मंगलवार, 18 मार्च 2025

Jaisalmer Highway : ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती||Trunk driver Real Horror story||Hindi horror||

 भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य


Part 1: वो रात जब सफर की शुरुआत हुई


मेरा नाम राजेश चौधरी है। मैं राजस्थान के एक छोटे से गाँव फलौदी का रहने वाला हूँ। मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना था - अपना ट्रक होना। लेकिन भाई, सपने पूरे करना आसान कहाँ होता है? पिता जी की मौत के बाद घर की सारी जिम्मेदारी मेरे सिर पर आ गई। माँ बीमार रहती थी और छोटा भाई अभी स्कूल में था। इसलिए मजबूरी में दूसरों के ट्रक पर ड्राइवरी शुरू की।


ये कहानी उस ट्रक की है जो मैं आज भी नहीं भूल पाया।


उस दिन दोपहर के वक़्त मैं अपने गाँव से जैसलमेर की ओर जाने के लिए तैयार हो रहा था। ट्रक मालिक ने मुझे नया सामान पहुंचाने का ऑर्डर दिया था। मेरे साथ था मेरा पुराना साथी शिवराम — जो खलासी था। शिवराम मेरी हर मुश्किल में साथ रहता था। वो भी गांव का ही था, हमेशा हंसते-मुस्कराते रहना उसकी आदत थी। लेकिन उस रात, हंसी उसके चेहरे से गायब हो गई थी।


शिवराम बोला, "भइया, ये जैसलमेर वाला रास्ता ठीक नहीं है। सुना है वहां रात के वक्त अजीब चीजें दिखती हैं।"

मैं हंस पड़ा, "अरे पगले! तुझे तो हर जगह भूत दिखते हैं। काम करना है तो चल, वरना तू यहीं उतर जा।"


शिवराम ने बेमन से ट्रक में चढ़ते हुए कहा, "ठीक है भइया, जैसी आपकी मर्जी।"


शाम तक हम जैसलमेर की ओर रवाना हो गए। हवा में हल्की सी ठंडक थी, और सूरज ढलने लगा था। ट्रक का पुराना इंजन गर्र-गर्र की आवाज कर रहा था, लेकिन मैं उसे ही अपना सहारा मानता था।


रास्ते में शिवराम ने चाय की दुकान पर रुकवाया। वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। उसने हमें घूर कर देखा और पूछा,

"कहाँ जा रहे हो बेटा?"

मैं बोला, "जैसलमेर की तरफ।"

वो अचानक गंभीर हो गया। फिर बोला, "रात को उस रास्ते से मत जाना बेटा, वहाँ रात के समय... अजीब साया घूमता है। कई ट्रक वाले वापस नहीं लौटे।"


शिवराम ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे कह रहा हो — "देखा भइया! मैं न कहता था?"

मैंने मुस्कराकर जवाब दिया, "बाबा, आजकल के भूत भी ट्रक देखते ही डर जाते होंगे।"


बूढ़े ने सिर झटकते हुए कहा, "ठीक है बेटा, भगवान भला करे।"


शिवराम धीरे से बुदबुदाया, "भगवान करे भइया की जुबान सच्ची निकले।"


रात होते-होते हम सुनसान हाईवे पर आ पहुंचे। आसमान में चाँद पूरा नहीं था, अधूरा चाँद और काले बादल माहौल को और डरावना बना रहे थे। रास्ते में दूर-दूर तक कोई ट्रक या गाड़ी नहीं दिख रही थी।


मैं ट्रक की हेडलाइट्स जलाकर सीधा रास्ता पकड़ चुका था। लेकिन शिवराम बार-बार पीछे मुड़कर देखने लगा।

"भइया, कोई पीछा कर रहा है क्या?" उसने धीरे से पूछा।


"अबे पगले, पीछे कौन आएगा? भूत-प्रेत हैं क्या?"


शिवराम ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसका चेहरा पीला पड़ता जा रहा था।


थोड़ी देर बाद मैंने भी रियर व्यू मिरर में झाँक कर देखा। अंधेरे में दूर-दूर तक कुछ नहीं था, लेकिन मन में अजीब सी बेचैनी होने लगी।


तभी अचानक सड़क के किनारे एक औरत दिखी — सफेद साड़ी में। वो झुकी हुई थी जैसे कुछ ढूँढ रही हो।


मैंने ब्रेक मारने की सोची, लेकिन फिर मन को समझाया — "अरे! रात में ऐसे कई पागल घूमते हैं। डरना नहीं है।"


शिवराम चिल्लाया, "भइया, देखो! उधर...!"

"हां देखा! बैठ जा, कुछ नहीं होगा।"


जैसे ही हम औरत के पास से गुजरे, मैंने शीशे में देखा — वो औरत अब हमारे ट्रक के पीछे भाग रही थी!


भाई, रोंगटे खड़े हो गए। ट्रक की स्पीड बढ़ा दी, लेकिन ट्रक जैसे भारी हो गया था। जैसे कोई वजन बढ़ा रहा हो।


शिवराम काँपती आवाज में बोला, "भइया... ट्रक रुक क्यूं नहीं रहा है?"


मैंने डर को काबू में रख कर कहा, "बस चुपचाप बैठ जा शिवराम, कुछ मत बोल।"


ट्रक की हेडलाइट के आगे अब रास्ता भी धुंधला दिख रहा था। लगा जैसे हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों।


और तभी...

एक जोरदार धक्का लगा! ट्रक का स्टेयरिंग मेरे हाथ से लगभग छूट गया!


शिवराम चिल्लाया, "भइया! संभालो!"


और ट्रक धड़ाम से एक तरफ झुक गया।

भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 2: ट्रक में बैठे साये की दस्तक...


भाई, उस रात जो ट्रक एक तरफ झुका, उसका झटका इतना जोर का था कि शिवराम तो सीट पर गिर ही पड़ा। मेरा भी सिर स्टेयरिंग से टकरा गया।


ट्रक का इंजन अभी भी चल रहा था, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वो भी डरा हुआ हो... उसकी घर्र-घर्र की आवाज अब एक अजीब सी कराह में बदल चुकी थी।


शिवराम हांफते हुए बोला,

"भइया... भइया, ये क्या था? ट्रक क्यूँ झटका खा गया? पीछे कोई था क्या?"


मैंने गुस्से में कहा,

"चुप कर, मुझे देखने दे।"


मैंने ट्रक का दरवाजा खोला, नीचे उतरा। चारों तरफ घना अंधेरा, ठंडी हवा की सायं-सायं और दूर रेगिस्तान की ओर भौंकते कुत्तों की आवाजें।


मैंने जेब से टॉर्च निकाली और पीछे जाकर देखा। भाई, पीछे ट्रक के ऊपर, ठीक बीच में, सफेद साड़ी में वही औरत बैठी थी!


उसका चेहरा... ऐसा जैसे जल चुका हो, और आँखें लाल... जैसे अंगारें हों!

मेरे हाथ से टॉर्च गिर गई।


शिवराम भी नीचे उतर आया, बोला,

"भइया... कौन है वो?"


मैं हक्का-बक्का रह गया। औरत धीरे-धीरे ट्रक के ऊपर से नीचे उतरने लगी। उसके पैरों की आवाज रेत में जैसे छुप जाती, पर दिल की धड़कन इतनी तेज हो चुकी थी कि खुद की सांस भी सुनाई दे रही थी।


शिवराम डर के मारे मेरी कमीज पकड़ कर खड़ा हो गया।


और तभी, वो औरत... ट्रक के सामने आकर खड़ी हो गई। सिर नीचे झुका हुआ, बाल पूरे चेहरे पर।


हम दोनों की हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ बोलने की।


फिर उसने सिर उठाया... भाई, उसकी आंखें सूखी नहीं थी, उनमें से काले रंग का खून गिर रहा था।


और उसने धीरे-धीरे कहा,

"मुझे मेरे बच्चों के पास छोड़ दो..."


शिवराम तो वहीं गिर पड़ा, घुटनों के बल।


"भइया, ये क्या बोल रही है? कौन है ये? क्या चाहती है?"


मेरे मुँह से भी आवाज नहीं निकल रही थी।


तभी ट्रक का इंजन खुद-ब-खुद बंद हो गया।


और अचानक... सन्नाटा।


लेकिन भाई, असली खौफ तो तब शुरू हुआ जब उसने अपना हाथ धीरे-धीरे ट्रक की बोनट पर रखा।













और ट्रक की बॉडी से जैसे चीखने की आवाज आने लगी... एक औरत की चीख।


शिवराम मुझसे चिपक कर बोला,

"भइया, भाग चलें यहां से, छोड़ दे ये ट्रक, कुछ भी कर, भइया!"


लेकिन भाई, कैसे छोड़ देता? वो ट्रक मेरी रोजी-रोटी थी।


मैंने हिम्मत जुटाई, और जोर से कहा,

"तू कौन है? क्या चाहिए तुझे?"


वो औरत चुप रही। बस धीरे-धीरे मुस्कराई।

फिर उसने कहा,

"जिस रास्ते से तुम आए हो... उसी रास्ते से लौट जाओ। वरना... मौत मिलेगी।"


शिवराम कांपती आवाज में बोला,

"भइया, मत उलझ इस साए से... चल वापिस चलते हैं।"


भाई, दिल पे पत्थर रख के स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन ट्रक स्टार्ट नहीं हो रहा था।


और तभी... काले बादलों में बिजली चमकी, और तेज हवाओं के साथ वो औरत गायब हो गई।


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 3: साए का खेल और ट्रक की जंजीरें


भाई, जब वो औरत हवा में गायब हो गई, तब भी हवाओं में उसकी मौजूदगी साफ महसूस हो रही थी। जैसे कोई बस दिख नहीं रहा, लेकिन आसपास ही घूम रहा हो।


शिवराम कांपती आवाज में बोला,

"भइया, ये जगह सही नहीं लग रही, कुछ तो है यहां। हमें जल्दी यहां से निकलना चाहिए।"


मैंने भी सोचा कि ट्रक स्टार्ट करना ही पड़ेगा, चाहे कुछ भी हो।

लेकिन ट्रक की चाबी घुमाते ही एक अजीब सी खरखराहट की आवाज आई, जैसे ट्रक के अंदर कोई बैठा हो और चेन खींच रहा हो।


शिवराम की आंखें फटी की फटी रह गईं,

"भइया... अंदर कोई है क्या?"


मैंने झट से ट्रक का दरवाजा खोला और सीट के नीचे झांका।

भाई, काले धुएं जैसा कुछ नीचे से सरकता दिखा...

और फिर जैसे ही मैंने सीट के पीछे देखा —

वहां जंजीरों में बंधी एक औरत की परछाई दिखी!


वो परछाई, हड्डियों की तरह पतली, चेहरा काला, बाल बिखरे हुए।

उसके होंठ फटे हुए, और वो फुसफुसा रही थी,

"मुझे बचा लो... ये रास्ता मत पकड़ो..."


भाई, रूह तक कांप गई मेरी।


मैं पीछे हटते ही शिवराम से टकराया।

"भइया, कौन है पीछे?" — शिवराम हांफते हुए बोला।


मैंने धीमे से कहा,

"शिवराम... कुछ बहुत बड़ा चक्कर है इस रास्ते पर।"


शिवराम मेरी बात सुनते ही हाथ जोड़ने लगा,

"भइया, तू बड़ा है, जो भी फैसला कर, लेकिन मुझे यहां से निकाल ले, मुझे नहीं मरना।"


ट्रक के अंदर से अब भी जंजीरों के घिसटने की आवाजें आ रही थीं।


और तभी भाई, ट्रक की हॉर्न अपने आप बज उठी!

इतनी जोर की आवाज हुई, जैसे किसी ने गुस्से में दबाया हो।


ट्रक की हेडलाइट अपने आप ऑन हुई, और सीधे सामने की रेत पर पड़ते ही हमें एक बूढ़ी औरत दिखी, जो बिलकुल सफेद कपड़ों में लिपटी थी।


भाई, उसकी आंखें नहीं थी! बस काले गहरे गड्ढे।

वो धीरे-धीरे हमारी ओर आने लगी।


शिवराम तो सीट पर ही बैठा कांपने लगा,

"भइया, ताला लगा दे दरवाजा! बंद कर दरवाजा!"


मैंने जल्दी से ट्रक का दरवाजा बंद किया,

लेकिन भाई, उस औरत की परछाई शीशे से आर-पार आ रही थी!


और फिर उसके मुंह से निकली आवाज —

"तुम भी उसी की तरह जाओगे... जिसने मुझे छोड़ा था इस रास्ते पर..."


भाई, रूह कांप गई।

"कौन? कौन छोड़ा तुझे?" — मैंने कांपते हुए पूछा।


लेकिन जवाब नहीं आया...

बस हवा का एक तेज झोंका आया, और वो गायब हो गई।


अब हम दोनों ट्रक के अंदर थे, लेकिन ट्रक का इंजन, लाइट्स, हॉर्न सब अपने आप चल रहे थे।


और भाई, सबसे डरावनी बात —

हमारे पीछे ट्रक की बॉडी पर खून से लिखा था — "अब लौटना मना है।"


शिवराम फूट-फूट कर रोने लगा,

"भइया, घर जाना है भइया, ये ट्रक छोड़ दे भइया!"


मैंने सोचा,

"अब क्या किया जाए? ट्रक की चाबी घुमाऊं या ये रास्ता छोड़ दूं?"


भाई, सामने अंधेरा और पीछे साया... बचने का रास्ता कहां था?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 4: ट्रक की घिसटती जंजीर और साये की दस्तक








भाई, उस रात की स्याही में अब तो ट्रक के अंदर बैठना भी जैसे मौत को गले लगाने जैसा लग रहा था।

शिवराम की हालत ऐसी थी जैसे किसी ने उसकी रूह निकाल ली हो।


मैंने बहुत हिम्मत जुटाकर चाबी घुमाई।

ट्रक "घूंघ... घूंघ..." की अजीब आवाजें निकालता, लेकिन स्टार्ट नहीं हो रहा था।

और तभी भाई, ट्रक के पीछे से किसी भारी जंजीर के घसीटने की आवाज आई।


जैसे कोई किसी को बांधकर घसीट रहा हो।


शिवराम मेरी तरफ देख के बोला,

"भइया, कुछ है पीछे, देख तो सही।"


भाई, दिल पे पत्थर रखकर दरवाजा खोला और बाहर निकला।

जैसे ही घूमकर ट्रक के पीछे देखा —


भाई सारा खून से सना था!

और ट्रक के पीछे बंधी थी एक लंबी मोटी जंजीर... जो रेत पर घिसटती चली जा रही थी।

लेकिन सबसे खौफनाक बात — जंजीर का दूसरा सिरा रेत के नीचे गायब था!


भाई, वो जंजीर खुद-ब-खुद हिल रही थी, जैसे किसी को घसीटते हुए ट्रक के पीछे लाया जा रहा हो।

शिवराम पीछे से कांपती आवाज में बोला,

"भइया, ये क्या है? ये किसकी जंजीर है?"


मैंने धीमे से कहा,

"भाई, लगता है इस ट्रक के पीछे कोई बहुत पुराना साया है... जो अभी भी बंधा है..."


तभी भाई, रेत के नीचे से किसी के नाखून रगड़ने की आवाज आई।

"खर्र... खर्र..."


जैसे कोई जिंदा इंसान मिट्टी में दबा हो, निकलने की कोशिश कर रहा हो।


शिवराम तो घबराकर वहीं गिर पड़ा,

"भइया, मुझे यहां से निकाल, मुझे अपने माई-बाप की कसम, भइया!"


मैंने सोचा, "अब या तो ट्रक स्टार्ट करू या यहां से पैदल भाग जाऊं।"


फिर भाई, हिम्मत कर के चाबी फिर घुमाई —

और अचानक ट्रक एक झटके में स्टार्ट हो गया!

लेकिन ट्रक स्टार्ट होते ही पीछे बंधी जंजीर तेजी से खिंचने लगी।


ऐसा लगा जैसे कोई बहुत भारी चीज ट्रक के पीछे बंधी हो, जिसे मैं घसीट रहा हूं।


शिवराम जल्दी से चढ़ गया ट्रक में।

"भइया, भाग यहां से! भाग भइया!"


मैंने ट्रक रफ्तार में डाला,

लेकिन भाई, आगे रेत के धुंध में वही सफेद साया रास्ता रोके खड़ा था!

वो अब और पास आ गया था, और उसके चेहरे पर गहरे कट के निशान थे, जैसे किसी ने उसे बहुत मारा हो।


और उसके फटे होंठों से आवाज निकली,

"क्यों ले जा रहे हो उसे? उसे भी तो मारा था... अब तुम भी जाओगे उसके साथ..."


भाई, दिल जोर से धड़कने लगा।

शिवराम मुझे पकड़ के बोला,

"भइया, क्या करें भइया? ट्रक मोड़ दे, भइया! ये रास्ता सही नहीं!"


मैंने ट्रक मोड़ने की कोशिश की,

लेकिन भाई, ट्रक की स्टीयरिंग खुद घूमने लगी!

जैसे कोई और ट्रक चला रहा हो।


और फिर भाई, ट्रक अपने आप उसी रास्ते पर भागने लगा,

जहां से हर बार लोग गायब हो जाते हैं।


शिवराम की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।

"भइया, हम भी नहीं बचेंगे क्या?"


भाई, सच्ची बात बताऊं, उस वक्त मेरे मन में भी यही सवाल था।

"क्या आज रात जिंदा लौटेंगे?"


और ट्रक की हेडलाइट के सामने अब वो औरत का चेहरा साफ दिखने लगा, खून से सना हुआ, और उसकी आंखों में नफरत की आग!


भाई, खेल बहुत गहरा था... हम किस जाल में फंस गए थे... ये समझना मुश्किल था।


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 5: रात की साजिश और ट्रक के भीतर छुपा डर


भाई, अब ट्रक पूरी रफ्तार में था, लेकिन स्टीयरिंग किसी और के हाथ में लग रहा था।

मैं और शिवराम सिर्फ देख रहे थे कि ट्रक खुद-ब-खुद कैसे उस सुनसान रास्ते पर भागा जा रहा है।


शिवराम की आंखें फटी की फटी रह गईं।

"भइया, कोई है ट्रक में... देख ना भइया... देख कौन चला रहा है?"


मैंने हिम्मत करके एक नजर अपनी बगल वाली सीट पर डाली।

भाई, शिवराम तो मेरे बगल में बैठा था, लेकिन... ड्राइवर की सीट पर मेरे साथ और कोई भी नहीं था!

फिर कौन था जो स्टीयरिंग घुमा रहा था?


तभी भाई, साइड शीशे में मैंने देखा... कोई औरत पीछे ट्रक के डाले पर खड़ी है!

सफेद लिबास, खुले लंबे बाल, और आंखों से काला खून टपकता हुआ।


भाई, उस साए की आंखें हम दोनों को घूर रही थीं।

शिवराम ने भी देख लिया और कांपते हुए बोला,

"भइया... वो... वो फिर आ गई..."


भाई, अभी हम संभल भी नहीं पाए थे कि ट्रक के अंदर जोर की दस्तक हुई —

"ठक... ठक... ठक..."


जैसे कोई ट्रक के दरवाजे पर घूंसे मार रहा हो।

शिवराम ने तो रोना शुरू कर दिया,

"भइया, रुक जा ना... रुक जा भइया! नीचे उतर के भागते हैं!"


लेकिन भाई, ट्रक रुक ही नहीं रहा था।

ब्रेक दबा रहा था, लेकिन ब्रेक पत्थर की तरह जाम।


और भाई, ट्रक की हेडलाइट की रोशनी में सामने दिखा —

बीच सड़क पर वही औरत खड़ी थी, हाथ उठाकर जैसे रोकना चाह रही हो।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया, बचा ले भइया! वो मारेगी हमको!"


मैंने स्टीयरिंग घुमाने की कोशिश की,

लेकिन भाई, ट्रक सीधे उसी की तरफ जा रहा था।


जैसे ही ट्रक उसके पास पहुंचा, भाई, औरत ने अपनी आंखें बड़ी बड़ी कर दीं, और चेहरा काला पड़ गया!

भाई, कसम से — ट्रक उसके आर-पार निकल गया, लेकिन वो गायब नहीं हुई।

हमारे ठीक सामने की सीट पर बैठ गई,

और धीरे से बोली,

"तुम भी नहीं बचोगे... मेरे राज़ जान लिए ना... अब वापस नहीं जाओगे..."


शिवराम तो कांपते हुए मेरी गोदी में सर रख लिया।

"भइया... भइया, वो क्या बोल रही है? भइया, हमें छोड़ दे ना..."


भाई, अब ट्रक की स्पीड और बढ़ गई थी।

रेगिस्तान की काली रात, दूर तक कोई रोशनी नहीं, और ट्रक के भीतर बस मौत का साया।


फिर भाई, अचानक ट्रक के रेडियो में आवाज आई —

"वो नहीं छोड़ेगी... कोई नहीं बचा उस रास्ते पर... जिस रास्ते पर तुम निकले हो..."


भाई, रेडियो तो बंद था!

फिर ये आवाज कहां से आई?


मैंने जोर से चिल्लाया,

"कौन है तू? क्यों कर रहा है ऐसा?"


भाई, तभी सीट के पीछे से आवाज आई —

"जिसने मेरा खून किया... उसका कर्ज तुम्हारे सिर है..."


भाई, सारा शरीर सुन्न हो गया।

शिवराम ने धीरे से कहा,

"भइया, कहीं ये ट्रक का ही राज़ तो नहीं... कोई इसमें मारा गया हो...?"


मैंने कांपती आवाज में कहा,

"शिवराम... कुछ बहुत बड़ा खेल है... और अब हम उस खेल में फंस गए हैं..."


भाई, अब हम दोनों की सांसें रुक रहीं थीं।

ट्रक अब किसी सुनसान वीराने की ओर जा रहा था, जहां सिर्फ रेत और अंधेरा था।












शिवराम बोला,

"भइया, अब क्या करेंगे? क्या आज बचेंगे भइया?"


और भाई, जैसे ही शिवराम ने ये बोला —

ट्रक खुद-ब-खुद बंद हो गया।

पूरा सन्नाटा छा गया।

बस हमारी सांसों की आवाज और दूर कहीं कोई साया...


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 6: ट्रक की खामोशी और साए की दस्तक


भाई, ट्रक अचानक वीराने के बीच रुक गया।

ना इंजन की आवाज, ना हवा की सरसराहट...

बस एक अजीब सा सन्नाटा, जो सीधे दिल की धड़कनों तक उतर रहा था।


शिवराम ने कांपते हुए मेरी बाजू पकड़ ली,

"भइया... ये सब क्या हो रहा है? ट्रक ऐसे कैसे रुक सकता है? तेल भी पूरा है..."


मैंने कांपती आवाज में कहा,

"पता नहीं शिवराम... लेकिन कुछ बहुत गलत है।"


भाई, तभी ट्रक के पीछे की ओर से कोई आहट हुई।

जैसे कोई नंगे पांव रेत पर चल रहा हो...

"स्स्स्स... स्स्स्स..." रेत की खिसकती आवाज!


मैंने शीशे से झांक कर देखा —

भाई, वो औरत अब ट्रक के पीछे खड़ी थी, बाल हवा में उड़ रहे थे और उसकी आंखें जैसे आग की तरह जल रही थीं।


शिवराम ने भी देख लिया और डर के मारे आंखें बंद कर लीं,

"भइया... भइया... अब हम नहीं बचेंगे भइया...!"


मैंने कहा,

"शिवराम... हिम्मत रख, देखना पड़ेगा... भाग नहीं सकते अब।"


तभी भाई, ट्रक के दरवाजे पर जोर की दस्तक पड़ी — "धड़ाम... धड़ाम..."

जैसे कोई पूरे जोर से दरवाजा फाड़ने की कोशिश कर रहा हो।


शिवराम जोर से चिल्लाया,

"भइया! दरवाजा मत खोलना! भइया!"


भाई, दरवाजा अपने आप खुलने लगा, किवाड़ चर्र... चर्र... कर के।

और उस दरवाजे के पार, अंधेरे में वो औरत धीरे-धीरे अंदर झांकने लगी।


भाई, उसकी आंखें बिलकुल लाल...

चेहरे पर डरावनी मुस्कान...

