शुक्रवार, 21 मार्च 2025

Himachal Trunk Driver horror story||

 हिमाचल का श्राप: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती




मेरा नाम राजू शर्मा है। उम्र 42 साल, पेशे से एक ट्रक ड्राइवर। ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा सड़कों पर ही गुज़र गया। राजस्थान से लेकर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल तक… अनगिनत हाइवे, अनगिनत रातें, और अनगिनत किस्से। पर जो मैंने उस रात हिमाचल की पहाड़ियों में देखा, वो मैं चाहकर भी नहीं भुला सकता।


घर की ज़िम्मेदारियाँ और सफर की मजबूरी


मैं जयपुर के पास एक छोटे से गाँव का रहने वाला हूँ। घर में बूढ़ी माँ, पत्नी सुनीता और दो छोटे बच्चे हैं। ज़िंदगी कभी आसान नहीं थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से जैसे मुसीबतें मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही थीं।

डीजल के बढ़ते दाम, ट्रांसपोर्ट के बदलते नियम, और ऊपर से ट्रक मालिक की सख्त शर्तें… इस सबके बीच ट्रक चलाना अब सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जंग बन चुका था।


उस रात मुझे मंडी (हिमाचल प्रदेश) के लिए रवाना होना था। माल की डिलीवरी ज़रूरी थी, वरना पेमेंट कट जाती। ट्रांसपोर्ट के ठेकेदार ने पहले ही चेतावनी दे दी थी – “राजू, टाइम पर माल पहुँचना चाहिए, वरना नुकसान तेरा होगा।”


सुनसान रास्ता और अजीब एहसास


रात के करीब 11:30 बजे मैं पंजाब के रास्ते हिमाचल की ओर बढ़ रहा था। खलासी गुड्डू मेरे साथ था – 28 साल का एक जवान लड़का, जो हमेशा मस्ती में रहता था। लेकिन उस रात न जाने क्यों, वह भी चुप था।


जैसे ही हमने हिमाचल की सीमा पार की, सड़क के दोनों ओर घना जंगल शुरू हो गया। चारों तरफ अंधेरा था, बस ट्रक की हेडलाइट्स ही रास्ता दिखा रही थीं। ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन उसके साथ एक अजीब सी बदबू भी महसूस हो रही थी – जैसे कोई गीली लकड़ी जलने की बू हो।


गुड्डू ने चुप्पी तोड़ी – “भाई, ये बदबू कैसी है? तूने कुछ जलाया क्या?”

मैंने इंजन चेक किया, सब ठीक था। फिर भी एक अजीब सा एहसास होने लगा, जैसे कोई हमें देख रहा हो…


पहला डरावना एहसास


करीब 12:30 बजे, जब हम एक सुनसान मोड़ से गुज़र रहे थे, तभी अचानक ट्रक का इंजन झटके खाने लगा।

“अबे! क्या हुआ इसे?” मैंने ट्रक साइड में रोका और नीचे उतरकर बोनट चेक करने लगा। सबकुछ सही था, लेकिन जैसे ही मैंने हेडलाइट की रोशनी में सड़क की दूसरी तरफ देखा, मेरा दिल ज़ोर से धड़क उठा।


वहाँ एक औरत खड़ी थी।

सफेद कपड़े, बिखरे हुए बाल, और चेहरा ऐसा जिसे देखना भी मुश्किल था।


गुड्डू ने भी देख लिया और घबराकर बोला –

“भाई… ये कहाँ से आई? इतनी रात को यहाँ कोई क्या कर रहा है?”


मैंने हिम्मत जुटाई और हेडलाइट की रोशनी उस पर डाली… और जो देखा, उससे मेरी रूह काँप उठी!


क्या वो सच में इंसान थी?


वो औरत हवा में झूल रही थी… उसके पैर ज़मीन से ऊपर थे!


(जारी…)


भाग 2 में: क्या राजू और गुड्डू उस औरत से बच पाएंगे? ट्रक का इंजन अचानक क्यों बंद हुआ? हिमाचल की उस सुनसान सड़क पर उन्हें कौन सा खौफनाक राज़ मिलेगा?




 हवा में लटकी वो औरत


मेरी सांसें तेज़ हो गईं। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे लग रहा था, जैसे अभी छाती से बाहर निकल आएगा। हेडलाइट की रोशनी में जो नज़ारा दिखा, उसे देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


वो औरत… हवा में झूल रही थी!

उसके पैर ज़मीन से ऊपर थे, जैसे किसी ने उसे अदृश्य धागों से हवा में टांग दिया हो। उसका सिर झुका हुआ था, और लंबे बिखरे हुए बाल उसके चेहरे को ढँक रहे थे।


गुड्डू के मुँह से सिर्फ़ इतना निकला – “भ… भाई… भाग यहाँ से!”


इंजन ने दिया धोखा


मैंने ट्रक का दरवाज़ा झटके से खोला और जल्दी से ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। कुंजी घुमाई… “घर्रर्र… घर्रर्र…” इंजन ने ज़ोर लगाया, लेकिन ट्रक स्टार्ट नहीं हुआ।


“हरामखोर! ऐसे समय पर धोखा दे रहा है तू?” मैंने गुस्से में स्टेयरिंग पर मुक्का मारा।


गुड्डू काँपते हुए बोला – “भाई, जल्दी कर! वो… वो हिल रही है…”


मैंने एक बार फिर कोशिश की… ट्रक ने ज़ोर लगाया और “धड़धड़धड़…” स्टार्ट हो गया!


हमने राहत की सांस ली, लेकिन जैसे ही मैंने गियर डाला और क्लच छोड़ा… कुछ अजीब हुआ।


भारी बोझ… ट्रक रुक गया!


ट्रक जैसे जगह पर जम गया हो। एक्सीलेटर पूरा दबाने के बावजूद, वह आगे नहीं बढ़ रहा था।


गुड्डू ने घबराकर खिड़की से झाँका और डर से चीख पड़ा –

“भाई!! कोई… कोई ट्रक को पीछे से पकड़ कर रोक रहा है!!!”


मैंने तुरंत रियर-व्यू मिरर में देखा… और जो दिखा, उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


काली परछाइयाँ…


ट्रक के पीछे कई काली आकृतियाँ दिख रही थीं – इंसानी आकार की, लेकिन उनकी आँखे नहीं थीं… सिर्फ़ गहरे अंधेरे से बनी हुई शक्लें।


वो ट्रक को पीछे से खींच रही थीं… उनकी उँगलियाँ इतनी लंबी और टेढ़ी थीं कि लगता था, जैसे वो ट्रक के लोहे में घुस जाएँगी।


गुड्डू बुरी तरह काँप रहा था। “भाई… हम बचेंगे ना?”


मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबाया। इंजन ज़ोर से गुर्राया, और अचानक…


धड़ाम!!


ट्रक को जैसे किसी ने ज़ोर से धक्का मारा हो, और हम पूरी रफ्तार से आगे बढ़ गए!


अचानक सब कुछ गायब…


जैसे ही हमने उस मोड़ को पार किया, ट्रक के पीछे का सारा भार एकदम हल्का हो गया।


गुड्डू ने खिड़की से झाँका –

पीछे अब कोई नहीं था…


लेकिन एक अजीब सी बात हुई। वो औरत, जो कुछ सेकंड पहले सड़क पर थी…


अब वो हमारे ठीक आगे, ट्रक की बोनट पर बैठी थी!


(जारी…)


भाग 3 में:


वो औरत ट्रक पर कैसे आ गई?


क्या राजू और गुड्डू इस श्राप से बच पाएंगे?


हिमाचल की इस सुनसान सड़क का खौफनाक राज़ क्या है?


ट्रक के बोनट पर बैठी वो औरत


मेरे हाथ स्टेयरिंग पर जमे हुए थे, लेकिन उनमें ताकत नहीं बची थी। सामने जो दिख रहा था, उस पर यकीन करना मुश्किल था। वो औरत… अब ट्रक के बोनट पर बैठी थी!


उसका सिर अब भी झुका हुआ था, और बाल उसके चेहरे को ढँके हुए थे। लेकिन इस बार… उसकी उँगलियाँ बोनट पर खुरचने लगीं। उसकी नुकीली उंगलियों से लोहे पर खरोंच पड़ रही थी, और कानों को चीर देने वाली चीं… चीं… की आवाज़ सुनाई दे रही थी।


गुड्डू कांपते हुए बोला – “भाई… ये हिलेगी नहीं क्या?”


अचानक उठ गया उसका सिर…






















मैंने धीरे-धीरे एक्सीलेटर दबाया। ट्रक की स्पीड बढ़ने लगी, लेकिन जैसे ही हमने 60 की रफ्तार पकड़ी…


उस औरत ने सिर उठाया!


मैंने पहली बार उसका चेहरा देखा… और कसम से, ज़िंदगी में कभी इतनी डरावनी चीज़ नहीं देखी थी।


उसकी आँखें नहीं थीं… सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे, जिनसे धुआँ निकल रहा था। चेहरा जल चुका था, जैसे किसी ने उसे आग में झोंक दिया हो। होंठ कटे हुए थे, और उनके बीच से पीली, सड़ी हुई हड्डियाँ दिख रही थीं।


उसने अपना कटा हुआ होंठ खींचते हुए एक आवाज़ निकाली –


“रु……को……।”


स्पीड ब्रेकर… और झटका!


मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबाया। ट्रक अब 80 की स्पीड पर था।

गुड्डू बुरी तरह डर गया था। “भाई, टक्कर मत मारना, वरना…”


लेकिन तभी सड़क पर एक बड़ा स्पीड ब्रेकर आया।


धड़ाम!!


ट्रक ज़ोर से उछला, और अगले ही पल… वो औरत बोनट से गायब हो गई।


हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा। गुड्डू कांपती आवाज़ में बोला – “ग… गई?”


मैंने चारों तरफ देखा। कुछ नहीं था।


शायद हम बच गए थे…


लेकिन नहीं।


पीछे से आई चीख…


ट्रक जैसे ही सीधा हुआ, अचानक पीछे से एक भयानक चीख आई।


“आ…आ…आहहहहहह!!!”


गुड्डू ने कांपते हुए पीछे मुड़कर देखा और अगले ही पल उसने ज़ोर से ट्रक के डैशबोर्ड पर मुक्का मारा –


“भाई!!! वो… पीछे बैठी है!!!”


मेरे हाथ से स्टेयरिंग छूटते-छूटते बचा।


मैंने रियर-व्यू मिरर में देखा…


वो औरत अब ट्रक के अंदर, ठीक पीछे… हमारी सीटों के पीछे बैठी थी!


उसके जलते हुए चेहरे से अब स्मोक निकल रहा था, और उसकी आवाज़ भारी हो चुकी थी –


“रुको… नहीं तो… मर जाओगे…।”


(जारी…)



---


भाग 4 में:


ट्रक के अंदर वो औरत क्या करने वाली है?


क्या राजू और गुड्डू इस खौफ से बच पाएंगे?


आखिर ये औरत कौन है, और हिमाचल की इन सड़कों पर क्यों भटक रही है?


ट्रक में बैठी मौत


मेरी सांस अटक गई। स्टेयरिंग पर रखे मेरे हाथ सुन्न पड़ चुके थे। रियर-व्यू मिरर में साफ दिख रहा था – वो औरत अब ट्रक के अंदर थी!


गुड्डू का चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसने हकलाते हुए कहा, “भ…भाई… अब क्या करें?”


मैंने झटके से सिर घुमाया।


ट्रक के ठीक पीछे, हमारी सीटों के पीछे…

वो औरत अंधेरे में बैठी थी।


उसका सिर झुका हुआ था, लेकिन उसकी उंगलियाँ लगातार ट्रक की सीट खुरच रही थीं। खरोंचने की आवाज़ इतनी डरावनी थी कि मेरा दिल बैठा जा रहा था।


चीं… चीं… चीं…


"बाहर निकलो!"


मैंने बिना एक पल गंवाए ट्रक रोकने का फैसला किया। ब्रेक मारा और ट्रक ज़ोर से झटके के साथ रुक गया।


“गुड्डू, जल्दी बाहर निकल!”


हम दोनों दरवाज़ा खोलकर बाहर कूद गए। लेकिन बाहर निकलते ही…


दरवाजे अपने आप बंद हो गए!!!


“धड़ाम!”


हम दोनों पीछे हट गए। ट्रक के अंदर अब भी हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं, जैसे कोई फुसफुसा रहा हो।


गुड्डू मेरी बाजू पकड़कर कांपते हुए बोला, “भाई, हम फँस गए!”


ट्रक हिलने लगा…


अचानक… ट्रक धीरे-धीरे हिलने लगा।


ऐसा लग रहा था, जैसे कोई अंदर से उसे धक्का दे रहा हो।


धक… धक… धक…


मैंने ट्रक के शीशों में झाँकने की कोशिश की, लेकिन शीशे काले पड़ चुके थे। अंदर कुछ नहीं दिख रहा था।


गुड्डू ने काँपते हुए कहा, “भाई… वो अब भी अंदर है…”


दरवाजे खुल गए…


अचानक, ट्रक के दोनों दरवाजे ज़ोर से खुले।


मैं और गुड्डू कुछ सेकंड के लिए जमे खड़े रहे। ट्रक के अंदर गहरा अंधेरा था।


लेकिन फिर… हमने जो देखा, उससे हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


ड्राइवर सीट खाली थी।


पीछे की सीट भी खाली थी।


ट्रक के अंदर कोई नहीं था!


"भाई, ये कैसे हो सकता है?"


गुड्डू ने काँपते हुए कहा, "भाई, अभी तो वो यहीं थी… कहाँ गई?"


मैंने धीरे-धीरे ट्रक के अंदर झाँका। कुछ नहीं था। बस वही पुरानी सीटें, वही गियर, वही हैंडब्रेक। सब कुछ वैसा ही था।


पर एक चीज़ बदली हुई थी…


डैशबोर्ड पर किसी ने खून से लिखा था – “अब ये ट्रक मेरा है।”


(जारी…)



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भाग 5 में:


क्या वाकई ट्रक अब किसी अज्ञात शक्ति के कब्जे में आ चुका है?


राजू और गुड्डू इस साये से कैसे बचेंगे?


इस भूतनी का राज़ क्या है?



अब ये ट्रक मेरा है…


डैशबोर्ड पर खून से लिखे शब्दों ने मेरे पैरों तले ज़मीन खिसका दी –


“अब ये ट्रक मेरा है।”


गुड्डू का चेहरा पीला पड़ चुका था। उसकी टाँगें काँप रही थीं। उसने धीरे से कहा, “भाई… अब क्या करेंगे? ट्रक छोड़ दें?”


पर ट्रक छोड़ना कोई आसान बात नहीं थी।


यह सिर्फ़ एक गाड़ी नहीं थी, बल्कि मेरी रोज़ी-रोटी थी। मैंने इस ट्रक के लिए सालों मेहनत की थी। इसे छोड़कर जाना मतलब अपने घरवालों को भूखा मारना था।


पर सवाल ये था – क्या इस ट्रक में कोई और रह रहा था? कोई अनदेखी ताकत?


ट्रक का इंजन खुद चालू हो गया!


मैं सोच ही रहा था कि अचानक…


“घररररर… घररररर…”


इंजन अपने आप स्टार्ट हो गया!


