।"


मैंने खुद से कहा,

"धुंध है, कोई बात नहीं... होली के बाद गांवों में अक्सर आग जलाते हैं, धुआं भी हो सकता है।"


पर दिल के किसी कोने में डर भी था...

क्योंकि ये रास्ता पहले भी बदनाम था।


लोग कहते थे —

"रात के वक्त इस सड़क पर मत जाना, कई ड्राइवर कभी लौटे नहीं।"


मैंने रफ्तार थोड़ी तेज कर दी...


तभी...

अचानक सामने बीच सड़क पर एक लाल साड़ी वाली औरत खड़ी दिखी।


(डरावनी हंसी की हल्की गूंज — हाहाहाहा...)


ब्रेक मारे... ट्रक की आवाज गूंज उठी — (कड़ाक... कड़ाक)


"ओ बाप रे... ये औरत बीच सड़क पर क्या कर रही है?"

मैंने खुद से कहा।


उसने धीरे-धीरे मुड़कर मेरी तरफ देखा...

चेहरा काला, आंखें लाल जैसे जल रही हों।


मेरे हाथ कांपने लगे।

स्टीयरिंग कस कर पकड़ लिया।


और तभी...

वो अचानक गायब हो गई!


(एक तेज हवा का झोंका — श्श्श्श्श्श...)


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"ये क्या देख लिया मैंने? क्या वाकई कोई थी या मेरी आंखों का धोखा?"


पर दिल मानने को तैयार नहीं था।

"अगर धोखा था, तो अब भी ऐसा क्यों लग रहा है जैसे कोई मेरी ट्रक में आ बैठा हो?"


पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी।


ट्रक का शीशा बार-बार धुंधला हो रहा था... और उसमें कोई अक्स दिखता जैसे कोई और बैठा हो..."


(धीमी डरावनी आवाज — "सुरेश....")


मेरे नाम की पुकार सुनाई दी।

मैंने जोर से चिल्लाया,

"क-क-क-कौन है... कौन?"


लेकिन जवाब सिर्फ गहरी खामोशी थी।


(डरावनी हवा की सीटी — वूंssssss...)


अब मुझे समझ आ चुका था — कुछ गड़बड़ है।

और ये होली की रात, मेरे लिए शायद आखिरी साबित हो सकती है।


ट्रक की रफ्तार बढ़ाई, लेकिन डर पीछा नहीं छोड़ रहा था।

कहीं से फिर वही औरत की परछाई दौड़ती दिखी — ट्रक के साथ-साथ!


(औरत की डरावनी हंसी — हाहाहाहाहा)


अब आगे क्या होगा...?

क्या सुरेश यादव बच पाएगा या नहीं...?




"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती"


(सुरेश की नज़रों से...)


ट्रक की रफ्तार बढ़ाए जा रहा था,

लेकिन वो औरत... लाल साड़ी में लिपटी... अब भी मेरे ट्रक के साथ-साथ दौड़ रही थी!


(डरावनी हंसी — "हाहाहाहाहा...")


उसकी हंसी मेरे कानों में गूंज रही थी।

"ये कौन है? और मुझसे क्या चाहती है?"


मेरे माथे पर पसीना आ चुका था,

हाथ कांप रहे थे, पर फिर भी स्टीयरिंग नहीं छोड़ा।


(धीमी-धीमी सी चीख — "रुको... रुको...!")


"ओह तेरी! अब बोल भी रही है..."


मैंने आंखें जोर से मीच ली, लेकिन ट्रक रोकने की हिम्मत नहीं हुई।

"रुकूं? नहीं भाई, रुका तो काम तमाम!"


तभी अचानक...

(ट्रक के बोनट पर जोर की थाप — ठक... ठक... ठक...)


मैंने डरते-डरते शीशे से झांक कर देखा...

सामने कोई नहीं था।


लेकिन तभी...

(कान के पास किसी की सांसें — "सुरेश.....")


"ओह बाप रे!"

मेरे मुंह से निकल गया।


पीछे देखने की हिम्मत जुटाई,

पीछे... वही औरत बैठी थी!

आंखें लाल... बाल बिखरे... होंठों पर अजीब सी मुस्कान।


(धीमी गूंजती आवाज — "तू भी होली मनाने निकला है सुरेश...?")


मैंने कांपती आवाज में पूछा,

"त-तुम कौन हो? क्या चाहती हो मुझसे?"


वो बोली —

"जिस रास्ते से गुजर रहा है, वो मेरा है... और जो मेरा है, वो अब कभी बच नहीं सकता..."


(तेज हंसी — "हाहाहाहाहा...")


ट्रक के शीशे अपने आप ऊपर-नीचे होने लगे।

(किच... किच... किच...)


"ओ भाई ये क्या हो रहा है..."

मैंने खुद से कहा।


फिर उसकी बात सुनकर जैसे दिल की धड़कन रुक सी गई —


"आज से ठीक तीन साल पहले... इसी होली की रात, मेरा खून इसी सड़क पर हुआ था... अब हर साल होली पर मैं लौटती हूं... अपने कातिल को ढूंढने..."


(धीमी हवाओं की तेज़ आवाज — "श्श्श्श्श्श्श...")


मैंने कहा —

"मेरा क्या कसूर है? मैं तो बस ट्रक चला रहा हूं..."


पर वो बोली —

"कातिल तुम हो या कोई और... पर इस सड़क से गुजरने वाला हर मर्द मेरे गुनाह का हिस्सा है... और अब..."










(तेज झटका — ट्रक के टायर की आवाज — च्छचछचछच...)


"अब तेरा खून भी रंग बनेगा होली का..."


(तेज हंसी — "हाहाहाहाहाहा")


मेरी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा,

हाथ-पांव सुन्न होने लगे।


"क्या मैं आज बच पाऊंगा?"

"क्या ये होली मेरे खून की होली बन जाएगी?"


ट्रक की रफ्तार अब मेरे काबू से बाहर थी।

आंखों के सामने धुंध,

कान में बस उसकी आवाजें।


"सुरेश... तैयार हो जा..."

(डरावनी फुसफुसाहट — "अब तेरा खेल खत्म...")


तभी... अचानक ट्रक रुक गया...

(जोरदार झटका — ठकककककक...)


मैं बेहोश होते-होते बस यही सोच रहा था — "क्या मैं बच पाऊंगा...?"


(यहीं पर इस Part का अंत करते हैं)


अब भाई, सवाल उठता है —


क्या सुरेश यादव वाकई जिंदा बचेगा?

कौन थी वो औरत, और क्यों उसे हर ट्रक ड्राइवर का खून चाहिए?

क्या उस रात का रहस्य कोई और बड़ा राज छिपाता है?




"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती"


(सुरेश की नज़रों से...)


आंख खुली तो आसमान में अजीब सी लाल रोशनी थी।

शायद होली की रात थी, लेकिन वो रोशनी रंगों की नहीं... खून की लग रही थी।


मैं ट्रक की ड्राइविंग सीट पर नहीं,

बल्कि सड़क के किनारे मिट्टी में गिरा हुआ था।

सिर में चोट लगी थी, खून बह रहा था।

"ये कैसे हो गया... ट्रक कहां है?"


मैंने खुद से पूछा और जैसे ही उठने की कोशिश की,

(कानों में फिर वही हंसी — हाहाहाहाहा)


सामने देखा —

वही औरत लाल साड़ी में खड़ी थी।


अबकी बार उसके हाथ में कोई चीज थी —

एक टूटी हुई गुड़िया... जिसके बाल भी लाल रंग में रंगे थे, या शायद खून में।


वो बोली —

"देख रहे हो सुरेश? ये मेरी बेटी की आखिरी निशानी है... तुम्हारे जैसे लोगों ने मुझसे सब छीन लिया।"


मैंने कांपते हुए कहा — "मैंने कुछ नहीं किया, मुझे जाने दो।"


लेकिन उसकी आंखों में जहर भर चुका था।

"कोई नहीं बचेगा... कोई नहीं।"


अचानक पीछे से किसी के रोने की आवाज़ आई।

(बिलखती हुई बच्ची की आवाज — "माँ... माँ...")


मैंने झटके से मुड़ कर देखा —

एक छोटी बच्ची, खून से लथपथ कपड़े, बाल बिखरे...


वो मेरी तरफ देख रही थी,

"अंकल... मुझे घर जाना है..."


"ये कौन है...? ये बच्ची कौन है?"


औरत बोली —

"ये मेरी बेटी है... जिसकी लाश आज भी इसी सड़क के नीचे दफन है... और उसका इंतजार खत्म नहीं हुआ।"


अचानक सब कुछ घूमने लगा।

चारों तरफ धुंध —

हवा में अजीब सी गंध —

(जली हुई चीज़ों की गंध, खून की सड़ांध...)


मैंने डरते हुए कहा —

"मैंने कुछ नहीं किया, मैं क्यों भुगतूं?"


वो औरत चीखते हुए बोली —

"हर मर्द जिसने मेरी बेटियों को रौंदा, सबको सज़ा मिलेगी... और तू भी बचेगा नहीं।"


(तेज हवाएं — श्श्श्श्श...)


अचानक उसके हाथ से गुड़िया गिर गई,

और जैसे ही वो मिट्टी पर गिरी,

जमीन कांपने लगी।


(भूकंप जैसी आवाजें — धड़धड़धड़धड़...)


सामने की सड़क फटने लगी,

और उस फटी हुई मिट्टी से कंकाल निकलने लगे।


हर कंकाल जैसे बोल रहा था —

"हम भी मारे गए थे... हमारी भी होली खून से खेली गई थी..."


मैंने हिम्मत जुटाई और दौड़ने लगा।

पर हर ओर से कंकाल,

हर ओर से वही औरत की हंसी।


(हाहाहाहाहा)


ट्रक कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

रास्ता गायब था।

बस चारों ओर धुंध और अंधेरा।


तभी एकदम सामने वही बच्ची खड़ी थी।

"अंकल... आप भी मर जाओगे क्या?"


उसकी मासूम आंखों में डर था, और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


मैंने हिम्मत कर के पूछा —

"तुम चाहती क्या हो?"


बच्ची बोली —

"माँ को चैन चाहिए... लेकिन माँ अब किसी को माफ नहीं करेगी..."


इतना कहते ही बच्ची गायब।

औरत की हंसी गूंजने लगी।

"अब तेरा खेल खत्म सुरेश..."


(तेज झटके, तेज हवाएं, डरावनी चीखें...)