और फिर वो बोली —

"क्यों आए हो मेरे रास्ते में...? क्यों छेड़ा तुमने मेरे ठिकाने को?"


मैंने कांपते हुए पूछा,

"तू कौन है? और हमसे क्या चाहती है?"


भाई, उसका जवाब सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

वो बोली —

"ये ट्रक मेरा है... और जिसने मुझे मारा था, वो भी इसी ट्रक में था... अब जो भी इस ट्रक में चढ़ेगा, वो जिंदा नहीं बचेगा..."


शिवराम सिसकने लगा,

"भइया... ये ट्रक... ये ट्रक तो रमेश भइया का था ना? जिनकी मौत साल भर पहले इसी हाईवे पर हुई थी?"


मैंने चौंक कर देखा शिवराम की तरफ,

"तू कैसे जानता है?"


शिवराम बोला,

"भइया, गांव में सब कहते थे, रमेश भइया की मौत सड़क हादसा नहीं थी, कोई साया था जिसने ट्रक पलटा दिया था..."


भाई, उस औरत ने भी सुन लिया, और जोर से हंसने लगी —

"हाहाहाहा... रमेश... वो मुझसे बच नहीं पाया... अब तुम भी नहीं बचोगे..."


भाई, उसकी हंसी ट्रक के हर कोने में गूंज रही थी।


तभी भाई, ट्रक की हेडलाइट अपने आप जल उठी, और उस रौशनी में वो औरत साफ दिख रही थी — पूरा सफेद कपड़ा, खून से सना हुआ।

उसकी आंखें अब और लाल हो चुकी थीं।


मैंने हिम्मत कर के पूछा,

"क्यों कर रही है ये सब? क्या चाहती है हमसे?"


वो बोली,

"इंसाफ... इंसाफ चाहिए मुझे... मेरे कातिल को सज़ा चाहिए... और जब तक नहीं मिलेगा, जो भी इस ट्रक में बैठेगा, वो मरेगा..."


शिवराम ने डरी हुई आवाज में पूछा,

"लेकिन दीदी, आपके कातिल को कैसे ढूंढें?"


भाई, वो औरत धीरे से बोली —

"ये ट्रक जानता है... ये रास्ता जानता है... अगर तुम बचना चाहते हो, तो मेरी सच्चाई सबके सामने लाओ..."


भाई, इतना बोलकर वो औरत गायब हो गई।

बस ट्रक के अंदर उसकी हल्की खुशबू और डर की परछाई बची।


शिवराम ने कांपते हुए पूछा,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने लंबी सांस ली और कहा,

"शिवराम, अब पीछे नहीं हट सकते... इस ट्रक के राज को खोलना ही पड़ेगा... नहीं तो अगला नंबर हमारा है..."


भाई, अब फैसला हो चुका था...

लेकिन कैसे करेंगे ये सब?

इस ट्रक के भूत को सच्चाई तक कैसे पहुंचाएंगे?

और क्या हम जिंदा बच पाएंगे?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 7: साये का सच और ट्रक की कहानी


भाई, उस रात ट्रक में बैठकर हमने जितना सोचा था, उससे कहीं ज्यादा डरावना खेल हमारे साथ हो चुका था।

मैं और शिवराम — दोनों की सांसें ऊपर-नीचे हो रही थीं, जैसे मौत सामने खड़ी हो।


मैंने कांपती आवाज में कहा,

"शिवराम... जो भी हो... अब हमें इस ट्रक की सच्चाई जाननी ही पड़ेगी... वरना अगली सुबह शायद देख भी ना पाएं..."


शिवराम धीरे से बोला,

"भइया... रमेश भइया की मौत के बाद ये ट्रक लंबे वक्त तक बंद रहा... फिर अचानक किसी ने इसे ठीक करवा दिया..."


मैंने पूछा,

"किसने?"


शिवराम बोला,

"भइया, गांव में सब कहते हैं मुंशी लाल ने... वो ठेकेदार जो रमेश भइया को हर काम दिलवाता था..."


भाई, मुझे जैसे मन में एक शक सा हुआ।


"शिवराम, तू कह रहा है रमेश की मौत हादसा नहीं थी? फिर?"


शिवराम ने गहरी सांस ली,

"भइया, कुछ लोग कहते थे कि रमेश भइया ने किसी की जमीन का ट्रक से जबरदस्ती माल उठाया था... और उसी जमीन की औरत... उसी औरत की आत्मा










 इस ट्रक से बंध गई..."


भाई, मैं एकदम से चौंक गया,

"मतलब ये ट्रक सिर्फ गाड़ी नहीं, किसी की कब्र बन चुका है?"


शिवराम ने सिर हिलाया।


भाई, तभी अचानक ट्रक का हॉर्न अपने आप बजने लगा — "पौं... पौं... पौं..."

मैं और शिवराम डर के मारे सीट से चिपक गए।


फिर जैसे ड्राइवर सीट पर कोई बैठ गया हो, सीट नीचे धंसने लगी... और स्टेयरिंग अपने आप हिलने लगा।


शिवराम डर के मारे चिल्लाया,

"भइया! कोई बैठा है सामने! देखो ना भइया!"


भाई, मैंने डरते हुए सामने देखा —

सामने वो औरत बैठी थी, वही खून से सना सफेद कपड़ा, आंखें जलती हुई...


फिर धीरे-धीरे ट्रक की हेडलाइट अपने आप जल उठी।

औरत ने स्टेयरिंग पकड़ लिया और बोली —

"चलो मेरे साथ... देखो मेरा सच..."


भाई, जैसे ही उसने कहा,

ट्रक अपने आप स्टार्ट हो गया।

मैं और शिवराम कुछ कर ही नहीं सके।


गियर अपने आप बदल रहा था, एक्सीलेटर अपने आप दब रहा था।

ट्रक रफ्तार पकड़ चुका था, और हम दोनों उसमें कैद।


शिवराम फूट-फूट कर रोने लगा,

"भइया... अब बच नहीं पाएंगे... ये औरत हमें ले जाएगी..."


भाई, लेकिन मैं जान चुका था,

वो औरत हमसे अपना बदला नहीं, अपनी सच्चाई दिखाना चाहती है।


मैंने हिम्मत जुटाई और पूछा,

"क्या दिखाना चाहती हो? क्यों पकड़ कर ले जा रही हो?"


वो औरत बस हल्की सी मुस्काई —

"तुम देखोगे... मेरा सच... मेरा दर्द..."


भाई, ट्रक सीधा रेगिस्तान की तरफ मुड़ गया।

चारों तरफ रेत और सिर्फ अंधेरा।

हवा की आवाज, कुत्तों की दूर तक रोने की आवाज, और ट्रक की गूंजती रफ्तार।


तभी भाई, सामने एक वीरान खंढहर दिखाई दिया।

ट्रक वहीं आकर रुक गया।


और फिर...

वो औरत ट्रक से उतर गई।

हम दोनों कांपते हुए उसके पीछे-पीछे उतरे।


भाई, खंढहर के पास पहुंचते ही वो औरत एक जगह खड़ी हो गई और अपनी तरफ इशारा किया।


"यहीं... यहीं से सब शुरू हुआ..."


भाई, तभी जैसे हवा ने उसकी आवाज दोहराई —

"यहीं... यहीं..."


मैंने कांपते हुए पूछा,

"क्या हुआ था यहां?"


और भाई, तभी वो औरत बोली —

"यहीं मुंशी लाल ने मुझे मारा था... और मेरा सब कुछ छीन लिया..."

"फिर मेरे शव को ट्रक में डाल कर रेत में फेंक दिया... और कहा, कोई नहीं ढूंढ पाएगा..."


भाई, मेरी रूह कांप गई।

शिवराम सिसकने लगा,

"भइया... ये सब तो हमने सोचा भी नहीं था..."


वो औरत आगे बोली,

"अब इस ट्रक में बैठने वाला हर इंसान तब तक सज़ा पाएगा... जब तक मुंशी लाल का सच सामने नहीं आएगा..."


भाई, मैं और शिवराम अब सोच में पड़ गए,

"मुंशी लाल ने अगर ये सब किया है, तो हमें उसकी सच्चाई बाहर लानी होगी।"


मैंने उस औरत से कहा,

"तू वादा कर, अगर हम तेरा सच बाहर लाएंगे तो तू किसी मासूम ड्राइवर को नहीं सताएगी?"


वो औरत थोड़ी देर चुप रही,

फिर बोली —

"अगर तुम मेरा सच सामने लाओगे, तो ये ट्रक छोड़ दूंगी..."


भाई, अब हम जानते थे कि क्या करना है।

लेकिन मुंशी लाल जैसा ताकतवर आदमी... उसके खिलाफ सबूत लाना... आसान नहीं था।


अब आगे क्या होगा? क्या हम इस साए से मुक्ति पाएंगे? क्या ट्रक फिर कभी सही चलेगा? या हम फंस चुके हैं हमेशा के लिए?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 8: मुंशी लाल का काला सच और ट्रक का रहस्य


भाई... उस रात जो कुछ भी हुआ, वो सोच कर आज भी रूह कांप जाती है।

ट्रक की हेडलाइट्स के सामने वो औरत खड़ी थी, आंखों में ऐसा गुस्सा, जैसे बरसों का इंतजार खत्म होने वाला हो।

उसने हमसे वादा लिया था —

"मेरा सच दुनिया को बताओगे, तभी ये साया हटेगा।"


भाई, हम दोनों — मैं (विक्रम) और शिवराम, अब उसी मुंशी लाल तक पहुंचने की ठानी।

लेकिन भाई, मुंशी लाल कोई आम आदमी नहीं था।

गांव का सबसे बड़ा दलाल, पॉलिटिक्स तक हाथ था उसका।

हर कोई उससे डरता था।


शिवराम कांपती आवाज में बोला,

"भइया, अगर सच लाने गए तो वो हमें भी मार देगा... जैसे उस औरत को मारा..."


मैंने लंबी सांस ली,

"शिवराम, अगर डर के पीछे हट गए, तो न वो औरत चैन पाएगी... न हम।"


भाई, ट्रक वहीं खड़ा था, जैसे अब वो हमारा साथी बन गया हो, ना की भूतिया।


हमने सोचा —

सबसे पहले उस जमीन के बारे में पता लगाना होगा, जिस पर ट्रक से जबरन माल उठाया गया था।


भाई, अगले दिन हम गांव के सबसे बूढ़े आदमी "रामदीन चाचा" के पास पहुंचे।

रामदीन चाचा की आंखें सब देख चुकी थीं।

मैंने धीरे से पूछा,

"चाचा, एक बात पूछनी है... वो जमीन की कहानी क्या है, जहां वो औरत रहती थी?"


रामदीन चाचा का चेहरा सफेद पड़ गया,

"काहे पूछ रहे हो बेटा? उस जगह का नाम भी लोग नहीं लेते।"


मैंने कहा,

"चाचा, सच जानना जरूरी है। नहीं तो और जाने जाएंगी।"


रामदीन चाचा ने डरते-डरते बताया,

"बेटा, उस औरत का नाम गुलाबो था। गरीब थी, लेकिन अपनी इज्जत की पक्की।

मुंशी लाल ने अपनी हवस के लिए पहले उसे डराया, फिर जमीन छीनने की कोशिश की।

जब गुलाबो ने इंकार किया, तो एक दिन उसका कत्ल कर दिया।

कहते हैं, उसका शरीर ट्रक में डाल कर रेत में गाड़ दिया।"


भाई, ये वही ट्रक था... वही!

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

शिवराम की आंखों में आंसू आ गए।

"भइया... वो बेचारी क्या करेगी अब?"


रामदीन चाचा बोले,

"मुंशी लाल ने तब से हर साल वो ट्रक बिकवाया, लेकिन जो भी चलाता... वो या तो मर जाता या पागल हो जाता।

ये ट्रक अब खुद उसकी सज़ा बन गया है।"


भाई, अब सारा खेल समझ में आ रहा था।


हमने सोचा, अब मुंशी लाल से सीधे मिलना पड़ेगा।


रात को हम दोनों उसी ट्रक में बैठे,

शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया, ये ट्रक फिर से चालू ना हो जाए अपने आप?"


मैंने ट्रक के स्टीयरिंग को हाथ लगाया,

"नहीं भाई, अब ये हमारे साथ है।"


भाई, जैसे ही मैंने कहा, ट्रक अपने आप स्टार्ट हो गया, लेकिन इस बार गुस्से से नहीं... जैसे वो हमें मंज़िल तक पहुंचाना चाहता हो।


भाई, हम सीधा मुंशी लाल के बंगले पहुंचे।

बंगला क्या, पूरा महल था।

लेकिन भाई, ट्रक की गूंजती आवाज सुनकर बाहर के आदमी भी डर गए।


"कौन है बे रात में?"

मुंशी लाल खुद बाहर आया।


मोटा सा शरीर, आंखों में लालसा।

हमें देखते ही बोला,












"क्यों बे विक्रम! ट्रक लेकर यहां क्या करने आए हो?"


मैंने गुस्से से कहा,

"सच सुनाने आए हैं मुंशी लाल! गुलाबो का सच!"


भाई, मुंशी लाल का चेहरा एकदम उतर गया।

"क...कौन गुलाबो? किसकी बात कर रहे हो?"


शिवराम ने चिल्ला कर कहा,

"वही, जिसे तूने मार कर इस ट्रक में डाला था! अब वो हर रात हमारे साथ है!"


भाई, मुंशी लाल का माथा पसीने से भर गया।


मैंने कहा,

"बोल! क्यों मारा उसे?"


मुंशी लाल बुदबुदाया,

"वो... वो नहीं मानी... मेरी बात नहीं मानी... सबक सिखाना पड़ा..."


भाई, तभी ट्रक का हॉर्न "पौं... पौं..." गूंज उठा, जैसे खुद गवाही दे रहा हो।


मुंशी लाल ने डर के मारे हाथ जोड़ लिए,

"माफ कर दो... माफ कर दो गुलाबो!"


भाई, तभी हवा में गुलाबो की साया दिखी... धीरे-धीरे ट्रक के पास आ गई।

मुंशी लाल की तरफ देखा और बोली,

"तेरी माफी अब नहीं चाहिए... तुझे वही सज़ा मिलेगी जो तूने मुझे दी..."


भाई, और एक झटके में मुंशी लाल की आंखें फटी की फटी रह गईं...

और वो वहीं गिर पड़ा।


शिवराम डर से थर-थर कांपने लगा,

"भइया, अब क्या होगा?"


मैंने कहा,

"अब शायद ये ट्रक आज़ाद हो जाए..."


भाई, लेकिन ट्रक शांत खड़ा था।

गुलाबो की साया हमारी तरफ मुस्कुराई,

और धीरे-धीरे धुंध में गायब हो गई।


शिवराम बोला,

"भइया... क्या अब सब ठीक हो जाएगा?"


मैंने लंबी सांस ली,

"शायद हां..."


लेकिन भाई...

जैसे ही हम ट्रक में बैठे, फिर से सीट के पीछे से किसी के सांस लेने की आवाज आई...


क्या ये साया सच में गया? या कहानी अभी बाकी है?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 9: कहानी का नया मोड़ और खौफ की वापसी


भाई... जब मुंशी लाल की सच्चाई सामने आई और उसकी मौत भी हमारे सामने हो गई, तो मुझे और शिवराम को लगा कि अब ये डरावनी कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।

लेकिन भाई, किस्मत को शायद ये मंज़ूर नहीं था।


उस रात हम दोनों ने सोचा,

"चलो भाई, अब गांव लौट चलते हैं। अब गुलाबो बहन को न्याय मिल गया है।"


शिवराम ने ट्रक स्टार्ट किया।

पहली बार ट्रक बिना हिचकिचाए, बिना किसी अजीब आवाज के स्टार्ट हुआ।

जैसे ट्रक भी सुकून में आ गया हो।


रास्ते में हम दोनों बात कर रहे थे,

"भइया, अब शायद ज़िंदगी फिर से नॉर्मल हो जाएगी।"

मैंने भी सिर हिलाया,

"हां भाई, अब कोई साया नहीं। बस अपने काम से काम रखेंगे।"


लेकिन भाई... ये खुशी ज्यादा देर नहीं टिक पाई।


जैसे ही हम हाईवे पर पहुंचे, रेत के टीलों के बीच से अचानक ठंडी हवाओं के साथ एक साया उभरा।

इस बार वो गुलाबो का नहीं था।

काला, लंबा, अजीब सा साया... जो हमारे ट्रक के सामने आकर खड़ा हो गया।


शिवराम के चेहरे का रंग उड़ गया।

"भइया, ये कौन है अब?"


भाई, मैं भी घबरा गया।

"शायद... कोई और राज़ छुपा है इस ट्रक में, जो हमें अभी तक नहीं पता।"


ट्रक के शीशे धुंध से भरने लगे, जैसे कोई अंदर आना चाहता हो।

अचानक पीछे से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई — "ठक... ठक..."


हम दोनों ने पीछे मुड़ कर देखा...

कोई नहीं था।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, क्या हम फिर से फंस गए?"


भाई, तभी ट्रक के डैशबोर्ड पर रेडियो अपने आप ऑन हो गया।

और रेडियो से अजीब-सी आवाजें आने लगीं,

"मुझे इंसाफ दो... मुझे इंसाफ दो..."


मैंने चौंक कर शिवराम की ओर देखा,

"शिवराम! क्या गुलाबो के अलावा भी किसी के साथ ऐसा हुआ है?"


शिवराम की आंखें फटी की फटी रह गईं।

"भइया, क्या मतलब?"


भाई, तभी मुझे याद आया —

रामदीन चाचा ने कहा था,

"मुंशी लाल ने कई औरतों की ज़िंदगी बरबाद की थी, पर किसी की हिम्मत नहीं हुई बोलने की।"


तो क्या ये साया किसी और की आत्मा है?

किसी और बेगुनाह की?


भाई, मेरे हाथ-पैर कांपने लगे।

"शिवराम, ट्रक रोको! हमें रामदीन चाचा से फिर मिलना पड़ेगा।"


लेकिन भाई, ट्रक रुकने का नाम नहीं ले रहा था!

स्टेयरिंग अपने आप घूमने लगा, स्पीड अपने आप बढ़ने लगी।

शिवराम ने ब्रेक पर पैर रखा,

"भइया ब्रेक नहीं लग रहा! कुछ करो भइया!"


भाई, ट्रक की हेडलाइट्स के सामने फिर वो साया आया...

इस बार और पास, और खतरनाक।


साया आगे बढ़ा,

और जैसे ही उसने ट्रक का बोनट छुआ...

एक जोरदार धमाका हुआ!

"धड़ाम!"


ट्रक झटके से रुक गया।

हम दोनों सीट पर गिर पड़े।


भाई, ये क्या हो रहा था?

हमने तो सोचा था कहानी खत्म... लेकिन कहानी अब और गहराई में उतरने वाली थी।


शिवराम बोला,

"भइया... अब क्या होगा? कौन है ये साया?"


भाई, तभी रेत के बीच से एक बूढ़ी औरत की परछाईं उभरी।

उसने कांपती आवाज में कहा,

"तुमने एक को इंसाफ दिलाया है, लेकिन बहुत से अब भी भटक रहे हैं..."


भाई, कहानी खत्म नहीं हुई थी।

ये ट्रक अब एक रहस्य बन चुका था — उन सभी आत्माओं का, जिनके साथ बुरा हुआ।

अब शायद ये ट्रक हमसे वो इंसाफ दिलवाएगा।


शिवराम ने डर कर पूछा,

"भइया, अब कहां चलेंगे?"


मैंने लंबी सांस ली,

"जहां ये ट्रक ले चले शिवराम... अब हमसे नहीं, ट्रक से पूछो।"


भाई... हमारे सामने एक और सफर शुरू हो चुका था।

एक ऐसा सफर, जहां हर रेत के टीले में कोई कहानी छुपी थी।

और ट्रक, अब हमारी नहीं, उन आत्माओं की सवारी बन चुका था।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 10: रेत में छुपा साया और नये डर की शुरुआत


भाई... जब वो बूढ़ी औरत की परछाईं गायब हो गई, तो मेरे और शिवराम के चेहरे पर सन्नाटा छा गया।

हम दोनों ट्रक की सीट पर बैठे एक-दूसरे की शक्ल देख रहे थे।

ट्रक की हैड लाइट्स अब भी जल रही थीं, और उनके उजाले में रेत के टीले अजीब-से दिख रहे थे।

जैसे हर टीले के पीछे कोई बैठा हो, हमें घूरता हुआ।


शिवराम ने धीरे से कहा,

"भइया... क्या हम कभी बच पाएंगे?"


मैंने सिर झुका लिया।

"शिवराम, अब ये खेल हमारे हाथ से निकल चुका है।"


अचानक ट्रक के पीछे से फिर वही आवाज आई — "ठक... ठक..."

भाई, जैसे कोई फिर से दरवाजा खटखटा रहा हो।


शिवराम ने कांपते हुए शीशे में देखा।

"भइया, कोई औरत खड़ी है पीछे... सफेद साड़ी में।"


भाई, मैं झटके से मुड़ा।

और सच कहूं... मेरे रौंगटे खड़े हो गए।


ट्रक की लाल ब्रेक लाइट की हल्की रोशनी में एक औरत की परछाईं नजर आ रही थी।













लंबे बाल, सिर झुका हुआ, और हाथ में कुछ पकड़े हुए।


शिवराम की आंखें भर आईं,

"भइया, ये कौन है अब? गुलाबो बहन की आत्मा तो चली गई ना?"


मैंने गहरी सांस ली,

"भाई, लगता है मुंशी लाल ने अकेले गुलाबो के साथ नहीं, कई औरतों के साथ बुरा किया था।"


ट्रक अपने आप रिवर्स में जाने लगा।

भाई, अब स्टेयरिंग, ब्रेक, कुछ भी हमारे कंट्रोल में नहीं था।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! कुछ तो करो, ट्रक अपने आप पीछे जा रहा है!"


मैंने हिम्मत करके दरवाजा खोलने की कोशिश की।

पर दरवाजा लॉक था, जैसे किसी ने बाहर से बंद कर दिया हो।


भाई, तभी वो औरत सामने आई...

धीरे-धीरे, घिसटते हुए कदमों से।

और जब उसने सिर उठाया... तो उसका चेहरा अधजला था।

एक आंख बाहर को निकली हुई, और चेहरा इतना डरावना कि आंख मिलाने की हिम्मत नहीं थी।


वो औरत बोली — "हमें भी इंसाफ दो...!"

भाई, उसकी आवाज सुनकर रूह कांप गई।


शिवराम फूट-फूट कर रो पड़ा,

"भइया, हम क्या करें? कैसे दिलाएं इंसाफ?"


भाई, तभी ट्रक के रेडियो से एक और आवाज आई,

"मुंशी लाल ने कई औरतों की जिंदगी बर्बाद की... तुम हमें इंसाफ दिलाए बिना नहीं जा सकते..."


अब भाई, हमें समझ आ चुका था,

ट्रक सिर्फ गुलाबो की आत्मा का नहीं था, ये एक "मौत की गाड़ी" बन चुका था।


भाई, फिर से वही डरावना मंजर बनने लगा —

ट्रक के शीशे पर खून की बूंदें गिरने लगीं।

हर तरफ से औरतों की चीखें आने लगीं।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! अब क्या करेंगे? ये रुकेंगी नहीं!"


मैंने हिम्मत जुटाई और ट्रक के भीतर बैठी साईं बाबा की छोटी मूर्ति को पकड़ा।

"शिवराम, अब ऊपर वाले के भरोसे हैं।"


भाई, जैसे ही मैंने साईं बाबा की मूर्ति हाथ में ली,

ट्रक के भीतर हल्की सफेद रौशनी फैल गई।


शिवराम चौंक कर बोला,

"भइया, ये क्या?"


भाई, वो रौशनी सीधी उस औरत के चेहरे पर पड़ी,

और जैसे ही रौशनी पड़ी, उसका चेहरा शांत होने लगा।

चेहरे की जलन गायब, आंखें बंद।


लेकिन भाई, उसकी जगह पीछे और साए खड़े हो गए!

और हर कोई बस एक ही बात कह रहा था,

"हमें इंसाफ चाहिए...!"