गुड्डू ने चीखते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया, “भाई! ये… ये अपने आप चालू हुआ!”


मैंने डरते हुए ट्रक के अंदर झाँका।

गियर अपने आप फर्स्ट में शिफ्ट हो गया।


और फिर…


ट्रक धीरे-धीरे खुद ही आगे बढ़ने लगा!


ट्रक ने खुद चलना शुरू कर दिया!


हम दोनों पीछे हटे। ट्रक बिना किसी ड्राइवर के सड़क पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।



















ऐसा लग रहा था, जैसे कोई अदृश्य शक्ति ट्रक चला रही हो।


गुड्डू की आँखों में आंसू आ गए, “भाई, ये जगह छोड़ देते हैं… ये ट्रक अब हमारा नहीं रहा…।”


पर मैं नहीं माना।


“अगर इस ट्रक को कोई चला सकता है, तो मैं भी चला सकता हूँ।”


मैंने हिम्मत जुटाई और ट्रक के दरवाज़े की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही मैंने अंदर पैर रखा…


स्टेयरिंग व्हील पर खून से भरे हाथ!


स्टेयरिंग पर खून से सने दो हाथ थे। वो किसी अदृश्य शक्ति के थे, जो स्टेयरिंग पकड़कर ट्रक चला रही थी!


मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।


अचानक, ट्रक का हॉर्न ज़ोर से बजा –


“भों… भों… भों… भों!!!”


जैसे किसी ने पागलों की तरह हॉर्न दबा दिया हो!


गुड्डू ने चिल्लाते हुए कहा, “भाई, बाहर आ जा!!!”


लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी…


दरवाज़ा बंद हो गया!


जैसे ही मैंने भागने की कोशिश की, ट्रक का दरवाज़ा ज़ोर से खुद ही बंद हो गया!


“धड़ाम!!”


मैं अंदर फँस चुका था।


गुड्डू बाहर रह गया… और मैं अंदर!


और फिर… स्टेयरिंग के पीछे कुछ हिला।


ट्रक का नया ड्राइवर…


मैंने धीरे-धीरे ऊपर देखा…


अब स्टेयरिंग पर सिर्फ़ खून से सने हाथ नहीं थे।


अब वहाँ… वो औरत बैठी थी!


उसका जला हुआ चेहरा… आँखों की जगह गहरे काले गड्ढे… और एक भयानक मुस्कान!


उसने मेरी तरफ़ देखा और धीमी आवाज़ में कहा –


“अब तू मेरा है।”


(जारी…)



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भाग 6 में:


क्या राजू इस ट्रक से बाहर निकल पाएगा?


वो औरत आखिर कौन थी?


ट्रक में रहने वाली इस आत्मा का क्या राज़ है?



अब तू मेरा है…


"अब तू मेरा है।"


उसकी फटी-गली आवाज़ मेरे कानों में सीसे की तरह उतर रही थी।

मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। स्टेयरिंग पर अब भी खून से सने हाथ थे, और वो औरत… ट्रक की ड्राइवर सीट पर बैठी थी!


दरवाज़े जाम हो गए!


मैंने तुरंत दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वो अंदर से लॉक हो चुका था।


“गुड्डू!!! दरवाज़ा खोल!!!”


गुड्डू बाहर खड़ा था, उसने हैंडल पकड़कर ज़ोर से खींचा –


पर दरवाज़ा टस से मस नहीं हुआ।


गुड्डू पागलों की तरह ट्रक के शीशे पर मुक्के मार रहा था, "भाई, तू अंदर कैसे बंद हो गया?"


पर मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था।


गियर अपने आप चलने लगा!


स्टेयरिंग पर बैठे उस साए ने धीरे से अपना सिर घुमाया, और अपनी खोखली, गहरी आँखों से मुझे घूरने लगा।


फिर, उसने अपने जलते हुए हाथ आगे बढ़ाए और गियर को खींच दिया!


"घररररर…"


ट्रक खुद ही चल पड़ा।


गुड्डू बाहर से चिल्लाया – “भाई, कूध जा!!!”


पर अब बहुत देर हो चुकी थी…


मैं अकेला था… उस मौत के साए के साथ।


ट्रक ने अचानक रफ़्तार पकड़ ली। पहाड़ी रास्ता घुमावदार था, और ट्रक तेज़ी से मोड़ काटता जा रहा था।


मैंने कांपते हुए उस औरत से कहा, “तू कौन है? क्या चाहती है?”


उसका चेहरा धीरे-धीरे मेरी तरफ़ मुड़ा।


उसके चेहरे की जली हुई चमड़ी पर से धुआँ उठ रहा था।


उसने धीरे से कहा –


“तू मेरी तरह मरेगा… जलकर… तड़पकर…”


ट्रक की सीटें जलने लगीं!


जैसे ही उसने ये कहा, ट्रक की सीटों से धुआँ उठने लगा।


मेरी सीट जलने लगी थी!


मेरे नीचे से सीट तपने लगी। ऐसा लग रहा था, जैसे मैं किसी जलते हुए तंदूर पर बैठा हूँ!


अचानक... ट्रक एक मोड़ पर आया!


सामने खाई थी!!!


ट्रक सीधा गहरी खाई की तरफ़ बढ़ रहा था।


मैंने पूरी ताकत से स्टेयरिंग पकड़ लिया और ज़ोर से मोड़ने की कोशिश की… पर वो औरत अब भी स्टेयरिंग को जकड़े बैठी थी।


मैंने चीखकर कहा, “तू क्या चाहती है? मुझे क्यों मार रही है?”


तभी उसने धीरे से कहा –


“क्योंकि… तू भी उसी रास्ते से आया है… जहाँ मैंने आखिरी सांस ली थी।”


“वही मोड़… वही जगह… और वही मौत…।”


ट्रक अब सीधा खाई की तरफ़ बढ़ रहा था!!!


क्या मैं बच पाऊँगा? या फिर इस ट्रक के साथ खाई में समा जाऊँगा?


(जारी…)



---


भाग 7 में:


ट्रक खाई में गिरेगा या बच जाएगा?


वो औरत कौन थी, और उसकी मौत कैसे हुई?


राजू इस मौत के जाल से कैसे निकलेगा?



खाई की ओर मौत की रफ्तार


"वही मोड़… वही जगह… और वही मौत…।"


उसकी फटी-गली आवाज़ ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।

ट्रक तेज़ रफ्तार से खाई की ओर बढ़ रहा था।


ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया!


मैंने पूरी ताकत से ब्रेक दबाया, लेकिन…


"कट्ट्ट… कट्ट्ट… कट्ट्ट…"


ब्रेक फेल हो चुके थे!


गुड्डू अब भी सड़क के किनारे से चिल्ला रहा था, "भाई, ट्रक रोक!!! खाई है आगे!!!"


पर मैं कुछ नहीं कर सकता था।


सामने धुंध में कुछ खड़ा था…


अचानक, खाई के किनारे धुंध में कोई खड़ा दिखा।


मैंने ध्यान से देखा…


वो वही औरत थी, जो अब ट्रक में भी मेरे साथ थी।


पर ये कैसे मुमकिन था?


वो एक ही समय पर दो जगह कैसे हो सकती थी?


"तू भी वैसे ही मरेगा…"


ट्रक के अंदर बैठी उस औरत ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे-धीरे मुस्कुराई।


उसने एक हाथ से स्टेयरिंग जकड़ रखा था, और दूसरे हाथ से अपने जले हुए चेहरे को नोचने लगी।


खर्र… खर्र…


उसकी चमड़ी उतरने लगी… नीचे काला कोयले जैसा जला हुआ मांस दिख रहा था।


उसकी आँखों की जगह अब सिर्फ़ जलते हुए गड्ढे थे।


"तू भी वैसे ही मरेगा… जैसे मैं मरी थी…"


खाई बस 20 मीटर दूर थी!


मुझे कुछ करना था।


मैंने झटके से स्टेयरिंग घुमाने की कोशिश की। पर उसके हाथ स्टेयरिंग पर चिपके हुए थे।


ट्रक अब खाई से 10 मीटर दूर था।


गुड्डू ज़ोर से चिल्लाया, "भाई, कूद जा!!!"


पर दरवाज़ा अब भी लॉक था!


गुड्डू ने रस्सी फेंकी!


अचानक, गुड्डू ने झाड़ियों से एक मोटी रस्सी उठाई और ट्रक की तरफ फेंकी।


रस्सी का एक सिरा ट्रक की खिड़की के पास आकर लटक गया।


मैंने झटपट हाथ बढ़ाया और रस्सी पकड़ ली।


"गुड्डू, खींच!!!"


गुड्डू पूरी ताकत से रस्सी खींचने लगा।


ट्रक अब खाई से 5 मीटर दूर था!!!


आखिरी सेकंड पर…


मैंने पूरा ज़ोर लगाकर रस्सी पर लटकने की कोशिश की।


और जैसे ही ट्रक खाई में गिरने ही वाला था…


मैंने छलांग लगा दी!!!


गुड्डू ने पूरी ताकत से मुझे खींच लिया।


हम दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।


"धड़ाम!!!"


ट्रक पूरी रफ्तार से खाई में जा गिरा!!!


"गड्ड्ड्ड्ड-ढड़ाम!!!"
















आसमान में धुआँ और चिंगारियाँ उठीं।


पर ट्रक के गिरने के बाद भी…


मैं और गुड्डू बुरी तरह हाँफ रहे थे।


पर तभी… खाई से एक आखिरी आवाज़ आई।


वो उसी औरत की चीख थी –


"ये कहानी अभी खत्म नहीं हुई…!!!"


(जारी…)



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भाग 8 में:


क्या ट्रक के गिरने से ये भूतिया घटना खत्म हो गई?


उस औरत की आत्मा कौन थी?


क्या राजू और गुड्डू वाकई सुरक्षित हैं?



मौत की गूंज


"ये कहानी अभी खत्म नहीं हुई…!!!"


उस औरत की चीख खाई से उठ रही थी।

ट्रक गिर चुका था, पर उसका भयानक एहसास अब भी मेरे शरीर में दौड़ रहा था।


मैं और गुड्डू वहीं ज़मीन पर गिरे हुए थे, सांसें उखड़ी हुई… शरीर कांप रहा था।


गुड्डू ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाई… वो सच में मर गई थी क्या?"


मैंने धीरे से खाई की तरफ देखा।


ट्रक से उठता काला धुआं…


नीचे ट्रक के जलने की आवाज़ आ रही थी।


"सड़ाक्क्क…"


कहीं कुछ फटने की आवाज़ आई।


अचानक, धुएं के बीच एक परछाईं उभरी।


हम दोनों ने घबरा कर देखा…


वो औरत… वापस आ गई!!!


खाई से उठते धुएं के बीच, वो औरत हवा में खड़ी थी।


उसका जलता हुआ शरीर अब और भी भयानक लग रहा था।


उसकी आंखों से लाल अंगारे चमक रहे थे।


उसने धीरे से अपना जला हुआ हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया –


"अब बचकर कहाँ जाएगा?"


गुड्डू चीख पड़ा, "भाग भाई!!!"


हम दोनों ने वहाँ से दौड़ लगा दी।


जंगल की ओर भागना…


हम सीधे पास के जंगल की तरफ भागे।


रात के अंधेरे में पेड़ों के बीच से गुजरते हुए, हमें पीछे से उसके कदमों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।


"ठक… ठक… ठक…"


पर वो आम कदमों की आवाज़ नहीं थी।


वो लकड़ी के टुकड़ों के घिसटने जैसी आवाज़ थी…


जैसे कोई बिना हड्डियों का इंसान रेंगता हुआ आ रहा हो…


गुड्डू अचानक गिर पड़ा!


भागते-भागते गुड्डू ज़ोर से चिल्लाया और ज़मीन पर गिर पड़ा।


मैंने मुड़कर देखा –


उसके पैर को किसी ने जकड़ लिया था!!!


वो औरत घास में छिपकर बैठी थी, और अब गुड्डू का पैर पकड़कर उसे खींच रही थी!!!


गुड्डू बुरी तरह तड़प रहा था, "भाई बचा!!!"


मैंने जल्दी से पास पड़ी लकड़ी उठाई और उसके हाथ पर वार किया –


"धप्प!!!"


पर वो नहीं छूटी।


उसने मुझे घूरा और फटी-गली आवाज़ में कहा –


"तू भी मरेगा… वो मोड़ श्रापित है… जिसने भी उस रास्ते से गुज़रा, वो ज़िंदा नहीं बचा!!!"


मेरा दिमाग सुन्न हो गया।


"श्रापित मोड़?"


यानी ये सब कुछ उसी रास्ते से गुजरने की वजह से हुआ था?


तभी, मुझे एक अजीब चीज़ महसूस हुई –


गुड्डू का शरीर ठंडा पड़ने लगा…


मैंने जल्दी से उसका हाथ खींचा, लेकिन…


वो ठंडा पड़ता जा रहा था…


जैसे कोई उसकी जान खींच रहा हो।


मैंने ज़ोर से हिम्मत जुटाई, और गुड्डू को पूरी ताकत से खींच लिया!!!


हम दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।


और जब हमने फिर से देखा…


वो औरत अब गायब हो चुकी थी।


पर उसका एक कटा हुआ हाथ वहीं पड़ा था… जो अब भी तड़प रहा था!!!


अब क्या होगा?


क्या हम बच पाएंगे?


उस श्रापित मोड़ का क्या रहस्य है?


कौन था वो, और क्यों हमारा पीछा कर रही थी?



(जारी…)



 श्रापित मोड़ का राज़


गुड्डू अब भी ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था।

हम दोनों की हालत ख़राब थी, पर सबसे भयानक चीज़ अब भी हमारे सामने थी—


वो कटा हुआ हाथ, जो अब भी तड़प रहा था!!!


"भाई… ये कैसे हिल रहा है?"


गुड्डू की आवाज़ काँप रही थी।


मैं भी स्तब्ध था।


एक मरा हुआ हाथ… जो ज़मीन पर पड़ा-पड़ा हिल रहा था?


ये इंसानी नहीं था।


ये कुछ और था…


अचानक—


"छपाक्क!!!"


हाथ ने ज़मीन पर ज़ोर से एक झटका दिया और धीरे-धीरे घास में धंसने लगा।


मैंने घबराकर गुड्डू को उठाया, "चल, यहाँ से निकलते हैं!!!"


जंगल में अजीब हलचल


हम दोनों जंगल से बाहर निकलने के लिए भागने लगे।


पर जैसे ही हम कुछ दूर पहुँचे—


चारों तरफ़ पेड़ खुद-ब-खुद हिलने लगे।


"सरसर… सरसर…"


हवा तेज़ हो रही थी।


पर ये सिर्फ हवा नहीं थी…


जंगल से धीमी-धीमी आवाज़ें भी आ रही थीं…


"तुम वापस नहीं जा सकते…"


"तुम्हें भी यहीं रहना होगा…"


मैंने मुड़कर देखा—


पेड़ों की छायाओं के बीच कई परछाइयाँ खड़ी थीं।


गुड्डू बेहोश होने लगा!


गुड्डू अचानक लड़खड़ाने लगा।


उसकी आँखें बंद होने लगीं।


उसकी गर्दन एक तरफ़ झुक गई।


उसके होंठ हिल रहे थे—


पर आवाज़ किसी और की थी!


