Jodhpur highway Trunk Driver ki aapbiti || Vk horror ||
जोधपुर हाईवे ट्रक ड्राइवर की खौफनाक आपबीती।
सफर की शुरुआत
रात का सन्नाटा और जोधपुर हाईवे
रात का अंधेरा धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। दूर तक फैला जोधपुर हाईवे वीरान पड़ा था। कहीं-कहीं सड़क किनारे जलते बल्ब की रोशनी से धुंधली परछाइयाँ बन रही थीं। हल्की ठंडी हवा में दूर किसी मंदिर की घंटी की आवाज़ रह-रहकर सुनाई दे रही थी।
ट्रक ड्राइवर 'रामलाल' और उसका खलासी 'फैज़ल'
रामलाल एक साधारण ट्रक ड्राइवर था, जो पिछले 15 सालों से राजस्थान की सड़कों पर अपना ट्रक दौड़ा रहा था। घर में बूढ़ी माँ, पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। हर महीने की कमाई मुश्किल से घर खर्च चलाने लायक होती थी। उधर फैज़ल भी कम उम्र में ही अपने घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ उठा चुका था। उसके अब्बू बीमार रहते थे, और उसकी छोटी बहन की शादी की फिक्र उसे हर दिन सताती थी।
दोनों का रिश्ता सिर्फ मालिक और नौकर का नहीं था, बल्कि एक सच्ची दोस्ती का था। वे हर सफर में एक-दूसरे का सहारा बनते।
"आज लंबा सफर है फैज़ल, तुझे नींद आए तो बता देना, मैं ट्रक रोक दूँगा," रामलाल ने सिगरेट जलाते हुए कहा।
"अरे रामभाई, अब तक कितने सफर किए हैं, नींद भी ट्रक की खड़खड़ाहट में ही आती है," फैज़ल ने हँसते हुए जवाब दिया।
रामलाल मुस्कुराया और ट्रक को एक्सीलेरेटर देते हुए सड़क पर आगे बढ़ा दिया।
पहला अजीब इशारा
रात के करीब 1 बजे वे एक सुनसान इलाके से गुजर रहे थे, जब अचानक ट्रक के सामने एक परछाईं उभरी।
"भाईजान, आगे कोई खड़ा है!" फैज़ल ने घबराकर कहा।
रामलाल ने झट से ब्रेक लगाया। ट्रक की हेडलाइट की तेज़ रोशनी में देखा तो सड़क पर कोई नहीं था।
"अरे, तू भी न! थका हुआ होगा, नींद का धोखा लग रहा होगा," रामलाल ने कहा।
लेकिन फैज़ल जानता था कि उसने किसी को सड़क पार करते देखा था।
"रामभाई, ये जगह कुछ अजीब नहीं लग रही?"
रामलाल ने इधर-उधर देखा। आस-पास दूर तक कोई गाँव नहीं था, न कोई दुकान, न कोई इंसान। बस वीरान सड़क और घना अंधेरा।
उन्होंने ट्रक फिर से आगे बढ़ा दिया, लेकिन दोनों के मन में एक अजीब सा डर घर कर गया था।
हॉरर का पहला संकेत
करीब आधे घंटे बाद जब वे हाईवे पर एक पुलिया के पास पहुंचे, तो ट्रक अचानक ज़ोर से झटका खाकर रुक गया।
"अबे! ये क्या हुआ?" रामलाल झल्लाया।
फैज़ल नीचे उतरा और बोनट खोलकर देखने लगा। इंजन में कोई खराबी नहीं थी, लेकिन ट्रक किसी अनदेखी ताकत से जैसे जाम हो गया था।
तभी...
पीछे से एक धीमी हँसी की आवाज़ आई।
दोनों के रोंगटे खड़े हो गए।
उन्होंने पीछे देखा, पर वहाँ कोई नहीं था।
"रामभाई... यहाँ से निकलते हैं!" फैज़ल की आवाज़ काँप रही थी।
रामलाल ने हिम्मत करके ट्रक स्टार्ट करने की कोशिश की। एक बार... दो बार... और तीसरी बार में ट्रक ज़ोर से झटका खाकर स्टार्ट हो गया।
वे दोनों बिना कुछ बोले ट्रक आगे बढ़ा चुके थे, लेकिन अब सफर पहले जैसा नहीं रहा।
कहीं कुछ ग़लत था...
क्या ट्रक सच में किसी अनदेखी ताकत से घिर चुका था? आगे क्या होने वाला था? जानने के लिए बने रहिए इस खौफनाक सफर में...