सामने से ट्रक की लाइट आती दिखी —

लेकिन वो मेरा ट्रक नहीं था।


(तेज हॉर्न — पों पों पों...)


क्या वो ट्रक मुझे कुचल देगा?

क्या मैं बच पाऊंगा?


(धड़ाम...)


अंधेरा... बस अंधेरा।


(यहीं तक...)




"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" Rajasthan) — 


...


(धीरे-धीरे होश आता है...)


आंखें खोलीं तो खुद को अस्पताल में पाया।

चारों तरफ सफेद दीवारें, सिर पर पट्टी, हाथों में ड्रिप लगी थी।


"ये मैं कहां हूं?"


पास ही एक नर्स आई, बोली —

"अरे सुरेश जी, आप बच गए, भगवान का शुक्र मनाइए।"


मैंने चौंक कर पूछा —

"क्या हुआ था?"


नर्स बोली —

"आपका ट्रक खाई में गिर गया था, गनीमत रही कि आप किसी तरह बाहर निकल आए।"


(दिमाग फिर घूमने लगा, आंखों के सामने वही औरत, वही बच्ची, वही खून से सनी होली...)


मैंने डरते हुए कहा —

"वो औरत... वो बच्ची... सब सच था?"


नर्स ने मेरी तरफ देखा और धीरे से कहा —

"कौन बच्ची? वहां कोई नहीं था... आप अकेले थे..."


(गहरी सांस ली, पर दिल की धड़कन तेज हो गई।)


अगले दिन जब पुलिस वाला मिलने आया,

मैंने उसे सारी बात बताई।


वो हंसते हुए बोला —

"अरे भाई, तुम ज्यादा सोच रहे हो। ये सड़क बदनाम है। यहां हर साल कोई ना कोई हादसे का शिकार होता है।"


"लेकिन भाई साहब, मैंने खुद देखा उस औरत को, उस बच्ची को!"


पुलिस वाला गंभीर होकर बोला —

"कहते हैं न... सालों पहले यहां एक औरत की बेटी को इसी सड़क पर कुचल दिया गया था। होली की रात... जब सब नशे में झूम रहे थे। तब से कहते हैं, वो आत्मा भटक रही है।"


(गला सूख गया, मुंह से आवाज़ तक नहीं निकली।)


मैंने धीरे से पूछा —

"क्या नाम था उस औरत का?"













पुलिस वाला बोला —

"नाम कोई नहीं जानता, पर उसे 'होली वाली चुड़ैल' कहते हैं।"


(हाहाहाहाहा — कानों में फिर वही हंसी गूंजी...)


अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद,

मैंने ठान लिया — अब कभी इस रास्ते पर ट्रक नहीं चलाऊंगा।

पर पेट की आग... मजबूरी ने फिर वही रास्ता पकड़ा।


(अगली होली की रात...)


ट्रक लेकर फिर उसी रास्ते पर था।

हर बार खुद से कह रहा था —

"सुरेश, डरना मत... सब भ्रम है।"


पर जैसे ही गाड़ी बढ़ाई,

(ट्रक की हेडलाइट में वही औरत दिखी — लाल साड़ी, बिखरे बाल...)


(हाहाहाहाहा)


मैंने आंखें बंद कर लीं।

पर ट्रक अपने आप रुक गया।


आंखें खोलीं तो वही बच्ची सामने।


"अंकल... माँ को माफ कर दो... माँ बहुत गुस्से में है..."


मैंने रोते हुए कहा —

"मैंने कुछ नहीं किया बेटा... मेरा कोई कसूर नहीं।"


बच्ची बोली —

"फिर भी माँ कहती है, जो भी यहां आएगा, वो बचेगा नहीं..."


अचानक औरत की आवाज आई —

"आज फिर खून की होली होगी सुरेश... तेरा भी वक्त आ गया।"


(सड़क पर चारों तरफ खून, हड्डियां, कंकाल बिखरे दिखने लगे...)


(हवा में चीखें, डरावनी आवाजें — आआआआआआ...)


ट्रक की लाइट बंद हो गई।

इंजन बंद।

मोबाइल बंद।


चारों तरफ सन्नाटा और उस औरत की हंसी।

(हाहाहाहाहा)


मैंने डरते हुए कहा —

"क्या चाहिए तुझे?"


औरत बोली —

"इंसाफ। मेरी बेटी के कातिलों का खून।"


मैंने कांपते हुए कहा —

"लेकिन मैं दोषी नहीं।"


औरत चिल्लाई —

"फिर भी मरेगा। क्योंकि मर्द जात ने ही छीना सब कुछ।"


(अचानक ट्रक के शीशे पर खून की लकीरें बन गईं...)


मैंने आंखें बंद कर लीं।

फिर खुली तो —

सब कुछ साफ।

ना औरत, ना बच्ची, ना खून।


क्या सब सपना था?

या हकीकत?


पर दिल अब भी धड़क रहा था,

गला सूख चुका था।


जैसे-तैसे ट्रक स्टार्ट किया और वहां से भाग निकला।


(अंत में ट्रक के पीछे से फिर वही बच्ची की आवाज...)

"अंकल... अगली होली फिर मिलेंगे..."


(हाहाहाहाहा)


(जैसा आपने कहा बिना रुके और बिना कुछ कहे, अगला भाग प्रस्तुत है)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


...


अगली सुबह जब मैं घर पहुंचा,

बीवी ने दरवाजा खोला।

मेरी हालत देखकर घबरा गई।


"क्या हुआ जी? आप ठीक तो हो?"


मैं चुप रहा, कुछ बोल नहीं पाया।


कमरे में बैठते ही बीवी ने फिर पूछा —

"बताइए ना, क्या हुआ?"


मैंने कांपते हाथों से पानी पिया और बोला —

"मैंने आज जो देखा... वो ताउम्र नहीं भूल सकता।"


बीवी चौंक गई।

"क्या देखा आपने?"


मैंने धीरे-धीरे पूरी बात बताई।

और जब मैंने कहा कि 'बच्ची ने कहा अगली होली फिर मिलेंगे',

तो बीवी के चेहरे का रंग उड़ गया।


मैंने पूछा —

"तुम क्यों डर गई?"


बीवी बोली —

"क्योंकि आज सुबह तुम्हारे ट्रक के पीछे किसी ने खून से लिखा है — 'फिर मिलेंगे सुरेश'..."


(हवा में एक बार फिर वही डरावनी हंसी गूंजी — हाहाहाहाहा)


मेरा दिल दहल गया।

मैं भाग कर ट्रक के पास गया।

और सच में, ट्रक के पीछे लाल रंग से लिखा था —


"फिर मिलेंगे सुरेश..."


उस दिन के बाद से मैंने ट्रक चलाना छोड़ दिया।

गांव के मंदिर में जाकर रोज पूजा करता हूं।

पर आज भी हर होली की रात,

जब गांव में रंग और गुलाल उड़ते हैं,

तो मेरे कानों में वो बच्ची की आवाज गूंजती है —


"अंकल... अगली होली फिर मिलेंगे..."


और दूर कहीं वो औरत की हंसी —

(हाहाहाहाहा)


(अचानक हवा का तेज झोंका, दरवाजे की चरमराहट, और फिर सन्नाटा...)





"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" — Rajasthan)


मैंने अब ट्रक चलाना छोड़ दिया था।

पर किस्मत की चाल देखिए,

होली के दिन एक बार फिर मुझे रास्ते पर निकलना पड़ा।


गांव के बड़े Seth ने कहा —

"सुरेश, बस तू ही है जिस पर भरोसा कर सकूं, शहर से माल लाना है।"


मैंने मना किया,

पर मजबूरी थी, बीवी की तबीयत खराब थी,

पैसे की जरूरत थी।


आख़िरकार ट्रक उठाया,

डरते हुए वही रास्ता चुना,

जहां पिछली होली को मेरा सामना उस भूतिया बच्ची से हुआ था।


रास्ता सुनसान था,

चारों तरफ रंगों की बजाय धूल उड़ रही थी।

हर पेड़ ऐसा लग रहा था मानो छुपकर कोई देख रहा हो।


ट्रक की हेडलाइट जैसे ही उस पुराने रेलवे फाटक के पास पहुंची,

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


वहां वही बच्ची खड़ी थी —

सफेद फटे कपड़े,

हाथ में लाल गुलाल,

चेहरे पर अजीब मुस्कान।


और फिर अचानक...


"अंकल, आपने वादा किया था ना... अगली होली मिलेंगे?"


(हाहाहाहाहा — हवाओं में गूंजती उसकी हंसी)


मैंने डर के मारे ब्रेक मारी,

ट्रक रुक गया,

मेरी सांसे तेज।


मैंने आंखें बंद की,

सोचा शायद मेरा वहम हो।


पर जब आंखें खोली,

तो वही बच्ची सामने आकर बोल पड़ी —


"चलो अंकल, आज रंग खेलेंगे ना?"


उसके हाथ में लाल नहीं,

खून से भरा थैला था।


(पीछे से कोई औरत की चीख — "मेरा बदला... मेरा बदला...")


मैंने घबरा कर ट्रक स्टार्ट किया,

पर ट्रक का स्टेयरिंग घूम नहीं रहा था।


और फिर अचानक —

वो बच्ची ट्रक के बोनट पर चढ़ गई।


"अंकल... बचोगे नहीं इस बार..."


(हाहाहाहाहा)




"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" — Rajasthan)


मेरे हाथ काँप रहे थे,

ट्रक स्टार्ट तो हो गया था,

पर स्टेयरिंग अपने आप घूम रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने कस कर पकड़ रखा हो।


बच्ची अब ट्रक के बोनट से उतरकर सामने आ गई।

उसकी आंखों से खून के आंसू बह रहे थे।

चेहरा गुस्से और नफरत से भरा।


"अंकल... आपने मुझसे खेला नहीं, अब देखो मेरी होली कैसी होती है..."


उसने जैसे ही हाथ बढ़ाया,

मेरे ट्रक का इंजन एक जोरदार झटके के साथ बंद हो गया।

सामने से धूल भरी आंधी चलने लगी।


आंधी के बीच से मुझे और भी परछाइयाँ दिखने लगीं —

औरतें, मरे हुए बच्चे,

सभी के चेहरे जले हुए,

आंखें लाल।


(किसी के चीखने की आवाज़ — "हमें बचा लो...! हमें बचा लो...!")