"श्राप… श्राप से कोई नहीं बच सकता… मोड़ की तरफ़ मत देखो… नहीं तो तुम भी मर जाओगे…"


मेरे हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए।


गुड्डू के अंदर किसी और की आत्मा आ गई थी!!!


श्रापित मोड़ का राज़


गुड्डू की आवाज़ अब भी गूँज रही थी—


"हर साल कोई न कोई यहाँ मारा जाता है… क्योंकि इस मोड़ पर जो भी रुकता है, वो मरने के लिए अभिशप्त होता है…"


मुझे अचानक वो पुराना ट्रक ड्राइवर याद आया, जिसने हमें चेतावनी दी थी—


"उस मोड़ पर कभी मत रुकना!"


तो क्या…



ये सब उसी श्राप की वजह से हो रहा था?


गुड्डू ने मेरी गर्दन पकड़ ली!!!


मैं सोच ही रहा था कि गुड्डू ने अचानक मेरी गर्दन पकड़ ली।


उसकी आँखें अब पूरी सफ़ेद हो चुकी थीं।


उसकी पकड़ ज़बरदस्त थी!


वो धीरे-धीरे फुसफुसाया—


"तू अब नहीं बचेगा…"


मुझे कुछ समझ नहीं आया।


गला घुटने लगा था।


मुझे कुछ करना था…


तभी मेरी नज़र पड़ी—


एक पुराना मंदिर…


जंगल के बीचों-बीच एक टूटा-फूटा मंदिर खड़ा था।


मुझे नहीं पता क्यों, पर मुझे लगा कि अगर मैं वहाँ पहुँच जाऊँ, तो शायद बच सकता हूँ।


पर क्या मैं बच पाऊँगा?


(जारी…)

मंदिर का रहस्य


गुड्डू की पकड़ और कसती जा रही थी।

मेरी साँसें घुटने लगीं।


उसकी आँखें पूरी सफ़ेद थीं, और उसकी आवाज़…

वो उसकी नहीं थी।


"तू अब नहीं बचेगा…"


मुझे बचना था!


मंदिर की ओर भागना


मैंने पूरी ताकत लगाई और गुड्डू को ज़ोर से धक्का दिया।


"धड़ाम!"


वो ज़मीन पर गिरा और मैं सीधा उस पुराने मंदिर की तरफ़ भागा।


हवा ग़ज़ब की तेज़ हो गई थी।


पेड़ों की डालियाँ टूटने लगीं, और जंगल में अजीब सी सरसराहट गूँजने लगी।


मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि कोई नहीं चाहता कि मैं उस मंदिर तक पहुँचूँ।


मंदिर का भूतिया माहौल


जैसे ही मैं मंदिर के पास पहुँचा—


















दरवाज़ा अपने आप खुल गया।


"चर्रर्रर्र…"


अंदर अंधेरा था।


मिट्टी और धूल से भरी मूर्तियाँ,

टूटे हुए दीये,

और दीवारों पर अजीब-सी आकृतियाँ बनी हुई थीं।


मुझे लगा कि ये मंदिर शायद किसी देवी का था।


पर ये इतनी बुरी हालत में क्यों था?


गुड्डू की डरावनी हंसी


पीछे से अचानक गुड्डू की हंसी सुनाई दी—


"हा… हा… हा…"


वो अब धीरे-धीरे मंदिर की तरफ़ बढ़ रहा था।


पर उसका शरीर अब भी किसी और के क़ब्ज़े में था।


"यहाँ आ गया? अब तो तेरा अंत तय है…"


मुझे समझ नहीं आया कि मंदिर में आकर भी मुझे राहत क्यों नहीं मिल रही थी।


अचानक घंटी बज उठी!!!


मंदिर के अंदर अचानक एक भारी घंटी बजने लगी—


"टन्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न्न…"


गुड्डू चीख पड़ा।


उसके कानों से खून बहने लगा।


उसका शरीर काँपने लगा और वो ज़मीन पर गिर गया।


मंदिर के रहस्य का खुलासा


तभी, मंदिर के एक कोने से एक बूढ़े पुजारी की परछाई उभरी।


उन्होंने कहा—


"ये मंदिर श्रापित आत्माओं को बाँधने के लिए बनाया गया था… लेकिन बहुत साल पहले इसे छोड़ दिया गया।"


मैंने घबराकर पूछा, "श्रापित आत्माएँ?"


पुजारी की परछाई आगे बढ़ी और कहा—


"ये जंगल, ये मोड़… ये सब एक बहुत पुराने श्राप के कारण बर्बाद हो चुका है।"


मैंने पूछा, "कैसा श्राप?"


पुजारी बोले—


"जिस मोड़ पर तेरा ट्रक रुका था… वहाँ बहुत साल पहले एक लड़की का कत्ल हुआ था।"


"वो लड़की बदले की आग में जल रही थी… और अब वो इस मोड़ से गुजरने वाले हर इंसान को मार देती है।"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


तो क्या गुड्डू के अंदर उसी लड़की की आत्मा आ गई थी?


गुड्डू की हालत और बिगड़ने लगी


गुड्डू ज़मीन पर छटपटा रहा था।


उसकी गर्दन अब अजीब तरीके से मुड़ रही थी।


उसके मुँह से काले धुएँ की धारा निकल रही थी।


पुजारी ने कहा—


"अगर इसे बचाना है, तो तुझे वो करना होगा जो अब तक किसी ने नहीं किया।"


मैंने काँपती आवाज़ में पूछा, "क्या करना होगा?"


पुजारी बोले—


"तुझे उस मोड़ पर वापस जाना होगा… और उस आत्मा से सामना करना होगा।"


अब क्या होगा?


क्या मैं वापस उस श्रापित मोड़ पर जाऊँगा?


क्या गुड्डू की जान बच पाएगी?


कौन थी वो लड़की और उसका बदला क्या था?



(जारी…)


मौत का सामना


गुड्डू की हालत और बिगड़ती जा रही थी।

उसकी आँखें अब गहरी काली हो चुकी थीं, और शरीर अजीब तरीके से ऐंठ रहा था।


पुजारी की परछाई अब भी मेरे सामने थी।


"अगर इसे बचाना है, तो तुझे उस आत्मा का सामना करना होगा।"


मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा—

"पर कैसे? मैं उसके सामने जाऊँगा तो वो मुझे भी मार डालेगी!"


पुजारी की परछाई बोली—


"उसका श्राप तभी टूटेगा जब उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा।"


मैंने चौंककर पूछा, "लेकिन… इतने सालों बाद ये कैसे मुमकिन है?"


पुजारी बोले—


"उसका शरीर अब भी वहीं दफ़न है, उसी मोड़ के नीचे। अगर तू उसे शांति से जलाएगा, तो ये सब खत्म हो सकता है।"


गुड्डू अचानक हवा में उठ गया!!!


मैं कुछ सोच ही रहा था कि गुड्डू का शरीर अचानक हवा में ऊपर उठ गया!


उसका सिर पीछे की तरफ़ झुक गया, और मुँह से भयानक चीख़ निकली।


"तुम सब मारे जाओगे!!!"


पुजारी चिल्लाए—


"इसे रोक! जल्दी कर!"


श्रापित मोड़ की ओर वापसी


मैंने गुड्डू को जैसे-तैसे खींचा और ट्रक की तरफ़ घसीटकर ले गया।


वो छटपटा रहा था, पर मैं अब कोई चांस नहीं लेना चाहता था।


इंजन स्टार्ट किया और गियर डालते ही फुल स्पीड से वापस उसी मोड़ की तरफ़ निकल पड़ा।


रात और भी गहरी हो चुकी थी।


जंगल अब पहले से भी ज़्यादा खौफनाक लग रहा था।


मोड़ पर खड़ी एक परछाई…


जैसे ही मैं वहाँ पहुँचा, मुझे सड़क के किनारे एक सफेद कपड़ों में लिपटी हुई परछाई खड़ी दिखी।


"तू वापस क्यों आया है?"


एक धीमी, पर डरावनी आवाज़ हवा में गूँजी।


गुड्डू फिर बेहोश हो गया!


गुड्डू ने जैसे ही वो परछाई देखी, उसकी आँखें पलटी खा गईं और वो एक झटके में बेहोश हो गया।


मैं अकेला था।


मेरे सामने खड़ी थी वही लड़की… जिसकी आत्मा इस जगह को श्रापित कर चुकी थी।


उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं, बस गहरे काले गड्ढे थे!


उसके सफ़ेद कपड़े हवा में लहरा रहे थे, मानो कोई अदृश्य ताकत उसे नियंत्रित कर रही हो।


आत्मा की भयानक हंसी


"हा… हा… हा…"


उसकी आवाज़ किसी गहरी गुफा से आ रही थी।


मैं समझ गया कि अगर मैंने जल्दी कुछ नहीं किया, तो मैं भी यहाँ नहीं बचूँगा।


मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा—


"तुझे शांति चाहिए ना? बता, तेरा शरीर कहाँ है?"


अचानक हवा शांत हो गई।


लड़की की आत्मा मेरी तरफ़ देखी और कहा—


"नीचे… सड़क के नीचे… वहीं, जहाँ मेरा खून गिरा था।"


गड्डा खोदने का फैसला


मैं जल्दी से ट्रक से बाहर निकला और सड़क के किनारे की मिट्टी हटाने लगा।


थोड़ी देर खोदने के बाद, मुझे हड्डियों के कुछ टुकड़े और एक पुरानी चूड़ी मिली।


जैसे ही मैंने वो चूड़ी उठाई—


"चिल्ल्ल्ल्ल!!!"


लड़की की आत्मा अचानक ज़ोर से चीखने लगी।


अब क्या होगा?


क्या मैं इस आत्मा का श्राप तोड़ पाऊँगा?


क्या गुड्डू की जान बच सकेगी?


क्या इस जंगल का भयानक राज़ खुल पाएगा?



(जारी...)


 श्राप की आखिरी रात


मुझे अब यकीन हो गया था कि मैंने उस लड़की की हड्डियाँ ढूंढ ली थीं।

मगर अब असली परीक्षा बाकी थी—


क्या मैं उसका श्राप खत्म कर सकता था?


गुड्डू अब भी बेहोश था, और आत्मा मेरे ठीक सामने खड़ी थी।

उसके लंबे सफ़ेद बाल हवा में लहरा रहे थे, और आँखों की जगह काले गड्ढे चमक रहे थे।


अचानक जंगल में आग लग गई!!!


जैसे ही मैंने उन हड्डियों को उठाया, अचानक चारों तरफ़ तेज़ लपटें उठने लगीं।


पेड़ अपने आप जलने लगे और हवा में भयानक चीखें गूंजने लगीं।


"तूने मुझे छूने की हिम्मत कैसे की?"


लड़की की आत्मा गुस्से में कांपने लगी।


मुझे लगा कि अगर मैंने जल्दी कुछ नहीं किया, तो ये आग मुझे भी जिंदा जला देगी।


हड्डियों का अंतिम संस्कार


मैंने जल्दी से ट्रक से एक डीज़ल का कैन निकाला और हड्डियों पर डाल दिया।


जेब से माचिस निकाली और…


"सस्स्स्स्स…"


आग की लपटें ऊपर तक उठ गईं!


लड़की की आत्मा दर्द में चीख पड़ी—
















"नहीं!!!!"


भूतिया हवा का हमला


अचानक, हवा इतनी तेज़ हो गई कि मैं उड़ने लगा।


मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य ताकत मुझे घसीट रही हो।


मेरी साँसें तेज़ हो गईं।


गुड्डू अब भी ट्रक के अंदर पड़ा था, मगर अचानक उसने अपनी आँखें खोलीं और…


"आह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!"


उसके मुँह से भी वही काला धुआं निकलने लगा।


आखिरी टकराव


लड़की की आत्मा पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी।


"तूने मेरी हड्डियाँ जला दीं, मगर मेरा दर्द अब भी बाकी है!!!"


मैंने हिम्मत जुटाकर कहा—


"तुझे इस दुनिया से मुक्ति मिल रही है, क्यों नहीं जा रही?"


अचानक, आत्मा की आँखों में दर्द झलकने लगा।


उसने कांपती आवाज़ में कहा—


"क्योंकि… मेरा कातिल अब भी जिंदा है…"


मैं सन्न रह गया।


"कातिल??"


नया राज़ खुला


आत्मा ने मेरी ओर देखा और धीरे से कहा—


"वो आदमी जो मुझे मारकर यहाँ फेंक गया था… वो अब भी ज़िंदा है। जब तक उसका खून इस ज़मीन पर नहीं बहेगा, मैं इस जगह से नहीं जाऊँगी।"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


"कौन था वो?"


आत्मा की आँखों से खून की बूंदें गिरने लगीं।


उसने कांपते हुए कहा—


"वो… एक ट्रक ड्राइवर था।"


अब क्या होगा?


क्या आत्मा का बदला पूरा होगा?


क्या मैं इस जाल से निकल पाऊँगा?


कौन था वो कातिल ट्रक ड्राइवर?



(जारी...)


कातिल कौन?


लड़की की आत्मा मेरे सामने खड़ी थी।

हवा अब भी तेज़ चल रही थी, मगर उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि गहरा दर्द था।


"एक ट्रक ड्राइवर…? मतलब, तेरा कातिल भी कोई ड्राइवर था?"


आत्मा धीरे से बोली—


"हाँ… वो मुझे यहाँ लाया था… और यहीं मुझे मारकर फेंक दिया…"


मैं सन्न रह गया।

मेरी नज़र अब भी गुड्डू पर थी, जो धीरे-धीरे होश में आ रहा था।


गुड्डू की डरावनी हरकत


जैसे ही गुड्डू ने अपनी आँखें खोलीं, उसके चेहरे पर एक अजीब सा भाव था।

उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और उसने धीरे से मुस्कुराया।


"तो तू फिर मिल गई?"


मेरा दिल दहल गया।


"गुड्डू… तू ठीक तो है?"


गुड्डू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर आत्मा की तरफ़ और हँसने लगा।


"हा हा हा… मैं ठीक हूँ, पर तू बच नहीं पाएगा!"


सच का खुलासा


लड़की की आत्मा ने गुड्डू की तरफ़ इशारा किया और चीख़कर बोली—


"यही है मेरा कातिल!"


मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


"क-क्या??"


मैंने गुड्डू की तरफ़ देखा, उसकी मुस्कान अब और भी डरावनी हो गई थी।


"हाँ… मैं ही हूँ वो… जिसने इसे मारा था!"


गुड्डू की खौफनाक कहानी


गुड्डू अब खुलकर बोल रहा था।


"पाँच साल पहले… मैं इस रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते में ये लड़की अकेली खड़ी थी। मुझे लगा कि इसे लिफ्ट देनी चाहिए। मगर जब मैंने इसे ट्रक में बैठाया, तब मुझे पता चला कि इसके पास कोई पैसा नहीं था…"


"मुझे गुस्सा आ गया। मैंने इसे जबरदस्ती नीचे उतारने की कोशिश की, मगर इसने मुझसे लड़ना शुरू कर दिया।"


"गुस्से में, मैंने इसे धक्का दे दिया… और ये सिर के बल गिर पड़ी।"


गुड्डू अब भी हँस रहा था, मगर मेरी आत्मा काँप रही थी।


लड़की की आत्मा चीख़कर बोली—


"तू झूठ बोल रहा है!!!"