ट्रक अपनी पूरी रफ्तार में हाईवे पर दौड़ रहा था, लेकिन रामलाल और फैज़ल के मन में अजीब सा डर बैठ गया था। अभी कुछ देर पहले जो हुआ था, वह महज़ कोई इत्तेफाक नहीं लग रहा था।
"रामभाई, आपने भी वो हँसी सुनी थी ना?" फैज़ल ने धीमी आवाज़ में पूछा।
रामलाल ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस सड़क पर ध्यान लगाए रखे हुए था।
"रामभाई?"
"हूँ... सुनी थी... लेकिन सोच रहा हूँ, शायद हवा का कोई खेल हो। वैसे भी रात का वक़्त है, दिमाग़ भी थका हुआ होगा।"
लेकिन दोनों को एहसास था कि ये कोई मामूली बात नहीं थी।
एक और अजीब घटना
घड़ी में रात के 2 बज चुके थे। हाईवे अब भी सुनसान था।
रामलाल ने अचानक महसूस किया कि ट्रक का स्टेयरिंग थोड़ा भारी हो गया है, जैसे कोई ज़बरदस्ती उसे किसी और दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा हो।
"ये क्या हो रहा है..." उसने खुद से बुदबुदाते हुए स्टेयरिंग को कसकर पकड़ लिया।
तभी फैज़ल की नज़र ट्रक के साइड मिरर पर पड़ी और उसका चेहरा फक पड़ गया।
"रामभाई... शीशे में देखो!"
रामलाल ने झट से साइड मिरर देखा, और उसकी भी आँखें हैरान रह गईं।
ट्रक के पीछे कोई चल रहा था।
न कोई गाड़ी, न कोई इंसान... बल्कि एक परछाई।
परछाई का पीछा
रामलाल ने ट्रक की स्पीड बढ़ा दी, लेकिन वो परछाई अब भी पीछे थी।
"ये क्या चीज़ है भाई? इंसान तो ऐसे नहीं भाग सकता!" फैज़ल लगभग चीख पड़ा।
रामलाल अब ट्रक को 80-90 की स्पीड पर चला रहा था, लेकिन परछाई उनकी बराबरी में आ रही थी।
फिर अचानक...
परछाई ने एक ऊँची छलांग लगाई और ट्रक के ऊपर कूद गई।
"धड़ाम!"
ट्रक के ऊपर किसी के गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई।
अब रामलाल और फैज़ल की साँसें तेज़ हो गई थीं।
"कोई ट्रक के ऊपर है!" फैज़ल ने काँपती आवाज़ में कहा।
अचानक सन्नाटा
रामलाल ने ट्रक रोकने का फैसला किया।
जैसे ही ट्रक रुका, सब कुछ अचानक शांत हो गया।
कोई आवाज़ नहीं...
कोई हरकत नहीं...
बस हाईवे पर गहरा सन्नाटा।
रामलाल और फैज़ल एक-दूसरे को देखने लगे।
"अबे, ऊपर जाकर देखता हूँ..." फैज़ल ने हिम्मत जुटाई।
"नहीं! तू मत जा!" रामलाल ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन तब तक फैज़ल ट्रक के दरवाजे से बाहर निकल चुका था।
ट्रक के ऊपर कौन था?
फैज़ल धीरे-धीरे ट्रक के ऊपर चढ़ा। उसकी टॉर्च की रोशनी चारों तरफ घुमा रही थी।
लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।
"रामभाई, यहाँ कुछ भी नहीं है..." फैज़ल ने ऊपर से कहा।
लेकिन तभी...
उसके पीछे कोई था।
वह धीरे-धीरे साँस ले रहा था...
फैज़ल को अपने गर्दन के पीछे ठंडी हवा महसूस हुई...
उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई...
और जो उसने देखा, उससे उसकी चीख निकल गई!
क्या फैज़ल की जान बच पाएगी? ट्रक के ऊपर कौन था? इस खौफनाक सफर का अंत क्या होगा?
फैज़ल ने जैसे ही अपनी गर्दन पीछे घुमाई, उसकी आँखें हैरान रह गईं।
ट्रक की छत पर एक औरत बैठी थी।
लंबे बिखरे बाल, सूखी हुई झुर्रियों से भरा चेहरा, और आँखें... वो आँखें जो बिल्कुल काली थीं,
उनमें कोई सफेदी नहीं थी।
फैज़ल की आवाज़ गले में अटक गई।
"अल्लाह..."