भाई, ट्रक अब जैसे भूतों का डेरा बन चुका था।

और मैं और शिवराम... अब इस राज के कैदी बन चुके थे।


शिवराम ने कांपती आवाज में कहा,

"भइया, अब कहां चलेंगे?"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, अब हमें उन सबकी सच्चाई पता करनी होगी। जब तक हम सबकी कहानी नहीं जानेंगे, ये आत्माएं नहीं जाएंगी।"


भाई... अब ये ट्रक सिर्फ सफर नहीं था, ये सफर बन चुका था सच्चाई खोजने का।

रेत के उस सुनसान हाईवे पर, जहां हर टीला, हर मोड़ एक नई कहानी, एक नया खौफ लेकर आता।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 11: "रेत की तहों में छिपा सच"


भाई...

अगली सुबह सूरज की पहली किरण भी उस सुनसान हाईवे तक नहीं पहुंची।

चारों तरफ बस रेत के अंधड़ चल रहे थे।

ट्रक वहीं खड़ा था, जैसे रात की वो सब बातें कोई बुरा सपना थीं।


लेकिन भाई... सपना नहीं था वो, क्योंकि ट्रक के शीशे पर अब भी खून की लकीरें थीं।

शिवराम सामने बैठा था, आंखें लाल और सूजी हुईं।

शायद पूरी रात जागता रहा।


मैंने धीरे से पूछा,

"शिवराम, कुछ याद है?"


वो बोला,

"भइया, सब याद है। वो औरत... उसका चेहरा... उसकी जली हुई आंखें।"


मैंने गहरी सांस ली,

"हमें इस राज की जड़ तक जाना होगा।"


शिवराम डरते हुए बोला,

"भइया, पर कहां से शुरू करें?"


भाई, तभी मैंने देखा, ट्रक के डैशबोर्ड पर एक पुराना अखबार पड़ा था।

वो वहीं नहीं था पहले... न जाने कब रखा गया!

मैंने उसे उठाया, और भाई... उसके पहले पन्ने पर एक खबर छपी थी —

"जैसलमेर के पास मिली जली हुई औरत की लाश, आरोपी अब तक फरार।"


मेरे हाथ कांपने लगे।

"शिवराम, देख... यही है गुलाबो बहन की खबर।"


शिवराम ने अखबार छीन लिया और कांपती आवाज में पढ़ने लगा।

"गुलाबो देवी, उम्र 22 साल, शादी के सपने देखती थी, मगर गांव के जमींदार मुंशी लाल ने..."

भाई, शिवराम की आवाज भर्रा गई।

"भइया... वो बेचारी..."


मैंने अखबार से तारीख देखी।

ये हादसा 15 साल पहले हुआ था।

और भाई, मुंशी लाल... वो आज भी अपने बंगलो में ऐश कर रहा होगा।


मैंने ठान लिया,

"शिवराम, अब हमें गांव जाना होगा। जहां ये हादसा हुआ था।"


शिवराम ने घबराकर कहा,

"भइया, पर वहां जाएंगे कैसे? ये ट्रक तो अब खुद जीता-जागता भूत बन गया है।"


मैंने ट्रक की चाबी घुमाई।

भाई, इंजन स्टार्ट हो गया... लेकिन जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ाई,

पीछे से औरतों की चीखें आने लगीं।

"हमें इंसाफ दिलाओ..."

"हमारी जान का बदला लो..."


शिवराम ने सीट पकड़ ली।

"भइया! ये फिर शुरू हो गया..."


भाई, मैं समझ गया,

ये ट्रक तब तक नहीं रुकेगा, जब तक हम वो गांव नहीं पहुंचते, जहां ये सब शुरू हुआ।


ट्रक आगे बढ़ा, और भाई, उस वीराने में अचानक रेत के गुब्बार उठने लगे।

जैसे कोई अदृश्य साया ट्रक के साथ-साथ चल रहा हो।


शिवराम ने कहा,

"भइया, देखो... कोई औरत रेत में से निकल रही है..."


मैंने शीशे से देखा।

भाई, रेत की आंधी के बीच से फिर वही औरत, जली हुई, हाथ फैलाए हुए,

और भाई, उसके पीछे और भी साए...


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! ये हमसे क्या चाहती हैं?"


मैंने कहा,

"इंसाफ शिवराम, ये सब औरतें अपने गुनहगार को सज़ा दिलाना चाहती हैं।"


भाई, जैसे ही ट्रक गांव की तरफ मोड़ा,

एक अजीब बात हुई — आंधी बंद हो गई, रेत शांत हो गई।


शिवराम बोला,

"भइया, ये साया हमसे चाहता है कि हम सच तक पहुंचें।"


भाई, अब हम गांव की ओर बढ़ चले।

सड़क टूटी-फूटी थी, और दोनों तरफ वीरानी थी।

कभी-कभी कोई सूखी झाड़ी, और कभी कोई टूटा-फूटा पेड़।

सड़क के किनारे, पुरानी हवेली नजर आई, और उसके पास लाल साड़ी पहने एक औरत की परछाईं।


शिवराम ने कांपते हुए कहा,

"भइया... शायद यही हवेली है मुंशी लाल की।"


भाई, ट्रक अपने आप रुक गया।

जैसे अब अंदर जाने का वक्त आ गया हो।


मैंने ट्रक की चाबी निकाली,

"चल शिवराम, अब असली लड़ाई शुरू होगी।"


शिवराम डरते-डरते नीचे उतरा।

"भइया, अगर कुछ हो गया तो?"


मैंने उसका कंधा पकड़ लिया,

"डर मत शिवराम। इन औरतों ने जो सहा, वो दर्द हमसे बहुत बड़ा है। चल, इंसाफ














 दिलाने का वक्त आ गया।"

भाई, हवेली की ओर कदम बढ़ते ही,

चारों तरफ से चीखें, रुदन, औरतों की हिचकियां, और हवेली के अंदर से आती आवाज — "क्यों जलाया मुझे...? क्यों मारा मुझे...?"


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, ये आवाजें... दिल दहला देने वाली हैं।"


भाई... हवेली के दरवाजे पर पहुंचकर मैंने पीछे देखा,

ट्रक की हैड लाइट्स खुद-ब-खुद जल गईं, जैसे ट्रक भी कह रहा हो — जाओ, अब आगे तुम्हारी बारी है।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 12: "मुंशी लाल की हवेली का खौफ"


भाई...

हवेली के अंदर कदम रखते ही एक अजीब सी ठंडी हवा ने हमें छू लिया।

जैसे कोई अदृश्य साया हमारे करीब से गुज़रा हो।

हवेली के दरवाजे अपने आप पीछे से "धड़ाम!" की आवाज के साथ बंद हो गए।

शिवराम घबरा कर पीछे देखने लगा।


"भइया... अब क्या करेंगे?"


मैंने गहरी सांस ली,

"अब पीछे नहीं हट सकते, शिवराम। अब तो गुलाबो बहन की आत्मा को इंसाफ दिलाकर ही लौटेंगे।"


भाई... हवेली अंदर से पूरी जर्जर हो चुकी थी।

दीवारों पर जगह-जगह हाथों के जले हुए निशान थे।

कहीं कोई औरत की चूड़ियों के टूटे हुए टुकड़े पड़े थे,

और सबसे डरावना वो कमरा, जिसमें लाल साड़ी की परछाईं दीवार पर ठहरी हुई थी।


शिवराम की आवाज कांप रही थी,

"भइया, ये जगह तो बहुत डरावनी है।"


अचानक भाई, ऊपर की मंजिल से तेज़ कदमों की आवाजें आने लगीं।

जैसे कोई हमारे आने से नाराज हो।


मैंने शिवराम से कहा,

"चलो, ऊपर चलते हैं। देखते हैं कौन है।"


भाई, जैसे ही हम सीढ़ियां चढ़ने लगे,

हर कदम पर लकड़ी की सीढ़ियों की चरमराहट, और साथ में औरतों की रुलाई की आवाजें।

"हमें बचा लो..."

"हमें जलाया क्यों...?"


शिवराम ने डरते हुए पूछा,

"भइया, ये आवाजें कौन हैं?"


मैंने जवाब दिया,

"शिवराम, ये उन औरतों की आत्माएं हैं, जिन्हें मुंशी लाल ने मार डाला।"


भाई, ऊपर पहुंचते ही एक बड़ा सा हॉल था,

और हॉल के बीचों-बीच एक पुरानी लोहे की कुर्सी,

जिस पर कोई आदमी की परछाईं बैठी थी।


शिवराम ने थरथराती आवाज में कहा,

"भइया, वो कौन है?"


भाई, जैसे ही हम करीब पहुंचे,

वो परछाईं धीरे-धीरे उठी।

सामने मुंशी लाल जैसा बूढ़ा आदमी,

पर भाई, उसकी आंखें लाल, और चेहरा पूरा जला हुआ।


"क्यों आए हो यहाँ?" उसने गूंजती आवाज में पूछा।


मैंने हिम्मत करके कहा,

"गुलाबो बहन की आत्मा को इंसाफ दिलाने।"


मुंशी लाल हंस पड़ा,

"हाहाहा! वो औरत मर चुकी है। अब कोई उसे बचा नहीं सकता।"


लेकिन भाई, जैसे ही उसने ये कहा,

हॉल की हर दीवार पर औरतों की डरावनी परछाइयाँ उभरने लगीं।


"हमें जलाया... हमें मारा... अब तेरा हिसाब होगा..."


भाई, शिवराम और मैं दहशत से कांपते हुए पीछे हटे।

लेकिन तभी ट्रक की आवाज हॉर्न के साथ गूंजने लगी।

जैसे ट्रक भी कह रहा हो — "अब समय आ गया है।"


भाई, मुंशी लाल की आंखें फटी रह गईं।

"ये ट्रक यहाँ कैसे आ गया?"


मैंने कहा,

"ये ट्रक अब सिर्फ सवारी नहीं, इंसाफ का हथियार है।"


अचानक हवेली की खिड़कियां अपने आप खुलने लगीं।

रेत की तेज़ आंधी अंदर घुस आई।

और रेत के साथ गुलाबो बहन की आत्मा सामने आ खड़ी हुई।

उसका जला चेहरा, पर आंखों में इंसाफ की आग।


मुंशी लाल कांपते हुए पीछे हटने लगा,

"नहीं... नहीं... मुझे माफ कर दो..."


गुलाबो की आत्मा गरजी,

"अब माफी नहीं, तुझे वही दर्द सहना होगा जो तूने मुझे दिया।"


भाई, तभी एक जोरदार हवा का झोंका आया,

और मुंशी लाल की आत्मा तेज चीख के साथ हवा में उठ गई,

"आआआ..."

और फिर हवेली की दीवारों में समा गई।


शिवराम हैरान होकर बोला,

"भइया... खत्म हो गया?"


मैंने कहा,

"नहीं शिवराम, ये तो बस शुरुआत है। अभी कई साए हैं जिन्हें इंसाफ चाहिए।"


भाई, तभी ट्रक का हॉर्न फिर बजा,

जैसे कह रहा हो — "आओ, अगली मंज़िल की ओर।"


शिवराम ने कहा,

"भइया, ये ट्रक अब रुकने वाला नहीं है, है ना?"


मैंने मुस्कराते हुए कहा,

"नहीं शिवराम, अब ये ट्रक हर उस औरत का बदला लेगा, जो बेगुनाह मारी गई।"


भाई, हम दोनों ट्रक में चढ़े।

इंजन स्टार्ट किया,

और ट्रक की हेडलाइट्स ने अंधेरे को चीरते हुए रास्ता दिखाया।


"अब ये सफर रुकेगा नहीं..."




भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 13: "रेत के तूफान में फंसा ट्रक और नई मुसीबत"


भाई...

हवेली से निकलने के बाद रात और भी ज्यादा डरावनी हो गई थी।

काला आसमान, और चारों तरफ सन्नाटा,

सिर्फ ट्रक का इंजन और हमारे दिलों की धड़कनों की आवाज।


शिवराम खिड़की से बाहर देख रहा था।

"भइया, हवा बहुत तेज़ हो गई है। देखो रेत उड़-उड़ के पूरा रास्ता ढक लिया है।"


मैंने कहा,

"शिवराम, ये रेत का तूफान अचानक नहीं आया... कुछ न कुछ गड़बड़ है।"


भाई, ट्रक की हैडलाइट्स रेत में फंसकर धुंधली सी पड़ गईं।

आगे कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था।

ट्रक धीरे-धीरे रुकने लगा।


शिवराम घबरा कर बोला,

"भइया, ट्रक बंद मत करना, ये रास्ता ठीक नहीं लग रहा।"


मैंने कहा,

"जानता हूँ शिवराम, पर इंजन भी जैसे डर गया हो।"


भाई, तभी रेत के तूफान में से एक औरत की परछाईं उभरी।

वो सफेद साड़ी में थी,

बाल खुले, और चेहरे पर खून के निशान।

शिवराम की आंखें फटी की फटी रह गईं।


"भइया... सामने देखो!"


मैंने भी देखा...

वो औरत ट्रक के सामने खड़ी थी।

हाथ जोड़ कर कह रही थी,

"मुझे बचा लो... मुझे इंसाफ दिलाओ..."


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, ये कौन है? क्या ये भी गुलाबो बहन की तरह...?"


मैंने कहा,

"शिवराम, लगता है ये भी उस हवेली की एक और आत्मा है। जिसने अभी तक इंसाफ नहीं पाया।"


भाई, मैंने ट्रक से उतरने की हिम्मत की।

जैसे ही मैं ट्रक से बाहर निकला,

रेत के तूफान की आवाज और तेज़ हो गई।

(हवा की सायं सायं और औरत की कराहती आवाजें बैकग्राउंड में)


"भइया, संभल कर जाना!" शिवराम ने डरते हुए कहा।


भाई, मैं उस औरत के पास पहुंचा।

उसने धीरे से कहा,

"मेरा नाम सुहानी है... मुंशी लाल ने मुझे भी जलाया था... मेरे बच्चे को भी..."


भाई, ये सुनते ही मेरा कलेजा कांप गया।

"सुहानी बहन, हम तुम्हारे लिए भी इंसाफ लाएंगे।"


वो बोली,
















"मुझे मेरा बच्चा चाहिए... मेरी आत्मा तब तक भटकेगी जब तक मेरा बच्चा मुझे नहीं मिलेगा।"


भाई, शिवराम भी नीचे आ गया।

"भइया, बच्चा? अब वो कैसे मिलेगा?"


मैंने कहा,

"पता करना पड़ेगा शिवराम। सुहानी बहन का बच्चा अगर जिंदा है, तो उसे ढूंढना होगा। और अगर नहीं... तो उसकी आत्मा को भी शांति दिलानी होगी।"


भाई, जैसे ही मैंने ये कहा,

सुहानी की आत्मा ने इशारा किया —

"जहाँ मेरा बच्चा है, वो जगह इस रास्ते के आखिरी मोड़ पर है।"


भाई, हवा की चीखती आवाज में भी उसकी बात साफ सुनाई दी।


शिवराम ने पूछा,

"भइया, चलें?"


मैंने ट्रक का दरवाजा खोला,

"चलो शिवराम, अब रुकना नहीं है।"


भाई, ट्रक स्टार्ट किया,

रेत की दीवारों को चीरते हुए ट्रक आगे बढ़ा।


लेकिन भाई... जैसे ही हम आगे बढ़े,

पीछे से बच्चे की रोने की आवाज आने लगी।

"माँ... माँ..."


शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया, पीछे कोई है?"


मैंने शीशे में देखा,

पीछे धुंध में एक छोटा बच्चा, नंगे पांव, ट्रक के पीछे-पीछे भाग रहा था।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! ट्रक रोको!"


मैंने तुरंत ब्रेक मारी।

लेकिन भाई...

जैसे ही उतरे, वहाँ कोई नहीं था।

बस रेत पर छोटे-छोटे पैरों के निशान, जो कहीं दूर जाते दिख रहे थे।


शिवराम ने कांपते हुए कहा,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने कहा,

"शिवराम, इस बच्चे की आत्मा को उसकी माँ से मिलाना होगा। तभी ये रास्ता खुलेगा।"


भाई, हम फिर से ट्रक में चढ़े,

हैडलाइट्स ऑन की, और निशानों के पीछे निकल पड़े।


ट्रक की हेडलाइट्स रेत के रास्ते पर उन पैरों के निशानों का पीछा कर रही थीं,

और हवा में अब भी सुहानी की दर्द भरी आवाज गूंज रही थी —

"मेरा बच्चा... मुझे दे दो..."


भाई, ये रास्ता अब डरावना नहीं, एक अधूरी माँ की दुआ बन गया था।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं थी भाई...

अभी रास्ता बाकी था,

और खतरे भी।

भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 14: "माँ और बच्चे की अधूरी कहानी"


भाई...

ट्रक रेत के तूफ़ान में रास्ता बनाता हुआ उन छोटे-छोटे पैरों के निशानों के पीछे चल रहा था।

चारों ओर सुनसान हाईवे, रेत की मार, और अजीब सी सरसराहट।


शिवराम चुप था, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे।

मैंने स्टीयरिंग कस कर पकड़ा हुआ था।

भाई, ऐसा लग रहा था जैसे ये ट्रक अब सिर्फ लोहे की गाड़ी नहीं, किसी दर्द की गवाही बन गया हो।


थोड़ी दूर जाने के बाद... ट्रक की हेडलाइट्स एक वीरान पुराने कुएँ पर आकर रुक गईं।

कुएँ के पास वही पैरों के निशान खत्म हो रहे थे।


शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया, ये तो वही कुआँ है जहाँ के बारे में गाँव में लोग कहते हैं... कि कई बरस पहले किसी औरत और उसके बच्चे को जिंदा दफना दिया था।"


भाई, मैं भी समझ गया —

"शिवराम, ये सुहानी बहन और उसका बच्चा है।"


कुएँ के पास जाकर देखा,

कुएँ से ठंडी-ठंडी हवा निकल रही थी, जैसे कोई नीचे से साँस ले रहा हो।

शिवराम ने कहा,

"भइया, कुछ तो बोल रहा है कुआँ... सुनो।"


भाई, जब कान लगाया,

तो अंदर से एक बच्चे की हल्की आवाज आई,

"माँ... माँ..."


शिवराम काँप गया,

"भइया, ये बच्चा... अब भी कुएँ में है?"


मैंने कहा,

"नहीं शिवराम, उसका दर्द, उसकी आत्मा इस कुएँ से जुड़ी है।"


भाई, तभी अचानक तेज हवा चली और सुहानी बहन की आत्मा हमारे सामने आ गई।

उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ,

और वो बोली,

"मेरा बच्चा... उसे मुझे दे दो... मेरी आत्मा तभी मुक्त होगी।"


भाई, मैं और शिवराम कुछ समझ नहीं पाए।

फिर सुहानी ने इशारा किया — कुएँ के पास एक पत्थर की पट्टी पर कुछ लिखा था।


जब पास जाकर पढ़ा,

तो उस पर उभरे हुए शब्द थे —

"यहाँ वो माँ और बच्चा सो रहे हैं, जिनको इस गाँव की हवस ने निगल लिया..."


शिवराम के मुंह से निकल पड़ा,

"भइया, इस औरत के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है।"


भाई, तभी कुएँ से एक सफेद रौशनी निकली —

बिलकुल छोटे बच्चे की शक्ल में।

वो रौशनी जाकर सीधा सुहानी बहन के पास पहुँची।

भाई, वो दृश्य देखकर रूह कांप उठी।


माँ और बच्चे की आत्मा मिलते ही,

एक तेज रोशनी हुई,

और फिर दोनों की आत्मा आसमान में उड़ गईं।


लेकिन भाई, जैसे ही उनकी आत्मा गई,

कुएँ से एक गहरी कराह की आवाज आई —

"तुम्हें नहीं छोड़ेंगे..."


शिवराम ने चौक कर कहा,

"भइया! ये आवाज किसकी थी?"


भाई, मैं भी चौंक गया।

"शिवराम, लगता है ये मामला सिर्फ सुहानी बहन तक नहीं है। इस कुएँ में और भी राज़ छुपे हैं।"


भाई, ट्रक की तरफ वापस लौटने लगे,

तभी शिवराम ने बोला,

"भइया, देखो, ट्रक के शीशे पर कुछ लिखा है!"


गाड़ी के शीशे पर रेत से खुद ब खुद लिखा हुआ था —

"मुंशी लाल अभी जिंदा है... और वो अब तुम्हारा इंतजार कर रहा है।"


शिवराम काँपते हुए पीछे मुड़ा,

"भइया, मुंशी लाल? ये वही आदमी जिसने सब बर्बाद किया था?"


मैंने कहा,

"हाँ शिवराम, अब वही असली खेल शुरू होने वाला है।"


भाई, ट्रक स्टार्ट किया,

रेत के तूफान को चीरते हुए हम निकल पड़े मुंशी लाल की तलाश में।


लेकिन भाई...

हमें नहीं पता था कि जो रास्ता हम पकड़ने जा रहे हैं,

वो रास्ता सीधा मौत की गली में जाता है।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 15: "मुंशी लाल का खौफनाक सच"


भाई...

ट्रक रेत के समुंदर में अपनी जान बचाता हुआ चल रहा था,

पर अब हमको सिर्फ एक ही नाम सुनाई दे रहा था —

"मुंशी लाल..."


शिवराम की आँखें फटी की फटी थीं,

"भइया, वो मुंशी लाल तो बहुत पहले मर गया था न? फिर उसका नाम क्यों आया?"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, ये वो लोग हैं, जिनके गुनाह मिटते नहीं... मौत भी जिनसे डरती है।"


भाई, हाईवे पर अजीब सी चुप्पी थी।

दूर से कोई पुराना मंदिर दिखाई दे रहा था,

लेकिन मंदिर टूटा-फूटा और वीरान।


जैसे ही ट्रक मंदिर के पास पहुँचा,

ट्रक अपने आप रुक गया।

ना ब्रेक दबाया, ना क्लच, लेकिन गाड़ी एक झटके से थम गई।


शिवराम बोला,

"भइया, ये क्या हो रहा है? ये ट्रक अपने आप कैसे रुक गया?"


भाई, तभी मंदिर की टूटी दीवार के पीछे से एक बुढ़ा सा आदमी दिखा,

जिसकी आँखें शेर की तरह लाल,

और दाढ़ी बिलकुल बर्फ की तरह सफेद।


शिवराम की रूह काँप गई,












"भइया... ये... ये तो मुंशी लाल है!"


भाई, मैं भी चौंक गया,

क्योंकि जो आदमी बीस साल पहले मर चुका था,

आज वो हमारे सामने खड़ा हंस रहा था।


मुंशी लाल बोला,

"समझे तुम दोनों? जो रास्ता तुमने पकड़ा है, वो तुम्हें जिन्दा नहीं छोड़ेगा।"


उसकी आवाज में ऐसी गूंज थी जैसे कहीं गुफा में शेर दहाड़ता है।


शिवराम चिल्लाया,

"तू कौन है? जिन्दा है या भूत?"


मुंशी लाल हँस पड़ा,

"मैं दोनों हूँ... जिन्दा भी और मुर्दा भी।"


भाई, उसकी बातें सुनकर मेरे पैर काँपने लगे।

"शिवराम, लगता है ये आदमी अपनी रूह को बेच चुका है।"


भाई, तभी मुंशी लाल ने पास के पत्थर पर बैठते हुए कहा,

"उस कुएँ में सिर्फ सुहानी नहीं दफन थी... उस कुएँ ने मेरी सच्चाई भी दफन की है।"


शिवराम गुस्से से बोला,

"क्या सच्चाई?"


मुंशी लाल की आँखें लाल हो गईं,

"मैंने ही वो सब किया था... वो औरत, उसका बच्चा... और भी कई जिंदगियाँ... सब मैंने ख़त्म की थीं।"


भाई, ये सुनकर रूह काँप गई।

मैंने कहा,

"क्यों? क्यों किया ये सब?"


मुंशी लाल ने हँसते हुए कहा,

"क्योंकि मैं चाहता था कि ये हाईवे मेरे कब्जे में रहे। जो भी इस रास्ते से गुजरे, मेरी मर्जी से गुजरे।"


शिवराम ने गुस्से से कहा,

"और अब क्या चाहता है?"