मैंने दरवाजा खोल कर भागने की कोशिश की,

लेकिन दरवाजा लॉक हो चुका था।

मेरे हाथ से पसीना बह रहा था।


बच्ची पास आई और बोली —

"तुम जैसे लोगों ने मुझे जलाया था होली की रात... आज मैं भी तुम्हें जलाऊंगी।"


(हाहाहाहाहा)


अचानक ट्रक के चारों तरफ आग की लपटें उठने












 लगीं।

जैसे पूरा ट्रक आग के गोले में बदल गया हो।


(धधकती आग की तेज आवाज, और दूर से आती महिला की दर्दनाक चीखें)

मैंने चिल्लाकर कहा —

"माफ कर दो मुझे! मैं उस जुर्म का हिस्सा नहीं था!"


बच्ची रुक गई,

उसकी आंखों में आंसू आ गए।


"तो क्या तुम मेरी सच्चाई दुनिया को बताओगे?"


मैंने कांपते हुए सिर हिलाया —

"हाँ... हाँ, मैं बताऊँगा..."


जैसे ही मैंने ये कहा,

आग की लपटें एकदम से शांत हो गईं।

आंधी रुक गई।


बच्ची बोली —

"याद रखना, अगर नहीं बताया... अगली होली पर फिर आउंगी..."


(हाहाहाहाहा)


इतना कहते ही वो गायब हो गई।

सामने का रास्ता साफ हो गया।


मैंने जल्दी से ट्रक स्टार्ट किया और वहाँ से निकल गया।


पर आज भी...

हर होली की रात,

मेरे कानों में उसकी आवाज गूंजती है —


"अगली होली मिलेंगे अंकल..."


(हाहाहाहाहा)






"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती"


ट्रक की हेडलाइट्स की रोशनी में वो रास्ता और भी डरावना लग रहा था।

रात के सन्नाटे में सिर्फ ट्रक के इंजन की गूंज थी।

लेकिन मेरे दिल की धड़कन इंजन से भी तेज़ थी।


रास्ते में पड़ने वाला वो वीरान पुल...

जहां लोग कहते थे कि किसी औरत की आत्मा भटकती है,

वहीं से मुझे होकर गुजरना था।


जैसे ही मैं पुल पर चढ़ा,

एक जोरदार झटके के साथ ट्रक रुक गया।

मेरे लाख कोशिश करने पर भी ट्रक ने दोबारा स्टार्ट होना मानो छोड़ दिया था।


हवा में एक अजीब सी सड़ांध घुली हुई थी।

जैसे किसी जलते हुए शरीर की बदबू।


अचानक मेरे ड्राइवर साइड के शीशे पर किसी ने थपथपाया।

मैंने डरते-डरते शीशे की तरफ देखा।

एक औरत... सिर से पाँव तक भीगी हुई।

चेहरा जला हुआ, आँखों से खून टपक रहा था।


वो धीमे से बोली —

"भाईसाहब... लिफ्ट दोगे क्या?"


मेरे मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी।

मैं पत्थर की तरह जड़ हो गया।


वो औरत दरवाजा खोलने लगी।

लेकिन दरवाजा लॉक था।


तभी... ट्रक का हॉर्न अपने आप बजने लगा।

(ट्रक का तेज़ हॉर्न... बीप बीप बीप...)


औरत जोर-जोर से हंसने लगी —

(हाहाहाहाहा)


उसकी हंसी सुनकर मेरा खून जम गया।

फिर अचानक वो गायब हो गई।

मैंने फौरन ट्रक स्टार्ट किया।


ट्रक जैसे किसी अदृश्य ताकत से आगे धकेल दिया गया।

लेकिन ये क्या?

सामने रास्ते में वो ही औरत खड़ी थी।

इस बार उसके साथ और भी परछाइयाँ थीं।


सभी औरतें जल चुकी थीं,

चेहरे काले पड़ चुके थे,

हाथों में रंग नहीं खून था।


वो सब मेरे ट्रक की तरफ बढ़ने लगीं।


मेरी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

ट्रक के शीशे पर खून के हाथों के निशान बनने लगे।


तभी किसी की फुसफुसाहट —

"अब तेरी बारी है... तेरी होली अब हमारे साथ..."


मैंने आँखें बंद कर लीं।

दिल से दुआ करने लगा।

पर जब आँखें खोलीं,

तो पूरा ट्रक खून से सना हुआ था।


आसमान से लाल रंग की बारिश हो रही थी।


(टप टप टप — खून की बूंदों की आवाज़)


मैं चीख पड़ा —

"कौन हो तुम लोग! मुझसे क्या चाहती हो!"


एक औरत की आवाज़ आई —

"जो हमारे साथ हुआ, वो सबको दिखाना..."


इतना कह कर वो सब गायब हो गईं।


मैंने ट्रक स्टार्ट किया और वहाँ से निकल भागा।


लेकिन पीछे से अब भी वही आवाज़ आती रही —


"हम फिर आएंगे... तेरे साथ होली खेलने..."


(हाहाहाहाहा)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


मैं बुरी तरह पसीने से भीग चुका था।

गाड़ी चलाते वक्त भी मेरे हाथ कांप रहे थे।

सड़क बिल्कुल सुनसान थी, चारों ओर सिर्फ अंधेरा।


रास्ते में एक चाय की ढाबा दिखाई दिया।

मैंने फौरन ट्रक साइड में रोका और उतरकर ढाबे की ओर बढ़ा।

ढाबे पर बैठे बूढ़े आदमी ने मुझे गौर से देखा, फिर बोला —

"क्या हुआ भईया? चेहरे पे हवाइयाँ क्यों उड़ रही हैं?"


मैंने काँपती आवाज़ में कहा —

"बाबा... वो... वो पुल पर एक औरत मिली थी... और..."

मेरे बोलते ही वो बूढ़ा आदमी चुप हो गया।

फिर बोला —

"तू भी मिल आया उससे?"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने घबराकर पूछा —

"मतलब?"


बूढ़ा धीरे से बोला —

"हर साल होली की रात, वो औरत उस पुल पर दिखती है...

जिसकी होली उसके खून से खेली गई थी..."


"क्या मतलब?" मैंने पसीना पोंछते हुए कहा।


बूढ़े ने गहरी सांस ली और बोला —


"कई साल पहले, उसी होली की रात, गांव के कुछ लड़कों ने उस औरत को जबरदस्ती पकड़ लिया।

उसके साथ बुरा सलूक किया... और फिर उसे जिंदा जला दिया।

उसकी चीखें आज भी हवा में गूंजती हैं।

जब तक उसे इंसाफ नहीं मिलेगा, वो हर होली किसी ना किसी की जान लेने आती है।"


मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

मैंने कांपते हुए पूछा —

"तो क्या वो मुझे मारने आई थी?"


बूढ़ा बोला —

"नहीं बेटा, शायद तुझे कुछ दिखाने आई थी।

शायद तुझे उसका सच दुनिया को बताने का जिम्मा सौंपा है।"


तभी ढाबे के पीछे से एक बच्चा भागता हुआ आया।

उसके चेहरे पर खून लगा हुआ था।

मैं चौंक गया।


बच्चा हांफते हुए बोला —

"दादा... दादा... पुल के पास फिर से वो औरत दिखी... वो किसी आदमी को अपने साथ खींच कर ले जा रही थी!"


मेरे हाथ से चाय का गिलास छूटकर गिर पड़ा।


मैंने तुरंत ट्रक की तरफ दौड़ लगाई।

अब मैं समझ चुका था कि मुझे उस पुल पर जाना ही होगा।

वरना किसी और की जान जा सकती थी।


रास्ते भर मेरे दिमाग में वही जलती हुई औरत की छवि घूम रही थी।


जैसे ही मैं पुल के पास पहुंचा,

ट्रक की हेडलाइट्स में वो फिर दिखी।


इस बार उसके साथ एक आदमी भी था,

जो उसकी गिरफ्त में चीख रहा था।


मैंने जोर से ट्रक का हॉर्न बजाया —

(बीप बीप बीप...)


और जोर से चिल्लाया —

"छोड़ दो उसे! मैंने कहा छोड़ दो!"


औरत ने मेरी तरफ देखा।

उसकी जलती आंखें सीधे मेरी आंखों में झांकने लगीं।

(हाहाहाहाहा)


तभी वो आदमी छूटकर पुल से नीचे गिर पड़ा।

मैंने फौरन ट्रक से उतरकर उसकी तरफ दौड़ लगाई।


वो आदमी बेहोश था, पर जिंदा था।


और वो औरत?

वो फिर से गायब हो गई।


लेकिन जाते-जाते हवा में उसकी फुसफुसाती आवाज़ सुनाई दी —


"एक दिन तुझे भी अपने साथ ले जाऊंगी..."


मेरे रोंगटे फिर से खड़े हो गए।


ट्रक की हेडलाइट अब भी जल रही थी।

मैंने उस आदमी को उठाया और ट्रक में बिठाया।














मगर मेरे दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था...


"क्या मैं अगली होली तक बच पाऊंगा?"


(हाहाहाहाहा)




"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 

उस रात के बाद मेरी ज़िंदगी बदल चुकी थी।

हर तरफ बस वही डरावना चेहरा, वही जलती हुई औरत की परछाई मेरे सामने घूमती रहती थी।

मैं ट्रक चलाता, तो शीशे में उसकी झलक दिखती।

रात को नींद आती, तो सपनों में वही "हाहाहाहा..." की गूंज।


मैंने ठान लिया था कि अब चुप नहीं बैठूंगा।

जिस गांव में उस औरत के साथ ये दरिंदगी हुई थी, वहां जाकर सच्चाई पता करनी होगी।


अगली सुबह मैं ट्रक लेकर उसी गांव की तरफ रवाना हो गया।

गांव का नाम था — "भीलवाड़ा के पास बंजरपुर"।

जैसे ही गांव के बाहर पहुंचा, गांव की वीरानी ने दिल दहला दिया।

ना कोई आवाज, ना बच्चे खेलते हुए, ना ही कोई बाजार।

सन्नाटा पसरा था।


गांव के बुजुर्ग चौपाल पर बैठे थे।

मैंने हिम्मत जुटाकर उनसे पूछा —

"बाबा, यहां कोई औरत थी राधा, जिसके साथ ज़ुल्म हुआ था?"