वह कुछ कह पाता, इससे पहले ही औरत ने अपना सिर झुका लिया और धीरे-धीरे घुटनों के बल खिसकती हुई उसकी तरफ बढ़ने लगी।
फैज़ल का पूरा शरीर कांप उठा।
रामलाल की बेचैनी
रामलाल ट्रक के अंदर बैठा सब देख रहा था।
उसे फैज़ल की टॉर्च की हल्की-हल्की रोशनी अब भी दिख रही थी, लेकिन उसके बाद जो हुआ, उसने उसे पसीने से तर कर दिया।
फैज़ल की टॉर्च हवा में उछली और नीचे गिर पड़ी।
उसके बाद... सन्नाटा।
"फैज़ल! नीचे आ बे!" रामलाल ने चिल्लाया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
अब उसकी हिम्मत जवाब देने लगी थी।
"यहीं खड़ा रहूँ, या ऊपर जाकर देखूँ?"
लेकिन अगले ही पल, उसके सामने कुछ ऐसा हुआ कि उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
ट्रक की छत से गिरा कुछ…
"धड़ाम!"
ट्रक की छत से कुछ गिरा और सामने सड़क पर औंधे मुँह पड़ा था।
रामलाल की आँखें चौड़ी हो गईं।
वह धीरे-धीरे ट्रक से बाहर निकला और आगे बढ़ा।
सड़क पर फैज़ल पड़ा था।
रामलाल ने जैसे ही उसे पलटा, फैज़ल की आँखें खुलीं और उसने हांफते हुए कहा—
"ट..ट..ट्रक... के ऊपर... मत जाना...!"
रामलाल ने तुरंत उसका हाथ पकड़कर उसे उठाया और ट्रक में बैठा दिया।
"क्या हुआ? कौन था ऊपर?"
लेकिन फैज़ल की हालत इतनी खराब थी कि वह बस कांप रहा था और हांफ रहा था।
फिर अचानक...
ट्रक के ऊपर कोई चलने लगा।
"टप... टप... टप..."
जैसे कोई धीरे-धीरे घूम रहा हो।
रामलाल और फैज़ल दोनों ने छत की ओर देखा।
भूतनी की झलक
चांदनी की हल्की रोशनी में, ट्रक के ऊपर कोई खड़ा था।
वही औरत।
इस बार वह घुटनों के बल नहीं, बल्कि सीधे खड़ी थी, और उनके ठीक ऊपर देख रही थी।
रामलाल ने घबराकर इंजन स्टार्ट किया और ट्रक को तेजी से भगाना शुरू कर दिया।
लेकिन...
वो औरत ट्रक के साथ-साथ भाग रही थी!
"भाई, ये क्या चीज़ है? इंसान ऐसे भाग नहीं सकते!" फैज़ल ने चीखते हुए कहा।
रामलाल ने ट्रक की स्पीड 100 से ऊपर कर दी।
परछाई अब भी साथ भाग रही थी।
फिर अचानक...
ट्रक की लाइट्स बंद हो गईं!
काली रात, काला हाईवे
ट्रक पूरी तरह अंधेरे में डूब चुका था।
रामलाल और फैज़ल को अब सड़क भी नहीं दिख रही थी।
"हे भगवान! अब क्या करें?"
रामलाल ने जैसे ही ब्रेक मारने की कोशिश की, ट्रक के अंदर की लाइट जली और सामने जो उन्होंने देखा, उसने उनकी रूह कंपा दी।
वो औरत अब ट्रक के सामने खड़ी थी!
वह हवा में तैर रही थी, उसके पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर थे।
उसकी आँखों से खून टपक रहा था।
फिर उसने अपना मुँह खोला...
और एक दिल दहला देने वाली चीख निकली—
"तुम लोग यहाँ क्यों आए हो?"
अब क्या होगा?
क्या रामलाल और फैज़ल इस मुसीबत से बच पाएँगे?
ट्रक के ऊपर आई इस रहस्यमयी आत्मा का राज़ क्या है?
रामलाल ने घबराकर ट्रक को रोकने की कोशिश की, लेकिन ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया था।
ट्रक रुक ही नहीं रहा था!
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
फैज़ल ने कांपते हुए पीछे मुड़कर देखा, लेकिन जो उसने देखा, वह और भी डरावना था—
ट्रक के अंदर, ठीक पिछली सीट पर, वह औरत बैठी थी!
सिर झुका हुआ, लंबे बाल चेहरे को ढके हुए, और बर्फ जैसी सफेद उंगलियाँ धीरे-धीरे कांप रही थीं।
फैज़ल की चीख निकल गई—
"रामू भाई! वो... वो अंदर आ गई!"