मुंशी लाल की आँखों में नफरत थी,

"अब? अब तुम दोनों की आत्मा चाहिए मुझे।"


भाई, इतना कहते ही हवा का रुख बदल गया।

आसमान में काले बादल छा गए।

दूर से भूतिया औरतों की चीखें आने लगीं।


शिवराम काँप गया,

"भइया, ये औरतें कौन हैं?"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, ये वही हैं जिनकी रूहें आज भी मुंशी लाल के गुनाह की सजा भुगत रही हैं।"


भाई, तभी मुंशी लाल की आँखें और लाल हो गईं,

और उसने कहा,

"अब देखो मेरा खेल..."


अचानक मंदिर की टूटी दीवारें अपने आप सीधी होने लगीं।

जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें खड़ा कर रही हो।


ट्रक का हॉर्न अपने आप बजने लगा —

बहुत ही डरावनी, भारी आवाज में।


भाई, शिवराम मेरी तरफ देख कर बोला,

"भइया, भागो यहाँ से... ये जगह अब मौत का जाल बन रही है।"


मैंने ट्रक स्टार्ट करने की कोशिश की,

लेकिन भाई, ट्रक स्टार्ट ही नहीं हो रहा था।


तभी मंदिर के अंदर से एक औरत की चीख आई —

"बचाओ..."


शिवराम काँपते हुए बोला,

"भइया, कोई है अंदर!"


भाई, मैं भी सोच में पड़ गया।

क्या करें?

वहाँ से भागें या उस आवाज की मदद करें?


और भाई, फिर जो हुआ...

उसने हमारी ज़िन्दगी बदल दी।


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 16: "मंदिर के अंदर की सच्चाई"


भाई...


ट्रक वहीं खड़ा था... इंजन स्टार्ट नहीं हो रहा था।

हवा की सनसनाहट इतनी तेज़ हो गई थी कि लगता था कान फट जाएंगे।

शिवराम की आंखों में डर साफ़ झलक रहा था।


"भइया... चलो ना यहां से... ये जगह ठीक नहीं लग रही," शिवराम की आवाज़ काँप रही थी।


पर भाई, मेरे दिल में उस औरत की चीख गूंज रही थी —

"बचाओ..."


मैंने ठंडी सांस ली और कहा,

"शिवराम, अगर हम नहीं देखेंगे... तो कौन देखेगा?"


शिवराम ने आँखें फाड़ कर देखा,

"भइया, वो मुंशी लाल फिर से दिखेगा... वो मार डालेगा हमें।"


पर भाई, डर के आगे झुकना नहीं था।

मैंने जेब से ट्रक की बड़ी टॉर्च निकाली,

और धीरे-धीरे मंदिर के टूटी-फूटी सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगा।


ट्रक की बैक लाइट जल-बुझ रही थी,

जैसे कोई अदृश्य साया ट्रक के आस-पास मंडरा रहा हो।


जैसे ही मैं मंदिर के गेट पर पहुंचा,

भाई, गेट की दरारों से ठंडी, बर्फ जैसी हवा मेरे चेहरे से टकराई।


अंदर अंधेरा था,

बस कोनों में अजीब सी लाल और नीली रौशनी तैर रही थी।

शिवराम धीरे-धीरे मेरे पीछे आ गया,

"भइया, जल्दी देख लो और निकलते हैं।"


जैसे ही मैं टॉर्च की रौशनी से सामने की दीवार पर डाला,

दीवार खून से सनी हुई थी।

उस पर किसी ने बड़ी बड़ी हिंदी में लिखा था —

"यहां मत आओ... वरना तुम्हारा अंत पास है..."


शिवराम पीछे हटने लगा,

"भइया... चलो ना... देख लिया ना?"


लेकिन भाई, तभी फिर वही महिला की चीख...

"बचाओ... मुझे निकालो..."


अबकी बार वो आवाज मंदिर के पिछले हिस्से से आई।

मैंने बिना सोचे कहा,

"शिवराम, चल पीछे चलते हैं।"


शिवराम डरते-डरते मेरे साथ आया।


भाई, जैसे ही हम पीछे पहुँचे,

एक पुराना लोहे का दरवाजा दिखा —

जंग खाया, टूटा हुआ।


पर भाई, उस दरवाजे के पीछे से साफ़-साफ़ किसी के कराहने की आवाज आ रही थी।


मैंने शिवराम को कहा,

"पकड़ इस दरवाजे को, खोलते हैं।"


शिवराम ने डरते-डरते दरवाजा पकड़ा।

मैंने पूरा जोर लगाया...


दरवाजा चरररररररर की आवाज के साथ खुला।


भाई, जो नज़ारा देखा, रूह काँप गई।

अंदर एक औरत लोहे की जंजीरों में बंधी हुई थी,

बिलकुल सफेद कपड़ों में,

चेहरे पर गहरे जख्म,

आँखों में आसूं।


शिवराम की आँखें फटी की फटी,

"भइया... ये कौन है?"


भाई, औरत ने कराहते हुए कहा,

"मुझे यहाँ सालों से बंद किया हुआ है... बचाओ मुझे..."


मैंने आगे बढ़ कर कहा,

"किसने बंद किया?"


औरत ने कांपते हुए कहा,

"मुंशी लाल... और वो भी नहीं... इसके पीछे कोई और भी है... जो इससे भी बड़ा शैतान है।"


भाई, ये सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"और कौन?" मैंने पूछा।


औरत बोली,

"जिसकी वजह से ये हाईवे खौफ की गली बना... वो और भी खतरनाक है..."


शिवराम बोला,

"भइया, जल्दी इनकी जंजीरें खोलते हैं..."


मैंने जेब से लोहे की बड़ी कील निकाली,

और जंजीर की कुंडी खोलने लगा।


भाई, जैसे ही जंजीर खुली,

मंदिर की दीवारें हिलने लगीं,

जैसे भूकंप आ गया हो।


औरत ने काँपते हुए कहा,

"तुमने मुझे छुड़ाया है, पर अब वो तुम्हारे पीछे आएगा... अब बच नहीं पाओगे..."


भाई, ये कहते ही मंदिर के अंदर से तेज़ हवा का झोंका आया,

टॉर्च की रौशनी बुझ गई,

और चारों तरफ काले साए घूमने लगे।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया, भागो यहां से... ये हमें मार डालेंगे!"


और भाई, वो औरत हमारे पीछे थी,

कह रही थी,

"भागो... अब वो आएगा..."


भाई, कौन था वो?

मुंशी लाल से भी बड़ा शैतान कौन था?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 17: "मंदिर से भागने की जद्दोजहद"


भाई...






















जैसे ही वो औरत की जंजीर खुली,

मंदिर की दीवारें हिलने लगीं,

चारों तरफ गूंजती अजीब-अजीब आवाजें...

जैसे कोई अदृश्य ताकत हमें घेर रही हो।


हवा की सनसनाहट इतनी तेज़ थी,

कि सांस लेना भी मुश्किल।


शिवराम मेरे करीब आ गया,

"भइया, जल्दी चलो, ये जगह अब हमारे लिए नहीं है!"


भाई, उस औरत की आँखों में डर साफ़ झलक रहा था।

वो कांपती हुई बोली,

"जल्दी भागो... वो आ रहा है... अगर उसने देख लिया, तो बच नहीं पाओगे!"


मैंने उसका हाथ पकड़ा और मंदिर की सीढ़ियों की ओर भागने लगा।

शिवराम हमारे पीछे-पीछे।


जैसे ही हम सीढ़ियों पर पहुँचे,

अचानक सीढ़ियों के सामने काले धुएं का भंवर बन गया।

भाई, ऐसा लगा कोई अदृश्य शक्ति रास्ता रोक रही है।


और तभी...


पीछे से किसी के भारी कदमों की आवाजें...

भाई, मैं पीछे मुड़ा —


एक ऊंचा काला साया,

आंखें लाल...

हाथ में लोहे की बड़ी जंजीरें...

शिवराम कांप उठा,

"भइया... वो आ गया... मुंशी लाल!"


भाई, ये मुंशी लाल नहीं था...

ये उससे भी बड़ा शैतान था।


वो साया गरजती आवाज़ में बोला,

"उसे नहीं छोड़ सकते... ये मेरी कैदी है... अब तुम भी मेरे साथ जाओगे..."


मैंने कांपते हुए कहा,

"क्यों बंद किया है इसे? क्या बिगाड़ा है इसका?"


वो हंसी...

ऐसी हंसी जो आज भी मेरे कानों में गूंजती है...


"क्योंकि इसकी वजह से ही मेरा सब कुछ खत्म हुआ... अब ये भी सहेगी... और जो बचाने आए हैं, वो भी!"


भाई, औरत रोते हुए मेरे पीछे छुप गई,

"भैया, बचा लो मुझे... नहीं तो ये मार डालेगा..."


शिवराम बोला,

"भइया, कुछ करो... ये हमें भी नहीं छोड़ेगा!"


मैंने जेब से भगवान की छोटी सी मूर्ति निकाली, जो हमेशा ट्रक में रखता था,

और उसकी तरफ दिखाते हुए कहा,

"तेरी ये ताकत हमारे ऊपर नहीं चलेगी... भगवान हमारे साथ है!"


भाई, उस साए ने जब ये देखा,

तो ज़ोर की चीख मारी...

पूरे मंदिर में धमाका जैसा गूंज उठा।


भाई, मौका देखकर हम तीनों तेजी से बाहर की तरफ भागे।


जैसे ही मंदिर के दरवाजे के पास पहुँचे,

पीछे से साया गरजा,

"तुम नहीं बचोगे... ये हाईवे अब तुम्हारा क़ब्रगाह बनेगा!"


भाई, डर के मारे पसीने-पसीने...

पर हिम्मत कर के हम बाहर भागे।


ट्रक के पास पहुँच कर देखा —

ट्रक अपने आप स्टार्ट था, जैसे कोई हमें जल्दी निकलने का इशारा कर रहा हो।


मैंने औरत को ट्रक में बैठाया,

शिवराम भी बैठ गया,

और भाई, मैंने फटाफट गाड़ी स्टार्ट की।


जैसे ही ट्रक आगे बढ़ा,

पीछे से तेज़ आवाज आई, जैसे कोई साया हमारे पीछे भाग रहा हो।


भाई, ट्रक की स्पीड 90-100 कर दी,

पर पीछे से वो आवाजें...

"तुम बच नहीं सकते... ये हाईवे तुम्हें निगल जाएगा..."


औरत मेरे पास बैठी थी, कांप रही थी,

"भैया... आपने मुझे बचा लिया... लेकिन ये हाईवे नहीं छोड़ेगा..."


मैंने कहा,

"तू डर मत बहन, अब कुछ नहीं होगा।"


भाई, लेकिन मेरे दिल में भी डर था...

"क्या वाकई हम बच पाएंगे?"


आगे हाईवे पर क्या इंतजार कर रहा था?

क्या वो साया पीछा करेगा?

क्या सच में मुंशी लाल के पीछे कोई और है?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 18: "हाईवे पर मौत की परछाई"


भाई...


जैसे ही हमने मंदिर से निकल कर ट्रक दौड़ाया,

रात के उस सन्नाटे में सिर्फ ट्रक की इंजन की गरज और हमारे धड़कते दिलों की आवाज थी।


शिवराम अब भी कांप रहा था,

"भैया... वो पीछा कर रहा है क्या?"


मैंने शीशे में देखा —

पीछे कुछ नहीं था,

लेकिन भाई... हवा में अजीब सी सनसनाहट थी,

जैसे कोई अदृश्य साया हमारे साथ-साथ उड़ रहा हो।


वो औरत...

जो अब तक चुप थी,

धीरे से बोली,

"भैया... वो नहीं मानेगा... उसने कसम खाई है... जो भी मुझे बचाने आएगा, वो मरेगा..."


भाई, ये सुनकर मेरी भी रूह कांप गई।


ट्रक तेज़ भाग रहा था...

पर भाई, हाईवे पे आग की लकीरें जैसी दिखने लगीं,

जैसे कोई हमारे रास्ते में आग बिछा रहा हो।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया, ब्रेक लगाओ! देखो सामने!"


मैंने जैसे ही ब्रेक मारा —

ट्रक की तेज़ आवाज के साथ टायर घिसकते हुए रुक गए।


सामने रास्ते में —

एक आदमी की लाश!

भाई, उसके कपड़े फटे हुए,

चेहरे पर गहरे नाखून के निशान,

आंखें खुली हुई — जैसे जाते वक़्त भी डर के मारे जान निकल गई हो।


औरत ने देखकर मुँह पर हाथ रख लिया,

"भैया... ये वही है जिसने मुझे पकड़वाया था... देखो इसका क्या हश्र हुआ..."


भाई, मेरा दिल कांपने लगा।


तभी अचानक...

ट्रक के ऊपर कोई कूदा!

धड़ाम!!

भाई, पूरा ट्रक हिल गया।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! ऊपर कोई है!"


मैंने शीशे से देखा —

काली परछाई... लाल आंखें... और वो औरत की तरफ झुकता जा रहा था!


औरत चिल्लाई,

"भइया बचाओ! ये मुझे मार डालेगा!"


भाई, हिम्मत कर के मैंने ट्रक का दरवाज़ा खोला,

लोहे की रॉड निकाली और छत पर चढ़ गया।


जैसे ही ऊपर चढ़ा,

भाई... दिल दहल गया!

वो साया मेरी तरफ घूमा,

"कहा था न... बच नहीं पाओगे..."


भाई, उसकी आंखों से खून के आंसू टपक रहे थे।

मैंने डरते-डरते रॉड उठाई,

"छोड़ दे उसे! वरना अच्छा नहीं होगा!"


वो हंसा...

"तुम इंसान मेरा क्या बिगाड़ोगे?"


भाई, तभी शिवराम ने नीचे से हिम्मत करके होन (Horn) बजाया,

तेज़-तेज़,

जैसे साया डर जाए।


पर वो और जोर से गुर्राया।


तभी...

ट्रक के पास से एक साधु गुजरा,

भाई, सच बोल रहा हूँ,

उसके हाथ में त्रिशूल था,

और आते ही बोला,

"ओ मायावी साए! छोड़ दे इन मासूमों को, नहीं तो त्रिशूल की आग में जल जाएगा!"


साया गुस्से में चिल्लाया,

"ये मेरी कैदी है! कोई नहीं छुड़ा सकता!"


साधु ने त्रिशूल उठाया,

"अभी देख!"


और भाई, जैसे ही साधु ने त्रिशूल उठाया,

भयंकर बिजली की चमक,

आसमान फट गया जैसे...


वो साया एक झटके में हवा हो गया,

लेकिन जाते-जाते बोला,

"मुझे रोकोगे? ये हाईवे अब भी मेरा है... फिर लौटूंगा..."


भाई, मेरे हाथ-पैर कांप रहे थे।

साधु ने हमारी तरफ देखा,

"बच तो गए, पर अभी खतरा टला नहीं है। जल्दी इस लड़की को सही जगह छोड़ दो।"


मैंने कहा,

"बाबा, कौन है ये? क्या है इसका राज?"


साधु धीरे से बोला,

"ये साया बहुत पुराना है बेटा... इसके पीछे बहुत गहरा राज है... 












जो अभी तुम नहीं समझोगे..."

भाई, वो कह कर आगे बढ़ गया,

और हम...

ट्रक स्टार्ट कर आगे निकल पड़े।


पर भाई...

रास्ता अब भी वीरान था...

और मेरे दिल में ये सवाल —

क्या वो साया वाकई चला गया? या फिर किसी मोड़ पे इंतजार कर रहा है?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 19: "भूतिया साए की वापसी"


भाई...


जैसे ही साधु बाबा चले गए और मैंने ट्रक फिर से स्टार्ट किया,

शिवराम मेरी बगल में बैठा था, बिल्कुल चुप।

ट्रक की हेडलाइट्स के आगे वो लड़की भी गुमसुम बैठी थी,

आंखें लाल थीं, जैसे कई रातों से सोई न हो।


हवा अब भी सीटी मारती हुई चल रही थी,

और दूर-दूर तक सन्नाटा...

बस हम तीन और वो वीरान हाईवे।


शिवराम बोला,

"भैया, ये लड़की है कौन? और ये साया क्यों उसका पीछा कर रहा है?"


मैंने भी उससे पूछा,

"बहन, अब तो बता दे, तेरा सच क्या है?"


वो रोते हुए बोली,

"भैया, मेरा नाम गौरी है। मेरा गाँव जैसलमेर के पास है।

मैं... मैं उस साए की बीवी थी..."


भाई, ये सुनकर मेरे और शिवराम के रोंगटे खड़े हो गए।


मैंने हैरान होकर पूछा,

"क्या? बीवी?"


गौरी बोली,

"हाँ भैया... एक समय मैं भी आम लड़की थी।

शादी के बाद पता चला कि मेरा पति कोई इंसान नहीं,

बल्कि भूत-प्रेत की ताकत वाला आदमी था।

उसने मुझे तांत्रिक विद्या में फंसा लिया।

मुझे भी अपने जैसा बनाना चाहता था।"


शिवराम डरते हुए बोला,

"फिर? फिर क्या हुआ?"


गौरी की आँखों में आंसू आ गए,

"भैया, जब मैंने मना किया,

तो उसने मुझे मार डाला...

लेकिन मेरी आत्मा आज़ाद नहीं हो सकी।

मैं भी उसी हाईवे पर भटकती रही।

फिर वो वापस आया और मुझे फिर क़ैद कर लिया।"


भाई, हवा और तेज़ होने लगी।

जैसे कोई हमें सुन रहा हो।


मैंने ट्रक और तेज़ किया,

पर तभी ट्रक के सामने अचानक एक साया उभरा!

सफेद कपड़े, उलझे बाल, और लाल आंखें!

भाई, मैंने जोर से ब्रेक मारे,

ट्रक रुकते-रुकते धड़ाम!


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! वो फिर आ गया!"


गौरी चीख पड़ी,

"भैया बचाओ! ये मुझे फिर ले जाएगा!"


मैंने रॉड उठाई,

"आ जा जो करना है कर ले! लेकिन इस बार तुझे गौरी को नहीं ले जाने दूँगा!"


भाई, तभी वो साया धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ा,

हवा में एकदम से अजीब सी सरसराहट भर गई।


उसने गुर्राकर कहा,

"तुम बचा नहीं सकते इसको... ये मेरी है!"


गौरी रोती हुई मेरे पीछे छिप गई,

"भैया, ये मुझे मार डालेगा! बचा लो भैया!"


भाई, वो साया एकदम पास आ गया।

मेरी सांस अटक गई।

शिवराम कांपता हुआ बोला,

"भइया... कुछ करो!"


भाई, तभी ट्रक के डैशबोर्ड से माँ दुर्गा की मूर्ति नीचे गिरी।

मैंने जल्दी से उठाई और उस साए की तरफ बढ़ाई।


भाई, जैसे ही मूर्ति उसके सामने आई,

वो साया चीख पड़ा,

"नहीं! ये नहीं! ये शक्ति मुझे जला देगी!"


मैंने गुस्से में कहा,

"जा भाग यहाँ से! नहीं तो यहीं खाक कर दूँगा!"


भाई, वो जोर से चीखा,

"ये बीच में मत आओ! वरना पछताओगे!"


और फिर एक जोर की आंधी आई,

साया उसमें समा गया।


सब कुछ शांत हो गया...

पर भाई, गौरी अब भी डरी हुई थी।


शिवराम बोला,

"भइया, ये साया फिर लौट सकता है क्या?"


गौरी बोली,

"हाँ भैया... जब तक इसका सच सामने नहीं आएगा, ये पीछा नहीं छोड़ेगा।"


मैंने ट्रक स्टार्ट किया,

"तो बहन, आज रात नहीं, तुझे सही जगह पहुँचाकर ही दम लेंगे।"


भाई, जैसे ही ट्रक फिर चला,

दूर आसमान में बिजली कड़कने लगी,

जैसे कोई फिर से आने का इंतजार कर रहा हो।


और हाईवे अब भी वीरान था...

और हम,

अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 20: "मौत का खेल: काली परछाई की वापसी"


भाई...


जैसे ही मैंने ट्रक स्टार्ट किया,

गौरी की कांपती आवाज़ अब भी मेरे कानों में गूंज रही थी।

शिवराम और मैं, दोनों अंदर से हिल चुके थे।

पर रास्ता लंबा था... और अब हमें हर हाल में गौरी को उसके मुकाम तक पहुंचाना था।


ट्रक के अंदर एक अजीब सी खामोशी थी।

सिर्फ ट्रक के इंजन की घरघराहट, और हल्की-हल्की हवा की सिसकारी।


शिवराम ने धीरे से पूछा,

"भइया, अब क्या होगा? अगर वो साया फिर से आ गया तो?"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, डरना नहीं। अब जो भी होगा, सामना करेंगे।"


गौरी धीरे से बोली,

"भैया, वो जल्दी नहीं मानेगा... वो नहीं चाहता कि मैं आज़ाद हो जाऊं।"


भाई, जैसे ही उसने ये कहा,

अचानक ट्रक की हेडलाइट्स बंद हो गईं!

सब ओर अंधेरा छा गया!


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! देखो, लाइट्स बंद!"


मैंने फटाफट ब्रेक मारा।

ट्रक रुक गया।

शिवराम जल्दी से उतरने ही वाला था कि मैंने उसका हाथ पकड़ लिया,

"रुक! बाहर कुछ गड़बड़ है!"


भाई, हम दोनों ट्रक के अंदर से ही बाहर देखने लगे।

और तभी...

सड़क के किनारे पर कोई खड़ा दिखा...


एक काली परछाई...

धुंध में लिपटी हुई...

उसकी आंखें ऐसे चमक रही थीं जैसे जलते अंगारे।


गौरी सहम गई,

"भैया... वो फिर आ गया!"


भाई, वो परछाई धीरे-धीरे ट्रक की तरफ बढ़ने लगी।

हर कदम पर जमीन कांपती महसूस हो रही थी।


शिवराम हकलाया,

"भइया, अब क्या करें? ये तो सीधा हमारी तरफ आ रहा है!"


मैंने जेब से बाबा का दिया ताबीज निकाला।

और ट्रक से बाहर झाँकते हुए ज़ोर से कहा,

"जो भी है, सुन ले! अबकी बार तेरा सामना मुझसे है!"


भाई, वो साया एकदम पास आ गया।

और उसने... भयानक हंसी हंसनी शुरू कर दी।

"तुम बच नहीं सकते... ये रास्ता मेरा है... और ये लड़की भी!"


भाई, उसकी आवाज सुनकर शिवराम की रूह कांप गई।

गौरी सिसकते हुए बोली,

"भैया, ये बहुत शक्तिशाली है... इसे कोई नहीं हरा सकता।"


पर भाई, मैंने हिम्मत नहीं हारी।

मैंने जेब से गंगाजल की शीशी निकाली और उसकी तरफ फेंक दिया।


जैसे ही गंगाजल की बूंदें उस साए पर पड़ीं,

वो दर्द से चीख पड़ा,

"नहीं! ये नहीं! मुझे जलाता है ये!"


भाई, उसका चेहरा झुलसने लगा,

लेकिन वो फिर भी हंसता रहा...

"आज बच गए... लेकिन हमेशा नहीं बचोगे!"


और वो साया धुएं में बदलकर हवा में उड़ गया।


भाई, ट्रक की हेडलाइट्स अचानक से फिर जल गईं।

गौरी की आंखों में डर अब भी था।

शिवराम बोला,

"भइया, ये मानेगा नहीं... ये फिर आएगा।"


















मैंने ट्रक स्टार्ट करते हुए कहा,

"तो आ जाने दे! अब भागने वालों में से नहीं हैं हम!"


भाई, ट्रक फिर चल पड़ा,

लेकिन मन में एक डर...

आगे रास्ता और भी डरावना होने वाला था।


गौरी धीरे से बोली,

"भैया, आपको पता है? मेरा गाँव जहाँ है, वहाँ की हवाओं में भी उसकी साया फैली है।

अगर वहाँ पहुंचे, तो असली मुझसे मिलने आ जाएगा।"


शिवराम ने घबराकर पूछा,

"भइया, वहाँ जाना सही रहेगा?"


मैंने मुस्कराकर कहा,

"अगर कहानी खत्म करनी है,

तो वहीं जाना होगा... जहाँ से ये सब शुरू हुआ।"


भाई, ट्रक रात के अंधेरे को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था,

और हम अपने अंजाम की तरफ...




भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 21: "साए की जमीन: मौत का रास्ता"


भाई...


रात अब और भी काली होती जा रही थी।

हवा की सायं-सायं और ट्रक के इंजन की घर्राहट के सिवा सब कुछ चुप था।

मैं और शिवराम, दोनों की आंखों में नींद दूर-दूर तक नहीं थी।

गौरी चुपचाप खिड़की के बाहर देख रही थी... उसकी आंखें खाली थीं, जैसे किसी गहरे साए में डूबी हों।


शिवराम ने धीमे से कहा,

"भइया... कहाँ तक जाना है? ये रास्ता तो लगता है कभी खत्म ही नहीं होगा।"


मैंने भी हल्की सांस छोड़ते हुए कहा,

"शिवराम... अब जहाँ जाना है, वहाँ पहुँच कर ही रुकेंगे।"


गौरी की आवाज टूटी-फूटी सी आई,

"भैया, वो जो जगह है ना... वहाँ सिर्फ मेरा इंतजार नहीं हो रहा,

वहाँ वो साया अपने असली रूप में मिलेगा।"


भाई, जैसे ही उसने ये कहा,

अचानक ट्रक का स्टीयरिंग खुद-ब-खुद घूमने लगा!

भाई, ये क्या हो रहा था!

मेरे हाथ स्टीयरिंग पर मजबूती से थे, लेकिन कोई अंजानी ताकत उसे घुमा रही थी।


शिवराम चीख पड़ा,

"भइया! कौन चला रहा है ट्रक?!"


मैं ज़ोर से चिल्लाया,

"गौरी! क्या ये वही साया है?"


गौरी की आंखों में डर की लहर दौड़ गई।

"हाँ भैया... वो आ गया है... अब और पास!"


भाई, ट्रक सीधे कच्चे रास्ते की ओर मुड़ गया।

जहाँ ना कोई लाइट, ना कोई निशान।

सिर्फ वीरान जमीन... और दूर-दूर तक अंधेरा।


भाई, दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं।

शिवराम बुदबुदाया,

"भइया... ये कौन सी जगह है? कहीं मरघट तो नहीं?"


गौरी की कांपती आवाज आई,

"यही है वो जगह... जहाँ मुझे जिंदा जलाया गया था..."


भाई, सुनकर हमारे रोंगटे खड़े हो गए।


अचानक ट्रक की हेडलाइट्स अपने आप बंद हो गईं।

सब कुछ एकदम काला।

हमने एक-दूसरे की तरफ देखा।


फिर दूर से घुंघरुओं की आवाज़ आई।

भाई, जैसे कोई औरत चल रही हो, भारी घुंघरू पहन के।


शिवराम डरते हुए बोला,

"भइया, कोई आ रहा है..."


और भाई,

जैसे ही हमारी आँखें अंधेरे में थोड़ी एडजस्ट हुईं,

हमने देखा...


एक औरत, पूरी काली साड़ी में, चेहरे पर बाल लटकाए हुए, हाथ में दिया लिए, हमारे ट्रक की तरफ देख रही थी।


भाई, उसका दिया हवा में भी बुझा नहीं।

उसके पैर ज़मीन पर नहीं, हवा में थे।

गौरी कांपती हुई बोली,

"भैया... ये वही है... जिसने मेरी जान ली थी... वही औरत!"


भाई, और उस औरत की गर्दन धीरे-धीरे मुड़ी... एकदम उल्टी तरफ!

और उसकी आंखों से... खून की धार बह रही थी।


शिवराम रोते हुए बोला,

"भइया! भाग चलो यहां से!"


लेकिन भाई, ट्रक स्टार्ट नहीं हो रहा था।

बार-बार कोशिश की,

लेकिन जैसे किसी ने उसकी जान निकाल ली हो।


और तभी...

वो औरत एकदम से ट्रक के बोनट पर कूद गई!

उसका चेहरा हमारी तरफ!

आंखें लाल!

मुँह से खून टपकता!

और भयानक हंसी...!


गौरी रोते हुए चिल्लाई,

"भैया, वो मुझे नहीं छोड़ेगी...! मुझे बचा लो भैया!"


भाई, मेरे हाथ काँप रहे थे।

शिवराम ने अपने गले से लाल धागा निकाला और गौरी को पहनाने लगा।

"ये ले बहन, बाबा का धागा है, तुझे बचाएगा!"


जैसे ही गौरी के गले में धागा पड़ा,

वो औरत भयानक चीख मार कर गायब हो गई।


और भाई, उसी वक्त ट्रक की लाइट फिर से जल उठी।

इंजन स्टार्ट हो गया।


गौरी की आंखों में आंसू थे।

"भैया... अब बचेंगे क्या?"


मैंने ट्रक आगे बढ़ाते हुए कहा,

"गौरी, अब तो जो भी होगा, देख लेंगे।

अब पीछे नहीं हटेंगे।"


भाई, लेकिन मन में एक डर साफ था —

जैसे-जैसे हम मंजिल के करीब पहुँच रहे थे,

ये साया और खतरनाक होता जा रहा था।


शिवराम बोला,

"भइया... आगे कुछ बड़ा होने वाला है।"


और भाई, मैं भी जानता था... आगे असली खेल बाकी है।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 22: "मौत की मंज़िल: जहां साया इंतजार करता है"


भाई...


रात और भी डरावनी हो चली थी।

ट्रक अब उस वीरान कच्चे रास्ते पर सरपट दौड़ रहा था।

हवा में अजीब सी गंध थी, जैसे कुछ जला हो... शरीर की राख जैसी बदबू।

गौरी पीछे बैठी बुरी तरह काँप रही थी।

शिवराम लगातार माला के मनके घुमा रहा था,

"ओम नमः शिवाय... ओम नमः शिवाय..."


भाई, तभी सामने एक टूटा हुआ पुराना बड़ा सा पीपल का पेड़ नजर आया।

वो पेड़ अजीब सा हिल रहा था, जैसे हवा में नहीं, किसी के हाथों से झूल रहा हो।


मैंने ब्रेक दबाया, लेकिन भाई...

ब्रेक फेल!

शिवराम घबराया,

"भइया! पेड़ आ रहा है सामने... बचाओ!"


मैंने जोर लगाकर ट्रक को मोड़ने की कोशिश की।

लेकिन भाई...

ट्रक उस पेड़ की तरफ खिंचता जा रहा था।

जैसे कोई साया ट्रक को खींच रहा हो।


और भाई... एक झटके में ट्रक पेड़ के सामने रुक गया।


गौरी की आंखों से आंसू बह रहे थे।

उसने धीरे से कहा,

"भैया, ये वही जगह है... जहां मेरी चिता जली थी।"


शिवराम चौंक कर बोला,

"क...क्या मतलब? कौन जलाया था तुझे?"


गौरी की आंखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे।

"मेरे ही अपने...

मेरे पति, उनकी दूसरी औरत, और वो पुजारी...

जिन्होंने मुझे डायन कहकर जला दिया।"


भाई, ये सुनते ही हम सन्न रह गए।

हवा में जैसे औरत की चीखों की आवाज़ गूंज उठी।

"मुझे क्यों जलाया... क्यों..."


भाई, और तभी,

हमने देखा —

पेड़ की डाल पर एक साया झूल रहा था,

औरत का साया,

फांसी के फंदे में लटकता हुआ।

उसका सिर एक तरफ लटका था, आंखें बाहर निकली हुई, और जीभ लटकी हुई!


शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया... ये क्या है... ये कौन है?"


गौरी की आवाज टूटी हुई थी,

"यही वो है... जिसने मुझे मारा... अब वो भी इस साए में कैद है।"













भाई, तभी वो साया एक जोरदार चीख के साथ नीचे कूद पड़ा,

और हमारी तरफ बढ़ा।


शिवराम कांपता हुआ बोला,

"भइया, ये साया तो हमारा भी काम तमाम कर देगा।"


मैंने तुरन्त जेब से मां की दी हुई ताबीज़ निकाली,

और ट्रक के सामने लहराया।

"जो भी है... दूर हट जा हमारे रास्ते से!"


भाई, उस ताबीज़ को देख कर साया रुक गया।

लेकिन भाई, उसकी आंखें आग की तरह जल रही थीं।

फिर भी वो पीछे हट गया।


गौरी रोते हुए बोली,

"भैया, मुझे उस घर तक ले चलो... जहां ये सब शुरू हुआ था।"


मैंने कहा,

"ठीक है गौरी, अब जो भी सच है, सामने आएगा।"


शिवराम ने कहा,

"भइया, लेकिन उस घर में जाना खतरे से खाली नहीं होगा।"


मैंने गहरी सांस ली,

"जो डर गया, वो मर गया शिवराम। अब पीछे नहीं हट सकते।"


भाई, फिर से ट्रक स्टार्ट किया।

आगे अंधेरे में एक पुराना खंडहर दिख रहा था।

गौरी ने इशारा किया,

"भैया, वही है मेरा घर... अब सारा सच वहीं खुलेगा।"


भाई, दिल थाम कर हम ट्रक लेकर उस खंडहर की ओर बढ़े।

मन में बस एक ही सवाल —

आखिर इस साए की सच्चाई क्या है?

और क्या हम बच पाएंगे?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 23: "खून से लिपटा सच: खंडहर की रात"


भाई...


ट्रक धीरे-धीरे उस खंडहरनुमा हवेली के सामने आकर रुक गया।

पूरा मकान वीरान, टूटी दीवारें, उखड़ा फर्श,

और हवा की सरसराहट के साथ जैसे कोई धीमे-धीमे हंस रहा हो।


गौरी कांपते हुए बोली,

"यही है मेरा घर... यहीं मुझे जिंदा जलाया था।"


शिवराम ने धीरे से कहा,

"भइया, लगता है कोई भी अंदर नहीं जाता होगा... बहुत डरावना है ये जगह।"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, जो भी हो, अब हमें अंदर जाना ही पड़ेगा।"


भाई, जैसे ही हमने ट्रक से उतर कर हवेली की तरफ कदम बढ़ाए,

दरवाज़ा खुद-ब-खुद चर्र्रर्रर्रर की आवाज़ के साथ खुल गया।

जैसे कोई अंदर बुला रहा हो।


गौरी ने काँपती आवाज़ में कहा,

"भैया... इस दरवाजे के पीछे मेरा सब कुछ छिन गया था।"


जैसे ही हम अंदर घुसे,

अंदर की दीवारों पर रक्त के धब्बे अब भी सूखे हुए नजर आ रहे थे।

हवा में गाय के गोबर, अगरबत्ती और कुछ सड़ी हुई चीज़ की मिली-जुली बदबू।


शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया... ये खून के निशान... अभी भी ताजे क्यों लग रहे हैं?"


गौरी ने धीमे से कहा,

"क्योंकि मेरा खून अभी भी साया बनकर इस घर में भटकता है।"


भाई, तभी अचानक ऊपर की सीढ़ियों से महिला की डरावनी चीख गूंजी,

"कौन है वहां...? फिर से कौन आया है?"


शिवराम तो सीधा पीछे हटने लगा,

"भइया... चलो यहां से निकलते हैं... ये जगह ठीक नहीं।"


मैंने उसका हाथ पकड़ा,

"नहीं शिवराम... जब तक सारा सच नहीं जान लेंगे, कहीं नहीं जाएंगे।"


गौरी हमें उस कमरे में ले गई,

जहां उसे जलाया गया था।

भाई... जैसे ही उस कमरे के दरवाजे पर कदम रखा,

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी गर्दन पकड़ ली हो।


गौरी ने इशारा किया,

"यहीं... यहीं उन्होंने मुझे रस्सियों से बांधा था... और फिर आग लगा दी।"


शिवराम की आंखें फटी रह गईं,

"भइया... देखो! कोने में राख के ढेर में औरत की हड्डियां दिख रही हैं!"


भाई, सच में... राख के ढेर में जली हुई हड्डियां चमक रही थीं।

और तभी... कमरे की दीवार पर खून से लिखा नाम उभर आया — 'गौरी'


शिवराम हक्का-बक्का,

"भइया... ये क्या है? ये कैसे लिखा गया?"


मैंने देखा,

खून की ताजी बूंदें अब भी टपक रही थीं।


भाई... तभी, कमरे के कोने से काला साया निकला।

वही आदमी, जिसने गौरी को जलाया था —

उसके चेहरे पर भयानक घाव, एक आंख बाहर निकली हुई, और आधा चेहरा जला हुआ।


उसने गुर्राकर कहा,

"यहां क्यों आए हो?

ये मेरी जगह है... गौरी मेरी थी!"


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया... ये... ये इंसान नहीं साया है।"


मैंने जेब से ताबीज़ निकाला,

"अगर तू इंसान नहीं, तो आज तुझे मुक्ति दिलाऊंगा!"


भाई, तभी उस साए ने जोर की दहाड़ मारी।

कमरे की सारी खिड़कियां खुद-ब-खुद बंद हो गईं।

हवा बंद... और हम तीनों फंस गए उस साए के साथ।


गौरी की आंखों से आंसू गिरते हुए,

"भैया, आज इसका हिसाब चाहिए... आज इसकी रूह को सजा दिलानी है!"


मैंने हिम्मत कर के कहा,

"तो बता गौरी, क्या करना होगा?"


गौरी ने कहा,

"वो मटका... जो कमरे के कोने में रखा है... उसमें इसकी रूह बंद है... उसे तोड़ दो भैया!"


भाई, मैं और शिवराम दौड़े उस मटके की तरफ।

जैसे ही मटके के पास पहुंचे,

वो साया हमारे बीच आकर खड़ा हो गया।


"कोशिश की तो जान ले लूंगा!"


शिवराम ने कांपते हुए कहा,

"भइया जल्दी करो!"


मैंने भगवान का नाम लेकर,

जोर से मटका उठाया और जमीन पर फोड़ दिया!


भाई... मटके के फूटते ही अंदर से काली धुआं और चीखें निकलने लगीं।

साया ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया,

"नहीं... नहीं... मुझे मत जला! मैं नहीं मरना चाहता!"


लेकिन भाई...

गौरी की आत्मा ने वो साया पकड़ लिया।

और वो दोनों जलते-जलते राख हो गए।


हवा में अब सन्नाटा था...

लेकिन भाई,

गौरी की आत्मा मुस्कुरा रही थी।

"धन्यवाद भैया... मुझे मुक्ति मिल गई।"


शिवराम और मैं एक-दूसरे को देख रहे थे।

जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो।


फिर शिवराम बोला,

"भइया... अब चले क्या?"


मैंने गहरी सांस ली,

"हां शिवराम, अब ये रास्ता साफ हो गया। अब डरने की जरूरत नहीं।"


भाई... जैसे ही हम ट्रक की ओर बढ़े,

पीछे से गौरी की आवाज आई — "भैया, रास्ते में मिलूंगी!"


शिवराम बोला,

"क्या मतलब भइया...?"


मैंने बस मुस्कुराकर कहा,

"चल शिवराम, अब रात बीत चुकी है, लेकिन कहानी अभी बाकी है..."



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 24: "रात के बाद भी डर नहीं गया..."


भाई...


हमने जैसे ही ट्रक स्टार्ट किया,

एक बार को ऐसा लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया।

ट्रक की लाइटें भी अब ठीक से जल रहीं थीं,

और इंजन की आवाज भी नॉर्मल थी।


शिवराम ने चैन की सांस लेते हुए कहा,

"भइया... लगता है अब वो आत्मा हमें नहीं डराएगी।"


मैंने भी सोचा,

"शायद अब रास्ता साफ है।"


लेकिन भाई,

जैसे ही ट्रक ने हवेली को पीछे छोड़ा,

रियर व्यू मिरर में मुझे फिर से कुछ अजीब दिखा।


एक औरत की परछाईं,

जो हवेली के दरवाजे पर खड़ी थी...


















और धीरे-धीरे हाथ हिला रही थी,

जैसे हमें अलविदा कह रही हो।


मैंने जल्दी से नजरें फेर लीं।


शिवराम ने कहा,

"भइया, अब सीधा घर चलेंगे ना?"


मैंने कहा,

"हाँ शिवराम, अब सीधा घर।"


भाई, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।


जैसे ही हम हाईवे पर पहुंचे,

रात के 3 बजे,

हाईवे एकदम सुनसान था।


चाँद की हल्की रोशनी,

दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं।


भाई, तभी सामने से धुंध में लिपटा ट्रक आता दिखा।

बिलकुल सफेद, बिना नंबर प्लेट का,

और उसकी हेडलाइट्स भी अजीब सी नीली चमक रही थीं।


शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया... वो देखो... कौन है इतनी रात को?"


मैंने ध्यान से देखा,

"शिवराम... ये वही ट्रक है... जो पहले भी दिखा था!"


भाई, वो ट्रक सीधा हमारी तरफ आ रहा था।

जैसे ही वो पास आया,

उसके अंदर कोई ड्राइवर नहीं था।

बस, खाली ट्रक, खुद से चल रहा था!


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! क्या करें?"


मैंने जल्दी से ट्रक को साइड में लिया।

लेकिन भाई, वो भूतिया ट्रक भी हमारे बगल में चलने लगा।


इतना नज़दीक कि

उसके अंदर की टूटी खिड़की से

हवा की तेज़ आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।


फिर भाई, अचानक उस ट्रक के अंदर से वही औरत —

गौरी जैसा चेहरा —

हमें घूरने लगी।


उसकी आंखें लाल,

चेहरा जला हुआ,

और हाथ में खून से सनी चुन्नी।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया! ये क्या है?

गौरी तो चली गई थी ना?"


मैंने भी हैरानी से देखा,

"हां... लेकिन ये कौन है?"


भाई, तभी वो ट्रक तेज रफ्तार से हमारे आगे निकल गया।

और एकदम से गायब हो गया हवा में!


शिवराम बोला,

"भइया... अब क्या करें?

ये साया पीछा कर रहा है क्या?"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, लगता है ये हाईवे सिर्फ गौरी की कहानी नहीं है...

ये रास्ता खुद श्रापित है।"


भाई, तभी रास्ते में एक पुरानी पुलिया आई।

जैसे ही हम उस पुलिया पर पहुंचे,

ट्रक की हेडलाइट्स खुद-ब-खुद बुझ गईं।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! अंधेरा हो गया!"


मैंने ट्रक रोक दिया।


भाई, चारों तरफ घुप्प अंधेरा।

बस, हवा की आवाज और दूर कहीं लोमड़ियों की डरावनी चीखें।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया... यहां कुछ गड़बड़ है।"


मैंने कहा,

"बैठो ट्रक में... कुछ भी हो जाए, उतरना नहीं।"


फिर भाई, मैं ट्रक से उतरा,

हाथ में टॉर्च लेकर।


जैसे ही टॉर्च की रोशनी आगे की,

भाई, पुलिया के किनारे पर एक औरत बैठी थी —

लंबे बाल, सफेद साड़ी,

और चेहरे पर भयानक मुस्कान।


उसने धीरे-धीरे सिर घुमाया और बोली,

"कहां जा रहे हो ड्राइवर...?

ये रास्ता तुम्हारे लिए नहीं।"


भाई, दिल की धड़कन रुक गई।


शिवराम ने ट्रक से झांक कर देखा,

और तुरंत पीछे सीट पर छिप गया।


भाई, उस औरत ने फिर कहा,

"मुझे कोई नहीं बचा सकता...

अब तुम भी नहीं बचोगे।"


मैं कांपते हुए बोला,

"क... कौन हो तुम?"


वो हंसी,

"जो इस रास्ते पर आता है...

वो मेरा हो जाता है।"


भाई, तभी हवा में भारी गूंजती हंसी गूंजी।

और ट्रक के अंदर बैठा शिवराम चिल्लाया,

"भइया! जल्दी आओ!"


मैंने बिना पीछे देखे ट्रक की तरफ दौड़ लगाई।

ट्रक स्टार्ट किया और निकल पड़ा उस अंधेरे पुलिया से।


पीछे मुड़ कर देखा तो भाई,

वो औरत अभी भी वहीं बैठी थी...

हाथ हिलाते हुए कह रही थी,

"फिर मिलेंगे... जल्दी ही!"


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया... क्या ये रास्ता कभी खत्म होगा?"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम... लगता है ये हाईवे...

हमसे अभी और भी राज़ उगलवाएगा।"



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 25: "हाईवे का खौफनाक खेल..."


भाई...


ट्रक अब तेज़ी से भाग रहा था,

जैसे हमारी जान बचाने की कोशिश कर रहा हो।

लेकिन दिल में डर ऐसा बैठ चुका था,

कि लग रहा था जैसे ये रास्ता कभी खत्म नहीं होगा।


शिवराम अब चुप बैठा था,

उसके होंठ सूख गए थे,

और आँखें लाल।


मैंने भी ट्रक की स्पीड 80-90 के पार कर दी थी।

लेकिन भाई, वो सन्नाटा,

वो अजीब सी ठंडी हवा,

वो अब भी ट्रक के चारों ओर थी।


अचानक भाई,

सामने दूर से एक तेज रौशनी आती दिखी।


शिवराम चौकते हुए बोला,

"भइया... सामने कौन है?"


मैंने आँखें गड़ा के देखा।


भाई, सामने एक पुराना ट्रक,

जिसके पीछे लिखा था — "मौत की सवारी"।


शिवराम घबराकर बोला,

"भइया! ये क्या मजाक है?"


लेकिन भाई, मजाक नहीं था।

वो ट्रक धीरे-धीरे हमारी तरफ आ रहा था,

और जैसे ही पास आया,

उसके ड्राइवर सीट पर कोई नहीं था!


भाई, हकीकत में खाली ट्रक,

लेकिन चल खुद से रहा था!


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया! ये कौन चला रहा है?"


मैंने कहा,

"शिवराम, कोई साया है यहां।"


जैसे ही वो ट्रक हमारी बगल में आया,

उसके अंदर से किसी औरत की चीख सुनाई दी।


शिवराम ने मेरे हाथ पकड़ लिए,

"भइया! अब बचा लो!"


भाई, मैं ट्रक को साइड में लेकर रुका,

और वो "मौत की सवारी" वाला ट्रक आगे निकल गया।


लेकिन भाई, डर तब और बढ़ गया

जब वो ट्रक थोड़ी दूरी पर रुक गया।


भाई, रुकने के बाद उसके पीछे एकदम साफ लिखा दिखा,

"जो भी मेरे पीछे आएगा, उसकी मौत तय है।"


शिवराम रोते हुए बोला,

"भइया... अब क्या करें?"


मैंने हिम्मत जुटाई और कहा,

"शिवराम... चाहे कुछ भी हो,

अब इस हाईवे से पार निकलना ही पड़ेगा।"


भाई, जैसे ही मैंने फिर ट्रक आगे बढ़ाया,

सामने रास्ते के बीचों-बीच एक औरत खड़ी दिखी।


उसका सिर झुका हुआ,

बाल पूरे चेहरे पर,

और सफेद लिबास हवा में उड़ रहा था।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया... वो फिर आ गई!"


मैंने कहा,

"आंख बंद कर ले शिवराम!"


भाई, मैंने ट्रक की स्पीड और बढ़ाई,

पर जैसे-जैसे पास पहुंचे,

वो औरत गायब हो गई हवा में।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, ये कौन है? क्या चाहती है हमसे?"


मैंने कहा,

"शिवराम, ये हाईवे शायद अपने राज़ खुद बयां कर रहा है।"


भाई, तभी अचानक ट्रक के सामने

एक छोटा बच्चा आ गया —

सिर से खून बहता हुआ।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया! ब्रेक मारो!"


मैंने जोर से ब्रेक मारा,

(तेज ब्रेक की आवाज)

और ट्रक एक झटके में रुक गया।


हम दोनों उतर कर बाहर आए।


भाई, बाहर उतर कर देखा तो...

वहां कोई नहीं था!

ना बच्चा, ना कोई और निशान।


शिवराम मेरे पास आकर बोला,











"भइया, हम फंस गए हैं।

ये रास्ता हमें जाने नहीं देगा।"


मैंने गहरी सांस ली,

"शिवराम, जो भी है,

हमें इसका सामना करना ही होगा।"


भाई, तभी पीछे से फिर वही आवाज —

(डरावनी हंसी)


हमने मुड़कर देखा,

तो वो औरत,

वही जो हवेली में मिली थी,

अब हमारे ठीक पीछे खड़ी थी।


चेहरे पर भयानक मुस्कान,

और आंखें जलती हुई।


उसने कहा,

"तुम मुझसे बच नहीं सकते।

अब ये रास्ता तुम्हारा आखिरी रास्ता है।"


शिवराम डर से थर-थर कांपते हुए बोला,

"भइया... भागो!"