गुड्डू चिल्लाया—


"मैंने कुछ गलत नहीं किया! मरना इसकी गलती थी!!!"


भूतिया बदला


अचानक, लड़की की आत्मा हवा में उठी और उसने गुड्डू की गर्दन पकड़ ली।


गुड्डू बुरी तरह चीख़ने लगा—


"आहहहह… छोड़ मुझे!!!"


मगर अब देर हो चुकी थी।


उसकी आँखें सफ़ेद हो गईं और शरीर झटपटाने लगा।


हवा में फिर से वही गूँज उठी—


"अब तू भी यहीं रहेगा…"


अचानक, तेज़ चमक हुई और गुड्डू की भयानक चीख़ के साथ सब कुछ शांत हो गया।


गुड्डू अब ज़मीन पर पड़ा था— बिलकुल बेजान।


लड़की की आत्मा मेरी तरफ़ मुड़ी और धीरे से कहा—


"मुझे अब शांति मिल गई…"


और वो धीरे-धीरे धुंध में बदलकर ग़ायब हो गई।


अब क्या होगा?


क्या गुड्डू की आत्मा भी अब इस जगह भटकती रहेगी?


क्या मैं इस जगह से सही सलामत निकल पाऊँगा?


क्या यह श्राप अब पूरी तरह खत्म हो चुका है?



(जारी...)


श्राप से आज़ादी या नई मुसीबत?


गुड्डू अब बिलकुल बेजान पड़ा था।

उसकी आँखें खुली थीं, मगर उनमें कोई जिंदगी नहीं थी।


लड़की की आत्मा ग़ायब हो चुकी थी…


मगर हवा अब भी अजीब सी थी।


गुड्डू जिंदा है या…?


मैं घबराते हुए गुड्डू के पास गया और उसके चेहरे के सामने हाथ लहराया।


कोई हरकत नहीं।


मैंने उसकी नब्ज़ देखी—


कुछ नहीं… बस ठंडा शरीर।


मैंने कांपते हुए ट्रक की चाबी उठाई और भागकर ट्रक के अंदर बैठ गया।


रास्ते में नई आफ़त


इंजन स्टार्ट हुआ और मैं ट्रक लेकर आगे बढ़ा।


मुझे लगा कि अब मैं बच चुका हूँ।


मगर तभी…


"टप… टप… टप…"


ट्रक की छत पर किसी के चलने की आवाज़ आई।


पीछे मुड़कर देखा तो...


मेरे माथे पर पसीना आ गया।


मैंने धीरे-धीरे रियर-व्यू मिरर में देखा…


और मेरी रूह काँप गई!


गुड्डू की लाश ट्रक के पीछे खड़ी थी!


उसके होंठ नीले हो चुके थे, आँखें पूरी सफ़ेद थीं…


और वो मुझे घूर रहा था!


"तूने मुझे अकेला छोड़ दिया…"


गुड्डू के होंठ हिले, मगर आवाज़ ट्रक के अंदर गूँजी।


"तू मेरा भाई था, फिर भी मुझे मरने दिया… अब मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा!"


ट्रक अचानक हिलने लगा।


स्टेयरिंग मेरे हाथ से छूटते-छूटते बचा।


ब्रेक फेल!!!


मैंने ब्रेक दबाया, मगर…


कुछ नहीं हुआ!


ट्रक तेज़ी से घाटी की तरफ़ बढ़ रहा था।


मेरे सामने सिर्फ़ दो रास्ते थे—


1. या तो ट्रक खाई में गिर जाए।



2. या फिर मैं किसी तरह कूदकर जान बचाऊँ।




मगर मैं कुछ कर पाता, उससे पहले…


गुड्डू की आत्मा अचानक ट्रक के अंदर आ गई!!!


उसने मुझसे स्टेयरिंग छीनने की कोशिश की।


अब क्या होगा?


क्या मैं बच पाऊँगा?


गुड्डू की आत्मा को कैसे रोका जाए?


क्या ये श्राप अब भी खत्म नहीं हुआ?



(जारी...)


मौत का सफर


गुड्डू की आत्मा ट्रक के अंदर आ चुकी थी।

उसका चेहरा भयानक सफ़ेद, आँखें पूरी सफ़ेद और होंठ नीले हो चुके थे।


"तूने मुझे अकेला छोड़ दिया… अब मैं तुझे भी मार डालूँगा!!!"


उसकी आवाज़ गूँज रही थी।


ट्रक की रफ़्तार और तेज़ हो गई!


मैंने स्टेयरिंग कसकर पकड़ लिया, मगर गुड्डू की आत्मा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।




















उसका स्पर्श बर्फ़ से भी ज्यादा ठंडा था।


मैंने ज़ोर से पैर मारा और खुद को छुड़ाने की कोशिश की, मगर…


ट्रक अब सीधे घाटी की तरफ़ बढ़ रहा था!!!


मौत बस एक सेकंड दूर थी…


मेरी साँसें तेज़ हो गईं।

अगर मैंने कुछ नहीं किया तो ट्रक सीधा खाई में गिर जाएगा।


अचानक, मुझे पीछे से किसी ने धक्का दिया!


"धड़ाम!!!"


मैं स्टेयरिंग से दूर गिर पड़ा और…


ट्रक पलट गया!


चारों तरफ़ धुआं और धूल भर गई।


मेरी आँखें बंद हो गईं… और हर तरफ़ अंधेरा छा गया।


फिर से वही डरावनी आवाज़…


कुछ देर बाद, मैंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।


गुड्डू की आत्मा ठीक मेरे सामने खड़ी थी!!!


मगर अब उसकी शक्ल पहले से भी ज्यादा डरावनी हो चुकी थी।


उसकी खोपड़ी बाहर आ चुकी थी, आँखों से काला धुआं निकल रहा था।


उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया और बोला—


"अब तेरा खेल खत्म!!!"


आखिरी कोशिश…


मैंने अपने पास पड़ी माचिस उठाई और ट्रक में गिरे डीज़ल पर फेंक दी।


"धड़ाक!!!"


ट्रक में तेज़ आग लग गई और आग की लपटें गुड्डू की आत्मा को छूने लगीं।


उसने एक भयानक चीख मारी—


"आहहहहहह!!!!!"


सब खत्म… या नहीं?


गुड्डू की आत्मा जलने लगी और धीरे-धीरे धुएँ में बदलकर ग़ायब हो गई।


मैं ज़मीन पर गिर पड़ा।


चारों तरफ़ बस सन्नाटा था।


क्या ये सब खत्म हो चुका था?


मगर तभी…


पीछे से किसी ने मेरा कंधा पकड़ लिया।


"भाई…"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


गुड्डू की आत्मा फिर से ज़िंदा थी???


(जारी...)


: कौन है मेरे पीछे?


पीछे से किसी ने मेरा कंधा पकड़ लिया…


"भाई…"


ये आवाज़ सुनते ही मेरी रूह कांप गई।

गुड्डू की आत्मा वापस आ गई थी?


मैंने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई…


पीछे जो था, उसे देख मेरी साँस अटक गई!


वहाँ कोई और नहीं, गुड्डू ही खड़ा था!

मगर वो वैसा नहीं लग रहा था, जैसा कुछ मिनट पहले था।


अब उसकी आँखों में न कोई नफरत थी, न ही वो डरावना दिख रहा था।

वो वैसे ही खड़ा था, जैसा वो ज़िंदा रहते समय दिखता था।


"तू ज़िंदा है… या मर गया?"


मैंने काँपती आवाज़ में पूछा।


गुड्डू की आँखों में आँसू आ गए।


"भाई, मुझे माफ़ कर दे… मैंने बहुत बुरा किया… मेरी आत्मा को अब शांति चाहिए।"


गुड्डू का सच


गुड्डू ने बताया कि उसकी मौत के बाद, वो इस जगह से बांध दिया गया था।

वो किसी और को चोट नहीं पहुँचाना चाहता था, मगर उसका गुस्सा और पाप उसे एक दुष्ट आत्मा बना चुके थे।


"मुझे इस जगह से मुक्ति चाहिए… मुझे माफ़ कर दे भाई!"


आत्मा को मुक्त करने का तरीका


मैंने आसपास देखा।

मेरे पास ज़्यादा कुछ नहीं था, मगर मुझे याद आया कि गाँव के बुज़ुर्ग हमेशा कहते थे कि मरे हुए की आत्मा को शांति दिलाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।


मैंने वहीं ज़मीन पर बैठकर दुआ माँगनी शुरू कर दी।

गुड्डू भी मेरे सामने बैठ गया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।


जैसे-जैसे मैं प्रार्थना कर रहा था, गुड्डू का शरीर धीरे-धीरे धुंआ बनने लगा।


उसके चेहरे पर अब शांति थी।


"भाई… अब मैं जा रहा हूँ… तेरा शुक्रिया…"


और देखते ही देखते… गुड्डू की आत्मा हवा में घुलकर ग़ायब हो गई।


सब कुछ शांत हो गया… मगर क्या ये सच में खत्म हुआ?


अब वहाँ न कोई आत्मा थी, न कोई डर।

हवा भी अब शांत थी।


मगर मेरे मन में एक सवाल रह गया—


क्या सच में सब खत्म हो गया था?


या फिर… इस पहाड़ी के अंधेरे में कोई और रहस्य छुपा था?


(जारी...)


मुक्ति या नया जाल?


गुड्डू की आत्मा धुएँ में बदलकर गायब हो चुकी थी।

चारों तरफ़ एक अजीब सी शांति थी।


मैंने गहरी साँस ली और खुद को संभालने की कोशिश की।


क्या ये सब सच में खत्म हो चुका था?


ट्रक अभी भी वहीं था… मगर जल चुका था।


मुझे अब पैदल ही आगे बढ़ना था।


रात का अंधेरा अब भी घना था, ठंडी हवाएँ चल रही थीं।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला—


फोन भी जल चुका था।


अब सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था— आगे बढ़ना।


रास्ते में अजीब घटनाएँ…


जैसे ही मैं धीरे-धीरे पहाड़ी सड़क पर चलने लगा, मुझे पीछे किसी के चलने की आहट सुनाई दी।


मैंने रुककर पीछे देखा—


कुछ भी नहीं।


मुझे लगा कि ये मेरा वहम था।


मगर जैसे ही मैं दोबारा चला, वो आहट फिर से सुनाई दी।


"टप… टप… टप…"


अब मेरा दिमाग़ सच में चकराने लगा था।


छायाएँ रास्ता रोकने लगीं!


अचानक, मुझे सड़क के दोनों तरफ़ अजीब-अजीब साए नज़र आने लगे।


वो इंसानों की आकृतियों जैसे थे, मगर उनका कोई चेहरा नहीं था!


मैंने नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की और तेज़ी से आगे बढ़ा।


मगर तभी, एक साया मेरे सामने आकर खड़ा हो गया!


"तू अकेला नहीं बच सकता!"


उस छाया की आवाज़ गूँजी।


मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा।


"तेरा भाई तो चला गया, मगर ये जगह तुझे इतनी आसानी से जाने नहीं देगी!"


अब मेरे पाँव ठंडे पड़ चुके थे।


क्या ये सच में खत्म हुआ था?


गुड्डू की आत्मा चली गई थी, मगर अब ये नए रहस्यमयी साए सामने आ चुके थे।


क्या मैं वाकई बच पाऊँगा?

या फिर इस श्राप ने मुझे भी अपने जाल में फंसा लिया था?


(जारी...)


मौत की परछाइयाँ


रात का अंधेरा और गहरा हो चुका था।

ठंडी हवाएँ मेरी हड्डियों तक चुभ रही थीं।

मगर मुझे सबसे ज्यादा डर उन अजीब सायों से लग रहा था जो मेरे सामने खड़े थे।


"तू अकेला नहीं बच सकता!"


उनमें से एक छाया की आवाज़ गूँजी।


मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ गए।


"तू कौन है?" मैंने हिम्मत करके पूछा।


अचानक, उन सायों ने अपने चेहरे दिखाने शुरू किए…


उनके चेहरे इंसानों की तरह थे, मगर आँखें पूरी काली और मुँह सिल दिया गया था!!!


भागने का कोई रास्ता नहीं!


मैं पीछे मुड़कर भागना चाहता था, मगर पीछे भी वही साए खड़े थे!


अब मैं पूरी तरह फँस चुका था।


सायों का हमला!


अचानक, उन सायों में से एक ने मुझ पर छलाँग लगा दी।

मैंने खुद को बचाने की कोशिश की, मगर उसने मुझे गले से पकड़ लिया!


उसकी पकड़ बर्फ से भी ठंडी थी, जैसे मेरी रूह को चूस लेना चाहता हो।


मैंने खुद को छुड़ाने के लिए ज़ोर लगाया, मगर वो मुझे खींचने लगे।


आखिरी उम्मीद


मेरी जेब में अब भी एक छोटी लोहे की हनुमान गदा थी, जो मुझे मेरी माँ ने दी थी।






















कहते हैं लोहे की चीजें बुरी आत्माओं को रोक सकती हैं।


मैंने जल्दी से वो गदा निकाली और पूरे जोर से उस साए पर दे मारी।


"कड़ाक!!!"


जैसे ही गदा उसके शरीर से टकराई, वो साया तेज़ चीख़ मारकर धुएँ में बदल गया!


बचा तो हूँ… मगर कब तक?


बाकी साए भी पीछे हटने लगे।

मुझे लगा कि शायद मैंने उन्हें डरा दिया है।


मगर तभी…


अचानक एक और भयानक आवाज़ गूँजी—


"ये जगह तुझे कभी ज़िंदा नहीं छोड़ेगी…"


मेरा खून जम गया।

क्या ये श्राप अब भी ख़त्म नहीं हुआ था?

क्या अभी भी कोई बड़ा खतरा मेरा इंतज़ार कर रहा था?


(जारी...)


 श्रापित दरवाज़ा


सायों को पीछे हटता देख मैंने राहत की सांस ली, मगर मेरी तकलीफ़ अभी खत्म नहीं हुई थी।

चारों ओर घना अंधेरा था और हवा की आवाज़ भी जैसे कानों को चीर रही थी।


"ये जगह तुझे कभी ज़िंदा नहीं छोड़ेगी…"


ये आखिरी शब्द अब भी मेरे कानों में गूँज रहे थे।


सामने आया एक रहस्यमयी दरवाज़ा!


मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की, मगर कुछ ही दूर पर मुझे एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखा।

वो यूँ ही सड़क के बीचों-बीच खड़ा था, जैसे किसी अनदेखी दुनिया का रास्ता खुला हो!


मगर यहाँ जंगल के बीच ये दरवाज़ा कैसे आया?


पीछे मुड़कर देखा – वहाँ कोई नहीं था!


जहाँ कुछ मिनट पहले भूतिया साए थे, वहाँ अब सिर्फ़ घना कोहरा था।


मैंने सोचा कि अगर मैं उस दरवाज़े को पार कर लूँ, तो शायद ये सब खत्म हो जाए।


मैंने धीरे-धीरे दरवाज़े को छूने के लिए हाथ बढ़ाया—


"रुक जा!"


एक डरावनी आवाज़ गूँजी।


गुड्डू की आत्मा फिर से आ गई थी!