ट्रक की भयानक चीख
रामलाल ने जैसे ही पीछे देखा, उसकी सांसें रुक गईं।
उस औरत ने अपना चेहरा ऊपर किया...
उसकी आँखों में खून था।
और अगले ही पल...
ट्रक के अंदर एक जोरदार चीख गूंज उठी!
"AAAAAAAAAHHHHHHHH!!!!"
ट्रक की खिड़कियों के शीशे अपने आप फूटने लगे।
हवा अचानक इतनी भारी हो गई कि सांस लेना मुश्किल हो गया।
फैज़ल ने जल्दी से अपने हाथ से कान बंद कर लिए, लेकिन वह चीख सीधे उसके दिमाग में घुस रही थी।
रामलाल का सिर चकराने लगा...
उसने ट्रक पर नियंत्रण खो दिया...
और फिर...
"धड़ाम!"
खून से सना ट्रक
ट्रक सीधा एक पुराने पेड़ से जा टकराया।
चारों तरफ धूल का गुबार उठ गया।
रामलाल का सिर स्टेयरिंग से टकराया और खून बहने लगा।
फैज़ल भी सीट से नीचे गिर पड़ा था।
दोनों कुछ देर तक हिल नहीं सके।
फिर धीरे-धीरे, फैज़ल ने कांपते हुए अपने हाथ से शीशे का टुकड़ा हटाया और रामलाल को झकझोरते हुए कहा—
"भाई... उठो... यहाँ से भागना पड़ेगा!"
रामलाल ने दर्द से कराहते हुए आँखें खोलीं, लेकिन उसकी नज़र फैज़ल के पीछे पड़ी और उसकी पूरी बॉडी सुन्न हो गई।
"फै... फैज़ल..."
फैज़ल ने डरते हुए पीछे देखा।
वो औरत अब ट्रक के बिल्कुल पास खड़ी थी।
लेकिन इस बार...
उसके हाथों में एक झूला हुआ इंसानी सिर था।
रहस्यमयी हत्या का सुराग
फैज़ल और रामलाल अपनी जगह जमे रह गए।
वह औरत धीरे-धीरे ट्रक के अंदर आने लगी।
उसके कदमों से अजीब सी धुंध उठ रही थी।
फिर उसने अपने हाथ में पकड़े कटे हुए सिर को उठाया और दोनों की तरफ बढ़ाया।
सिर की आँखें खुली थीं, और मुँह हल्के से हिल रहा था...
"मुझे बचाओ..."
फैज़ल का दिमाग सुन्न हो गया।
"भाई, ये क्या हो रहा है?"
लेकिन रामलाल की आँखें उस कटे हुए सिर को पहचान गईं।
"ये... ये वही है..."
फैज़ल ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"कौन भाई?"
रामलाल ने कांपते हुए कहा—
"ये वही आदमी है जो तीन साल पहले इसी सड़क पर मारा गया था!"
कातिल कौन था?
रामलाल की बात सुनकर फैज़ल का दिमाग चकरा गया।
"मतलब? कौन मारा गया था?"
रामलाल ने काँपते हुए कहा, "तीन साल पहले, इस सड़क पर एक ट्रक ड्राइवर का मर्डर हुआ था। उसका सिर काट दिया गया था, लेकिन उसका शरीर कभी नहीं मिला।"
फैज़ल की रूह कांप गई।
"तो... तो ये क्या चाहती है?"
तभी अचानक, वो औरत ज़ोर से चीख़ी—
"उनका खून... अभी तक सूखा नहीं है!"
और फिर एक ज़ोरदार धमाका हुआ...
पूरी सड़क खून से लाल हो गई!
अब क्या होगा?
क्या रामलाल और फैज़ल इस भूतिया राज़ से बच पाएँगे?
इस सड़क पर क्या हुआ था तीन साल पहले?
ट्रक के चारों ओर पसरा खून धीरे-धीरे जमीन में समा रहा था।
रामलाल और फैज़ल अभी भी सुन्न बैठे थे।
उस औरत की भयानक चीख के बाद सबकुछ शांत हो गया था, लेकिन उस शांति में भी एक अजीब सा डर समाया हुआ था।
फैज़ल ने कांपते हुए कहा, "भाई, अब हमें यहाँ से भागना चाहिए।"
रामलाल ने धीरे से सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखें अभी भी डर से फैली हुई थीं।
"ये औरत कौन है?"
फैज़ल ने एक नज़र उस जगह डाली जहाँ वह औरत खड़ी थी।
अब वहाँ सिर्फ अंधेरा था।
लेकिन ट्रक के सामने वाली मिट्टी पर कुछ उभरा हुआ था...