भाई, हम दोनों भाग कर ट्रक में चढ़े,

और ट्रक स्टार्ट कर दिया।


लेकिन भाई, जैसे ही ट्रक आगे बढ़ा,

सामने वही औरत, ट्रक के बोनट पर चढ़ी हुई!


शिवराम चीख पड़ा,

"भइया! क्या कर रही है ये?"


भाई, मेरा भी दिल बैठा जा रहा था।

उस औरत ने कांच से झांकते हुए कहा,

"अब तुम मुझसे बच नहीं सकते।"


भाई, इतना कहते ही

वो अचानक गायब हो गई।


ट्रक फिर तेज़ रफ्तार में चल पड़ा।

पर भाई, डर ये था कि

ये खेल अभी खत्म नहीं हुआ था।


शिवराम ने कांपती आवाज़ में कहा,

"भइया, क्या अब भी हम बच पाएंगे?"


मैंने लंबी सांस ली,

"शिवराम, अब लड़ना पड़ेगा।

क्योंकि ये रास्ता,

हमें छोड़ने वाला नहीं।"


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 26: "साया जो पीछा नहीं छोड़ता..."


भाई...


ट्रक अब रफ्तार पकड़ चुका था।

शिवराम मेरे पास चुपचाप बैठा था,

लेकिन उसकी आंखें अब भी डर से फटी हुई थीं।


हवा में अजीब सी गंध थी,

जैसे कोई पुराना, सड़ा हुआ मांस जल रहा हो।

ट्रक के बाहर सिर्फ अंधेरा...

और अंदर हमारे डर की आवाजें।


शिवराम बोला,

"भइया... ये रास्ता कभी खत्म नहीं होगा क्या?"


मैंने कहा,

"शिवराम... सब्र रख... कुछ तो रास्ता निकलेगा।"


लेकिन भाई, तभी सामने फिर वही पुरानी हवेली दिखी,

जहां से सब कुछ शुरू हुआ था।


मैं हैरान रह गया।

"अरे ये कैसे हो सकता है? हम तो काफी आगे निकल चुके थे!"


शिवराम ने काँपते हुए कहा,

"भइया... हम फंस गए हैं, ये साया हमें घूम-घूम कर वहीं ला रहा है।"


भाई, अब दिल की धड़कनें और तेज़ हो गईं।

ट्रक का हैंडल पकड़ते हुए,

मैंने फिर से ट्रक मोड़ने की कोशिश की,

पर ट्रक जैसे किसी अदृश्य ताकत से बंधा हो।


ट्रक अपने आप हवेली की तरफ बढ़ने लगा।


शिवराम बोला,

"भइया! कुछ करो...! ये अपने आप जा रहा है।"


मैंने पूरा जोर लगा दिया,

पर स्टीयरिंग जैसे जम गया था।


भाई, ट्रक सीधा हवेली के सामने आकर रुक गया।

(ट्रक के ब्रेक की चरमराहट)


जैसे ही ट्रक रुका,

हवेली के दरवाजे खुद-ब-खुद खुल गए।

अंदर से फिर वही औरत की हंसी,

(डरावनी हंसी की गूंज)


शिवराम मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोला,

"भइया, इस बार कुछ बड़ा होने वाला है।"


भाई, मैं हिम्मत करके नीचे उतरा।

शिवराम भी मेरे साथ।


हम दोनों हवेली के अंदर गए।

भाई, अंदर घुप्प अंधेरा था,

और दीवारों पर लाल रंग से कुछ लिखा था —


"जो आएगा, वापस नहीं जाएगा..."


शिवराम ने कांपते हुए पढ़ा,

"भइया, ये क्या लिखा है?"


मैंने कहा,

"लगता है, ये रास्ता मौत का रास्ता है।"


भाई, अचानक एक कमरा अपने आप खुला।

कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी,

और कुर्सी पर बैठी वही औरत।


उसके चेहरे पर डरावनी मुस्कान,

और उसकी आंखें सीधे हमारी आंखों में।


वो बोली,

"कहा ना... यहां से कोई नहीं जाता।"


शिवराम बोला,

"तू कौन है? क्यों कर रही है ये सब?"


भाई, वो औरत गुस्से में बोली,

"मेरा सब कुछ छीन लिया लोगों ने...

अब मैं सबको छीन लूंगी!"


फिर वो बोली,

"जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो,

वो मेरा रास्ता है,

मेरी आत्मा का रास्ता।"


भाई, ये सुनते ही शिवराम ने हिम्मत की,

"अगर तू आत्मा है, तो हमें क्यों परेशान कर रही है?

हमें छोड़ दे।"


भाई, वो औरत जोर से हंसी,

"अब तुम दोनों भी यहीं रहोगे,

मेरे साथ... हमेशा के लिए।"


भाई, जैसे ही उसने ये कहा,

कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

अंधेरा छा गया।


हम दोनों अंदर फंस चुके थे।

ट्रक बाहर,

और हम हवेली के जाल में।


शिवराम बोला,

"भइया, अब क्या करेंगे?"


भाई, मैंने कहा,

"शिवराम, या तो ये रास्ता हमें छोड़ेगा,

या हम इसे।"


भाई, तभी कमरे के कोने से

एक डरावना साया हमारी तरफ बढ़ा।


शिवराम चीख पड़ा,

"भइया! देखो!"


मैंने भी देखा,

भाई, वो साया धीरे-धीरे हमारी तरफ आ रहा था।

और जैसे-जैसे पास आ रहा था,

ठंडी हवा हमारे बदन को छूने लगी।


भाई, उस साए ने पास आकर कहा,

"तुमने मेरी कहानी नहीं सुनी,

इसलिए फंसे हो।

अगर जान बचानी है,

तो मेरी कहानी सुनो।"


शिवराम कांपते हुए बोला,

"क्या कहानी?"


भाई, उस साए ने कहा,

"मेरी मौत की,

मेरी बर्बादी की।"


भाई, जैसे ही वो बोलने लगा,

कमरे के चारों ओर अजीब सी परछाइयाँ घूमने लगीं।

और हवेली की दीवारों से आवाजें आने लगीं।

(औरत की रोने की आवाज, बच्चे की चीखें, हवाओं की सिसकियाँ)


भाई, मैं और शिवराम पत्थर की तरह खड़े थे।


अब वो साया बोलने लगा,

"मेरी कहानी सुनोगे तो ही यहां से जा पाओगे।

वरना, हमेशा यहीं फंसे रहोगे।"


भाई, अब हमारी जान उसी की बात मानने में थी।

मैंने कांपते हुए कहा,

"ठीक है, सुना, बता तेरी कहानी।"


भाई, वो साया अब हमें अपनी दर्दनाक कहानी सुनाने वाला था।

एक ऐसी कहानी,

जिसने उस हाईवे को भूतिया बना दिया।


भाई, इस दर्दनाक और डरावनी कहानी का राज़ खोलूंगा अगले पार्ट में...



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 27: "साये की सच्चाई...जिसने हाईवे को बना दिया मौत का रास्ता"


भाई...


कमरे के चारों तरफ अंधेरा और साया हमारे सामने।

वो साया, जो अब हमें अपनी सच्चाई सुनाने लगा।

हवा की सिसकती आवाजें,

हवेली की दीवारें जैसे उसकी बातों पर रो रही थीं।


साया बोला,

"मेरा नाम था रूपकंवर,

यही इस गांव की बेटी थी मैं।

खूबसूरत, हंसती खेलती ज़िंदगी थी मेरी।"


शिवराम धीरे से बोला,

"फिर... फिर क्या हुआ?"


भाई, साया बोली,

"मेरी शादी कर दी गई एक लालची आदमी से।

जो सिर्फ दहेज चाहता था।

मेरे मायके वाले गरीब थे,

कुछ नहीं दे पाए।

मेरे ससुराल वालों ने मुझे जला डाला...

जिंदा जला दिया!"


भाई, ये सुनकर हमारे रौंगटे खड़े हो गए।



















साया की आवाज में गुस्सा और दर्द एक साथ था।


"जैसे ही मैं जली...

मेरी आत्मा ने कसम खाई,

जो भी इस रास्ते से जाएगा,

उसे भी वही दर्द दूंगी।

ताकि दुनिया को पता चले,

दहेज के लालच ने कैसे बर्बाद किया मुझे।"


शिवराम कांपते हुए बोला,

"तो...तुम इस हाईवे पर सबको क्यों मारती हो?"


साया बोली,

"क्योंकि जब मैं तड़प रही थी,

कोई भी नहीं बचाने आया।

सारे गांव वाले चुप थे।

अब मैं सबका दर्द बन चुकी हूं।

ये रास्ता... अब मेरा है।"


भाई, उस साए की आंखों से जैसे आंसू गिर रहे थे,

लेकिन वो आंसू आग बन चुके थे।


मैंने हिम्मत कर के कहा,

"बहन, तेरा दुख समझते हैं,

लेकिन जो बेगुनाह हैं,

उन्हें क्यों मारती हो?"


साया गुस्से में बोली,

"सब गुनहगार हैं!

जो चुप थे, वो भी गुनहगार!

जो देख कर अनदेखा कर गए,

वो भी गुनहगार!"


भाई, शिवराम ने रोते हुए कहा,

"लेकिन हम तो कुछ नहीं जानते थे!

हमें छोड़ दे... हमें जाना है..."


भाई, साया चुप हो गई।

फिर बोली,

"अगर सच में मुझसे सहानुभूति है,

तो मेरा बदला लो।

उन लोगों का सच सबके सामने लाओ,

जिन्होंने मुझे मारा।

तभी ये रास्ता छोड़ेगा तुम्हें।"


मैंने कहा,

"कैसे लाएं? कौन लोग हैं?"


साया बोली,

"जैसलमेर के पास जो पुराना गांव है 'खेजड़ला',

वहीं के लोग हैं।

उनके नाम दीवार पर खुदे हुए हैं।

जाओ, पता करो।

अगर मेरा सच सामने नहीं आया,

तो तुम दोनों की भी रूह यहीं भटकेगी।"


भाई, ये सुनकर हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई।

मतलब अगर हम उसका बदला नहीं लाए,

तो हमारा भी वही हश्र!


शिवराम ने कहा,

"भइया, अब क्या करेंगे?"


मैंने कहा,

"शिवराम, अब हमें ये सच्चाई सामने लानी होगी।"


भाई, तभी साया बोली,

"याद रखना...

अगर किसी को बताने की कोशिश की,

तो मेरी आत्मा तुम्हारा पीछा करेगी।

सच सामने लाना है...

वरना यहां से कोई रास्ता नहीं।"


फिर वो साया अंधेरे में गायब हो गई।

कमरे की दीवारों पर लिखे नाम दिखने लगे।

शिवराम ने कांपते हुए कहा,

"भइया, ये नाम याद रखना पड़ेगा।"


भाई, जैसे ही हम नाम पढ़ रहे थे,

अचानक ट्रक का हॉर्न अपने आप बजने लगा।

(ट्रक हॉर्न की डरावनी आवाज)


शिवराम बोला,

"भइया, ट्रक बुला रहा है क्या?"


मैंने कहा,

"चलो, यहां से निकलते हैं।"


भाई, जैसे ही बाहर आए,

हवेली अपने आप बंद हो गई।

और वो रास्ता फिर वही वीरान,

लेकिन अब हवेली की सच्चाई हमारे साथ।


भाई, अब अगला पड़ाव —

खेजड़ला गांव।

जहां हमें उस औरत के कातिलों का नाम पता लगाना है।


लेकिन भाई, क्या गांव वाले सच बताएंगे?

क्या वो नाम अब भी जिन्दा हैं?

या उस औरत की आत्मा ने उन्हें पहले ही सजा दे दी है?


भाई, अब सफर उस गांव की ओर होगा,

जहां हर मोड़ पर खतरा होगा।

क्योंकि अब हम सच्चाई की तलाश में हैं,

और वो आत्मा पीछे-पीछे।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 28: "खेजड़ला गांव की ओर मौत का सफर"


भाई...


जैसे ही हवेली से बाहर निकले,

शिवराम की आंखें डर के मारे लाल हो रही थीं।

उसके हाथ कांप रहे थे।

मैंने उसकी पीठ थपथपाई,

"शिवराम, अब डरना नहीं है।

हमें इस सच्चाई को बाहर लाना ही पड़ेगा।"


भाई, रात के अंधेरे में वो हाईवे और भी भूतिया लग रहा था।

दूर तक वीरानी थी।

ट्रक की हेडलाइट की पीली रोशनी बस आगे का रास्ता दिखा रही थी।

हमने ट्रक स्टार्ट किया।

(ट्रक स्टार्ट होने की भारी आवाज)


भाई, जैसे ही ट्रक ने रास्ता पकड़ा,

हम दोनों की नजरें बार-बार शीशे में जा रही थीं।

लग रहा था जैसे कोई पीछे बैठा है।


शिवराम बोला,

"भइया, लगता है वो साया अभी भी हमारे साथ है।"


मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा,

"शिवराम, हमें अब उसका बदला पूरा करना है।"


भाई, ट्रक की स्पीड धीमी थी,

क्योंकि डर के मारे हाथ-पैर सुन्न थे।

रास्ता ऐसा लग रहा था जैसे हर पेड़, हर पत्थर हमें घूर रहा हो।

(हवा की सिसकती आवाजें, दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज)


अचानक शिवराम ने मेरी बांह पकड़ ली,

"भइया, वो देखो!"


भाई, ट्रक की हेडलाइट के सामने अचानक एक औरत खड़ी थी!

सफेद साड़ी, खुले बाल, सिर झुका हुआ।

ट्रक की लाइट में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था।


भाई, मैंने ब्रेक मारे,

(तेज ब्रेक की आवाज, ट्रक के टायर की घिसटती चीख)

ट्रक रुक गया।


शिवराम बोला,

"भइया, क्या करें? नीचे उतरें?"


मैंने कहा,

"नहीं, रुको।"


भाई, उस औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

चेहरा जैसे जला हुआ, आंखें लाल।

फिर वो गायब हो गई।


शिवराम बोला,

"भइया, ये तो साया था!"


मैंने ट्रक आगे बढ़ाया।

"शिवराम, वो हमें याद दिला रही है कि रास्ता मुश्किल है।"


भाई, जैसे ही ट्रक ने गांव की ओर रुख किया,

हमारी मुसीबतें और बढ़ने लगीं।

रास्ता ऐसा लग रहा था जैसे कोई छाया साथ चल रही हो।

कभी ट्रक के ऊपर,

कभी साइड मिरर में झलक दिखती।


शिवराम बोला,

"भइया, अगर ये आत्मा हमें गांव तक नहीं पहुंचने देगी तो?"


मैंने कहा,

"शिवराम, देख, अगर डर गए तो खत्म।

अब जाना ही पड़ेगा, चाहे जो हो।"


भाई, आधी रात हो चुकी थी।

खेजड़ला गांव बस कुछ किलोमीटर दूर था।


लेकिन तभी अचानक ट्रक का इंजन बंद हो गया।

(इंजन के रुकने की आवाज)


शिवराम बोला,

"भइया! अब क्या करें?"


मैंने उतरकर देखा।

इंजन बिलकुल ठीक था,

फिर भी ट्रक स्टार्ट नहीं हो रहा था।


भाई, तभी पीछे से किसी औरत की हंसने की आवाज आई।

(औरत की डरावनी हंसी गूंजने लगी)

"हहहहहहह..."


शिवराम डर के मारे चिल्लाया,

"कौन है? क्या चाहिए?"


भाई, सामने कोई नहीं था।

लेकिन वो हंसी अब पास आती जा रही थी।

मैंने शिवराम से कहा,

"चुप रह, हिम्मत रख।"


फिर उसी साया की आवाज आई,

"सच लाओ...

वरना इसी जगह से लौटोगे नहीं..."


भाई, उस आवाज के बाद अचानक ट्रक खुद स्टार्ट हो गया।

(इंजन अपने आप चालू होने की आवाज)


शिवराम बोला,

"भइया, ये क्या है? ट्रक अपने आप कैसे स्टार्ट हो गया?"


मैंने कहा,

"शिवराम, साया हमें रास्ता दे रही है,

लेकिन वादा पूरा न किया तो जान नहीं बचेगी।"


भाई, ट्रक अब तेजी से गांव की ओर बढ़ने लगा।

हमारी सांसें अटकी हुई थीं।


दूर एक बोर्ड दिखा —

"खेजड़ला गांव - 3 KM"


भाई, अब रास्ता साफ था,

लेकिन मन में एक ही डर —













अगर गांव वालों ने सच नहीं बताया तो?

अगर वहां भी साया पहुंच गई तो?


भाई, अब गांव की सच्चाई जाननी थी।

शिवराम धीरे से बोला,

"भइया, अब जो होगा, देखा जाएगा।"


भाई, ट्रक जैसे ही गांव की सीमा में पहुंचा,

कुत्ते भौंकने लगे।

गांव पूरी तरह सन्नाटे में डूबा था।


अब भाई,

सच सामने लाना है,

लेकिन कौन बताएगा?

कौन जिंदा है उस हादसे का गवाह?

या फिर गांव भी अब भूतों का है?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 29: "खेजड़ला गांव की छुपी हुई सच्चाई"


भाई...


ट्रक जैसे ही खेजड़ला गांव के अंदर घुसा,

एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।

रात के तीन बज चुके थे,

गांव की हर गली में अंधेरा,

ना कोई इंसान,

ना कोई आवाज।


बस दूर कहीं उल्लू की आवाज और हवा की सिसकती सरसराहट।

(तेज हवा की सनसनाहट, रात के सन्नाटे की आवाज)


शिवराम धीरे से बोला,

"भइया, कहीं ये पूरा गांव... भूतिया तो नहीं है?"


भाई, दिल तो मेरा भी दहल रहा था।

पर हिम्मत करके कहा,

"शिवराम, पहले देख लेते हैं, फिर सोचेंगे।"


हमने ट्रक गांव के चौक के पास रोक दिया।

नीचे उतरे।

चारों ओर सूखा मैदान, टूटी-फूटी झोपड़ियां।

कुछ घरों के दरवाजे आधे खुले थे, जैसे बरसों से किसी ने बंद ही नहीं किए।


शिवराम ने कहा,

"भइया, कहीं किसी से पूछें?"


मैंने एक दरवाजे पर दस्तक दी,

(दरवाजा खटकने की आवाज)

"कोई है? भइया, सुन रहे हो?"


कोई जवाब नहीं।


दूसरे घर के पास गए।

वहां भी सन्नाटा।


भाई, तभी पीछे से चप्पल घसीटने की आवाज आई।

हमने मुड़कर देखा,

एक बूढ़ा आदमी, झुकी कमर, सूखी आंखें,

हमें घूर रहा था।


शिवराम धीरे से बोला,

"भइया, ये कौन है?"


मैंने हिम्मत करके पूछा,

"बाबा... हम बाहर से आए हैं।

हमें कुछ पूछना है।"


वो बूढ़ा बिना बोले पास आया,

धीरे से बोला,

"तुम... उस ट्रक वाले हो न?"


हम दोनों चौक गए।


"तुम्हें किसने भेजा है?"


शिवराम बोला,

"बाबा, हम बस सच जानना चाहते हैं।

जो लड़की उस रात मरी थी... उसका क्या सच है?"


भाई, बाबा की आंखों में आंसू आ गए।

धीरे से बोले,

"तुम नहीं जानते बेटा, वो साया क्यों भटक रही है।"


मैंने कहा,

"हमें सच बताओ बाबा, नहीं तो हम भी मर जाएंगे।"


भाई, बाबा धीरे-धीरे बैठ गए।

हाथ कांपते हुए बोले,

"उस लड़की का नाम 'माया' था।

गांव के ठाकुर ने उसकी इज्जत लूटी थी,

और जब वो भागी, तो उसी रास्ते पर ट्रक के नीचे आ गई।

लेकिन बेटा, वो खुद नहीं कूदी थी...

ठाकुर के आदमियों ने धक्का दिया था।"


भाई, सुनकर मेरी रूह कांप गई।

शिवराम के मुंह से निकला,

"बाबा! मतलब उसकी मौत एक्सीडेंट नहीं थी?"


बाबा बोले,

"नहीं बेटा, वो हत्या थी।

तब से उसकी आत्मा बदला लेने के लिए भटक रही है।

जो भी उस रास्ते से गुजरता है,

उसे रोकती है ताकि कोई उसका सच दुनिया को बताए।"


भाई, ये सुनकर शिवराम की हालत खराब हो गई।

"भइया, अब क्या करेंगे?"


मैंने बाबा से पूछा,

"बाबा, ठाकुर अब कहां है?"


बाबा बोले,

"वो तो यहीं है बेटा।

गांव के बाहर अपने महल में रहता है।

डर के मारे बाहर नहीं निकलता,

पर पैसा और ताकत अभी भी है उसके पास।"


भाई, उस रात हमें सब समझ आ गया।

माया का साया क्यों बार-बार दिखता है,

क्यों हमें रास्ते में रोकता है।


अब फैसला करना था —

क्या हम ठाकुर का सच सबके सामने लाएंगे?

या इस राज़ को यूं ही छोड़ देंगे?


भाई,

ट्रक में बैठते हुए शिवराम बोला,

"भइया, अब ये लड़ाई हमारी है।

माया की आत्मा को मुक्ति दिलानी है।"


मैंने कहा,

"शिवराम, चाहे जान चली जाए,

लेकिन अब हम ये सच्चाई सबके सामने लाएंगे।"


भाई, ट्रक स्टार्ट हुआ।

(धीमे गूंजते ट्रक स्टार्ट होने की आवाज)

हमने ठाकुर के महल की ओर रुख किया।


आगे क्या हुआ?

ठाकुर से कैसे सामना किया?

क्या माया की आत्मा को इंसाफ मिला?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 30: "ठाकुर के महल की ओर: माया के इंसाफ की जंग"


भाई...


ट्रक अब धीरे-धीरे गांव से निकलते हुए

सीधा उस रास्ते पर बढ़ रहा था,

जहां से बाबा ने बताया था ठाकुर का महल है।

रात के तीन बज रहे थे,

पूरा रास्ता सुनसान,

और हवा में एक अजीब सी घुटन।

(तेज हवा की सनसनाहट, सूखे पेड़ों की चरमराहट की आवाजें)


शिवराम ट्रक में चुप बैठा था,

पर उसकी आंखें गुस्से से लाल थीं।


मैंने उससे पूछा,

"शिवराम, डर तो नहीं लग रहा?"


वो बोला,

"भइया, डर तो लग रहा है,

पर उस माया दीदी का खून याद आता है,

तो लगता है डर से लड़ना ही पड़ेगा।"


भाई, ट्रक जैसे-जैसे महल के पास पहुंचा,

चारों ओर बबूल के झाड़,

टूटे-फूटे खंभे,

और महल की दीवारें देख के रूह कांपने लगी।


एक पुरानी हवेली की तरह महल खड़ा था,

जिसकी खिड़कियों से हवा की तेज़ चीख निकल रही थी।

(हवा की सरसराहट, पुराने दरवाजे के चरमराने की आवाज)


शिवराम ने कहा,

"भइया, ये जगह तो पहले से ही भूतिया लगती है।"


मैंने कहा,

"शिवराम, हिम्मत रख। अब पीछे नहीं हट सकते।"


ट्रक को बाहर रोक कर,

हम दोनों नीचे उतरे।

धीरे-धीरे महल के टूटे हुए गेट की तरफ बढ़े।

गेट के पास पहुंचते ही,

एक तेज झोंके ने गेट को अपने आप खोल दिया।


भाई, जैसे कोई हमें अंदर बुला रहा हो।


महल के अंदर कदम रखते ही,

दीवारों पर पड़े पुराने खून के धब्बे,

और जगह-जगह जली हुई लकड़ियां।

कहीं-कहीं पेड़ की जड़ें महल के अंदर तक आ चुकी थीं।


तभी ऊपर की खिड़की से

किसी औरत की हल्की सी सिसकने की आवाज आई।

शिवराम ने मेरी ओर देखा,

"भइया, सुना?"