वो हवा में तैरता हुआ मेरे सामने आ गया।

मगर इस बार वो गुस्से में नहीं, बल्कि डरा हुआ लग रहा था।


"ये दरवाज़ा मत खोलना! ये मौत का दरवाज़ा है!"


क्या था इस दरवाज़े के पीछे?


मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई।


गुड्डू की आत्मा ने कांपते हुए कहा—


"जो इस दरवाज़े को खोलता है, वो कभी वापस नहीं आता…"


अब मेरे पास दो ही रास्ते थे—


1. इस दरवाज़े से गुज़रकर सच जानूँ



2. वापस भाग जाऊँ और इस श्राप को हमेशा के लिए भूल जाऊँ




मगर इससे पहले कि मैं कोई फ़ैसला ले पाता…


दरवाज़ा अपने आप खुलने लगा…


और अंदर से एक भारी-भरकम साया बाहर आने लगा!


क्या मैं अब भी ज़िंदा बच सकता हूँ?


(जारी…)


मौत के दरवाज़े के उस पार


दरवाज़ा धीरे-धीरे खुद-ब-खुद खुल रहा था…

अंदर गहरा अंधेरा था, और उस अंधेरे में कोई चीज़ हिल रही थी!


गुड्डू की आत्मा अब कांप रही थी—

"भाग भाई… ये मौत है… ये तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा!"


अंदर से उठती चीखें…


मैंने कान लगाकर सुना, तो अंदर से कई लोगों के चीखने-कराहने की आवाज़ें आ रही थीं।

ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ सैकड़ों आत्माएँ कैद थीं!


मेरे पैरों के नीचे ज़मीन काँपने लगी।


एक विशाल परछाईं निकली बाहर!


अचानक, दरवाज़े के अंदर से एक भारी-भरकम छाया बाहर आने लगी।

वो कोई इंसान नहीं था… वो कुछ और ही था!


उसकी लंबाई 8-9 फीट की थी, शरीर से काले धुएँ निकल रहे थे, और उसकी आँखें आग की तरह लाल थीं।


उसके आते ही हवा और ठंडी हो गई…

मेरे अंदर अजीब-सा डर बैठ गया।


"तूने दरवाज़ा खोल दिया… अब कोई नहीं बचेगा!"

उसका भारी स्वर गूँजा।


मैंने हिम्मत जुटाई…


मैंने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा—

"तू कौन है? और ये दरवाज़ा क्या है?"


वो साया हँसने लगा…

"ये श्राप का दरवाज़ा है… जो इसमें एक बार आ गया, वो कभी बाहर नहीं जा सकता!"


अब मैं सच में फँस चुका था।


क्या अब बचने का कोई रास्ता नहीं?


गुड्डू की आत्मा भी बेबस खड़ी थी।


अचानक, मुझे याद आया…

मेरे गले में माँ का दिया ताबीज़ था!


क्या वो इस अंधेरे से बचा सकता है?

या फिर अब मेरा अंत तय था?


(जारी…)

 ताबीज़ की शक्ति या अंधेरे की हार?


मैंने अपने गले में लटकते माँ के दिए ताबीज़ को कसकर पकड़ लिया।

शायद यही मेरी आखिरी उम्मीद थी।


भयानक साया धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ रहा था…


उसकी लाल जलती आँखें मुझे सीधा घूर रही थीं।

हवा भारी हो चुकी थी, जैसे मेरी हर सांस पर उसका कब्जा हो।


गुड्डू की आत्मा चीख पड़ी—

"ताबीज़ निकाल भाई! जल्दी!"


आखिरी मौका!


मैंने झट से ताबीज़ को हाथ में लिया और पूरी ताकत से उस साए की ओर उछाल दिया!


"धड़ाम!"


जैसे ही ताबीज़ उस भूतिया दरवाज़े से टकराया, एक तेज़ रोशनी फूटी!

उस साए ने भयंकर चीख़ मारी, उसकी पूरी आकृति कांपने लगी!


"नहीं!!! ये कैसे हो सकता है!!!"

वो गरजा।


श्रापित दरवाज़ा जलने लगा…


उस दरवाज़े से लाल-नीली आग निकलने लगी, मानो कोई पुराना श्राप अब टूट रहा हो।

चारों तरफ़ एक अजीब-सी गूँज होने लगी।


वो साया अब छटपटाने लगा, जैसे कोई उसे खींच रहा हो!


"ये तेरा अंत है!!!" वो चीखा।


और फिर…


अचानक सबकुछ शांत हो गया…


दरवाज़ा और वो साया दोनों गायब हो गए।

चारों तरफ़ बस सुनसान जंगल और ठंडी हवा थी।


क्या सच में सब खत्म हो गया था?


गुड्डू की आत्मा अब शांत थी।

वो हल्की मुस्कान के साथ बोला—

"शुक्रिया भाई… तूने मुझे भी इस श्राप से आज़ाद कर दिया।"


अब उसका शरीर धीरे-धीरे हवा में घुलने लगा…

उसकी आत्मा अब मुक्त हो रही थी।


मेरी आँखों से आँसू गिर पड़े।

"मुझे माफ़ कर देना भाई…"


गुड्डू ने आखिरी बार मुझे देखा… और फिर अदृश्य हो गया।


अब मैं अकेला था…


मगर अब डर नहीं था।

अब सिर्फ एक सवाल था—


क्या मैं अब भी इस जंगल से ज़िंदा बाहर निकल पाऊँगा?


(जारी…)


 जंगल से निकलने का आखिरी रास्ता


सब कुछ खत्म हो चुका था—

श्रापित दरवाज़ा जलकर राख हो गया था, गुड्डू की आत्मा मुक्त हो गई थी, और वो भयानक साया भी खत्म हो चुका था।


मगर अब एक नई मुसीबत थी…


"अब मैं जंगल से बाहर कैसे निकलूँ?"


चारों ओर घना अंधेरा और कटीली झाड़ियाँ थीं।

रास्ता दिखाई ही नहीं दे रहा था।


हर तरफ़ गहरा सन्नाटा…


ना कोई आवाज़, ना हवा की सरसराहट…

बस मौत जैसा सन्नाटा।


मैंने अपनी जेब में हाथ डाला—

सिर्फ एक छोटी टॉर्च और माँ का ताबीज़ बचा था।


अचानक पेड़ों के पीछे हलचल हुई!


मैंने टॉर्च जलाकर देखा…

कोई वहाँ छुपा हुआ था!


"कौन है वहाँ?" मैंने डरते हुए पूछा।




















कोई जवाब नहीं आया।


मैंने धीरे-धीरे क़दम बढ़ाए और रोशनी फैलाई…


तभी…


एक पुराना ट्रक झाड़ियों के बीच खड़ा था!


"ये यहाँ कैसे आया?"

उसकी नंबर प्लेट धुंधली थी, जैसे कई सालों से कोई इसे चला ही नहीं रहा था।


मैंने ट्रक के अंदर झाँका—


और मेरी साँसें रुक गईं!


ड्राइवर की सीट पर एक कंकाल बैठा था!!!


उसका हाथ अब भी स्टेयरिंग पर था, जैसे वो मरते-मरते भी ट्रक चला रहा हो!


"क्या ये मेरी ही तरह का कोई और ड्राइवर था?"


या फिर ये ट्रक भी इस श्राप का हिस्सा था?


अब मेरे पास दो ही रास्ते थे—


1. ट्रक में बैठकर जंगल से बाहर जाने की कोशिश करूँ



2. पैदल ही बाहर निकलने का रास्ता ढूँढूँ




मगर मुझे नहीं पता था कि इस ट्रक में बैठने का अंजाम क्या होगा…


क्या मैं सही फ़ैसला ले पाऊँगा?


(जारी...)


मौत का ट्रक


पुराना जंग लगा हुआ ट्रक मेरी आँखों के सामने खड़ा था।

ड्राइवर की सीट पर बैठा कंकाल अब भी स्टेयरिंग पकड़े था।

ऐसा लग रहा था जैसे मरने के बाद भी वो यहाँ से हिला नहीं था!


"अब क्या करूँ?"


मैं जंगल में भटककर मर नहीं सकता था।

अगर ये ट्रक अभी भी चल सकता था, तो शायद मैं यहाँ से निकल सकता था।


मैंने हिम्मत जुटाई…


धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए मैं ट्रक के दरवाज़े के पास पहुँचा।

धड़कन इतनी तेज़ थी कि लग रहा था अभी दिल फट जाएगा।


दरवाज़ा खोलते ही…


जैसे ही मैंने ट्रक का दरवाज़ा खोला, कंकाल का सिर मेरी ओर घूमा!!!


"धड़ाम!"

डर के मारे मैं पीछे गिर पड़ा!


कंकाल की खाली आँखों से काला धुआँ निकल रहा था…


वो धीरे-धीरे हिलने लगा।


मेरी सांसें अटक गईं।


"तू भी यहीं फँस जाएगा…"


उस कंकाल ने बुदबुदाते हुए कहा।


मैंने डर के मारे आँखें बंद कर लीं…

"या अल्लाह मेरी मदद कर!"


जब आँखें खोलीं, तो वो कंकाल गायब हो चुका था!


ट्रक अब खाली था।


क्या ये मेरी कल्पना थी?

या फिर ट्रक में बैठते ही उसकी आत्मा मुझ पर हमला करने वाली थी?


मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

पर मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था।


मैंने ट्रक स्टार्ट किया…


इंजन गर्जना के साथ चालू हो गया!

मेरी उम्मीद जागी—


"अब मैं यहाँ से बाहर निकल सकता हूँ!"


लेकिन जैसे ही मैंने ट्रक आगे बढ़ाया…


ट्रक के साइड मिरर में वो कंकाल फिर से दिखा!!!


वो पीछे ट्रक में बैठ चुका था…

और धीरे-धीरे मेरी ओर आ रहा था!


अब क्या मैं बच पाऊँगा?


(जारी…)


पीछा करती मौत


ट्रक के साइड मिरर में वो भयानक कंकाल दिख रहा था।

उसकी खाली आँखों से अब भी काला धुआँ निकल रहा था।

वो धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रहा था!


"बच के निकल भाई!"


गुड्डू की आत्मा अब नहीं थी, पर उसकी आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही थी।


मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दिया!

"घर्रर्रर्र!!!"


ट्रक रॉकेट की तरह जंगल के कच्चे रास्ते पर दौड़ पड़ा।


लेकिन कंकाल पीछा नहीं छोड़ रहा था…


अब वो ट्रक की छत पर चढ़ चुका था!

हर झटके के साथ उसके पैर छत पर धड़धड़ा रहे थे।


अचानक उसने ट्रक का शीशा पीटना शुरू कर दिया!


"ठक… ठक… ठक…"


मैंने बगल से देखा—

उसकी उंगलियाँ अब सिर्फ हड्डियों का ढाँचा थीं।


"दरवाज़ा खोल…"


उसकी गूँजती हुई आवाज़ सुनाई दी।


"कभी नहीं!!!"


मैंने पूरी ताकत से गियर बदला और ट्रक को और तेज़ कर दिया।


लेकिन तभी—


ट्रक के ब्रेक फेल हो गए!!!


"धड़ाम!!!"


ट्रक एक झटके से उछला और सामने एक खाई दिखी!

अब मैं या तो इस श्रापित आत्मा से मर सकता था…

या फिर इस गहरी खाई में गिर सकता था!


अब क्या रास्ता बचा था?


मैंने जल्दी से माँ के दिए ताबीज़ को पकड़ा।

"या अल्लाह मदद कर!"


और फिर मैंने एक ऐसा फ़ैसला लिया…

जिसने मेरी ज़िंदगी और मौत दोनों तय कर दी।


(जारी…)

मौत की खाई या आखिरी उम्मीद?


ब्रेक फेल हो चुके थे…

ट्रक बेकाबू होकर खाई की तरफ बढ़ रहा था।


पीछे वो कंकाल छत पर चढ़ा बैठा था, उसकी हड्डियाँ खड़खड़ा रही थीं।


"अब या तो खाई में गिरकर मरूँ… या इस भूत से हार जाऊँ!"


कोई और रास्ता नहीं दिख रहा था।


लेकिन तभी…


मेरी नज़र स्टेयरिंग के पास लटकते ताबीज़ पर पड़ी।

माँ ने इसे हमेशा बुरी ताकतों से बचाने के लिए दिया था।


आखिरी मौका!


मैंने ताबीज़ को झट से पकड़ा और ट्रक की छत की ओर उछाल दिया!


"धड़ाम!!!"


ताबीज़ कंकाल के ऊपर गिरा और उसके शरीर से भयानक चीख़ निकली!


"नहीं!!!!"


वो छटपटाने लगा।

उसकी हड्डियाँ धुएँ में बदलने लगीं…

जैसे कोई बड़ा श्राप टूट रहा हो!


"अब बचने का मौका है!"


मैंने पूरी ताकत से हैंडब्रेक खींचा!


"कड़ाक!!!"


ट्रक की चिंगारियाँ निकलीं और वो खाई के किनारे पर जाकर रुक गया!


मैं मौत के एक इंच करीब था…


सामने हजारों फीट गहरी खाई थी।

अगर ज़रा भी देर करता, तो आज जिंदा न बचता!


पीछे देखा…


कंकाल पूरी तरह गायब हो चुका था।

वो भूतिया साया हमेशा के लिए खत्म हो चुका था।


"क्या अब ये सब खत्म हो गया?"


शायद हाँ…

पर इस जंगल का श्राप अब भी बाकी था।


अब मुझे यहाँ से निकलना था… जल्दी!


(जारी...)


 जंगल की आखिरी रात


ट्रक खाई के किनारे अटका था…

अगर जरा भी आगे बढ़ता, तो सीधा मौत के मुँह में चला जाता।


"अब यहाँ से बाहर कैसे निकलूँ?"


ट्रक को पीछे करने की कोशिश की, लेकिन इंजन पूरी तरह से बंद हो चुका था।

मेरे पास अब कोई चारा नहीं बचा था।


"क्या अब मुझे पैदल ही जाना पड़ेगा?"


चारों ओर अंधेरा था…

घना जंगल खौफनाक सन्नाटे में डूबा हुआ था।


तभी झाड़ियों में कुछ सरसराने की आवाज़ आई…


मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

"अब कौन है?"


मैंने धीरे-धीरे टॉर्च जलाकर उधर रोशनी डाली…


और जो मैंने देखा, उससे मेरी साँसें थम गईं!


झाड़ियों के पीछे एक लड़की खड़ी थी।

सफेद कपड़े, लंबे उलझे बाल, और चेहरा जो साफ दिखाई नहीं दे रहा था…


"ये कौन हो सकती है?"


वो धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रही थी…


"भाई… मदद करो…"


उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे वो कई दिनों से भूखी-प्यासी हो।


मैंने थोड़ा हिम्मत जुटाकर पूछा,

"तुम यहाँ इस सुनसान जंगल में क्या कर रही हो?"


उसने सिर उठाया और मेरी ओर देखा—


उसकी आँखें सुर्ख लाल थीं!!!


"तुम बच नहीं सकते…"




















उसकी आवाज़ एकदम भयानक और डरावनी हो गई।


अब तो बचने का बस एक ही रास्ता था— भागो!!!