खून से लिखा संदेश
रामलाल ने हिम्मत जुटाई और ट्रक से बाहर निकला।
उसने नीचे झुककर देखा।
मिट्टी पर खून से कुछ लिखा था—
"उसे ढूँढो, वरना तुम भी मरोगे!"
रामलाल का शरीर झनझना उठा।
फैज़ल ने घबराकर कहा, "भाई, इसका मतलब क्या है?"
रामलाल ने एक लंबी साँस ली और धीमे स्वर में बोला, "हम जिस ट्रक को चला रहे हैं... शायद ये भी उसी क़ातिल का कोई सुराग छुपाए हुए है।"
फैज़ल के गले से आवाज़ नहीं निकली।
"मतलब?"
रामलाल ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं और फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—
"तीन साल पहले..."
तीन साल पहले की वो खौफनाक रात
"ये वही हाईवे है जहाँ तीन साल पहले एक ट्रक ड्राइवर का कत्ल हुआ था।
मैंने सुना था कि उसका सिर काट दिया गया था, लेकिन उसका शरीर कभी नहीं मिला।"
फैज़ल के रोंगटे खड़े हो गए।
"लेकिन भाई, ये सब हमारा ट्रक से क्या लेना-देना?"
रामलाल ने गहरी साँस ली, "क्योंकि फैज़ल... ये ट्रक पहले उसी ड्राइवर का था!"
फैज़ल के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
"क... क्या?"
रामलाल ने सिर हिलाया, "हाँ... ये ट्रक पहले उस ड्राइवर के पास था। उसके मरने के बाद, किसी और ने इसे खरीद लिया, फिर किसी और ने... और फिर ये हमारे पास आ गया।"
फैज़ल को चक्कर आने लगा।
"मतलब हम उसी श्रापित ट्रक में सफर कर रहे हैं?"
क्या हुआ था उस रात?
रामलाल ने सिर हिलाया, "कोई नहीं जानता कि उस ड्राइवर को किसने मारा। बस ये सुना था कि वो किसी से बहुत डरा हुआ था।"
फैज़ल ने घबराकर पूछा, "किससे?"
रामलाल ने अपने होठों पर ज़बान फेरी, "कहते हैं कि उसने रात के अंधेरे में किसी को लिफ्ट दी थी... और वो इंसान नहीं था!"
फैज़ल की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
"मतलब... उसने किसी आत्मा को बिठाया था?"
रामलाल ने सिर झुकाकर कहा, "और शायद... वो आज भी हमारे ट्रक में मौजूद है!"
ट्रक के अंदर छुपा डरावना सच
तभी अचानक, ट्रक का इंजन अपने आप चालू हो गया!
रामलाल और फैज़ल ने हड़बड़ाकर ट्रक की तरफ देखा।
ट्रक अपने आप स्टार्ट हो चुका था!
लेकिन कोई अंदर नहीं था।
फैज़ल के मुँह से हल्की चीख निकल गई।
"भाई... ये अपने आप कैसे?"
रामलाल ने काँपते हुए ट्रक के अंदर झाँका।
और तभी...
पीछे की सीट से किसी के हँसने की आवाज़ आई!
"हुह... हुह... हुह..."
रामलाल और फैज़ल के चेहरे का रंग उड़ गया।
पीछे वाली सीट पर एक परछाईं हिल रही थी!
"अब बारी तुम्हारी है..."
अब क्या होगा?
ट्रक में बैठी वो परछाईं कौन थी?
क्या वो तीन साल पुराने क़त्ल का कोई सुराग था?
ट्रक के अंदर जो हँसी की आवाज़ आ रही थी, वो अब गूंजने लगी थी।
"हुह... हुह... हुह..."
रामलाल और फैज़ल दोनों के पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी।
फैज़ल ने कांपते हुए रामलाल का हाथ पकड़ लिया, "भाई, ये कोई मज़ाक नहीं है, हमें यहाँ से भागना चाहिए!"
रामलाल की नज़र ट्रक के रियर-व्यू मिरर पर पड़ी।
मिरर में पीछे की सीट पर कोई बैठा था।
लेकिन जब उसने सीधा मुड़कर देखा—
पीछे कुछ भी नहीं था!
परछाईं का खेल
"ये... ये कैसे हो सकता है?"
रामलाल ने झटके से मिरर की तरफ दोबारा देखा।
वहाँ फिर से एक परछाईं दिखाई दी।
फैज़ल ने डरकर अपनी आँखें बंद कर लीं, "भाई, ये सब हमारे साथ ही क्यों हो रहा है?"