मैंने सिर हिलाया,

"हां, सुना।"


भाई, दिल की धड़कन इतनी तेज थी,

कि खुद की सांसों की आवाज भी डराने लगी थी।


आगे बढ़े तो सामने ठाकुर की बड़ी सी कुर्सी थी,

जिस पर धूल जमी थी।

पर भाई, कुर्सी पर बैठा था — ठाकुर खुद!

हां भाई, असली ठाकुर!


शिवराम की आंखें फटी रह गईं,

"भइया, ये जिंदा है?"


ठाकुर हमें घूरते हुए बोला,

"क्यों आए हो यहां?

कौन भेजा तुम्हें?"


मैंने गुस्से से कहा,

"वो लड़की... माया... जो मर गई थी,

उसका सच जानने।"


ठाकुर हंस पड़ा,

"हाहाहा...

मर गई?

अरे मैंने ही मारा उसे।

क्योंकि वो मेरी बात नहीं मानी।"


भाई, दिल थरथरा उठा।


शिवराम गुस्से में चिल्लाया,














"और उसके बाद उसकी आत्मा क्यों भटक रही है, जानते हो?"


ठाकुर बोला,

"जानता हूं।

पर वो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।"


भाई, तभी पीछे से एक जोर की औरत की चीख आई।

ठाकुर के चेहरे का रंग उड़ गया।


हमने मुड़कर देखा,

माया की आत्मा,

पूरी तरह काले घूंघट में,

आंखें लाल,

बाल बिखरे हुए।

ठाकुर की ओर देखती हुई।

(हवा के साथ औरत के चीखने की आवाज)


भाई, शिवराम ने मेरे कान में कहा,

"भइया, देखो, माया दीदी आ गई।"


ठाकुर कांपता हुआ कुर्सी से उठा,

"न-नहीं! माया! मुझे छोड़ दो!"


पर भाई, माया की आत्मा बस घूरती रही।


ठाकुर ने हमसे कहा,

"बचाओ! मुझे बचाओ!"


मैंने कहा,

"अब कौन बचाएगा तुझे, जब तूने किसी को नहीं बचाया?"


तभी माया की आत्मा ने

ठाकुर की ओर हाथ बढ़ाया,

और भाई...

ठाकुर की सांसें रुक गईं।

वो वहीं गिर पड़ा।


(तेज हवा, और इंसान की चीख)


भाई, माया की आत्मा धीरे से हमारी ओर मुड़ी,

फिर आसमान की ओर देखते हुए

आंखों से आंसू गिराए,

और हवा में गायब हो गई।


शिवराम बोला,

"भइया, लगता है अब माया दीदी को इंसाफ मिल गया।"


मैंने कहा,

"हां शिवराम, अब उसका साया हमें परेशान नहीं करेगा।"


भाई, उस महल से निकलते वक्त

रात का अंधेरा भी अब

कुछ कम डरावना लग रहा था।


ट्रक में बैठकर

जैसे ही हम आगे बढ़े,

पीछे से एक मीठी सी औरत की आवाज आई,

"धन्यवाद..."


शिवराम ने मेरी ओर देखा,

"भइया, सुना?"


मैंने सिर हिलाया,

"हां भाई, माया दीदी का शुक्रिया था।"


भाई, ट्रक अब फिर से अपने रास्ते पर था।


लेकिन भाई, क्या सच में ये कहानी खत्म हो गई?

या रास्ते में फिर कोई नई परछाईं हमारा इंतजार कर रही है?


ये जानने के लिए तैयार रहना Part 31 में...

सुनाऊं आगे?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 31: "रात का सफर और फिर एक नई परछाई"


भाई...


ठाकुर की हवेली से लौटते वक्त

हम दोनों के चेहरे पर

एक अजीब सुकून भी था और डर भी।

सुकून इस बात का कि

माया दीदी की आत्मा को इंसाफ मिल गया।

डर इस बात का कि

शायद ये कहानी यहीं खत्म न हो।


ट्रक अब उसी वीरान रास्ते पर दौड़ रहा था,

जहां दिन में भी सन्नाटा रहता है।

और भाई, रात के तीन बजे की वो सुनसान सड़क,

ऊपर से तेज हवाएं,

कहीं-कहीं बबूल के पेड़ की टूटी डालियां हवा में झूल रही थीं।

(हवा की सिटी जैसी आवाज, सूखे पत्तों की सरसराहट)


शिवराम चुपचाप स्टीयरिंग थामे बैठा था,

उसके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी।

मैंने कहा,

"शिवराम, अब तो चैन की सांस ले भाई,

अब डरने की क्या बात है?"


शिवराम बोला,

"भइया, बात तो सही है...

पर दिल में अजीब सा डर है।"


मैंने हंसते हुए कहा,

"डर गया क्या ठाकुर से ज्यादा?"


शिवराम भी मुस्कुरा दिया,

"नहीं भइया, अब तो हमसे बड़े भूत भी डरेंगे।"


भाई, हम दोनों की ये हंसी

अभी ठीक से खत्म भी नहीं हुई थी,

कि ट्रक के सामने से

अचानक सफेद साड़ी में एक औरत

सड़क पार करती दिखी।

(तेज ब्रेक की आवाज, घिसटते टायर की चीख)


भाई, मेरा दिल धक् से रह गया।

ट्रक झटके से रुका।

हम दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया।


शिवराम चिल्लाया,

"भइया, फिर से? अब कौन है ये?"


मैंने कहा,

"भाई, ये माया दीदी तो नहीं लगती।"


धीरे-धीरे ट्रक से उतरे,

तो देखा वो औरत

सड़क किनारे बैठी थी,

सर झुकाए, बाल बिखरे,

और भाई... पैरों में घुंघरू।


(धीमे-धीमे घुंघरू की आवाज, सन्नाटे के बीच गूंजती हुई)


शिवराम फुसफुसाया,

"भइया, इस वीरान जगह में ये कौन हो सकती है?"


मैंने धीरे से कहा,

"चल, पास चलते हैं।"


जैसे ही हम उसके पास पहुंचे,

वो औरत धीरे से उठी,

पर भाई उसका चेहरा...

जैसे मरे हुए कई दिनों पुराना हो।

आंखें सूनी, होंठ फटे हुए।

शिवराम की सांस रुक गई,

"भइया, ये इंसान नहीं लगती।"


तभी वो औरत बोली,

(धीमी, कांपती आवाज)

"क्यों आए हो मेरे रास्ते में?"


हम दोनों कांपने लगे।

मैंने हिम्मत कर पूछा,

"तुम कौन हो? क्या चाहती हो?"


वो औरत बोली,

"मैं भी उसी की तरह हूं...

जिसे कभी धोखा मिला,

जिसकी आत्मा भटकती रही।

पर मेरा कोई इंसाफ नहीं हुआ।"


भाई, सुनकर रूह कांप उठी।

मतलब...

माया दीदी के बाद भी इस रास्ते पर

और भी आत्माएं हैं,

जो अपने दर्द के साथ भटक रही हैं।


शिवराम ने धीरे से कहा,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने कहा,

"जो माया के लिए किया,

वो इसके लिए भी करेंगे।"


भाई, उस औरत ने हमारी तरफ देखा,

और कहा,

"ठीक है,

अगर तुम सच्चे हो,

तो मेरी कहानी जानने आओ उस पुराने कुएं तक,

जहां मेरा सच दबा है।"


फिर भाई,

वो औरत हवा में गायब हो गई।

(तेज हवा की भयानक आवाज, और अचानक सन्नाटा)


शिवराम ने कांपते हुए कहा,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने उसकी तरफ देखा,

"शिवराम, ये रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ भाई।

अब उस कुएं तक जाना पड़ेगा।

शायद वहां कोई और खौफनाक राज छिपा हो।"


भाई, ट्रक की तरफ लौटते वक्त

हवा फिर से तेज चलने लगी,

और दूर किसी औरत की चीख गूंजने लगी।


शिवराम ने कहा,

"भइया, अब तो ये सफर और भी खतरनाक लग रहा है।"


मैंने कहा,

"हां शिवराम,

लेकिन जब रास्ता शुरू कर ही लिया है,

तो अंजाम तक पहुंचाएंगे।"


भाई, ट्रक फिर से स्टार्ट हुआ,

और अंधेरे में उस पुराने कुएं की तलाश में निकल पड़ा।


क्या होगा उस कुएं में?

क्या मिलेगा हमें वहां?

क्या ये आत्मा भी इंसाफ पाएगी?


ये सब जानने के लिए तैयार रहना Part 32 में...

सुनाऊं आगे?

भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 32: "पुराने कुएं का राज और मौत की परछाई"


भाई...


ट्रक जैसे ही फिर से आगे बढ़ा,

हवा की रफ्तार और तेज हो गई।

कभी ऐसा लगता कि

कोई पेड़ की डालियों पर झूल रहा है,

और कभी ऐसा जैसे

कोई औरत की सिसकियां हमारे कानों में गूंज रही हों।

(धीमे-धीमे रोने की आवाज, हवाओं की सिटी)


शिवराम धीरे से बोला,

"भइया, वो औरत बोल गई थी कि कुएं तक आओ,

लेकिन ये कुआं मिलेगा कहां?"


मैंने कहा,

"भाई, जो माया दीदी ने सिखाया है,

अब वही हिम्मत रखनी होगी।

चल, देखते हैं।"


भाई, ट्रक की हैडलाइट दूर तक अंधेरे को चीर रही थी,

पर रोड के दोनों तरफ वीरानी।

ना कोई आदमी,

ना कोई घर,

ना कोई आवाज।


अचानक,




















दाईं तरफ एक पुरानी, टूटी-फूटी पत्थरों की बाउंड्री नजर आई,

जिसके बीच में एक सूखा,

गहरा कुआं।

(हवा का झोंका, कुएं से आती अजीब सी फुफकार)


शिवराम ने ट्रक रोक दिया।

"भइया, लगता है ये वही कुआं है।"


हम दोनों ट्रक से उतरे।

कुएं के पास पहुंचे,

तो भाई उस कुएं की हालत देख कर रूह कांप गई।

कुएं के किनारे पेड़ की एक पुरानी डाल लटक रही थी,

जिस पर किसी ने शायद कभी फांसी लगाई थी।

(रस्सी के झूलने की आवाज, कुएं से आती गूंजती सिसकी)


शिवराम ने कांपते हुए कहा,

"भइया, यहां तो बहुत कुछ गलत हुआ है।"


तभी, भाई, कुएं के अंदर से

एक औरत की धीमी, टूटी-फूटी आवाज आई,

"क्यों आए हो...?"

(बहुत हल्की लेकिन डरावनी महिला की आवाज)


हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

मैंने हिम्मत कर के कहा,

"तुमने बुलाया था, बताओ क्या चाहती हो?"


तभी भाई,

कुएं के अंदर से

हवा का एक भयंकर झोंका आया,

जिसने हमारे कपड़े तक फड़फड़ा दिए।

(तेज हवा की सीटी, पत्तों की सरसराहट)


और फिर, कुएं के किनारे

धुंधली परछाई बनने लगी।

एक औरत की शक्ल,

बिखरे बाल,

सफेद फटी साड़ी,

आंखें लाल जैसे जलती हुई।


उसने कहा,

"मुझे भी इंसाफ दो...

ठाकुर ने मेरे साथ जो किया,

उसे सबको बताओ।

मुझे रातों को चैन नहीं आता...

मेरी आत्मा यहां फंसी है।"


शिवराम बोला,

"भइया, क्या ये भी ठाकुर की शिकार है?"


मैंने सिर हिलाया,

"हां भाई, लगता है ठाकुर ने कई जिंदगियां तबाह की हैं।"


फिर मैंने उस आत्मा से कहा,

"बहन, जो माया दीदी के लिए किया,

वो तेरे लिए भी करेंगे।

तेरी बात सबको बताएंगे।"


वो आत्मा एक बार फिर बोली,

"अगर तुमने सच बोला,

तो ये कुआं तुम्हें भी जिंदा नहीं छोड़ेगा।

सच बोलोगे,

तो मेरी आत्मा आजाद होगी।"


भाई, उसकी आंखों से

आंसू की जगह खून टपक रहा था।

(टपकते खून की धीमी आवाज, धड़कन की गूंज)


शिवराम बोला,

"भइया, ये जगह तो बिल्कुल मौत का दरवाजा लगती है।"


मैंने कहा,

"हां शिवराम,

पर अगर हम नहीं करेंगे,

तो ये आत्माएं कभी शांति नहीं पाएंगी।"


फिर भाई,

उस औरत की आत्मा अचानक हवाओं में विलीन हो गई,

लेकिन जाते-जाते एक फुसफुसाहट छोड़ गई,

"जल्दी करो... वरना ठाकुर की आत्माएं तुम्हें भी घेर लेंगी..."


भाई, हम दोनों डर के मारे

कुएं के पास बैठ ही गए।

शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने कहा,

"भाई, सच्चाई बाहर लानी होगी।

ठाकुर की हवेली की औरतों का दर्द सबको बताना होगा।

वरना ना वो आत्माएं चैन लेंगी,

ना हमें चैन मिलेगा।"


ट्रक फिर से स्टार्ट किया,

लेकिन भाई, उस कुएं के पास जो सन्नाटा था,

वो अब भी हमारे दिल में छाया हुआ है।


रास्ते में शिवराम बोला,

"भइया, लगता है अब ये सफर और लंबा होने वाला है।"


मैंने कहा,

"हां भाई,

ये ट्रक अब किसी मंजिल पर नहीं,

बल्कि सच्चाई के रास्ते पर दौड़ रहा है।"


भाई,

क्या हम इस आत्मा को इंसाफ दिला पाएंगे?

क्या ठाकुर के राज को सबके सामने ला पाएंगे?

या फिर हम भी उसी कुएं में समा जाएंगे...?


ये जानने के लिए तैयार रहना Part 33 में...

सुनाऊं आगे?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 33: "ठाकुर की हवेली की सच्चाई"


भाई...


जैसे ही हम कुएं से लौटे,

ट्रक की हेडलाइट्स उस वीरान रास्ते को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी।

लेकिन दिल के अंदर वो औरत की सिसकती आवाज गूंज रही थी...

और उस कुएं का अंधेरा हमारे ज़हन में बैठ चुका था।

(धीमे साउंड इफेक्ट, हवाओं की सिसकी)


शिवराम ने कांपते हुए सिगरेट सुलगाई,

"भइया, ये मामला बहुत बड़ा है।

ठाकुर की हवेली की हकीकत जाननी पड़ेगी।"


मैंने कहा,

"भाई, अगर जिन्दगी बचानी है,

और उन बेगुनाह आत्माओं को इंसाफ दिलाना है,

तो हवेली तक जाना पड़ेगा।"


शिवराम घबराते हुए बोला,

"भइया, लेकिन ठाकुर के बारे में कहते हैं,

मर कर भी उसकी आत्मा हवेली में घूमती है।

और जिसने भी उसके खिलाफ कुछ बोला,

वो वापस नहीं लौटा।"


मैंने गहरी सांस ली,

"भाई, डरना तो पड़ेगा,

पर अगर हमने नहीं किया,

तो ये आत्माएं हमें भी नहीं छोड़ेंगी।"


ट्रक की स्टेरिंग को कस कर पकड़ते हुए

हमने हवेली की तरफ रुख किया।


भाई, कुछ किलोमीटर बाद

हाइवे से हट कर एक पुरानी टूटी-फूटी सड़क मिली,

जो सुनसान जंगल के अंदर जा रही थी।

(टायर की घिसटती आवाज, दूर कुत्तों के भौंकने की हल्की आवाज)


शिवराम ने डरते हुए कहा,

"भइया, ये रास्ता सही है क्या?"


मैंने कहा,

"भाई, सही या गलत अब देखना नहीं है,

जो भी होगा, यहीं मिलेगा।"


ट्रक जैसे ही उस कच्चे रास्ते पर चढ़ा,

चारों ओर घना जंगल,

सूखे पेड़,

और पेड़ों की डालियों से टकराती हवा की डरावनी आवाज।

(तेज हवा की सीटी, झाड़ियों की सरसराहट)


कुछ दूर चलने के बाद,

अचानक ट्रक की हेडलाइट्स के सामने

एक बड़ी, काली, और वीरान हवेली नजर आई।

इतनी बड़ी हवेली कि मानो वक्त वहीं थम गया हो।

(गहरे ड्रम साउंड, डरावना बैकग्राउंड)


हवेली की टूटी खिड़कियों से

हवा ऐसी आवाज कर रही थी जैसे कोई औरत रो रही हो।

दरवाजे आधे टूटे हुए,

और छत पर बैठी कौवे की आवाज गूंज रही थी।

(कौवे की कांव-कांव, हवा की सिसकी)


शिवराम बुरी तरह घबराया,

"भइया, हम यहीं तक रुकते हैं ना?"


मैंने उसकी तरफ देखा,

"शिवराम, अब अगर यहां से भागे,

तो वो आत्माएं हमें रास्ते में ही पकड़ लेंगी।

हवेली के अंदर जाना ही पड़ेगा।"


शिवराम ने कांपते हाथों से हनुमान चालीसा की किताब निकाली,

और बुदबुदाने लगा,

"श्री गुरु चरण सरोज रज,

निज मनु मुकुरु सुधारि..."


मैंने कहा,

"पढ़ भाई, पढ़...

ये तेरी हिम्मत बढ़ाएगा।"


फिर हम दोनों ट्रक से उतरे।

भाई, हवेली का गेट जैसे ही खोला,

दरवाजा खुद-ब-खुद चर्र्रर की आवाज करता खुल गया।

(दरवाजे के खुलने की डरावनी आवाज, धीमी हवा)


अंदर घुसते ही ऐसा लगा,

जैसे किसी की नजर हम पर गड़ी हो।

दीवारों पर पुरानी तस्वीरें,

ठाकुर की बड़ी सी मुस्कराती तस्वीर,

जिसे देखकर ही रूह कांप जाए।


शिवराम बोला,

"भइया, लगता है ये तस्वीरें भी हमें घूर रही हैं।"


मैंने गर्दन हिलाई,

"हां भाई, इन दीवारों ने बहुत कुछ देखा है।"


फिर हम अंदर की तरफ बढ़े।

अचानक, हवेली के अंदर
















सीढ़ियों से किसी के उतरने की आवाज आई।

(धीमे कदमों की आवाज, लकड़ी की सीढ़ियों की चरमराहट)


शिवराम का चेहरा सफेद पड़ गया,

"भइया, कोई है ऊपर..."


मैंने कहा,

"तैयार हो जा, जो भी हो, सामना करेंगे।"


भाई, दिल की धड़कनें तेज,

हाथ में मोबाइल की टॉर्च जलाए,

हमने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाए।

लेकिन जैसे ही पहला कदम रखा,

एक डरावनी परछाई तेजी से सामने से निकली।

(तेज हवा का झोंका, औरत की हंसी की गूंज)


शिवराम चिल्लाया,

"भइया!!!"


मैंने उसका हाथ पकड़ा,

"हिम्मत रख भाई, पीछे नहीं हटेंगे।"


अब हवेली के अंदर

हवा भी रुक गई थी,

और सन्नाटा ऐसा कि अपने दिल की धड़कनें भी सुनाई दें।


शिवराम बोला,

"भइया, ठाकुर की आत्मा क्या अब भी यहीं है?"


मैंने कहा,

"पता चलेगा भाई,

आज या तो सच्चाई सामने आएगी,

या हमारी भी कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।"


भाई, जो भी राज इस हवेली में छिपा है,

क्या हम जान पाएंगे?

क्या ठाकुर की आत्मा से सामना होगा?

या फिर हवेली में और भी कोई खौफनाक राज छिपा है?


ये सब जानने के लिए तैयार रहना Part 34 में...

सुनाऊं आगे?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 34: "हवेली में पहला कदम... औरत की चीख"


भाई...


जैसे ही हम हवेली की सीढ़ियों पर चढ़ने लगे,

हर कदम के साथ दिल की धड़कन और तेज होती जा रही थी।

चारों तरफ ऐसा सन्नाटा कि हमारी साँसों की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी।

(धीमी हवा की आवाज, हल्की सी लकड़ी की चरमराहट)


शिवराम ने धीरे से कहा,

"भइया, सच में यहां कुछ है।

मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे कोई हमें देख रहा है।"


मैंने उसकी तरफ देखा और कहा,

"हां भाई, लेकिन अब पीछे नहीं हट सकते।

अगर हम डर के भागे,

तो ये आत्माएं हमें हाईवे पर भी नहीं छोड़ेंगी।"


जैसे ही हम ऊपर पहुंचे,

भाई, सामने एक बड़ा सा कमरा था।

दरवाजे पर मोटा ताला जड़ा हुआ था,

लेकिन अजीब बात ये कि ताले के अंदर से कोई धीरे-धीरे दरवाजा पीट रहा था।

(दरवाजे पर थप-थप की धीमी आवाज, और हवा की सरसराहट)


शिवराम ने डर के मारे मेरी बाजू पकड़ ली,

"भइया... अंदर कोई है?"


मैंने धीमे से कहा,

"भाई, अंदर कौन है, ये तो ताला खोलने पर ही पता चलेगा।"


मैंने जेब से एक लोहे की रॉड निकाली,

जो ट्रक में हमेशा रहती थी,

और ताले को तोड़ने की कोशिश करने लगा।


तभी अचानक,

ताले के अंदर से औरत की तेज दर्द भरी चीख सुनाई दी...

(तेज औरत की चीख, "बचाओ... कोई मुझे बचाओ!")


शिवराम पीछे हटते हुए बोला,

"भइया, ये किसकी आवाज है?

कहीं वो चुड़ैल तो नहीं?"


मैंने खुद को संभालते हुए कहा,

"भाई, इंसान की हो या आत्मा की...

इस आवाज की सच्चाई हमें जाननी पड़ेगी।"


भाई, जैसे-तैसे ताला टूटा,

और दरवाजा चर्ररर की डरावनी आवाज के साथ खुला।

(दरवाजे के खुलने की डरावनी आवाज)


अंदर झांका,

तो भाई, कमरा बिल्कुल अंधेरा था।

मोबाइल की टॉर्च जलाकर जैसे ही अंदर देखा,

तो दीवारों पर खून के निशान थे।

जमीन पर पुराने, फटे कपड़े,

और कोने में बैठी हुई किसी औरत की धुंधली सी परछाई दिखी।


शिवराम डर से कांपता हुआ बोला,

"भइया, ये कौन है?"


मैंने धीरे से कहा,

"शिवराम, ध्यान से देख।"


जैसे ही हम दोनों थोड़ा आगे बढ़े,

वो औरत अचानक खड़ी हो गई,

उसका चेहरा इतना डरावना,

कि आंखें सुर्ख लाल,

बिखरे बाल,

और उसके पैरों के नीचे खून टपक रहा था।

(डरावनी औरत की सांस लेने की आवाज, धीमे गुर्राने की आवाज)


भाई, मैं और शिवराम एकदम पत्थर बन गए।


और तभी, वो औरत डरावनी हंसी हंसने लगी,

(महिला की डरावनी हंसी "हहहहहाहा")

"तुम भी आ गए ठाकुर की हवेली में?

अब यहां से कोई नहीं जाता..."


शिवराम बुरी तरह कांपते हुए बोला,

"भइया, भाग चलें?"


लेकिन भाई, तभी उस औरत ने हाथ उठाया,

और हवा में कुछ फेंका...

और जैसे ही वो चीज हमारे पास गिरी,

हमने देखा... वो इंसान की हड्डी थी।


शिवराम तो जमीन पर गिर पड़ा,

"भइया! अब तो बचे नहीं।"


मैंने उसे उठाते हुए कहा,

"नहीं भाई, हिम्मत रख,

हमें ये जानना है कि आखिर ठाकुर ने इस औरत के साथ क्या किया था।

क्यों ये आत्मा अब भी हवेली में कैद है?"


और भाई,

तभी उस औरत की आंखों से आंसू बहने लगे,

और उसने कहा,

"ठाकुर ने मुझे मार डाला...

मेरी आत्मा यहां कैद है...

मुझे मुक्ति दिलाओ।"


भाई, ये सुनकर रूह कांप गई।

लेकिन सवाल ये है,

क्या हम उस आत्मा को मुक्ति दिला पाएंगे?