सुनते ही सबकी आंखें झुक गईं।

एक बूढ़े ने कांपती आवाज़ में कहा —

"बेटा, वो किस्सा अब मत छेड़।

उसकी आत्मा आज भी भटकती है।

होली की रात उसकी चीखें सुनाई देती हैं।

जो भी उसकी बात करता है, उसका हाल बुरा होता है।"


"मगर बाबा, मुझे जानना ही पड़ेगा।"

मैंने ज़िद पकड़ी।


तभी एक और बूढ़े ने धीरे से कहा —

"वो औरत बेकसूर थी।

गांव के ज़मींदार और उसके साथी दरिंदे थे।

उन्होंने ही उसे बदनाम किया, फिर खेत में ले जाकर जला दिया।

पुलिस भी मिली हुई थी।

कोई गवाही देने नहीं गया।

अब उसकी आत्मा हर होली को बदला लेने आती है।"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

ये वही सच्चाई थी, जो वो औरत मुझसे कह रही थी।

मगर सवाल था — "अब क्या करूं?"


जैसे ही मैं गांव से लौटने लगा,

गांव की एक बूढ़ी औरत मेरे पास आई।

उसके हाथ में एक पुरानी, जली हुई चुन्नी थी।

उसने कहा —

"बेटा, ये उसकी आखिरी निशानी है।

अगर तू सच्चा है, तो ये चुन्नी पुल पर ले जाकर रख आ।

शायद उसकी आत्मा को शांति मिल जाए।"


मैंने वो चुन्नी ली।


अगली रात, ठीक होली की रात,

मैं फिर उसी पुल पर पहुंचा।

चारों तरफ सन्नाटा।

हवा में अजीब सी गर्माहट।


जैसे ही मैंने चुन्नी को पुल के बीचों-बीच रखा,

चारों तरफ से आग की लपटें उठने लगीं।

और फिर वो औरत सामने आई,

आंखों में आंसू, मगर चेहरा शांत।


"तूने मेरा संदेश समझा...?"

उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं, दर्द था।


मैंने सिर झुकाते हुए कहा —

"हां बहन, तुझे इंसाफ दिलाऊंगा।"


वो मुस्कराई और कहा —

"अगर तूने वादा तोड़ा,

तो अगली होली पर तेरा इंतजार करूंगी..."


(हाहाहाहाहा...)


फिर वो धुंए में बदल गई।


अब मेरे सामने सवाल था —


"क्या मैं उसका इंसाफ ला पाऊंगा?

या अगली होली पर मैं भी उसी आग में जलूंगा?"


(हाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


उस रात के बाद मेरी हालत बिगड़ती चली गई।

मैं ट्रक स्टैंड पर होता, तो मुझे वो जलती हुई औरत की परछाई दिखती।

ड्राइविंग करते हुए पीछे से वो दर्द भरी हंसी —

"हाहाहाहाहा..."

ऐसे सुनाई देती, जैसे मेरे कान के पास कोई खड़ा हो।


मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा था।

हर दिन डर और पछतावे के साए में जी रहा था।

लेकिन अब मैंने ठान लिया था — "इंसाफ दिलाकर रहूंगा।"


मैंने उसी गांव के सरपंच से मिलने की ठानी।

गांव पहुंचते ही कुछ लोगों ने मुझे अजीब नजरों से देखा।

शायद वो जान गए थे कि मैं किसलिए आया हूं।


सरपंच का घर गांव के बीचों-बीच था।

मैंने दरवाजा खटखटाया।


"कौन है?"

भीतर से आवाज आई।


"मुझे आपसे राधा के बारे में बात करनी है।"

मेरे इतना कहते ही दरवाजा जोर से बंद हो गया।


फिर खिड़की से सरपंच झांका और गुस्से में बोला —

"क्यों भूत की बात छेड़ रहा है बे? जा यहां से, वरना..."


"वरना क्या? जो राधा के साथ किया, वही मेरे साथ भी करोगे?"

मैंने गुस्से में कहा।


सरपंच कुछ देर चुप रहा, फिर धीरे से बोला —

"देख बेटा, जो होना था, हो गया। अब उस बात को भूल जा।"


"मगर राधा की आत्मा नहीं भूली, वो आज भी इंसाफ चाहती है!"

मेरी आवाज ऊंची हो गई।


सरपंच ने गुस्से में कहा —

"अगर ज्यादा बोला, तो तेरी भी जुबान हमेशा के लिए बंद कर दूंगा।"


मुझे समझ आ गया कि गांव के बड़े लोग अब भी उस जुर्म को छुपा रहे हैं।

अब मैं पुलिस के पास जाने की सोच रहा था।


रात को ट्रक में बैठा सोच ही रहा था कि...

अचानक ट्रक का दरवाजा अपने आप खुल गया!


धड़ाम!!


सामने वो औरत खड़ी थी,

चेहरे पर आंसू, और होंठों पर वही डरावनी हंसी।


"मुझे इंसाफ कब मिलेगा? कब?"


मैं कांपते हुए बोला —

"बहन, मैं कोशिश कर रहा हूं।"


उसने गुस्से में कहा —

"कोशिश? वादा किया था न?

अगर इंसाफ नहीं दिला सका, तो अगली होली तक तुझे ले जाऊंगी!"


(हाहाहाहा...)


ये सुनकर मेरी रूह कांप गई।


अब मेरे पास वक्त बहुत कम था।

अगर जल्दी कुछ नहीं किया, तो अगली होली मेरी आखिरी हो सकती थी।


अभी भी कई सवाल मेरे मन में घूम रहे थे —


क्या मैं सरपंच और गांव के गुनहगारों की सच्चाई बाहर ला पाऊंगा?


क्या राधा की आत्मा को शांति मिल पाएगी?


या फिर होली की रात मेरी भी बलि चढ़ेगी?


(हाहाहाहाहा...)



"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


रात के उस सन्नाटे में, राधा की आत्मा की वो डरावनी हँसी —

"हाहाहाहाहा..."

मेरे कानों में गूंज रही थी।


मैं पसीने-पसीने हो गया।

ट्रक के अंदर बैठे-बैठे सोच रहा था —

"अब क्या करूं? अगर सच में अगली होली तक राधा को इंसाफ नहीं दिलाया, तो...?"


उस रात नींद तो दूर, मेरी आँखों से निनद उड़ चुकी थी।

सुबहे होते ही मैं सीधा थाने पहुंचा।


"साहब! मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।"

मैंने कांपती आवाज़ में कहा।


इंस्पेक्टर ने घूरते हुए पूछा —

"क्या बात है?"


मैंने पूरी आपबीती बताई —

"साहब, राधा के साथ जो हुआ... वो... वो भूत बन गई है। मुझे दिखती है, बात करती है।"


इंस्पेक्टर हँस पड़ा —

"तू पागल है क्या? भूत-वूत कुछ नहीं होता। जा यहां से!"


मैंने बहुत मिन्नत की —

"साहब, मैं झूठ नहीं बोल रहा। अगर कुछ नहीं किया, तो और मौतें होंगी।"












तभी पीछे से एक हवलदार बोला —

"साहब, कुछ साल पहले भी ऐसी ही बातें गांव के लोग कर रहे थे। लेकिन आप ही ने केस दबवा दिया था ना?"


इंस्पेक्टर का चेहरा सख्त हो गया।

"तू अपने काम से काम रख! और तुम... निकल यहां से!"


मैं समझ गया —

"इस खेल में पुलिस भी शामिल है।"


अब तो मुझे खुद ही सबूत जुटाने थे।

मैंने फैसला किया कि उस पुराने खेत में जाऊंगा, जहां राधा को जलाया गया था।


रात का वक्त।

आसमान पर बादल छाए हुए थे।

हवा में अजीब सी गंध थी, जैसे कुछ जल रहा हो।


जैसे ही मैं खेत के पास पहुंचा,

मिट्टी से उठती धुंए की लपटें दिखने लगीं।

और फिर...


"हाहाहाहाहा..."


राधा की आत्मा फिर सामने थी।

इस बार उसके हाथ में वही गुलाबी साड़ी का जला हुआ टुकड़ा था।


"ये देख, यही वो साड़ी है, जिसमें मुझे आग लगाई थी!"

उसकी आंखों से खून के आंसू गिर रहे थे।


मैं कांपते हुए बोला —

"बताओ बहन, मैं क्या करूं? कैसे दिलाऊं इंसाफ?"


राधा बोली —

"जिन लोगों ने मुझे मारा, उनकी लाशें चाहिए मुझे। वरना मैं हर होली पर एक जान लूंगी।"


मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।


"लेकिन कैसे करूं मैं ये सब?"

मैंने डरते हुए पूछा।


उसने धीरे से कहा —

"तुम्हें करना ही होगा। वरना अगली होली को तुम्हारी बारी है।"


"हाहाहाहाहा..."


अब सवाल ये था:


क्या मैं उन गुनहगारों तक पहुंच पाऊंगा?


क्या मैं खुद की जान बचा पाऊंगा?


या फिर ये खूनी होली मेरी आखिरी होली होगी?


टाइम बहुत कम था...

कहानी अब और खतरनाक मोड़ लेने वाली थी...


(हाहाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


राधा की वो खौफनाक बात अब मेरे दिल-दिमाग पर छा चुकी थी।

"अगर उन गुनहगारों को नहीं मारा, तो अगली होली मेरी आखिरी होगी..."


मैं रातभर सो नहीं पाया।

सुबह होते ही गांव के एक बूढ़े आदमी के पास गया, जिसे गांव की पुरानी बातें और राधा कांड की पूरी जानकारी थी।


वो एक टूटी चारपाई पर बैठा बीड़ी पी रहा था।

मैंने पूछा —

"बाबा, सच-सच बताओ, राधा को किसने मारा था?"


बाबा ने बीड़ी का कश लेते हुए कहा —

"बेटा, वो जमाना बहुत खतरनाक था। राधा गरीब घर की थी, और ठाकुर के बेटे ने..."


मैंने बीच में ही कहा —

"ठाकुर के बेटे ने क्या?"


बाबा की आंखें भर आईं —

"ठाकुर के बेटे ने राधा के साथ जबरदस्ती की कोशिश की, लेकिन राधा ने इंकार कर दिया। फिर उसे उठवा लिया गया। खेत में ले जाकर... जिंदा जला दिया।"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"और पुलिस?"


बाबा ने हंसते हुए कहा —

"पुलिस तो ठाकुर की जेब में थी बेटा। राधा का केस कभी लिखा ही नहीं गया।"


अब मेरी आंखों में खून उतर आया था।

"ठाकुर का बेटा... वही असली गुनहगार है।"


मैंने बाबा से पूछा —

"अब वो कहां है?"