रामलाल को लगा जैसे उसकी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई हो।
"शायद... शायद ये ट्रक हमें कुछ बताना चाहता है।"
फैज़ल ने काँपते होंठों से कहा, "क्या?"
पुरानी सीट का रहस्य
रामलाल ने धीरे-धीरे ट्रक के पीछे की सीट को टटोला।
उसकी उंगलियाँ सीट के एक कोने पर अटक गईं।
कुछ वहाँ फँसा हुआ था।
उसने धीरे-धीरे सीट की सिलाई को खोलने की कोशिश की।
जैसे ही सीट का कपड़ा हटा—
एक पुरानी, जली हुई डायरी मिली।
फैज़ल ने घबराकर पूछा, "ये क्या है?"
रामलाल ने उस डायरी को उठाया।
उसका कवर आधा जल चुका था, लेकिन उस पर हल्के अक्षरों में लिखा था—
"रवि त्रिपाठी"
ट्रक का पहला मालिक
रामलाल का दिल जोर से धड़कने लगा।
"रवि त्रिपाठी... ये वही ड्राइवर है जो तीन साल पहले मारा गया था!"
फैज़ल ने डर से सिर हिलाया, "मतलब उसकी डायरी हमारे ट्रक में छुपाई गई थी?"
रामलाल ने जल्दी से डायरी के पहले पन्ने को खोला।
"8 जुलाई 2022— आज मैंने वो देख लिया, जो नहीं देखना चाहिए था।"
फैज़ल ने सवाल किया, "क्या मतलब?"
रामलाल ने पन्ने पलटे—
"मैंने हाईवे पर एक औरत को लिफ्ट दी थी। उसके पैर उल्टे थे!"
फैज़ल का गला सूख गया।
"भाई... ये वही औरत तो नहीं जो हमने अभी देखी थी?"
डायरी के आखिरी शब्द
रामलाल ने जल्दी-जल्दी डायरी के आखिरी पन्ने को पढ़ा।
"अगर कोई ये डायरी पढ़ रहा है, तो जान लो कि ये ट्रक श्रापित हो चुका है। ये तुम्हें भी मार डालेगा। मुझे माफ़ करना, लेकिन अब मैं बच नहीं सकता..."
रामलाल और फैज़ल के शरीर से जैसे सारी ताकत निकल गई।
फैज़ल ने फुसफुसाते हुए कहा, "भाई, हमें तुरंत इस ट्रक को छोड़ देना चाहिए!"
रामलाल ने एक पल सोचा।
"नहीं... अब हमें ये पता लगाना होगा कि रवि त्रिपाठी के साथ क्या हुआ था।"
फैज़ल ने चौंककर कहा, "पर भाई, अगर उसने ये लिखा है कि ट्रक श्रापित है, तो..."
तभी अचानक...
ट्रक की लाइटें अपने आप जल उठीं!
हवा में एक हल्की सरसराहट गूंजने लगी।
फैज़ल ने कांपते हुए कहा, "भाई... हमें यहाँ से निकलना चाहिए!"
लेकिन रामलाल अब ठान चुका था—
"पहले इस राज़ को खोलना होगा!"
अब आगे क्या होगा?
कौन थी वो औरत जिसे रवि त्रिपाठी ने लिफ्ट दी थी?
क्या सच में ट्रक श्रापित था?
क्या रामलाल और फैज़ल इस रहस्य को सुलझा पाएंगे?
रामलाल और फैज़ल के हाथ में वह जली हुई डायरी थी, जिसमें कुछ ऐसा छुपा था, जो उनके रोंगटे खड़े कर रहा था।
ट्रक के अंदर अजीब सी खामोशी थी, लेकिन बाहर हवा सरसराने लगी थी।
फैज़ल ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाई, इस डायरी को हमें फेंक देना चाहिए। ये अशुभ चीज़ है!"
लेकिन रामलाल ने सिर हिलाया, "नहीं, हमें पहले इसे पूरा पढ़ना होगा।"
रवि त्रिपाठी का आखिरी सफर
रामलाल ने डायरी का अगला पन्ना खोला—
"15 जुलाई 2022— मैंने उस औरत को फिर से देखा।"
फैज़ल ने जल्दी से पूछा, "कौन सी औरत?"
रामलाल ने धीरे से पढ़ा—
"वही, जिसे मैंने लिफ्ट दी थी। लेकिन इस बार वो सड़क के किनारे नहीं खड़ी थी... वो मेरे ट्रक के अंदर थी!"
फैज़ल की सांसें थम गईं, "मतलब?"