मैंने ट्रक को वहीं छोड़कर दौड़ना शुरू कर दिया।


लेकिन वो लड़की भी मेरे पीछे-पीछे भाग रही थी!


अचानक…

मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसकने लगी और मैं एक गहरे गड्ढे में गिर गया!!!


"अब क्या मैं यहाँ से जिंदा निकल पाऊँगा?"


(जारी...)

मौत का गड्ढा


मैंने खुद को बचाने के लिए ज़मीन पर हाथ मारा, लेकिन मैं गड्ढे में तेज़ी से गिरता चला गया।

नीचे घुप अंधेरा था और हवा में एक अजीब बदबू भरी हुई थी।


"धड़ाम!!!"


मैं मिट्टी और काई से भरी ज़मीन पर गिरा।

पूरे शरीर में दर्द दौड़ गया।

टॉर्च अब भी मेरे हाथ में थी, लेकिन उसकी रोशनी हल्की पड़ रही थी।


"अब मैं कहाँ आ गया हूँ?"


मैंने इधर-उधर देखा—

ये कोई पुरानी गुफा लग रही थी।


अचानक…


मुझे सामने एक पुराना टूटा हुआ ताबूत दिखा।

उस पर कई अजीबोगरीब निशान बने हुए थे।


मैंने गौर से देखा—

ताबूत का ढक्कन हल्का-सा हिला।


"क्या इसके अंदर कोई है?"


मेरा दिल बुरी तरह धड़कने लगा।


तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा…


मैंने डर के मारे झटके से पलटकर देखा—


वो वही लड़की थी!!!


उसके चेहरे पर अब कोई भाव नहीं थे।

उसकी आँखें गहरी काली हो चुकी थीं।


"तूने इसे छू लिया…"

उसकी आवाज़ एकदम ठंडी और डरावनी थी।


"अब तेरा भी वही हश्र होगा, जो मेरा हुआ था…"


इतना कहकर उसने ताबूत की तरफ इशारा किया…

और ढक्कन अचानक पूरी तरह खुल गया!!!


"अब इसके अंदर क्या है?"


क्या ये मेरा अंत था…?


(जारी...)


 ताबूत का राज़


ताबूत का ढक्कन धीरे-धीरे चरमराते हुए खुला…

उसमें से घना काला धुआँ निकल रहा था।


"अब अंदर क्या होगा?"


मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था।

टॉर्च की मद्धम रोशनी में ताबूत के अंदर झाँका…


और जो देखा, उससे मेरी रूह काँप उठी!!!


ताबूत के अंदर किसी की कंकालनुमा लाश पड़ी थी…

लेकिन उसके हाथ हिल रहे थे!!!


"ये कैसे हो सकता है?"


मैंने घबराकर पीछे हटना चाहा, लेकिन…


वो कंकाल अचानक हिलने लगा!!!

उसकी खाली आँखों से सफेद धुआँ निकल रहा था।


तभी पीछे से वो लड़की धीरे-धीरे बोलने लगी:


"ये वो आत्मा है जो इस जंगल से कोई जिंदा नहीं जाने देती…"


मैंने घबराकर लड़की की ओर देखा—

उसका चेहरा अब और भी डरावना हो चुका था।


"अब तुम भी इससे बच नहीं सकते…"


उसकी आवाज़ गूँजने लगी।


"नहीं!!!"


मैंने पूरी ताकत से पीछे हटने की कोशिश की…

लेकिन मेरे पैरों के नीचे जमीन काई से फिसलन भरी थी।


अचानक…


कंकाल का एक हाथ बिजली की तरह मेरी ओर बढ़ा और मेरी कलाई पकड़ ली!!!


"छोड़ मुझे!!!"


मैंने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन…

उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरी हड्डियाँ चटकने लगीं।


"अब मेरा क्या होगा?"


क्या ये वही श्राप था, जो मुझे भी अपना शिकार बना लेगा?


(जारी…)


 मौत की पकड़


कंकाल का हाथ मेरी कलाई को बर्फ़ की तरह जकड़े हुए था।

उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरी नसें सुन्न पड़ने लगीं।


"अब बचने का कोई रास्ता नहीं!"


मेरी साँसें तेज़ हो गईं।

मैंने पूरी ताकत लगाकर हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन वो हिला तक नहीं।


तभी…


पीछे खड़ी लड़की धीरे-धीरे हँसने लगी।

उसकी हँसी एकदम अजीब और भयानक थी।


"अब तू भी इस जंगल का हिस्सा बनने वाला है…"


उसकी आँखें गहरी काली गुफाओं जैसी लग रही थीं।

वो धीरे-धीरे ताबूत के पास आने लगी।


"क्या ये मुझे भी इस ताबूत में कैद कर देगी?"


मुझे अपने अंत का अहसास होने लगा।


लेकिन तभी…


मेरी नज़र टॉर्च की बची-कुची रोशनी पर पड़ी।

मुझे एक आखिरी कोशिश करनी थी!


मैंने झटके से टॉर्च उठाई और कंकाल के चेहरे पर रोशनी डाल दी!


"आआआआह्ह्ह!!!!"


जैसे ही तेज़ रोशनी उसकी खाली आँखों पर पड़ी, उसने एक भयंकर चीख़ मारी!

उसका हाथ तुरंत मुझसे छूट गया।


"रोशनी से इसे तकलीफ़ हो रही है!"


मुझे अब इस भूत से बचने का तरीका मिल गया था!


लेकिन…


लड़की अब भी वहीं खड़ी थी…

उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।


"अब तुझे इस जंगल में कोई नहीं बचा सकता…"


उसकी आवाज़ में एक अजीब ठंडापन था।


"क्या ये सच में मेरा अंत था?"


या अभी कोई और रास्ता बचा था?


(जारी…)


 जंगल का खेल


कंकाल की चीख़ के साथ ही उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और पीछे हट गया।

लेकिन लड़की अब भी वहीं खड़ी थी… गहरी, ठंडी निगाहों से मुझे घूरते हुए।


"तू इससे बच गया, लेकिन मुझसे नहीं बचेगा…"


उसकी आवाज़ एकदम खौफनाक थी।


"अब क्या करूँ?"


मेरे पास टॉर्च की हल्की रोशनी ही आखिरी सहारा थी।

लेकिन उसकी बैटरी भी लगातार कमज़ोर हो रही थी।


अचानक…


गुफा के अंदर की दीवारों पर अजीबोगरीब आकृतियाँ उभरने लगीं।

ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों परछाइयाँ मुझे घेरने लगी हों!


"तू भी इस जंगल का हिस्सा बनेगा!"


लड़की की आवाज़ अब गुफा में गूँजने लगी।


मैंने तुरंत भागने की कोशिश की…


लेकिन गुफा का रास्ता गायब हो चुका था!!!


अब मैं चारों तरफ सिर्फ काली दीवारों से घिरा था।


"क्या ये कोई मृगतृष्णा थी?"


या फिर इस जंगल ने मुझे पूरी तरह से कैद कर लिया था?


तभी…


मेरे कानों में एक परिचित आवाज़ आई।


"भाई… सुन रहा है?"


ये मेरे खलासी की आवाज़ थी!!!


"क्या वो अब भी ज़िंदा था?"


मैंने हिम्मत जुटाकर ज़ोर से चिल्लाया—

"हाँ! मैं यहाँ हूँ!"


लेकिन जवाब में केवल सन्नाटा मिला…


"क्या ये भी किसी आत्मा का खेल था?"


(जारी…)


 मौत की परछाइयाँ


"भाई… सुन रहा है?"


वो आवाज़ मेरे खलासी की थी!


"लेकिन ये कैसे हो सकता है?"


मैंने खुद को समझाया—

"अगर वो ज़िंदा होता, तो इतनी देर तक मुझे अकेला क्यों छोड़ता?"


पर आवाज़ फिर आई—


"इधर आ… जल्दी कर!"


"अब क्या करूँ?"


अगर मैं आवाज़ की तरफ जाता तो कहीं ये मौत का जाल न हो!

लेकिन अगर रुकता तो… इस भूतिया गुफा में हमेशा के लिए फँस सकता था।


तभी…


मेरी टॉर्च की आखिरी रोशनी भी बुझने लगी।


"नहीं!!!"


अंधेरा मुझे पूरी तरह से घेरने लगा।


अचानक…


दीवारों पर उभरती परछाइयाँ मेरी ओर बढ़ने लगीं!


"अब मैं इनसे बच नहीं सकता!"















मुझे लगा कि ये मेरी आखिरी घड़ी थी।


तभी—


कहीं दूर से एक रोशनी की हल्की किरण चमकी।

वो किसी की टॉर्च थी!


"शायद ये मेरा खलासी ही था!"


मैंने पूरी ताकत से उस रोशनी की तरफ दौड़ लगाई।


"अगर ये भी धोखा निकला तो?"

लेकिन अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था।


मैंने रोशनी की ओर कदम बढ़ाया…


और तभी किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया!!!


"कौन था वो?"

क्या मैं सच में बच जाऊँगा?


(जारी…)


जिन्दा या मौत?


"कौन है?"


मैंने डरते-डरते पूछा।


जिस हाथ ने मेरी कलाई पकड़ी थी, उसकी पकड़ ठंडी और मजबूत थी।


"भाई! मैं हूँ… जल्दी बाहर निकल!"


ये वाकई मेरे खलासी की आवाज़ थी!


"क्या ये सच था?"


या फिर ये भी किसी आत्मा का धोखा था?


"तू जिंदा है?"


मैंने कांपते हुए पूछा।


"हाँ भाई, पर तू जल्दी कर!"


उसने जोर से मेरा हाथ खींचा।


मैंने देखा कि वो गुफा के बाहर खड़ा था, और मेरे चारों तरफ की परछाइयाँ अब और भी गहरी हो रही थीं।


"अगर ये भूत नहीं है, तो मैं अब भी बच सकता हूँ!"


मैंने पूरी ताकत से भागने की कोशिश की।


लेकिन…


जैसे ही मैं बाहर की रोशनी की तरफ बढ़ा,


गुफा की ज़मीन नीचे धँसने लगी!!!


"भाई जल्दी!"


खलासी ने ज़ोर से चिल्लाया।


मैंने आखिरी छलांग लगाई…


और जैसे ही बाहर निकला,

गुफा का रास्ता भयंकर गर्जना के साथ बंद हो गया!!!


"हे अल्लाह… मैं बच गया?"


मैंने धड़कते दिल के साथ खुद को टटोला…

मैं जिंदा था!!!


खलासी की आँखों में भी खौफ था।


"भाई, ये जगह हमें जिंदा नहीं छोड़ेगी… हमें यहाँ से निकलना होगा!"


मैंने गहरी साँस ली और ट्रक की ओर भागा…

लेकिन जब हम हाईवे पर पहुँचे, तो हवा में फिर वही सरसराहट गूँज रही थी।


क्या ये सब खत्म हो चुका था?


या फिर अभी मौत का असली खेल बाकी था…?


(जारी…)


बचकर कहाँ जाओगे?


हम ट्रक की तरफ दौड़े।


गुफा के अंदर की भयानक परछाइयाँ,

वो कंकाल का हाथ,

और वो लड़की की रहस्यमयी हँसी –

सब अब भी मेरे दिमाग में गूंज रहा था।


"भाई, जल्दी ट्रक स्टार्ट कर!"


खलासी ने दरवाजा खोलकर अंदर छलांग लगाई।


मैंने कांपते हाथों से चाबी घुमाई…


"घर्रर्रर्र…… घर्रर्रर्र……"


ट्रक स्टार्ट नहीं हुआ!


"नहीं!!!"


मेरे माथे से पसीना बहने लगा।


तभी…


सामने सड़क पर वही लड़की खड़ी थी।

उसकी आँखें अब भी गहरी काली गुफाओं जैसी थीं।


"तुम भाग नहीं सकते…"


उसकी आवाज़ हवा में गूंज उठी।


"भाई, कुछ कर!"


खलासी चिल्लाया।


मेरे पास सिर्फ एक ही रास्ता था…


मैंने एक बार फिर चाबी घुमाई…


"घर्रर्रर्र… घड़घड़घड़… व्रूऊउउम!!!"


ट्रक स्टार्ट हो गया!!!


मैंने बिना कुछ सोचे एक्सीलेटर दबाया और ट्रक लड़की की तरफ बढ़ा दिया!


"अगर ये भूतनी असली है, तो रास्ता छोड़ेगी… वरना…!!!"


जैसे ही ट्रक उसके करीब पहुँचा—


वो गायब हो गई!!!


लेकिन अगले ही पल…


ट्रक के अंदर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी…


"धड़… धड़… धड़…"


"अब ये कौन था???"


क्या हमने सच में भूत को पीछे छोड़ दिया था?

या वो अब ट्रक के अंदर था?


(जारी…)



ट्रक के अंदर कौन है?


"धड़… धड़… धड़…"


ट्रक के अंदर कोई था!!!


मैंने और खलासी ने सांसें थाम लीं।

ट्रक पूरी रफ्तार से सुनसान हाईवे पर दौड़ रहा था…

लेकिन पीछे से दस्तक की आवाज़ अब और तेज़ हो गई थी।


"भाई… पीछे कोई बैठा है!"


खलासी ने काँपते हुए कहा।


मैंने रियर मिरर में झाँका…


और मेरी रीढ़ में ठंडी सनसनी दौड़ गई।


पीछे सीट पर एक धुंधली परछाई बैठी थी!!!


"भाई, ये कौन है?"


खलासी की आवाज़ काँप रही थी।


"क्या ये वही लड़की है?"


या फिर कोई और अज्ञात आत्मा हमारे साथ ट्रक में थी?


"क्या करूँ?"


ट्रक रोकना मतलब खुद को मरने के लिए छोड़ देना था।


मैंने हिम्मत जुटाई और पीछे मुड़कर देखा…


लेकिन… पीछे कोई नहीं था।


"क्या मैंने गलत देखा था?"


पर खलासी का चेहरा सफेद पड़ चुका था।


"भाई… वो यहाँ थी! मैंने खुद देखा!"


"क्या ये सब हमारे दिमाग का वहम था?"


या फिर कोई अनदेखी ताकत हमारा पीछा कर रही थी?


ट्रक अब भी दौड़ रहा था…

लेकिन अजीब बात ये थी कि…


सड़क ख़त्म ही नहीं हो रही थी!!!


हम लगातार ड्राइव कर रहे थे,

लेकिन सामने का रास्ता वही का वही लग रहा था!


"क्या हम एक भूतिया लूप में फँस चुके हैं?"


तभी अचानक…


ट्रक की हेडलाइट्स बंद हो गईं!!!


अब हम घने अंधेरे में दौड़ रहे थे…


बिना यह जाने कि आगे क्या है…


(जारी…)

 अंधेरे की कैद


"भाई… ये क्या हो रहा है?"


खलासी का गला सूख चुका था।


हेडलाइट्स बंद… सड़क गायब…


और अब ट्रक अंधेरे में दौड़ रहा था।


"ब्रेक मारूँ?"


पर अगर आगे खाई हुई तो?


"गाड़ी चलने दूँ?"


पर अगर हम किसी खतरनाक जगह पहुँच गए तो?


तभी… ट्रक के अंदर किसी के सांस लेने की आवाज़ आई।


"हहहहहहह….."


"भाई, पीछे कोई बैठा है!"