बाबा बोला —

"वो तो अब भी यहीं है। अपना बड़ा बंगला है उसका, और होली के दिन वो बड़ा जलसा करता है।"


अब मेरे पास वक्त बहुत कम था।

राधा ने कहा था —

"इस होली तक मुझे इंसाफ चाहिए।"


मैंने उसी वक्त फैसला कर लिया —

"अब जो भी हो, मैं राधा को इंसाफ दिलाकर रहूंगा।"


रात को, जब गांव में सब सो रहे थे, मैं चुपके से ठाकुर के बंगले की तरफ निकला।

लेकिन तभी...


पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रख दिया।


"कहां जा रहे हो इस वक्त?"


मैंने पलट कर देखा — गांव का मास्टर था।

मैंने कहा —

"मास्टर जी, जो राधा के साथ हुआ, क्या आप जानते हैं?"


मास्टर की आंखें भी भीग गईं —

"जानता हूं बेटा, लेकिन कोई कुछ कर नहीं सकता। ठाकुर बहुत ताकतवर है।"


मैंने कहा —

"मास्टर जी, अब राधा की आत्मा भटक रही है। अगर मैंने कुछ नहीं किया, तो होली पर बड़ी अनहोनी होगी।"


मास्टर बोले —

"अगर सच में आत्मा भटक रही है, तो इंसाफ जरूरी है। मैं तेरे साथ हूं।"


अब मैं अकेला नहीं था।

मास्टर भी साथ थे।


हमने ठाकुर के बंगले की रेकी की।

पता चला, होली की रात बड़ा जलसा होगा।


वही मौका था —

जहां या तो इंसाफ मिलेगा... या मेरी जान जाएगी।


पर तभी अचानक...

मेरे फोन पर एक मैसेज आया —

"अगर ठाकुर को मारा, तो तेरा भी वही हाल करूंगी।"


मैं कांप गया।

"ये किसका मैसेज है?"


फिर महसूस हुआ —

"कहीं राधा की आत्मा के अलावा कोई और ताकत भी है इस खेल में?"


अब सवाल ये था:


क्या मैं ठाकुर तक पहुंच पाऊंगा?


क्या मास्टर जी मेरा साथ देंगे?


कौन है वो जिसने मुझे धमकी दी?


क्या ये सिर्फ राधा की आत्मा का बदला है या कुछ और भी है?"


सच सामने आने वाला है...

खूनी होली अब पास है...


(हाहाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


अब वक्त बहुत करीब था...

होली की रात आने ही वाली थी।

गांव में चारों तरफ गुलाल, रंग और हंसी-ठिठोली का माहौल बनने लगा था, लेकिन मेरे दिल में एक ही बात घूम रही थी —

"राधा का बदला, और उस धमकी भरे मैसेज का सच।"


मैंने मास्टर जी से कहा —

"आज रात जो भी हो जाए, ठाकुर को उसके गुनाह की सजा जरूर मिलेगी।"


मास्टर जी ने मेरी आंखों में झांकते हुए कहा —

"बेटा, ये रास्ता बहुत खतरनाक है। लेकिन अगर तू ठान चुका है, तो मैं भी तेरे साथ हूं।"


शाम होते-होते गांव के बाहर ठाकुर के बंगले में शराब, डांस और शोरगुल शुरू हो चुका था।

ठाकुर और उसके गुंडे नशे में धुत्त हो रहे थे।

ठाकुर की हंसी...

"हाहाहाहा... राधा की आत्मा...! अगर हिम्मत है तो आकर कुछ कर के दिखाए।"


ये सुनकर मेरा खून खौल उठा।

मैंने मास्टर जी को इशारा किया और चुपके से बंगले के पिछले हिस्से की ओर बढ़ा।


जैसे ही अंदर दाखिल हुआ, दीवारों पर अजीब से लाल धब्बे थे।

जैसे खून के निशान।

और अचानक...

"हाहाहाहा..."

राधा की डरावनी हंसी फिर गूंज उठी।

मास्टर जी ने कांपते हुए कहा —

"ये तो राधा की आत्मा है बेटा... वो यहीं है।"


मैंने धीमे से कहा —

"राधा, मैं तुझे इंसाफ दिलाने आया हूं।"


तभी कमरे की दीवार पर खून से लिखा दिखा —

"ठाकुर को मारो, नहीं तो अगली बारी तुम्हारी है।"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

मास्टर जी बोले —

"इसका मतलब वो आत्मा सच में यहीं भटक रही है।"


हम दोनों धीरे-धीरे ठाकुर के कमरे की ओर बढ़े।

कमरे से तेज़ म्यूजिक की आवाजें आ रही थीं।















ठाकुर नशे में झूम रहा था —

"राधा... ओ राधा... फिर से आ जा, देख तेरा क्या हाल करूंगा..."


इतना सुनते ही...

कमरे की लाइट अपने आप बंद हो गई।

ठाकुर चिल्लाया —

"कौन है बे? कौन?"


तभी खिड़की से राधा की सफेद साड़ी में लिपटी परछाई अंदर आई।

ठाकुर की आंखें फटी की फटी रह गईं —

"न..न..नहीं... राधा! माफ कर दे!"


लेकिन राधा की आत्मा ने ऐसा झपट्टा मारा कि ठाकुर दीवार से टकरा गया।

मैं और मास्टर जी सब देख रहे थे।


तभी राधा की आत्मा ने मुझे देखा, जैसे कह रही हो —

"अब तेरा वक्त है इंसाफ देने का।"


मैंने जेब से चाकू निकाला, लेकिन तभी मास्टर जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया —

"बेटा, खून से कभी इंसाफ नहीं होता।"


मैंने कहा —

"लेकिन अगर इसे जिंदा छोड़ा, तो ना जाने कितनी राधाएं बली चढ़ेंगी।"


मास्टर जी चुप हो गए।


ठाकुर जमीन पर पड़ा कांप रहा था —

"माफ कर दो! मुझे माफ कर दो!"


राधा की आत्मा सामने आकर खड़ी हो गई।

उसकी आंखें लाल...

बाल बिखरे हुए...

और फिर अचानक...

"हाहाहाहा..."


कमरे की दीवारों से खून टपकने लगा।

ठाकुर की चीखें —

"आग लगा दो! मुझे बचाओ!"


और वो अपने आप जलने लगा!

"आग! आग! बचाओ!"


मैं और मास्टर जी भागे...

पूरा कमरा धू-धू कर जलने लगा।


बाहर आकर देखा, लोग होली खेल रहे थे।

किसी को अंदाजा नहीं था कि अंदर क्या हो रहा है।


मास्टर जी ने मुझे देखा और कहा —

"इंसाफ हो गया बेटा। राधा अब चैन से सो पाएगी।"


तभी पीछे से राधा की आत्मा की हल्की आवाज आई —

"शुक्रिया..."


और अचानक हवा में गुलाल उड़ने लगी...

लेकिन वो लाल गुलाल नहीं...

खून की बूंदें जैसी थी।


अब सवाल ये है:


क्या राधा की आत्मा सच में मुक्त हो गई?


या ये कहानी यहीं खत्म नहीं हुई?


क्योंकि जिस रात ठाकुर मरा, उसी रात गांव की एक और लड़की गायब हो गई...


(हाहाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


गांव की वो होली अब कभी ना भूलने वाली हो गई थी।

ठाकुर की मौत के बाद लगा था कि सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन असली खेल तो अब शुरू होना था...


सुबह जैसे ही सूरज निकला, गांव की गलियों में अफवाह फैल गई —

"ठाकुर आग में जल गया, लेकिन उसकी लाश नहीं मिली!"


मैं और मास्टर जी एक-दूसरे की शक्ल देखने लगे।

"क्या मतलब? लाश नहीं मिली?"

मैंने हैरानी से पूछा।


मास्टर जी बोले —

"बेटा, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा।"


तभी गांव की चौपाल पर हंगामा मच गया।

"सीमा नहीं मिल रही! रात से गायब है!"

गांव के लोग चिल्ला रहे थे।


सीमा — वही लड़की जो ठाकुर की अगली शिकार थी।

जिसे बचाने के लिए मैं और मास्टर जी सब कुछ कर रहे थे।


अब सवाल ये था —

"अगर ठाकुर मर गया, तो सीमा को कौन ले गया?"


मैंने तुरंत अपना ट्रक निकाला और मास्टर जी के साथ गांव के बाहर उस पुराने सुनसान रेलवे ट्रैक की तरफ बढ़ गया।

जहां राधा को मारा गया था।


जैसे ही ट्रक रेलवे ट्रैक पर पहुंचा,

एक अजीब सी ठंडी हवा चलने लगी।

चारों ओर सन्नाटा था।


तभी सामने अचानक सीमा दिखी...

फटी हुई साड़ी, बिखरे बाल, डर से कांपती हुई।


मैंने ट्रक रोका और भाग कर उसके पास गया।

"सीमा! ये क्या हाल है तेरा?"

वो कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस कांप रही थी।


तभी पीछे से वो आवाज आई —

"हाहाहाहा..."


मैंने पलट कर देखा, कोई नहीं था।


मास्टर जी बोले —

"ये ठाकुर की आत्मा है... वो मरा नहीं बेटा। अब आत्मा बन चुका है।"


मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।


सीमा ने कांपती आवाज में कहा —

"वो...वो मुझे लेने आया था... कह रहा था... 'अब तो मैं आत्मा बन गया हूं, अब कोई नहीं बचा सकता।'"


मास्टर जी बोले —

"बेटा, अब ये आत्मा रुकने वाली नहीं है। इसका बदला और बड़ा होगा।"


मैंने कहा —

"तो क्या इसका कोई अंत नहीं है?"


मास्टर जी बोले —

"है बेटा, लेकिन उसके लिए वो जगह ढूंढनी होगी जहां राधा की आत्मा कैद है।"


अब हम तीनों उसी खौफनाक जगह की तरफ बढ़े।


रास्ते में मेरा ट्रक खुद-ब-खुद रुक गया।

इंजन बंद, ब्रेक लॉक।


मैं ट्रक से उतरा, तभी देखा —

"राधा की आत्मा सामने खड़ी थी।"

सफेद कपड़े, लाल आंखें, और होंठों पर हल्की सी हंसी।


राधा ने कहा —

"ठाकुर की आत्मा को खत्म करना है, तो मेरी अधूरी होली पूरी करनी होगी।"


मैंने डरते हुए पूछा —

"कैसे?"