"मैंने उसे लिफ्ट नहीं दी थी, फिर भी वो मेरे ट्रक में बैठी थी।"
"भाई, ये सब बहुत अजीब हो रहा है..." फैज़ल ने घबराकर कहा।
लेकिन इससे पहले कि वे और कुछ समझ पाते—
ट्रक का हॉर्न अचानक अपने आप बज उठा!
खौफ का साया
रामलाल और फैज़ल ने चौंककर देखा।
ट्रक अपने आप स्टार्ट हो गया था!
स्टेयरिंग व्हील धीरे-धीरे खुद-ब-खुद घूमने लगा।
रामलाल ने हड़बड़ाकर चाबी घुमाई, लेकिन ट्रक बंद नहीं हुआ।
फैज़ल चिल्लाया, "भाई, यहाँ से भागो!"
लेकिन जैसे ही वे दरवाजा खोलने लगे—
ट्रक के शीशे पर किसी ने बाहर से खून से लिखा— "अब तुम्हारी बारी है!"
दोनों का खून जम गया।
फैज़ल लगभग रोने लगा, "भाई, ये जगह छोड़ दो!"
रामलाल ने पूरी ताकत लगाकर ट्रक के ब्रेक दबाए, और एक झटके से ट्रक रुक गया।
रहस्यमयी औरत की परछाई
दोनों ने जल्दी से ट्रक से बाहर छलांग लगा दी।
लेकिन तभी, ट्रक के सामने सड़क पर किसी की परछाई दिखी।
वो कोई इंसान नहीं था।
वो वही औरत थी— सफेद साड़ी में, बिखरे बाल, और आँखों में अजीब सा खून जैसा लालपन!
फैज़ल के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"भ...भाई, ये वही औरत है..."
रामलाल ने भी उसे देख लिया।
लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कर पाते—
वो औरत हवा में उड़ने लगी और देखते ही देखते ट्रक के ऊपर जा बैठी!
रामलाल और फैज़ल की सांसें थम गईं।
"अब क्या करें?"
फैज़ल ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाई, ये जगह शापित है... हमें यहाँ से भाग जाना चाहिए!"
लेकिन रामलाल की नज़र फिर डायरी पर गई।
आखिरी पन्ने पर कुछ लिखा था—
"अगर ये औरत तुम्हारे ट्रक पर चढ़ जाए, तो समझ लो, मौत तुम्हारे बेहद करीब है!"
मौत का खेल शुरू
अचानक ट्रक के दरवाजे अपने आप खुल गए।
भीतर से किसी के रोने की आवाज़ आने लगी।
रामलाल और फैज़ल बुरी तरह डर चुके थे, लेकिन अब उनके पास दो ही रास्ते थे—
या तो वे इस रहस्य को सुलझाएं,
या फिर इस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दें।
रामलाल ने दृढ़ आवाज़ में कहा, "अब जो होगा, देखेंगे। मैं ये रहस्य सुलझाए बिना नहीं जाऊँगा!"
लेकिन क्या ये उनकी सबसे बड़ी गलती थी?
रामलाल और फैज़ल के चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा था। ट्रक का दरवाजा अपने आप खुल गया था और भीतर से किसी के सुबकने की आवाज़ आ रही थी।
फैज़ल ने डरकर कहा, "भाई, मत जाओ अंदर! ये जगह ठीक नहीं लग रही!"
लेकिन रामलाल ने बिना कुछ बोले ट्रक की ओर कदम बढ़ाया।
जैसे ही उसने ट्रक के अंदर झाँका, उसकी आँखें फटी रह गईं।
ट्रक की ड्राइविंग सीट पर कोई बैठा था...
एक परछाई!
ड्राइवर की कब्र?
रामलाल के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
वो कोई इंसान नहीं था।
उसका चेहरा काला था, आँखों में लाल चमक, और उसके शरीर से धुआँ निकल रहा था।
रामलाल ने कांपती आवाज़ में पूछा, "त...तू कौन है?"
परछाई ने धीरे से सिर घुमाया और फुसफुसाई—
"तुम यहाँ से भाग नहीं सकते..."
फैज़ल ने डरकर रामलाल को खींच लिया, "भाई, पीछे हटो!"
लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कर पाते—
ट्रक के अंदर ज़ोरदार झटके लगने लगे!
मौत का जाल
ट्रक हिलने लगा, जैसे किसी अदृश्य ताकत ने उसे जकड़ लिया हो।
दरवाजे खुद-ब-खुद बंद हो गए!