या हवेली के अंदर और भी कोई डरावनी ताकत है?


ये सब पता चलेगा अगले Part 35 में...

भाई, सुनाऊं आगे?

भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 35: "हवेली के तहखाने का रहस्य और काली परछाई"


भाई...


उस औरत की आत्मा की बात सुनकर, मैं और शिवराम तो जैसे जड़ बन गए थे।

शिवराम की तो आंखों से आंसू गिर रहे थे, वो बोला,

"भइया, अब क्या करें? कैसे बचें इससे?"


मैंने दिल मजबूत करते हुए कहा,

"भाई, हमें इसके दर्द की सच्चाई जाननी होगी।

अगर इसे मुक्ति नहीं मिली, तो ये हमें भी नहीं छोड़ेगी।"


भाई, उस आत्मा ने कांपती आवाज में कहा,

"ठाकुर ने मेरे साथ बहुत बुरा किया...

मुझे मार कर हवेली के तहखाने में छिपा दिया।

मेरी रूह तभी से कैद है यहां।"


(धीमी, सिसकियों की आवाज, हवेली में हवा की सिहरन)


मैंने धीरे से पूछा,

"लेकिन ठाकुर ने ऐसा क्यों किया?

क्या राज है इस हवेली का?"


तभी वो आत्मा जोर से चिल्लाई,

(महिला की चीख "वो मुझसे शादी करना चाहता था... जब मैंने मना किया...")


भाई, उसकी बात सुनते ही हवेली की दीवारें खुद-ब-खुद कांपने लगीं।

(गहरी गूंज की आवाज, छत से मिट्टी गिरने की आवाज)


शिवराम डरते हुए बोला,

"भइया, कुछ गड़बड़ है यहां।"


मैंने उसे चुप कराते हुए कहा,

"हिम्मत रख भाई, अब जो होना है, देख लेंगे।"


भाई, उस आत्मा ने हमें हवेली के अंदर के तहखाने की तरफ इशारा किया।

हम दोनों कांपते कदमों से तहखाने की ओर बढ़े।

जैसे ही तहखाने का दरवाजा खोला,

एक अजीब सी सड़ांध और ठंडी हवा का झोंका हमारे चेहरे पर पड़ा।

(दरवाजे के खुलते ही तेज हवा की आवाज)


भाई, सीढ़ियों से नीचे उतरे तो पूरा तहखाना धुंध और धूल से भरा था।

मोबाइल की लाइट से देखा,

















तो एक कोने में कंकाल पड़ा था...

सिर्फ हड्डियां, और पास में एक औरत की पुरानी साड़ी।

शिवराम डर के मारे पीछे हट गया,

"भइया, ये उसी का शव है!"


मैंने सिर झुकाया और मन ही मन दुआ की,

"हे भगवान, इसे शांति देना।"


तभी भाई, कंकाल के पास से अचानक काली परछाई उठने लगी।

(काली परछाई की आवाज, डरावनी फुफकार सी आवाज)


वो परछाई हवेली की आत्मा को देखकर जोर से हंसी,

(काली औरत की डरावनी हंसी "अब तुझे कोई नहीं बचा सकता!")


भाई, ये और भी बड़ी मुसीबत थी।

शिवराम घबराकर बोला,

"भइया, ये कौन है अब?"


भाई, वो काली परछाई असली चुड़ैल थी,

जो हवेली की औरत की आत्मा को कैद कर के रखे हुए थी।

हवेली की आत्मा चीखने लगी,

"भाई, मुझे बचाओ, ये मुझे नहीं छोड़ती!"


मैंने हिम्मत करते हुए अपने गले से ताबीज निकाला,

जो माई जी ने दिया था।

उस ताबीज को हाथ में लेकर उस काली परछाई की तरफ बढ़ा।


भाई, जैसे ही ताबीज उसके सामने किया,

वो जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

(तेज औरत की चीख, "नहीं... नहीं... हटाओ ये...")


शिवराम बोला,

"भइया, ये काम कर रहा है, और पास ले जाओ!"


मैंने वो ताबीज हवेली की आत्मा की तरफ किया,

और बोला,

"भगवान की कसम, आज तुझे मुक्ति मिलेगी बहन!"


भाई, तभी कमरे की सारी चीजें हिलने लगीं,

हवेली कांप उठी,

और वो काली परछाई चिल्लाती हुई गायब हो गई।

(तूफानी हवा, चीजों के गिरने की आवाज)


हवेली की आत्मा रोते हुए बोली,

"भाई, आपने मुझे बचा लिया।

अब मैं मुक्त हूं..."


और भाई, आंखों के सामने वो आत्मा आसमान की तरफ उड़ गई।

(धीमी राहत की आवाज, हल्की सी हवा)


शिवराम बोला,

"भइया, खत्म हो गया?"


मैंने कहा,

"नहीं भाई, अब भी नहीं...

अब हमें जानना होगा कि ठाकुर कहां है,

और वो ट्रक की कहानी कैसे जुड़ी है इस हवेली से।"


भाई, ये सच जानना जरूरी है,

क्योंकि जब तक ये राज नहीं खुलेगा,

हमारा पीछा ये साया नहीं छोड़ेगा।


अब आगे क्या होगा, क्या ठाकुर अब भी जिंदा है?

क्या वो हमें भी खत्म करना चाहता है?

भाई, ये सब सुनाऊं Part 36 में?


भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 36: "ट्रक और ठाकुर का काला सच"


भाई...


हवेली की आत्मा को मुक्ति मिलने के बाद, मैं और शिवराम तो कुछ देर वहीं ज़मीन पर बैठ गए।

शिवराम ने थके हुए लहजे में कहा,

"भइया, जो देखा, जो सुना, वो तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

इतना सब हो जाएगा, नहीं मालूम था।"


मैंने भी गहरी सांस ली और बोला,

"भाई, सच्चाई अब भी अधूरी है।

इस हवेली की कहानी के पीछे जो असली गुनहगार है... वो अभी जिंदा है,

और मुझे लगता है वो कोई और नहीं, वही ठाकुर है।"


शिवराम चौंक गया,

"क्या भइया? ठाकुर?

लेकिन वो तो मर चुका है, सब कहते हैं।"


मैंने सिर हिलाते हुए कहा,

"भाई, जब तक हम उसे देख न लें,

इस ट्रक के पीछे लगी वो साया नहीं हटेगी।

ट्रक भी उसी के राज से जुड़ा है।"


(ट्रक के हॉर्न की धीमी गूंज, हवेली के बाहर से आती हुई आवाज)


भाई, ये वही ट्रक था,

जिस पर हम माल लेकर निकले थे।

वो ट्रक खुद-ब-खुद हवेली के सामने आकर रुक गया।

(ट्रक के अपने आप रुकने की आवाज)


शिवराम बोला,

"भइया, ये ट्रक... अपने आप...!"


मैंने कहा,

"भाई, कुछ तो है इसके पीछे।

आओ, देख लेते हैं।"


हम दोनों ट्रक के पास पहुंचे।

भाई, जैसे ही ट्रक के दरवाजे को खोला,

ड्राइविंग सीट पर एक पुराना, सड़ा-गला कागज रखा था।

उसे उठाकर पढ़ा,

तो भाई, ठाकुर का नाम और हवेली का पता लिखा था।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, ये क्या है?"


मैंने कागज पढ़ते हुए कहा,

"भाई, इस ट्रक का मालिक ठाकुर ही है।

यानी जो साया हमें पीछा कर रहा था,

वो इसी ट्रक से जुड़ी उस औरत की आत्मा थी।

ठाकुर ने न सिर्फ उस बेचारी की जान ली,

बल्कि उसके नाम का सारा माल भी हड़प लिया।"


भाई, ट्रक के अंदर और भी चीजें मिलीं —

एक पुरानी डायरी, जिसमें ठाकुर की सच्चाई लिखी थी।

भाई, उसमें लिखा था कि कैसे ठाकुर ने हवेली की उस लड़की को धोखे से अपने जाल में फंसाया,

फिर उसे मार डाला।


शिवराम गुस्से में बोला,

"भइया, ये आदमी तो राक्षस है!

अगर जिंदा है, तो इसका खेल खत्म करना पड़ेगा।"


भाई, तभी डायरी के आख़िरी पन्ने पर लिखा था —

"जो भी इस ट्रक का मालिक बनेगा,

उस पर ये साया कभी रहम नहीं करेगा,

जब तक इंसाफ़ न मिले।"


शिवराम की आवाज लड़खड़ाने लगी,

"भइया, मतलब अब हम फंस चुके हैं?"


मैंने ताबीज को कस के पकड़ते हुए कहा,

"नहीं भाई, हम हारेंगे नहीं।

अब ये लड़ाई ठाकुर तक जाएगी।

जहां भी वो छुपा है, उसे ढूंढना होगा।"


(ट्रक स्टार्ट होने की खुद-ब-खुद आवाज, जैसे कोई कह रहा हो जल्दी करो)


शिवराम बोला,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने कहा,

"चलो भाई, पहले माई जी से मिलते हैं।

शायद उनके पास कुछ उपाय हो।

और उसके बाद...

ठाकुर से दो-दो हाथ करने को तैयार हो जा।"


भाई, हम ट्रक स्टार्ट कर के निकल पड़े,

पर भाई, दिल में एक डर बैठा था...

क्या हम वाकई ठाकुर तक पहुंच पाएंगे?

या वो खुद हमें रास्ते में ही खत्म कर देगा?


(तेज हवा, ट्रक की रफ्तार की आवाज)


भाई, आगे की कहानी और बड़ा राज लेकर आएगी...

क्या तुम सुनना चाहोगे कि ठाकुर का अंजाम क्या हुआ?

Part 37 सुनाऊं?



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 37: "ठाकुर की तलाश और मौत की साजिश"


भाई...


जैसे ही ट्रक स्टार्ट हुआ,

हवा में अजीब सी सरसराहट होने लगी।

ऐसा लग रहा था जैसे कोई नामालूम ताकत हमें रास्ता दिखा रही हो...

या फिर मौत का न्योता दे रही हो।


शिवराम सीट पर बैठते हुए बोला,

"भइया, अब कहां चलें?"


मैंने ट्रक चलाते हुए कहा,

"भाई, सीधा उस माई जी के पास।

जिसने ताबीज दिया था,

शायद वही कुछ रास्ता बताए।"


भाई, जैसे-जैसे हम गांव की ओर बढ़ रहे थे,

रास्ता सुनसान और डरावना होता जा रहा था।

चांद भी बादलों के पीछे छुप गया।

ट्रक की हेडलाइट की रौशनी में सिर्फ धूल और साया नजर आ रहा था।


भाई, रास्ते में अचानक शिवराम बोला,

"भइया, देखो... वो पेड़ के पास कोई है!"


मैंने ब्रेक मारे।

(तेज ब्रेक की आवाज, ट्रक की चीख जैसी आवाज)


भाई, काले कपड़े में लिपटी एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।














चेहरा पूरा ढका हुआ,

हाथ में लकड़ी की बड़ी लाठी।


मैं ट्रक से उतरा,

"माई, इतनी रात को यहां क्या कर रही हो?"


भाई, वो औरत बोली,

"बेटा, मुझसे बचके नहीं जा पाओगे।

जो खोज रहे हो, उसका रास्ता मैं जानती हूं।

ठाकुर को ढूंढना आसान नहीं।"


शिवराम डरते हुए बोला,

"माई, तुम कौन हो? और ठाकुर के बारे में क्या जानती हो?"


माई ने गहरी सांस ली,

"मैं उसी की बहन हूं।

ठाकुर ने हवेली की लड़की के साथ जो किया,

उसका राज छुपाने के लिए मुझे भी जान से मारने आया था।

लेकिन मैं बच गई, और अब उसी की तलाश में भटक रही हूं।"


भाई, ये सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने पूछा,

"माई, क्या आप जानती हैं वो अब कहां है?"


माई बोली,

"वो गांव के बाहर, पुरानी कोठी में छुपा है।

वहां कोई नहीं जाता,

कहते हैं वहां भी आत्माएं घूमती हैं।

पर अगर तुम सच में उसके पाप का अंत करना चाहते हो,

तो वहां जाना पड़ेगा।"


शिवराम बोला,

"भइया, जाना पड़ेगा।

अब नहीं रुका जाएगा।"


भाई, माई ने हमें एक लाल धागा और ताबीज दिया।

"इसे बांध लेना बेटा,

वरना ठाकुर की ताकत बहुत बड़ी है।

साया तुम्हें मार डालेगा।"


भाई, हम माई को धन्यवाद कहकर फिर ट्रक में बैठ गए।

रास्ता अंधेरे में डूबा हुआ,

पर अब दिल में बस एक ही बात थी —

ठाकुर को पकड़ना है, चाहे जान पर बन आए।


शिवराम ट्रक की खिड़की से बाहर देखते हुए बोला,

"भइया, अगर आज कुछ हो गया,

तो घर पर मां का क्या होगा?"


मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा,

"भाई, डरना नहीं।

जिसका हिसाब अधूरा है,

उसे पूरा किए बिना अब लौटना नहीं।"


भाई, ट्रक ने जैसे ही गांव की सीमा पार की,

अजीब सी औरत की हंसी की आवाज फिर गूंज उठी।


शिवराम ने कांपती आवाज में कहा,

"भइया, फिर से वही साया आ गया लगता है।"


मैंने कहा,

"डर मत भाई,

अब ये साया भी हमारा रास्ता नहीं रोक सकता।

ठाकुर का सच सामने लाकर रहेंगे।"


भाई, ट्रक अब उस कोठी की ओर जा रहा था,

जहां ठाकुर छुपा बैठा था।

पर क्या हम सच में वहां तक पहुंच पाएंगे?

या फिर ये भूतिया साया हमें रास्ते में ही खत्म कर देगा?


(तेज हवा, डरावनी आवाजें, ट्रक की रफ्तार बढ़ती जा रही है)


भाई, आगे की कहानी और भी भयानक मोड़ लेने वाली है।

क्या तुम जानना चाहोगे ठाकुर से आमना-सामना कैसा होगा?

तो बोलो "हाँ भाई, जल्दी सुनाओ Part 38!"



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 38: "पुरानी कोठी का खौफ और ठाकुर का सच"


भाई...


हम ट्रक से जैसे ही उस वीरान रास्ते पर पहुंचे,

जहां वो पुरानी हवेली थी,

हवा की रफ्तार अपने आप बढ़ गई।

ऐसा लग रहा था जैसे पूरा रेगिस्तान जाग उठा हो।


शिवराम डरते-डरते बोला,

"भइया, ये हवेली तो वाकई बहुत डरावनी है,

इतनी रात में यहां कौन आता होगा?"


भाई, चांद की हल्की रौशनी में हवेली की टूटी खिड़कियां,

दरवाजे, और जर्जर दीवारें,

जैसे हमें घूर रही थीं।

हवा में औरत के चीखने की आवाजें गूंज रही थीं।


मैंने ट्रक रोका।

(ट्रक के ब्रेक की आवाज, हवा की सायं-सायं)


"चल भाई, अब यहां से आगे पैदल जाना पड़ेगा।

ठाकुर तक ऐसे नहीं पहुंच सकते।"


शिवराम ने कांपती आवाज में कहा,

"भइया, क्या वाकई जाना जरूरी है?"


मैंने उसकी तरफ देखा,

"भाई, अब लौटने का सवाल ही नहीं।

जिस साये ने हमारी जिंदगी नर्क बना दी,

आज उसी को खत्म करने का वक्त है।"


भाई, हम दोनों ट्रक से उतरकर धीरे-धीरे हवेली की ओर बढ़े।

हर कदम के साथ दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं।

शिवराम ने पीछे मुड़कर देखा,

"भइया, ऐसा लग रहा जैसे कोई पीछा कर रहा है।"


भाई, मैं भी महसूस कर रहा था।

किसी के पैरों की आहट,

जैसे कोई हमारे साथ-साथ चल रहा हो।


हम दोनों ने ताबीज को कसकर पकड़ा।

"जो भी है, आज इसका सामना करना पड़ेगा।"


हवेली का दरवाजा हिल रहा था।

(दरवाजे के चरमराने की आवाज, धूल उड़ती हुई)


भाई, जैसे ही हमने दरवाजा धकेला,

अंदर घुप्प अंधेरा था।

शिवराम ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

दीवारों पर अजीब-सी डरावनी तस्वीरें,

काले रंग के हाथ के निशान,

और ज़मीन पर सूखे खून के धब्बे।


शिवराम की सांसें तेज हो गईं,

"भइया, ये जगह तो सच में मौत का घर लगती है।"


भाई, तभी अंदर से ठाकुर की गूंजती आवाज आई,

"कौन है? कौन मेरे पीछे पड़ा है?"


हम दोनों सन्न।

मैंने हिम्मत जुटाकर आवाज दी,

"ठाकुर! हम वो हैं जिनके पीछे तेरा पापी साया लगा है।

अब तेरे सारे राज खोलने आए हैं।"


भाई, हवेली के अंदर अचानक तेज हवा चली, दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

शिवराम चिल्लाया,

"भइया, दरवाजा बंद हो गया!"


मैंने कहा,

"डर मत भाई, अब यहीं निपटना होगा।"


तभी ठाकुर दिखाई दिया।

भाई, सफेद कुर्ता,

मगर चेहरा जैसे मरा हुआ आदमी।

आंखें लाल,

माथे पर गहरा कट।


ठाकुर हंसते हुए बोला,

"तुम मुझसे नहीं लड़ सकते।

मुझे उस लड़की की आत्मा का श्राप है,

जिसे मैंने मारा था।

तुम क्या कर लोगे?"


शिवराम ने कांपती आवाज में कहा,

"अगर तुझे श्राप है,

तो क्यों दूसरों को मारता फिरता है?"


ठाकुर चिल्लाया,

"मुझे इस श्राप से तभी मुक्ति मिलेगी,

जब कोई और मेरी जगह मरेगा!

इसलिए तुम दोनों को लाया हूं!"


भाई, ये सुनते ही हवेली की दीवारों पर खून के धब्बे और गहराने लगे।

औरत की डरावनी हंसी गूंजने लगी।

शिवराम मेरी ओर लपका,

"भइया, अब क्या करें?"


मैंने जेब से माई का दिया ताबीज निकाला,

"यही ताबीज अब इसे रोकेगा।"


ठाकुर चिल्लाया,

"ये ताबीज नहीं चलेगा!

मुझे कोई नहीं रोक सकता!"


भाई, तभी हवेली के एक कोने से उस लड़की की आत्मा दिखाई दी।

सफेद साड़ी, खुले बाल,

आंखें लाल।

उसने धीरे से कहा,

"मुझे इंसाफ चाहिए...!"


ठाकुर भागने लगा,

मगर हवेली के दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

शिवराम बोला,

"भइया, आत्मा खुद ही अपना बदला लेगी।"


भाई, अब हवेली में वो लड़की और ठाकुर आमने-सामने थे।

ठाकुर चीख रहा था,

"नहीं! नहीं! मुझे मत ले जा!"


और लड़की की आत्मा धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही थी।

(औरत की गुस्से में चीख, हवेली की दीवारों पर अजीब साये)


भाई, आगे क्या हुआ,

कैसे आत्मा ने ठाकुर को खत्म किया,

या ठाकुर ने कोई चाल चली,

ये सब जानने के लिए तैयार रहो।














कहानी अब अपने सबसे भयानक मोड़ पर है।



भूतिया ट्रक: जैसलमेर हाईवे का रहस्य

Part 39: "ठाकुर का भयानक अंत और आत्मा की मुक्ति"


भाई...


हवेली के अंदर जो मंजर था,

उसे देखकर हमारे रोंगटे खड़े हो गए।

ठाकुर सामने खड़ा कांप रहा था,

और उस लड़की की आत्मा...

धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।


हवा की सिसकती आवाजें,

दरवाजों का खुद-ब-खुद बंद हो जाना,

और आत्मा की आंखों की आग...


शिवराम फुसफुसाया,

"भइया... ये क्या हो रहा है?"


मैंने कहा,

"भाई, ये वही आत्मा है, जिसे ठाकुर ने मारा था।

अब वो अपना बदला लेने आई है।"


ठाकुर ने कांपते हुए कहा,

"माफ कर दो! मुझे माफ कर दो!

मैंने गलती की थी...!"


लेकिन भाई, आत्मा की आंखों में कोई दया नहीं थी।

वो धीरे-धीरे ठाकुर के पास आई।

ठाकुर पीछे हटता रहा,

पर उसके पीछे सिर्फ दीवार थी।


आत्मा ने कहा,

"जिस दर्द से मैंने जान गंवाई,

आज वही तुझे मिलेगा।"


भाई, उसके बोलते ही हवेली में

तेज चमक, कड़कती बिजली की आवाज गूंजी।


शिवराम ने मेरी ओर देखा,

"भइया, कुछ करो ना!"


मैंने जेब से ताबीज निकाला और जोर से कहा,

"हे माँ! अगर ये ताबीज सच्चा है,

तो आज इस आत्मा को शांति दे दो!"


भाई, जैसे ही मैंने ताबीज उठाया,

वो लड़की की आत्मा मेरी ओर देखने लगी।

उसकी आंखों में एक पल को सुकून दिखा।


शिवराम भी हाथ जोड़कर बोला,

"माँ! इसे शांति दे दो।"


भाई, तभी आत्मा ने गर्दन घुमाई और ठाकुर की ओर बढ़ गई।

ठाकुर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,

"मुझे मत ले जा! मुझे मत ले जा!

मैंने गलती की थी...!"


पर आत्मा ने उसकी गर्दन पकड़ ली।

भाई, ठाकुर का पूरा शरीर हवा में उठ गया।

उसके मुंह से झाग निकलने लगे,

आंखें फटी की फटी रह गईं।


शिवराम कांपते हुए बोला,

"भइया, ये क्या हो रहा है?"


भाई, आत्मा ने ठाकुर से कहा,

"अब तू भी वैसे ही मरेगा,

जैसे तूने मुझे मारा था।"


और भाई, ठाकुर की चीख हवेली में गूंज उठी,

"बचाओ! कोई बचाओ!"


भाई, उसकी चीखते-चीखते गर्दन एक झटके में मुड़ गई।

ठाकुर का शरीर वही गिर पड़ा।

(गिरते शरीर की आवाज, हवा का सन्नाटा)


शिवराम ज़ोर से चिल्लाया,

"भइया, ये... ये खत्म हो गया क्या?"


मैंने धीरे से कहा,

"शायद हाँ..."


भाई, तभी वो आत्मा हमारी तरफ मुड़ी।

हम दोनों सन्न।

पर आत्मा अब शांत थी।


उसने कहा,

"तुम दोनों ने मुझे इंसाफ दिलाया।

अब मैं आजाद हूं।"


फिर भाई, वो आत्मा धीरे-धीरे रौशनी में बदल गई और आसमान की ओर उड़ गई।

(धीमी सुकून भरी हवा की आवाज)


हवेली की दीवारों पर जो साये थे,

वो भी मिटने लगे।

हवेली में एक अजीब सी शांति छा गई।


शिवराम ने लंबी सांस ली,

"भइया, लगता है सब खत्म हो गया।"


मैंने कहा,

"हाँ भाई, लेकिन इस रास्ते से गुजरने वालों के लिए

ये कहानी हमेशा एक डरावना सच रहेगी।"


फिर हम ट्रक की ओर लौटे।

भाई, रात अब भी काली थी,

लेकिन हवेली के ऊपर से जैसे भूतों का साया हट चुका था।


ट्रक में बैठते वक्त शिवराम ने कहा,

"भइया, इस रात को मैं कभी नहीं भूल सकता।"


मैंने मुस्कराकर कहा,

"ना भाई, ये किस्सा भी अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया।"


भाई, जैसे ही ट्रक स्टार्ट किया,

हवा की एक हल्की फूंक आई,

जैसे कोई कह रहा हो... 'शुक्रिया...'


(ट्रक स्टार्ट होने की आवाज, दूर तक सुनसान रास्ता)


तो भाई,

ये थी हमारी जैसलमेर हाईवे की भूतिया कहानी।

कैसी लगी आपको?


अगर सुननी है नई कहानी या इस किस्से का कोई और राज,

तो ज़रूर बताओ...

और हाँ, VK Horror को सब्सक्राइब करना मत भूलना।







0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]

<< मुख्यपृष्ठ