खलासी डर के मारे सीट से चिपक गया।


मैंने धीरे-धीरे रियर मिरर में देखा…


और मेरे रोंगटे खड़े हो गए!!!


पीछे वाली सीट पर वही लड़की बैठी थी।


उसकी काली आँखें,

उसके बिखरे हुए बाल,

और उसका पीला, सड़ा हुआ चेहरा…


"अब तो हम बचे नहीं!"


खलासी ने रोते हुए कहा।


तभी लड़की ने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया…


और अपने होंठों से फटी हुई आवाज़ में बोली—


"तुम मेरी दुनिया में आ चुके हो… अब यहाँ से कोई नहीं बचता…"


"भाई, कुछ कर!"


खलासी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।


"क्या करूँ?"


गाड़ी रोकूँ?

या पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दूँ?


तभी लड़की अचानक गायब हो गई।


लेकिन उसके हँसने की आवाज़ ट्रक के अंदर गूँज रही थी।


मैंने झटके से ब्रेक मारा!!!


ट्रक घसीटते हुए रुका…


और जब मैंने चारों तरफ देखा—

हम किसी अनजान जगह पर पहुँच चुके थे।


"ये हम कहाँ आ गए?"


चारों तरफ गहरी धुंध थी।


सामने एक टूटा-फूटा मंदिर दिख रहा था…

और मंदिर के दरवाजे पर खून से लिखा था—


"अब तुम हमारे हो…"


(जारी…)


मौत का दरवाज़ा


हम गलत जगह आ गए थे।


ट्रक के चारों ओर गहरी धुंध थी।

और सामने वो टूटा-फूटा मंदिर…


"अब तुम हमारे हो..."


खून से लिखे ये शब्द मेरे सीने में नश्तर की तरह चुभ रहे थे।


"भाई, ये कौनसी जगह है?"




















खलासी की आवाज़ काँप रही थी।


"हमें यहाँ से निकलना होगा!"


मैंने ट्रक का गियर बदला और पीछे हटने की कोशिश की।


लेकिन… ट्रक हिला तक नहीं।


"भाई, गाड़ी क्यों नहीं चल रही?"


खलासी ने मेरी तरफ देखा।


मैंने पूरी ताकत लगाकर एक्सीलेटर दबाया…

पर ट्रक जैसे ज़मीन से चिपक गया हो!


तभी मंदिर के दरवाजे से चरमराने की आवाज़ आई…


"कड़क… कड़ाक… कचचचच!!!"


दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल रहा था।


"भाई, अब तो मौत पक्की!"


खलासी की आँखों में आंसू थे।


अंदर घुप्प अंधेरा था…


लेकिन मुझे लगा जैसे कोई हमें अंदर बुला रहा है।


"भाई, मत देख!"


खलासी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।


पर मेरी नज़र उस अंधेरे में अटक गई।


क्योंकि… वहाँ कोई खड़ा था।


एक लंबा साया…

जो धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ रहा था।


"हम यहाँ से जिंदा नहीं बचेंगे!"


खलासी रो पड़ा।


"कोई रास्ता निकालना होगा!"


मैंने सोचा।


"अगर ट्रक नहीं चला… तो हमें पैदल ही भागना होगा!"


मैंने दरवाजा खोला…

पर जैसे ही मैंने बाहर कदम रखा…


"धड़ाम!!!"


दरवाजा अपने आप बंद हो गया।


और मंदिर का दरवाजा भी पूरी तरह खुल चुका था।


"अब भागने का कोई रास्ता नहीं बचा था…"


(जारी…)



मंदिर के अंदर क्या है?


दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था…


हम अब ट्रक के अंदर फँस चुके थे।

बाहर गहरी धुंध और टूटा-फूटा मंदिर था।


मंदिर के दरवाजे से अंधेरा बाहर आ रहा था।


और वो साया… धीरे-धीरे हमारी ओर बढ़ रहा था।


"भाई, अब क्या करें?"


खलासी की साँसें तेज़ हो गईं।


"हमें कुछ करना होगा… वरना ये चीज़ हमें मार डालेगी!"


मैंने झटके से ट्रक का हॉर्न बजाया…


"पोंnnnnnnn!!!"


हॉर्न की तेज़ आवाज़ से सब कुछ एक पल के लिए थम गया।


लेकिन तभी…


मंदिर के अंदर से एक औरत की चीख सुनाई दी—


"आआआआआआह्ह्ह्ह!!!!"


हमने एक-दूसरे की तरफ देखा।


"क्या ये वही लड़की थी?"


"भाई, अब कोई और रास्ता नहीं बचा…"


"हमें इस मंदिर में जाना ही होगा!"


"क्या???"


खलासी के चेहरे का रंग उड़ गया।


"तू पागल हो गया है? वहाँ मौत हमारा इंतज़ार कर रही है!"


पर हमारे पास कोई और चारा नहीं था।

ट्रक स्टार्ट नहीं हो रहा था और

अगर हम बैठे रहे, तो वो साया हमें ज़िंदा नहीं छोड़ेगा!


"चलो… जो होगा देखा जाएगा!"


मैंने ट्रक का दरवाजा खोला और धीरे-धीरे मंदिर की तरफ बढ़ा।

खलासी काँपते हुए मेरे पीछे-पीछे आया।


जैसे ही हमने मंदिर में कदम रखा…


दरवाजा अपने आप बंद हो गया!!!


अब हम उस अंधेरे मंदिर के अंदर कैद हो चुके थे।


और सामने…


खून से सनी ज़मीन पर…


एक लाश पड़ी थी।


(जारी…)


 मंदिर की लाश


दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था…


हम अब मंदिर के अंदर फँस चुके थे।


और हमारे सामने…


खून से सनी ज़मीन पर एक लाश पड़ी थी।


"भाई… ये कौन है?"


खलासी की आवाज़ काँप रही थी।


लाश पूरी तरह सड़ी-गली थी।

इसके हाथ-पैर मुड़े हुए थे और चेहरे पर गहरे नाखूनों के निशान थे।


"कोई इस पर हमला कर चुका था…"


पर ये कब मरा था?

और किसने इसे मारा था?


तभी लाश के पास रखी एक पुरानी किताब पर नज़र पड़ी।


कवर पर धूल जमी थी, लेकिन…

इस पर खून से कुछ लिखा था—


"जो भी इस किताब को पढ़ेगा, वो मर जाएगा!"


"भाई, इस किताब को मत छू!"


खलासी घबराकर पीछे हट गया।


पर मुझे कुछ जवाब चाहिए थे।

मैंने धीरे से किताब उठाई और पहला पन्ना पलटा…


और तभी… मंदिर में गूंजती हुई एक औरत की चीख सुनाई दी—


"रुक जा!!!"


मेरे हाथ सुन्न हो गए…


मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी कलाई पकड़ ली हो।


खलासी ने काँपते हुए इधर-उधर देखा।


"भाई… यहाँ कोई है!"


मैंने धीरे-धीरे सिर उठाया…


और देखा…


मंदिर की दीवारों पर सैकड़ों कटी-फटी लाशें टंगी हुई थीं!


(जारी…)


 मंदिर की दीवारों पर लाशें


हमने जो देखा, उस पर यकीन करना मुश्किल था…


मंदिर की दीवारों पर सैकड़ों कटी-फटी लाशें टंगी हुई थीं।


कुछ सूख चुकी थीं,

कुछ ताज़ा लग रही थीं,

और कुछ के आधे शरीर गायब थे।


"भाई… ये सब कौन लोग हैं?"


खलासी की आवाज़ डर से लड़खड़ा रही थी।


"पता नहीं… लेकिन ये लाशें यहाँ क्यों रखी गई हैं?"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


तभी एक लाश ने हल्की-सी हरकत की…


"भाई… वो हिली!!!"


खलासी ने दहशत में मेरा हाथ पकड़ लिया।


हम दोनों घबराकर पीछे हटे।


लेकिन तभी…


पूरे मंदिर में एक तेज़ हवाओं का झोंका आया…


"भड़ाम!!!!"


मंदिर के अंदर की सभी मशालें अपने आप जल उठीं।


अब अंधेरा थोड़ा छंट चुका था।

हमने ध्यान से उन लाशों को देखा…


और हमारी आँखें फटी की फटी रह गईं।


"भाई… ये सब ट्रक ड्राइवर हैं!!!"


हजारों ड्राइवरों की लाशें…


जो इस रास्ते से गुज़र चुके थे…


और कभी लौटकर नहीं गए।


तभी मंदिर के कोने से किसी के कदमों की आवाज़ आई…


"टक…टक…टक…"


कोई हमारी तरफ आ रहा था।


खलासी ने डर के मारे मेरे कंधे पर हाथ रखा—


"भाई… हमें यहाँ से निकलना होगा!!!"


लेकिन जैसे ही हम भागने के लिए मुड़े…


सामने…


वो लड़की खड़ी थी।


फटे कपड़े, बिखरे बाल… और खाली काली आँखें।


उसका चेहरा एकदम सफेद था…


और होंठों से सिर्फ़ एक ही शब्द निकला—


"रुको!!!"


(जारी…)


वो लड़की कौन थी?


हम वहीं जम गए…


सामने वो लड़की खड़ी थी।


उसकी खाली काली आँखें सीधे हमें घूर रही थीं।

उसके होंठों से खून टपक रहा था,

और बिखरे बाल हवा में उड़ रहे थे।


"रुको!"


उसकी आवाज़ गूँजी।


खलासी सांस रोककर मेरी ओर देखने लगा।


"भाई… ये जिन्दा है या…?"


मैं कुछ बोल पाता, इससे पहले…


लड़की ने आगे कदम बढ़ाया।


"तुम लोग यहाँ क्यों आए हो?"


हम चुप थे।


हमारे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था।


"तुम भी उन्हीं में से हो, जो मेरी बात नहीं मानेंगे?"


लड़की की आवाज़ गहरी और डरावनी हो गई।


"हमें कुछ नहीं पता…"


मैंने हिम्मत करके कहा,


"हम बस यहाँ से निकलना चाहते हैं!"


लड़की ने धीरे से गर्दन घुमाई।

उसकी हड्डियाँ "कटकटकटक" की आवाज़ के साथ मुड़ीं।


"अगर तुमने मंदिर से बाहर जाने की कोशिश की… तो तुम भी इन्हीं लाशों में बदल जाओगे!"


"क..क्या?"


खलासी काँपने लगा।


"इस जगह पर जो भी आता है, वो यहाँ का हिस्सा बन जाता है।"

















लड़की के चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान आ गई।


"तुम लोग भी यहाँ मरोगे…"


"न…नहीं!"


मैंने ज़ोर से चिल्लाया।


मैंने खलासी का हाथ पकड़ा और भागने के लिए मुड़ा…


लेकिन तभी—


सभी लाशों की आँखें खुल गईं!!!


"भाई!!!!"


खलासी ज़ोर से चिल्लाया।


चारों तरफ से बेजान आवाज़ें आने लगीं—


"तुम यहाँ से नहीं जा सकते…"


"तुम अब हमारे हो…"


"हम सब तुम्हारे जैसे ही थे…"


मंदिर की दीवारों से खून बहने लगा…


फर्श पर दरारें पड़ गईं…


और मंदिर हिलने लगा…


हमारे पास बस कुछ ही पल बचे थे!


(जारी…)


मौत का दरवाज़ा


हम चारों तरफ से घिर चुके थे…


सैकड़ों लाशों की खोखली आँखें हमें घूर रही थीं।

मंदिर की दीवारों से खून बहने लगा,

और ज़मीन दरारों में टूट रही थी।


"भाई… अब क्या करें?"


खलासी डर के मारे कंपकंपा रहा था।


"हमें इस लड़की से बचना होगा!"


पर वो लड़की मुस्कुरा रही थी…


उसके होंठों से खून टपक रहा था।


"तुम जा नहीं सकते…"


उसकी आवाज़ गहरी और खौफनाक थी।


"ये मंदिर अब तुम्हारा क़ब्रिस्तान बनने वाला है!"


"नहीं!!!"


मैंने पूरा ज़ोर लगाकर खलासी का हाथ खींचा और मंदिर के दरवाज़े की तरफ दौड़ा।


"भड़ाम!!!!"


दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया।


"भाई… ये अपने आप बंद हो गया?"


खलासी ने काँपते हुए कहा।


हमने दरवाज़े को धक्का दिया,

पर वो टस से मस नहीं हो रहा था।


"तुम जितना भागोगे, तुम्हारी मौत उतनी करीब आएगी।"


लड़की की आवाज़ हमारे कानों में गूँज रही थी।


तभी मंदिर की दीवार पर एक अजीब सा चिह्न चमकने लगा।


वो एक दरवाज़ा था… पर खून से बना हुआ।


"भाई… वो देख!"


खलासी ने उँगली से इशारा किया।


"ये कैसा दरवाज़ा है?"


मुझे समझ नहीं आया कि हमें क्या करना चाहिए।


तभी पीछे से लाशों की झुंड हमारी तरफ बढ़ने लगी…


"भाई… जल्दी कुछ कर!!!"


खलासी ने मेरी बाजू पकड़ ली।


मैंने फैसला कर लिया…


हमारे पास बस एक ही रास्ता बचा था…


हमें उस खून के दरवाज़े के अंदर जाना था!


(जारी…)


खून का दरवाज़ा


हमारे पीछे मौत खड़ी थी…


और सामने वो खून से बना दरवाज़ा।


मंदिर की लाशें धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ रही थीं।

उनकी आँखों से खून बह रहा था और उनके मुँह से अजीब-सी गुर्राहट निकल रही थी।


"भाई, जल्दी फैसला कर!"


खलासी के चेहरे से साफ़ था कि वो अब हिम्मत खो रहा था।


"अगर यहाँ रुके, तो मर जाएंगे…"


मैंने घबराते हुए कहा,


"हमें इस दरवाज़े से जाना होगा!"


पर एक सवाल दिमाग में आया—


अगर हम इस दरवाज़े से गए… तो क्या हम बच जाएंगे?


या… इससे भी बड़ी मुसीबत में फँस जाएंगे?


पर अब सोचने का वक्त नहीं था।


मैंने खलासी का हाथ पकड़ा और तेज़ी से खून के दरवाज़े की तरफ भागा।


"भाई!!! ये ठीक नहीं लग रहा!!!"


खलासी पीछे हटना चाहता था, पर मैंने उसका हाथ और ज़ोर से पकड़ लिया।


जैसे ही हमने दरवाज़े को छुआ—


पूरे मंदिर में ज़ोरदार झटके लगने लगे!!!


दीवारें कंपने लगीं,

छत से पत्थर गिरने लगे,

और मंदिर के अंदर की सारी लाशें दर्द से चीखने लगीं।


"तुम्हें रुकना होगा!"


लड़की की डरावनी आवाज़ फिर गूँजी।


लेकिन बहुत देर हो चुकी थी…


हमने दरवाज़ा पार कर लिया था।


और जैसे ही हम अंदर गए…


सामने जो देखा, उससे हमारी साँसें थम गईं!


हम किसी दूसरी दुनिया में आ चुके थे…


(जारी…)



दूसरी दुनिया


जैसे ही हमने खून का दरवाज़ा पार किया…


सामने का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था!