राधा बोली —

"जिस जगह मेरा खून गिरा था, वहां होली का रंग चढ़ाना होगा। तभी मेरा बदला पूरा होगा, और ठाकुर की आत्मा मिटेगी।"


तभी अचानक हवाओं में फिर वो हंसी गूंजी —

"हाहाहाहा..."


ठाकुर की आत्मा बोली —

"कोशिश कर लो जितनी करनी है, लेकिन अब मैं अमर हूं।"


अचानक एक जोरदार झटका आया और ट्रक के शीशे अपने आप टूट गए।

सीमा चिल्लाई —

"बचाओ!"


मैंने कसम खाई —

"अब या तो ठाकुर बचेगा या मैं।"


और हम निकल पड़े उस जगह की ओर, जहां राधा की चीखें आज भी गूंजती थीं।


लेकिन सवाल अब भी बाकी है —


क्या ट्रक ड्राइवर राधा की अधूरी होली पूरी कर पाएगा?


क्या ठाकुर की आत्मा को हराया जा सकेगा?


या फिर ये खूनी होली हमेशा के लिए चलती रहेगी...?


(हाहाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


राधा की आत्मा की बात सुनकर मेरे रौंगटे खड़े हो गए।

सीमा अब भी डरी हुई थी, और मास्टर जी बार-बार कोई मंत्र बुदबुदा रहे थे।


मैंने हिम्मत करके पूछा —

"राधा, वो जगह कहां है? जहां तेरा खून गिरा था?"


राधा ने आहिस्ता से इशारा किया —

"गांव से बाहर, उस पुराने पीपल के पेड़ के नीचे। जहां ठाकुर ने मुझे मारा था।"


हवा में ठंडक और तेज हो गई।

हम ट्रक में बैठे और उस खौफनाक जगह की तरफ बढ़ गए।


रास्ते में हर जगह सन्नाटा...

ना कोई आदमी, ना कोई परिंदा।


जैसे ही हम पीपल के पेड़ के पास पहुंचे,

पेड़ के चारों ओर बिखरा खून अभी भी सूखा हुआ था।

जमीन पर राख और जले हुए गुलाल के निशान।


मास्टर जी बोले —

"यहीं राधा की आत्मा बंधी है।"


मैंने जेब से गुलाल निकाला, जो मंदिर से लाया था।

जैसे ही मैंने उसे उस जगह डाला,

अचानक भयंकर आंधी चल पड़ी।

पेड़ की शाखाएं जोर-जोर से हिलने लगीं।


तभी अचानक सामने ठाकुर की आत्मा प्रकट हुई —

"हाहाहाहा... लगता है बहुत हिम्मत आ गई है तुझमें ट्रक ड्राइवर!"


ठाकुर की आंखें खून की तरह लाल।

हाथों में वही कुल्हाड़ी, जिससे राधा की जान ली थी।


मैं चिल्लाया —

"तेरा खेल खत्म ठाकुर!"


लेकिन ठाकुर हंसा —

"खत्म? अभी तो खेल शुरू हुआ है।"


और हवा में गायब हो गया।


अचानक राधा की आत्मा चीख पड़ी —

"जल्दी करो! पूरा गुलाल डालो, वरना सब खत्म हो जाएगा।"


मैं और मास्टर जी ने मिलकर पूरा गुलाल वहां डालना शुरू कर दिया।

जैसे-जैसे गुलाल गिर रहा था,

पेड़ की शाखाएं खून छोड़ रही थीं।


सीमा कांपती हुई मेरे पास आकर बोली —

"भैया, मुझे डर लग रहा है।"


मैंने कहा —

"डर मत, ये आखिरी लड़ाई है।"


तभी ठाकुर की आत्मा फिर प्रकट हुई।

"मुझे कोई नहीं रोक सकता... हाहाहाहा!"


लेकिन इस बार राधा की आत्मा उसके सामने खड़ी हो गई।

राधा चिल्लाई —

"आज तेरा हिसाब पूरा होगा ठाकुर!"


राधा और ठाकुर की आत्माएं एक-दूसरे के सामने।

जैसे दो आंधियां टकरा रही हों।


अचानक सब ओर आग की लपटें उठने लगीं।

पेड़ से लपटें उठीं, और राधा की आत्मा के चारों ओर एक चक्र बन गया।


ठाकुर चिल्लाया —

"नहीं! ये नहीं हो सकता!"


मास्टर जी ने तेज आवाज में मंत्र पढ़ना शुरू किया।

"ॐ क्रीं कालिका, दुर्गा, रक्षा करि, स्वाहा!"


जैसे ही मंत्र पूरा हुआ,

ठाकुर की आत्मा जोर-जोर से चिल्लाने लगी —

"नहीं! मुझे मत जलाओ!"


लेकिन राधा की आत्मा हंसते हुए बोली —

"तेरी सजा अब खत्म होगी, और मेरा बदला भी।"


और देखते ही देखते ठाकुर की आत्मा आग में जल गई।


चारों तरफ सन्नाटा।

हवा भी थम गई।


राधा की आत्मा ने मेरी तरफ देखा —

"शुक्रिया भाई। अब मैं आजाद हूं।"


राधा की आंखों से आंसू गिर रहे थे, लेकिन चेहरे पर सुकून था।

धीरे-धीरे राधा की आत्मा आसमान की ओर उठने लगी, और गायब हो गई।


सीमा ने मेरी तरफ देखा और कहा —

"भैया, क्या अब सब ठीक हो जाएगा?"


मैंने मुस्कुरा कर कहा —

"हां बहन, अब गांव में कोई खून की होली नहीं खेल पाएगा।"


लेकिन तभी पीछे से मास्टर जी बोले —

"बेटा, ये कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।"


मैं चौंक कर बोला —

"क्या मतलब?"


मास्टर जी बोले —

"ठाकुर की आत्मा का एक हिस्सा बच निकला है। वो अब भी ताक में है, कब वापस लौटे, कोई नहीं जानता।"


मैंने आसमान की ओर देखा...

हवा में फिर वो हंसी गूंजी —

"हाहाहाहाहा..."


अब सवाल ये है —


क्या ट्रक ड्राइवर को फिर से उस डरावनी आत्मा का सामना करना पड़ेगा?


क्या सीमा और गांव वाले वाकई सुरक्षित हैं?


या ये खूनी होली फिर से लौटेगी...?


(हाहाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 

गांव लौटते वक्त भी मेरे दिल में अजीब डर समाया हुआ था।

सीमा ने मेरी तरफ देखा और कहा —

"भैया, अब सब ठीक हो जाएगा ना?"


मैंने जबरन मुस्कराने की कोशिश की —

"हां, सब ठीक होगा।"


लेकिन मेरे मन में मास्टर जी की बात घूम रही थी —

"ठाकुर की आत्मा का एक हिस्सा अब भी ज़िंदा है।"


गांव पहुंचते ही लोग इकट्ठा हो गए।

सबके चेहरे पर डर, लेकिन आंखों में उम्मीद।


मास्टर जी ने सबको बताया —

"राधा की आत्मा अब मुक्त है। लेकिन अभी हमें और भी सावधान रहना होगा।"


रात हो चुकी थी।

गांव में अजीब सन्नाटा पसरा था।

मैं ट्रक की सफाई करने लगा,

लेकिन तभी ट्रक के शीशे पर खून के छींटे नजर आए!


"ये कैसे...? मैंने तो सब साफ कर दिया था!"


जैसे ही मैंने शीशा साफ करने के लिए हाथ बढ़ाया,

शीशे पर एक डरावना चेहरा उभर आया —

ठाकुर का!


"हाहाहाहा... मैं फिर आया हूं!"


मैं डर के मारे पीछे हट गया।

लेकिन जब दुबारा देखा,

तो शीशा बिल्कुल साफ था।


मैंने खुद से कहा —

"नहीं, ये मेरा वहम है।"


लेकिन तभी पीछे से एक आवाज आई —

"वहम नहीं हकीकत है, ट्रक ड्राइवर..."


मैंने पलट कर देखा,

कोई नहीं था।


सीमा भागती हुई आई —

"भैया! मास्टर जी बेहोश हो गए हैं! चलिए जल्दी!"


मैं दौड़ता हुआ उनके घर पहुंचा।

मास्टर जी ज़मीन पर गिरे हुए थे।

हाथ में कोई कागज पकड़ा था।


मैंने कागज उठाया,

उस पर लिखा था —

"ठाकुर की आत्मा अब किसी और के शरीर में जा चुकी है।"


मैं चौंक गया —

"मतलब वो आत्मा अब गांव में किसी इंसान के अंदर है?"


मास्टर जी ने धीरे से आंखें खोलीं —

"बचाओ... वो यहीं है... हमारे बीच में।"


मैंने घबराकर पूछा —

"कौन मास्टर जी? कौन?"


मास्टर जी ने कांपती उंगलियों से दरवाजे की ओर इशारा किया।

मैंने जैसे ही दरवाजा खोला...


गांव का मुखिया खड़ा था —

"क्या देख रहे हो ड्राइवर साहब?"


उसकी आंखें अजीब लाल थीं।

चेहरे पर हल्की मुस्कान।


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

क्या ठाकुर की आत्मा अब मुखिया के अंदर आ चुकी है?


मुखिया ने कहा —

"होली तो खत्म हो गई, लेकिन असली खेल अब शुरू होगा।"


और वो हंसते हुए वहां से चला गया।


सीमा मेरे पास आई —

"भैया, ये क्या बोल रहा था?"


मैंने धीरे से कहा —

"सीमा, लगता है हमें फिर से उस आत्मा से लड़ाई लड़नी होगी।"


तभी हवा में फिर वही खौफनाक हंसी गूंजी —

"हाहाहाहाहा..."


गांव की बत्तियां टिमटिमाने लगीं।

दूर कहीं ढोल की आवाजें गूंजने लगीं।

लेकिन ये कोई साधारण ढोल नहीं थे।

उनकी थाप में खून की प्यासी लहर थी।


सीमा ने डरते हुए कहा —

"भैया, अब क्या होगा?"


मैंने धीरे से कहा —

"शायद अब असली खूनी होली शुरू होगी..."


अब सवाल ये है —


क्या ट्रक ड्राइवर इस बार भी उस आत्मा से बच पाएगा?


क्या गांव वाले जान सकेंगे कि ठाकुर की आत्मा किसके अंदर है?


और इस बार होली के दिन कौन बचेगा, कौन मरेगा?


(हाहाहाहाहा...)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


गांव में फिर से डर की हवा फैल गई थी।

मुखिया की लाल आंखें, उसकी बातों का अंदाज… सब कुछ अजीब था।


रात को जब मैं अपने घर के बाहर बैठा था,

ट्रक की हेडलाइट अपने आप जल उठी।

मैं घबरा गया।


"ये कैसे जल सकती हैं? मैंने तो बैटरी निकाल दी थी!"


जैसे ही मैं ट्रक के पास गया,

ड्राइवर सीट पर कोई बैठा था।

मैंने कांपते हाथों से दरवाजा खोला।


कोई नहीं था।

लेकिन सीट गीली थी… जैसे किसी ने अभी-अभी वहां बैठ कर पसीना बहाया हो।


तभी पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज आई —

"क्यों ड्राइवर... डर लग रहा है?"


मैंने पलट कर देखा —

मुखिया खड़ा था।

चेहरे पर वही डरावनी मुस्कान।


"तुम क्या चाहते हो?" — मैंने हिम्मत करके पूछा।


मुखिया पास आया,

धीरे से बोला —

"वो ही जो ठाकुर चाहता था... खूनी होली!"


और वो ज़ोर से हंसा —

"हाहाहाहाहा..."


अचानक हवा चलने लगी।

आसमान में बादल घिर आए।

चारों तरफ अंधेरा छा गया।


मुखिया चला गया।

मैं सोच में पड़ गया —

"क्या सच में ठाकुर की आत्मा अब उसके अंदर है?"


अगले दिन गांव में होली की तैयारी थी।

लेकिन सबके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था।


सीमा मेरे पास आई —

"भैया, हम कहीं और चलें क्या? ये गांव अब सुरक्षित नहीं है।"


मैंने उसे दिलासा दी —

"नहीं सीमा, हमें इस डर का सामना करना ही पड़ेगा।"


तभी गांव की तरफ से ढोल-नगाड़ों की आवाजें आने लगीं।

लेकिन ये ढोल अजीब थे,

उनकी आवाज में एक अजीब कंपन था।


हम दोनों तेजी से गांव के चौक की तरफ भागे।

वहां देखा — मुखिया होली के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ था।

लेकिन रंग लाल था… जैसे खून!


मुखिया चिल्लाया —

"आज की होली में रंग नहीं, खून बहेगा!"


गांव वाले डर के मारे पीछे हट गए।


तभी उसने एक बकरी को पकड़कर उसके गले पर छुरा फेर दिया।

खून का फव्वारा छूट पड़ा।


मुखिया हंसा —

"ये है असली होली!"


गांव वाले भागने लगे।


मैंने पास जाकर कहा —

"तू पागल हो गया है क्या? ये क्या कर रहा है?"


मुखिया मेरी तरफ देखकर बोला —

"मैं नहीं, ठाकुर कर रहा है। मैं तो बस उसका रास्ता हूं।"


फिर उसने मेरी तरफ छुरा घुमाया —

"तेरे ट्रक की वजह से राधा बच गई थी, पर इस बार कोई नहीं बचेगा।"


मैं पीछे हटा,

तभी मास्टर जी आ गए।


"रुक जा ठाकुर! इस बार तेरा खेल खत्म होगा।"


मुखिया हंसा —

"कौन रोकेगा मुझे? तू? ये बूढ़ा मास्टर?"


मास्टर जी ने जेब से कुछ निकाला —

एक पुराना ताबीज।


"यही ताबीज तेरी आत्मा को फिर से कैद कर देगा!"


मुखिया की आंखें लाल हो गईं।

वो मास्टर जी पर झपटा।


मैंने बीच में आकर मास्टर जी को बचाया।


मुखिया गरजा —

"कोई नहीं बचा सकता तुम्हें!"


तभी हवा में फिर वही राधा की दर्दभरी आवाज गूंजी —

"ठाकुर! बस कर! तेरा अंत आ गया है!"


मुखिया कांपने लगा।

उसके चेहरे पर डर उतर आया।


"नहीं! नहीं! मैं हार नहीं सकता!"


तभी ताबीज चमकने लगा।

एक जोरदार झटका हुआ।


मुखिया ज़मीन पर गिर पड़ा।


गांव वाले इकट्ठा हो गए।


मुखिया की आंखें अब सामान्य थीं।

वो घबराकर बोला —

"क्या हुआ? मैं यहां कैसे?"


मास्टर जी ने कहा —

"सब खत्म हो गया... अब ठाकुर की आत्मा हमेशा के लिए बंध चुकी है।"


गांव वालों ने राहत की सांस ली।


मैंने ऊपर आसमान की तरफ देखा,

राधा की आत्मा को जैसे चैन मिला हो।


लेकिन तभी दूर से ढोल की एक हल्की सी आवाज फिर गूंजी...

और हवा में एक धीमी सी हंसी...

"हाहाहाहाहा..."


क्या वाकई सब खत्म हो गया?

या डरावना खेल फिर से शुरू होगा?


(रुकें... क्या आप जानना चाहते हैं, क्या ट्रक ड्राइवर की जिंदगी फिर से पटरी पर लौटेगी? या ये डर कभी खत्म नहीं होगा?)


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


गांव में सब कुछ शांत था... पर वो सन्नाटा किसी तूफान से पहले की शांति जैसा लग रहा था।

मुखिया अब सही था, लेकिन मेरे दिल में अजीब बेचैनी थी।


रात का अंधेरा गहराने लगा।

मैं ट्रक के पास बैठा,

सोच रहा था —

"क्या वाकई सब खत्म हो गया?"


तभी ट्रक के शीशे पर किसी ने दस्तक दी — ठक ठक...


मैंने पलट कर देखा —

कोई नहीं था।

पर शीशे पर लाल हाथ का निशान था... (खून से सना हुआ हाथ!)


मेरी रूह कांप गई।

मैंने फौरन ट्रक का दरवाजा खोला,

इंजन स्टार्ट किया।


इंजन ने एक अजीब सी आवाज की — घर्रर्रर्र...

जैसे किसी की दर्द भरी चीख हो।


तभी अचानक, पीछे की सीट से एक साया निकल कर सामने आ गया।

सफेद साड़ी में लिपटी,

खून से सनी आंखें।


राधा!


वो धीरे-धीरे बोल रही थी —

"तू नहीं बच पाएगा... वो लौट आया है..."


मैं डर के मारे ट्रक से कूद पड़ा।

मेरे पैरों में जान नहीं थी।


पास ही मास्टर जी खड़े थे।

उन्होंने मुझे संभाला।


"क्या हुआ बेटा?"


मैंने कांपती आवाज में कहा —

"राधा... वो... ट्रक में है..."


मास्टर जी गंभीर हो गए।

"तो फिर सब खत्म नहीं हुआ।"


अचानक आसमान में बिजली चमकी — कड़ड़ड़ड़ड़ड़ड़...

और उसी के साथ गांव के बाहर बने पुराने कुएं से आवाज आई —


"हाहाहाहाहा..."


मास्टर जी बोले —

"ठाकुर की आत्मा अब भी भटक रही है।"


मैंने कहा —

"मगर ताबीज तो काम कर गया था?"


मास्टर जी बोले —

"शायद नहीं... या शायद ठाकुर ने किसी और शरीर को पकड़ लिया हो।"


हम दोनों उस कुएं की तरफ बढ़े।


जैसे-जैसे पास जा रहे थे,

कुएं से ठंडी हवा के साथ अजीब सी सड़ांध आ रही थी।

जैसे कोई लाश सड़ रही हो।


कुएं के पास पहुंचते ही एक औरत दिखी,

जो बाल बिखेर कर बैठी थी।

और उसके पास एक बच्चा खेल रहा था।


अंधेरे में बच्चा अचानक हमारी तरफ घूमा।

उसकी आंखें लाल थीं।

चेहरे पर खून के धब्बे।


मास्टर जी ने मेरे हाथ पकड़े —

"पीछे हटो, ये इंसान नहीं है!"


तभी वो औरत उठी और हमारी तरफ देख कर बोली —

"आ गए? तुम्हारा इंतजार था..."


मैं कांपने लगा —

"कौन हो तुम?"


औरत बोली —

"जिसे तुमने छोड़ा था मरने के लिए... ठाकुर की बहन हूं मैं!"


मास्टर जी चौंके —

"क्या? ठाकुर की बहन?"


औरत बोली —

"मेरे भाई की मौत का बदला अब मैं लूंगी... और इस बार होली पर पूरा गांव खून से नहाएगा!"


तभी बच्चा ज़ोर से चीखा —

"हाहाहाहाहाहा..."


अचानक औरत की आंखें काली पड़ गईं।

उसके बाल हवा में उड़ने लगे।

उसके मुंह से खून टपकने लगा।


मैंने मास्टर जी की तरफ देखा —

"अब क्या करें?"


मास्टर जी बोले —

"हमें गांव वालों को बचाना होगा... नहीं तो इस बार कोई नहीं बचेगा!"


मैंने कहा —

"पर कैसे?"


मास्टर जी गंभीर होकर बोले —

"तैयारी करो बेटा... अगली होली खून की होगी... और हमें रोकना होगा!"


आसमान में फिर बिजली चमकी —

"कड़ड़ड़ड़ड़ड़..."


और कुएं के अंदर से फिर वही डरावनी हंसी गूंजी —

"हाहाहाहाहा..."


अब सवाल ये है...

क्या ट्रक ड्राइवर अपने गांव को बचा पाएगा?

क्या ठाकुर की बहन और वो बच्चा रुकेंगे?

या अगली होली वाकई खूनी होगी?


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" 


अगले दिन सुबह की पहली किरण के साथ,

गांव में एक बार फिर सन्नाटा पसरा था।

मास्टर जी और मैं रात की घटनाओं से अब तक सहमे हुए थे।


मास्टर जी ने कहा —

"हमें गांव वालों को ये सब बताना होगा... वरना अगली होली बर्बादी लाएगी।"


मैंने कहा —

"लेकिन मास्टर जी, कौन मानेगा हमारी बात? वो सब तो मान रहे हैं कि सब खत्म हो चुका है।"


मास्टर जी ने गहरी सांस ली —

"कभी-कभी सच को सामने लाना पड़ता है, चाहे लोग माने या ना माने।"


हम दोनों गांव की चौपाल की तरफ बढ़े।

वहां सारे गांव वाले बैठे थे, होली की तैयारी की बात कर रहे थे।

उनके चेहरों पर डर का नामोनिशान नहीं था।


मास्टर जी ने ऊंची आवाज में कहा —

"भाइयों और बहनों, सुनो... इस बार की होली अलग होगी... ये होली 'खून' की होली बनने जा रही है!"