हम मंदिर में नहीं थे…

बल्कि किसी अजीब, धुंध से ढकी जगह पर खड़े थे।


चारों तरफ़ गाढ़ा काला धुआँ फैला हुआ था।

ज़मीन पर खून की धारियाँ बनी हुई थीं।

और हवा में अजीब-सी बदबू थी… जैसे सड़े हुए मांस की!


"भाई… ये हम कहाँ आ गए?"


खलासी की आवाज़ कांप रही थी।


"मुझे नहीं पता…"


मैंने चारों तरफ़ देखा,

पर कहीं कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था।


"हमें वापस चलना चाहिए!"


खलासी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा…

पर वो दरवाज़ा गायब हो चुका था!


"भाई… दरवाज़ा कहाँ गया?"


हम फँस चुके थे।


तभी दूर से किसी के रोने की आवाज़ आई…


हमने एक-दूसरे को देखा।


"भाई… कोई रो रहा है!"


खलासी ने काँपते हुए कहा।


वो आवाज़ धीरे-धीरे तेज़ होने लगी…


"हमें वहाँ नहीं जाना चाहिए!"


खलासी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।


पर मेरा दिल अजीब दुविधा में था…


क्या हमें उस रोने की आवाज़ की तरफ़ जाना चाहिए?


या हमें बस यहाँ से भागने की कोशिश करनी चाहिए?


पर भागेंगे किधर?


यहाँ तो कोई रास्ता ही नहीं था…


तभी अचानक हमारे पीछे कुछ हिला…


हमने मुड़कर देखा—


एक परछाईं धीरे-धीरे हमारी तरफ़ बढ़ रही थी…


(जारी…)



मौत की परछाईं


हम दोनों बुरी तरह डर चुके थे…


पीछे वो काली परछाईं धीरे-धीरे हमारी तरफ़ बढ़ रही थी।

सामने से किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी।


"भाई… अब क्या करें?"


खलासी ने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया।


"हमें कुछ करना होगा…"


मैंने हिम्मत जुटाने की कोशिश की,

पर मेरे पैरों में जैसे जान ही नहीं थी।


तभी… वो परछाईं और तेज़ी से हमारी तरफ़ आई!


"भागो!!!"


हम दोनों पीछे हटे,

पर हमारे पीछे खून की दलदल थी।


"ये जगह हमें बाहर नहीं जाने देगी…"


मेरे दिमाग़ में बस यही बात घूम रही थी।


तभी अचानक रोने की आवाज़ और तेज़ हो गई।


पर अब वो सिर्फ़ एक आदमी की आवाज़ नहीं थी…

बल्कि कई लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें थीं!


"भाई… हम मर जाएँगे!!!"


खलासी की आँखों में आंसू थे।


"नहीं!!! हमें हार नहीं माननी!"


मैंने खुद को संभाला।


परछाईं अब हमारे बहुत करीब थी…


मैंने नज़रें घुमाईं…

कहीं तो बचने का रास्ता होगा!


और फिर मैंने देखा—


दूर एक टूटा हुआ दरवाज़ा दिख रहा था!


शायद वही हमारा आख़िरी मौका था…


"भागो उस दरवाज़े की तरफ!"


मैंने खलासी का हाथ खींचा और हम दौड़ पड़े।


पर परछाईं ने भी हमें देख लिया था…


और वो हमारी तरफ़ तेज़ी से बढ़ रही थी!


(जारी…)


 आखिरी रास्ता


हम दोनों जान बचाने के लिए दौड़ पड़े…


पीछे वो काली परछाईं भयानक रफ्तार से हमारी तरफ़ आ रही थी।

सामने टूटा हुआ दरवाज़ा दिख रहा था—

पर वहाँ तक पहुँचना इतना आसान नहीं था।


"भाई… ये दरवाज़ा सच में बाहर 










जाने का रास्ता है?"

खलासी ने हांफते हुए पूछा।


"पता नहीं… पर हमारे पास और कोई चारा नहीं!"


हम पूरी ताकत से भाग रहे थे।

परछाईं हमारे पीछे ज़मीन पर अपने काले पंजे फैला रही थी।

उसकी आँखों से लाल रोशनी चमक रही थी।


"तुम बच नहीं सकते…"


"तुम अब हमारे हो चुके हो…"


"रुक जाओ…"


हमारे कानों में डरावनी आवाज़ें गूँजने लगीं।

ऐसा लग रहा था जैसे ये आवाज़ें हमारे दिमाग़ में घुस रही हों।


"भाई… मेरे पैरों में जान नहीं बची!"


खलासी लड़खड़ा गया।


मैंने पीछे मुड़कर देखा—

परछाईं अब हमारे बिल्कुल करीब थी!


"नहीं!!! हिम्मत मत हार!"


मैंने उसे खींचा और पूरी ताकत से दौड़ा।


बस पाँच कदम…


चार…


तीन…


दो…


एक…


"भड़ाम!!!"


हम दोनों ने टूटे हुए दरवाज़े को धक्का दिया…

और जैसे ही अंदर घुसे, दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया!


अंदर अंधेरा था… सन्नाटा था…


और फिर…


एक जानी-पहचानी आवाज़ आई…


"तुम फिर आ गए?"


हम दोनों का खून जम गया…

हमने धीरे-धीरे सिर उठाया—


और सामने जो देखा, उससे हमारे होश उड़ गए!


(जारी…)


 पहचानी हुई आवाज़


"तुम फिर आ गए?"


ये आवाज़…


इतनी जानी-पहचानी क्यों लग रही थी?


हमने धीरे-धीरे सिर उठाया…


और सामने जो देखा, उससे हमारे होश उड़ गए!


सामने वही साधु खड़ा था…


जो हमें पहली बार मंदिर के पास मिला था!


"त… तुम?"


खलासी की आवाज़ कांप रही थी।


"मैंने कहा था, इस रास्ते पर मत आओ…"


साधु की आँखें लाल थीं,

उसके हाथ में रुद्राक्ष की माला थी,

और उसके चेहरे पर क्रोध और निराशा का मिला-जुला भाव था।


"तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"


उसकी आवाज़ गूँज रही थी।


हम दोनों सदमे में थे।

ये कैसे हो सकता था?

हम तो किसी दूसरी दुनिया में फँस चुके थे…

फिर ये साधु यहाँ कैसे पहुँचा?


"हम वापस जाना चाहते हैं…"


मैंने हिम्मत करके कहा।


"अब बहुत देर हो चुकी है…"


साधु ने धीरे से कहा और हमारी आँखों में देखा।


"तुम दोनों… अब इस श्राप का हिस्सा बन चुके हो।"


ये सुनते ही हमारी रूह काँप गई!


खलासी ने रोते हुए कहा,


"नहीं बाबा! हमें बचा लो!"


साधु ने लंबी साँस ली और कहा,


"सिर्फ एक ही रास्ता बचा है… पर वो भी आसान नहीं।"


"क्या?"


मैंने बेचैनी से पूछा।


"तुम्हें श्राप के जन्मस्थान तक जाना होगा… और उसे वहीं खत्म करना होगा।"


"पर वो जगह कहाँ है?"


"जहाँ ये सब शुरू हुआ था… कुलंत पहाड़ी पर!"


ये सुनते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


कुलंत पहाड़ी…

वही पहाड़ी जहाँ कोई जिंदा वापस नहीं आता!


क्या हम बच पाएँगे?


(जारी…)


 कुलंत पहाड़ी की सच्चाई


"कुलंत पहाड़ी?"


हम दोनों के मुँह से एक साथ निकला।


साधु ने सिर हिलाया।


"हाँ… वही जगह जहाँ ये श्राप शुरू हुआ था।"


"पर बाबा, वहाँ तो कोई जिंदा नहीं लौटता!"


खलासी ने कांपती आवाज़ में कहा।


साधु ने हमारी आँखों में देखा और बोला—


"अगर तुमने हिम्मत नहीं दिखाई, तो यहाँ भी नहीं बचोगे!"


"पर कुलंत पहाड़ी पर हमें क्या करना होगा?"


मैंने घबराते हुए पूछा।


साधु ने गहरी सांस ली।


"वहाँ एक पुराना शिव मंदिर है, जो अब खंडहर बन चुका है।"


"उसी मंदिर के गर्भगृह में तुम्हें श्राप की असली जड़ मिलेगी।"


"वो क्या चीज़ है?"


खलासी ने डरते हुए पूछा।


साधु ने धीरे से कहा—


"एक बंद ताबूत…"


हम दोनों सन्न रह गए।

ताबूत?

इसका क्या मतलब था?


"उस ताबूत में क्या है?"


मैंने काँपती आवाज़ में पूछा।


साधु ने हमें घूरकर देखा और कहा—


"वो आत्मा… जिसने इस जगह को श्राप दिया है।"


"क्या?"


हमारी रूह काँप गई।


साधु ने धीरे से कहा,


"अगर तुमने वो ताबूत खोला… तो या तो श्राप खत्म होगा… या तुम दोनों वहीं हमेशा के लिए फँस जाओगे!"


"अब फैसला तुम्हारे हाथ में है…"


"क्या तुम इस डरावनी पहाड़ी पर जाने की हिम्मत करोगे?"


हमें तय करना था—


कुलंत पहाड़ी पर जाना… या हमेशा के लिए इस भूतिया दुनिया में फँस जाना।


(जारी…)


मौत की पहाड़ी


"हमें कुलंत पहाड़ी जाना ही होगा!"


मैंने हिम्मत जुटाकर कहा।


खलासी डर के मारे काँप रहा था।


"भाई… ये जगह वैसे ही खतरनाक है, और अब हम उस पहाड़ी पर जाएँगे, जहाँ कोई जिंदा नहीं लौटता?"


साधु ने गहरी सांस ली और कहा—


"डर तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगा। अगर तुम इस श्राप को खत्म करना चाहते हो, तो तुम्हें जाना ही होगा!"


हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।


"ठीक है… हम तैयार हैं।"


मैंने फैसला कर लिया।


"चलो, जल्दी निकलना होगा।"


साधु ने कहा और हमें एक गुप्त रास्ते की ओर ले चला।


रास्ते में अजीब घटनाएँ होने लगीं…


हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई।


पेड़ खुद-ब-खुद हिल रहे थे, जैसे हमें रोकना चाहते हों।


दूर से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी।



"ये आवाज़ें क्या हैं?"


खलासी ने डरते हुए पूछा।


साधु ने बिना रुके जवाब दिया—


"ये उन्हीं लोगों की आत्माएँ हैं, जो इस श्राप का शिकार हुए थे।"


"तो क्या वो हमें नुकसान पहुँचाएँगी?"


मैंने घबराकर पूछा।


साधु रुक गया और बोला—


"अगर तुम कमजोर पड़े, तो हाँ!"


हम दोनों एक-दूसरे को देखकर सिहर उठे।


आखिरकार, हम कुलंत पहाड़ी के पास पहुँचे।


ये जगह बिल्कुल सुनसान और डरावनी थी।

चारों तरफ़ गहरी धुंध थी।

पेड़ों की टहनियाँ हवा में हिल रही थीं, जैसे किसी ने उन्हें जकड़ रखा हो।

हर तरफ़ भयानक सन्नाटा था, जो और डरावना लग रहा था।


साधु ने इशारा किया—


"वो देखो… शिव मंदिर!"


हमने मंदिर की तरफ़ देखा… और हमारी रूह काँप गई!


मंदिर के ऊपर कई काली परछाइयाँ घूम रही थीं…

और वहाँ से अजीब-सी गूंजती हुई आवाज़ें आ रही थीं।


खलासी का चेहरा सफेद पड़ गया।


"भाई… ये जगह तो मौत से भी ज्यादा खतरनाक लग रही है!"


मैंने खुद को संभाला और धीरे से कहा—


"अब वापस जाने का कोई रास्ता नहीं… हमें अंदर जाना ही होगा!"


(जारी…)


मंदिर के अंदर


"अब कोई पीछे नहीं हट सकता!"


साधु की आवाज़ गूँज रही थी।


हमने एक-दूसरे को देखा और शिव मंदिर की ओर बढ़ने लगे।


मंदिर के गेट पर अजीब-सी आकृतियाँ हिल रही थीं…


हवा बेहद ठंडी हो चुकी थी।






















मंदिर की दीवारों से रहस्यमयी मंत्रों की गूँज आ रही थी।


हर कदम पर ऐसा लग रहा था कि कोई हमें देख रहा है।



"बाबा, ये परछाइयाँ क्या हैं?"


खलासी ने काँपते हुए पूछा।


साधु ने गहरी आवाज़ में कहा—


"ये उन आत्माओं के अंश हैं, जो इस श्राप के कारण मुक्त नहीं हो पाईं।"


हम दोनों का डर और बढ़ गया!


जैसे ही हमने मंदिर के अंदर कदम रखा…


धड़ाम!


मंदिर के मुख्य द्वार के पीछे से बड़ा सा पत्थर गिरा… और रास्ता बंद हो गया!


हम तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।


अब हमारे पास सिर्फ एक ही रास्ता था—आगे बढ़ना!


मंदिर के अंदर माहौल और भी भयानक था…


चारों तरफ़ अजीब-अजीब चित्र बने थे।


मिट्टी से सने खंडहरों के बीच टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं।


हवा में एक अजीब-सा धुआँ फैला था, जिससे हल्की जलन महसूस हो रही थी।



"बाबा, अब क्या करना होगा?"


मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा।


साधु ने इशारा किया—


"मंदिर के गर्भगृह में चलो… वहीं वो ताबूत रखा होगा!"


हम तीनों धीरे-धीरे अंदर बढ़ने लगे।


जैसे ही हमने गर्भगृह के दरवाजे के पास कदम रखा…


एक भयानक चीख पूरे मंदिर में गूँज उठी!


"रुको…!!!"


हमारी रूह काँप गई!


वो आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी…


मंदिर में अब कोई और भी था…!


(जारी…)


 मौत का ताबूत


"रुको…!!!"


वो आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी…


हम तीनों सहम गए।

मंदिर की दीवारों पर अजीब सायों की हलचल होने लगी।


"बाबा, ये कौन है?"


खलासी की आवाज़ काँप रही थी।


साधु ने गहरी सांस ली और कहा—


"यही श्राप की असली शक्ति है… हमें जल्दी करनी होगी!"


हमने गर्भगृह के दरवाजे की ओर देखा।


दरवाजा खुद-ब-खुद खुलने लगा… अंदर अंधेरा था।


और वहाँ बीच में एक ताबूत रखा था!


"यही है वो ताबूत?"


मैंने कांपती आवाज़ में पूछा।


साधु ने सिर हिलाया।


"हाँ… और इसके अंदर वो आत्मा बंद है, जिसने इस जगह को श्राप दिया है!"


अचानक ताबूत खुद-ब-खुद हिलने लगा…!


और फिर… एक खौफनाक चीख मंदिर में गूँज उठी!!!


"अगर तुमने इसे खोलने की कोशिश की… तो तुम्हारी आत्माएँ भी इसी में बंद हो जाएँगी!!!"


हम तीनों का खून जम गया।


आवाज़ ताबूत के अंदर से आ रही थी…!


अब हमें फैसला करना था—


क्या ताबूत खोलना चाहिए?


या यहाँ से भाग जाना चाहिए?



लेकिन क्या हम सच में भाग सकते थे…?


(समाप्त… या फिर यह अंत नहीं?)


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