लोग हंसने लगे —

"अरे मास्टर जी, डराना बंद करो।"

"अब भूत-वूत कुछ नहीं, ठाकुर की आत्मा तो चली गई।"


मैंने गुस्से में कहा —

"नहीं गई! मैंने खुद राधा की आत्मा को देखा ट्रक में! और ठाकुर की बहन अब अपने भाई का बदला लेने आई है!"


लोग सहम गए।


तभी बुजुर्ग हरीराम काका बोले —

"अगर ये सच है, तो हमें क्या करना होगा?"


मास्टर जी ने कहा —

"हमें मिलकर उस आत्मा से लड़ना होगा। उसके पास जो ताकत है, वो किसी अकेले के बस की बात नहीं।"


सबकी नजरें मेरे चेहरे पर टिक गईं।

मानो कह रहे हों — "अब तू ही कुछ कर सकता है।"


मैंने ठान लिया — "जो भी होगा, गांव को बचाऊंगा!"


रात को हम सब मिलकर पुराने मंदिर में गए।

जहां गांव के सबसे पुराने पुजारी बाबा रघुनाथ जी मिले।

उनसे जब हमने सब बताया,

उन्होंने गंभीर होकर कहा —

"तुम लोग बहुत बड़ी मुसीबत में फंस चुके हो। ठाकुर की बहन साधारण आत्मा नहीं है। उसे मारने के लिए 'खून' चाहिए... अपने भाई का खून।"


मैं चौंका —

"पर ठाकुर तो मर चुका है!"


बाबा बोले —

"ठाकुर का एक और राज है, जो किसी को नहीं पता।"


हम सब उत्सुक हो उठे।


बाबा ने आंखें बंद कीं और कहा —

"ठाकुर का एक बेटा भी था... जिसे उसने गांव वालों से छुपा कर रखा था। वही बेटा अभी जिंदा है... और अब वही इस प्रेत लीला का अंत कर सकता है।"


गांव में कानाफूसी शुरू हो गई।

सब एक-दूसरे की शक्ल देखने लगे।


मैंने बाबा से पूछा —

"बाबा, वो बेटा कौन है? कहां मिलेगा?"


बाबा बोले —

"वो बेटा यहीं है... गांव में।"


सभी हैरान —

"कौन है वो?"


तभी बाबा की उंगली मेरी तरफ उठी —

"तू... राजू! तू ही ठाकुर का बेटा है!"


मुझे जैसे बिजली का झटका लगा।


"मैं? नहीं बाबा... ये कैसे हो सकता है?"


बाबा बोले —

"तुझे बचपन में गोद लिया गया था। तेरे असली पिता ठाकुर थे। ये सच तेरे मां-बाप ने तुझसे छुपाया।"


मेरे पैर कांपने लगे।

सच ऐसा होगा, कभी सोचा न था।


गांव वाले भी चौंक गए।


मास्टर जी ने मुझे पकड़ते हुए कहा —

"अब तुझे ही अपने खून से उस आत्मा को रोकना होगा।"


मैंने कांपते हुए पूछा —

"क्या करना होगा बाबा?"


बाबा बोले —

"तुझे मंदिर के चबूतरे पर जाकर अपने खून की कुछ बूंदें चढ़ानी होंगी। तभी राधा की आत्मा मुक्त होगी और ठाकुर की बहन की शक्तियां खत्म हो जाएंगी।"


मैं तैयार था... डर के बावजूद।


अगली रात की तैयारी शुरू हुई।

सारी गांव की नजरें मुझ पर थीं।


रात के अंधेरे में मैं मंदिर के पास पहुंचा।

हवा जोर से चल रही थी।

आसमान में काले बादल गरज रहे थे — "गड़गड़गड़गड़..."


जैसे ही मैंने चाकू उठाया और हाथ पर चोट की,

खून की बूंदें जैसे ही जमीन पर गिरीं —

आसमान में जोर की बिजली गिरी — "कड़ड़ड़ड़ड़ड़ड़..."


और सामने राधा की आत्मा प्रकट हुई।

वो मुस्कुरा रही थी —

"अब मैं मुक्त हूं... धन्यवाद बेटे!"


मेरी आंखों में आंसू थे।


लेकिन तभी...


ठाकुर की बहन की डरावनी आवाज आई —

"नहीं! ये नहीं हो सकता!"


वो हवा में उड़ती हुई आई।

उसके साथ वो बच्चा भी,

जिसकी आंखें लाल अंगारे जैसी थीं।


मैंने कांपती आवाज में कहा —

"अब तेरा खेल खत्म!"


मास्टर जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया —

"ॐ भूतप्रेतात्मनाशक मंत्र..."


आसमान और गड़गड़ाया —

"गड़गड़गड़गड़..."


और एक तेज रोशनी में ठाकुर की बहन चीखती हुई गायब हो गई —

"नहीं.... नहीं... हाहाहाहा... नहीं!"


सारा गांव राहत की सांस लेने लगा।

राधा की आत्मा ने मुझे देखा और कहा —

"अब गांव सुरक्षित है।"


और फिर वो भी एक रौशनी में बदल गई।


सुबह होते ही गांव की गलियों में बच्चों की हंसी गूंजने लगी।

गांव फिर से जिंदा हो गया था।


लेकिन मेरे दिल में हमेशा के लिए ये डर बैठ गया...

"क्या सच में सब खत्म हो गया?"


या फिर कहीं न कहीं...

अभी भी अंधेरे में कोई ताकत छुपी बैठी है?


"खूनी होली: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती" (Final Part - Grand Climax)


सुबह की रौशनी के साथ गांव में एक अजीब सी शांति थी।

पिछली रात की घटनाओं के बाद, सबको लगा था कि अब सब कुछ ठीक हो गया है।

लेकिन मेरे दिल की धड़कनें कुछ और ही कह रही थीं।


मैं अपने ट्रक के पास खड़ा था।

सोच रहा था —

"क्या वाकई सब खत्म हो गया? या फिर..."


तभी...


ट्रक के शीशे में एक परछाई दिखी!

मैंने पीछे मुड़ कर देखा...

कोई नहीं था।


लेकिन शीशे में साफ दिख रहा था —

एक लड़की सफेद कपड़े में, काले लंबे बाल, सूनी आंखों से मुझे देख रही थी।


"हाहाहाहाहा..." (भयानक हंसी की गूंज)


मेरे हाथ से पानी की बोतल गिर गई —

"छपाक..."


मेरी सांसें तेज हो गईं।


तभी मास्टर जी मेरे पास आए —

"क्या हुआ राजू?"


मैंने कांपती आवाज में कहा —

"मास्टर जी... वो... वो फिर से आ गई!"


मास्टर जी ने मेरी पीठ पर हाथ रखा —

"डर मत बेटे, अब वो कुछ नहीं कर सकती।"


लेकिन अंदर ही अंदर मास्टर जी भी डर गए थे।


हम दोनों मंदिर की ओर भागे।

बाबा रघुनाथ वहीं बैठे थे।

उन्होंने आंखें बंद कीं और कहा —

"राजू बेटा... शायद कहानी खत्म नहीं हुई।"


मैंने डरते हुए पूछा —

"बाबा अब क्या होगा?"


बाबा बोले —

"राधा की आत्मा तो मुक्त हो गई, लेकिन ठाकुर की बहन ने अपने बदले की आग अब भी जिंदा रखी है।"


मास्टर जी ने पूछा —

"तो बाबा, अब क्या उपाय है?"


बाबा बोले —

"अब इसका अंत तभी होगा, जब वो खुद सामने आएगी। और उसका सामना तुम्हें ही करना होगा, राजू!"


मैं दंग रह गया।


तभी हवा में फिर वही सिहरन दौड़ी —

"श्श्श्श्श्श..."


और मंदिर के दरवाजे अपने आप बंद हो गए —

"धड़ाम..."


हम तीनों अंदर फंस गए।


चारों तरफ अंधेरा छा गया।

दीए की लौ भी बुझ गई —

"फूssss..."


तभी एक डरावनी आवाज गूंजी —

"तुम्हें लगा सब खत्म हो गया? मेरा बदला अभी बाकी है!"


हम तीनों चौंक कर इधर-उधर देखने लगे।

आवाज गूंज रही थी, लेकिन नजर कोई नहीं आ रहा था।


फिर सामने मंदिर की मूर्ति के पीछे से वो औरत निकली।

चेहरा खून से सना, आंखें लाल, बाल बिखरे हुए।


"अब तेरा खून बहेगा, राजू! मेरे भाई के खून का बदला!"


मैंने हाथ जोड़ लिए —

"माफ कर दो... प्लीज माफ कर दो।"


लेकिन वो नहीं मानी।


तभी बाबा ने मंत्र पढ़ने शुरू किए —

"ॐ क्लीं चामुण्डाय विच्चे..."


औरत जोर-जोर से चिल्लाने लगी —

"नहीं! ये मंत्र बंद करो! ये मंत्र नहीं!"


मैंने हिम्मत कर के हाथ में रखा त्रिशूल उठाया।

आंखें बंद कर के सीधे उस आत्मा की तरफ बढ़ा।


"जय माँ दुर्गा!"


जैसे ही त्रिशूल उसके सीने में घुसा —

"छचचचचच..."

भयंकर चीख —

"आआआआआ..."

और वो जलते हुए राख बन गई।


मंदिर के दरवाजे अपने आप खुल गए।


बाबा ने गहरी सांस ली —

"अब उसका अंत हो गया, राजू।"


गांव वाले दौड़ते हुए मंदिर आए।

सब हैरान थे।

मास्टर जी ने सबको सारी कहानी बताई।


गांव वाले बोले —

"तूने गांव को बचा लिया राजू।"


लेकिन मैं अंदर से टूटा हुआ था।


अब मैं फिर से ट्रक स्टार्ट कर के हाईवे की तरफ बढ़ चला।


लेकिन जाते-जाते एक बार पीछे मुड़ कर देखा।

गांव की सरहद पर एक औरत की परछाई अब भी खड़ी थी।

मुस्कराते हुए बोली —

"अभी खेल बाकी है, बेटा... हाहाहाहाहा..."


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


"क्या सच में कहानी खत्म हो गई? या फिर एक नई शुरुआत?"


(The End)


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