रामलाल और फैज़ल फँस चुके थे।
अचानक ट्रक का रेडियो अपने आप ऑन हो गया और उसमें से एक अजीब-सी आवाज़ आने लगी—
"क्यों आए हो यहाँ? तुम्हें नहीं पता... इस ट्रक में कौन रहता है?"
फैज़ल कांपते हुए बोला, "भाई, हमें यहाँ से निकलना होगा!"
रामलाल ने पूरी ताकत से दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वो टस से मस नहीं हुआ।
तभी—
ट्रक के शीशे पर खून से लिखा जाने लगा— "ये ट्रक तुम्हारी कब्र बनेगा!"
दोनों की धड़कनें तेज़ हो गईं।
भूतिया सफर शुरू
अचानक ट्रक अपने आप स्टार्ट हो गया।
क्लच, एक्सीलेटर, सब अपने आप दब रहे थे!
रामलाल और फैज़ल को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
ट्रक तेजी से हाईवे पर दौड़ने लगा... बिना किसी ड्राइवर के!
फैज़ल लगभग रोते हुए बोला, "भाई, अब तो बस अल्लाह ही बचाएगा!"
रामलाल ने ट्रक रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन ब्रेक फेल हो चुके थे।
तभी, अचानक...
सामने हाईवे पर वही औरत खड़ी थी— सफेद साड़ी में, बिखरे बाल, बिना आँखों के गड्ढे!
ट्रक सीधे उसी की ओर जा रहा था!
क्या ये अंत है?
रामलाल और फैज़ल के पास कोई चारा नहीं था।
क्या ट्रक औरत से टकराएगा? या कोई और खौफनाक सच सामने आएगा?
रामलाल और फैज़ल की चीखें ट्रक के अंदर गूंज रही थीं।
ट्रक बेकाबू होकर सफेद साड़ी वाली उस औरत की ओर बढ़ रहा था।
रामलाल ने पूरी ताकत लगाकर स्टेयरिंग मोड़ा, लेकिन ट्रक पर उसका कोई बस नहीं था।
धड़ाम!!!
ट्रक पूरी रफ्तार से उस औरत से टकराया... लेकिन...
औरत हवा में घुल गई!
ट्रक उसके आर-पार निकल गया, जैसे वो कभी थी ही नहीं।
रामलाल और फैज़ल दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा—
ये क्या था?
लेकिन सोचने का वक्त नहीं था।
ट्रक की स्पीड बढ़ती जा रही थी, और सामने एक बड़ा मोड़ था।
अगर ट्रक नहीं रुका तो वो सीधे खाई में गिर सकता था!
राहत या नया खतरा?
रामलाल ने फिर से ब्रेक दबाने की कोशिश की, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
फैज़ल ने घबराकर कहा, "भाई, कुछ तो कर!"
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर गियर बदलने की कोशिश की, लेकिन गियर बॉक्स अजीब तरह से जाम हो गया था।
तभी...
एक झटके से ट्रक रुक गया!
जैसे किसी ने उसे ज़ोर से पकड़ लिया हो।
दोनों हांफते हुए एक-दूसरे को देखने लगे।
फैज़ल ने कांपते हुए कहा, "भाई, ये ट्रक अब हमें मार कर ही मानेगा!"
पुराना सच सामने आया
ट्रक के अंदर अचानक अजीब सी ठंडक महसूस होने लगी।
पीछे से किसी के रोने की आवाज़ आ रही थी...
रामलाल और फैज़ल ने पीछे मुड़कर देखा—
एक आदमी खड़ा था!
पुराने ज़माने के ड्राइवर की वर्दी, चेहरे पर चोटों के निशान, और आँखों में गहरा दर्द।
उसने धीरे से कहा—
"तुम लोग मेरी जगह ले चुके हो। अब इस ट्रक से बाहर जाना नामुमकिन है!"
रामलाल और फैज़ल की सांसें थम गईं।
क्या सच में अब ये ट्रक उनकी कब्र बनने वाला था?
रामलाल और फैज़ल की आँखों के सामने वो भूतिया ड्राइवर खड़ा था।
उसकी आंखों में एक अजीब चमक थी, जैसे वो बरसों से कुछ कहना चाहता हो।
"तुम लोग मेरी जगह ले चुके हो... अब इस ट्रक से बाहर जाना नामुमकिन है!"
रामलाल के चेहरे पर पसीना छलक पड़ा।
फैज़ल कांपते हुए बोला, "भाई... ये कौन है?"
ट्रक के अंदर ठंडक और बढ़ गई।
भूतिया ड्राइवर ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—
"ये ट्रक सिर्फ़ एक गाड़ी नहीं, एक श्राप है... जो भी इसे चलाता है, उसकी किस्मत मेरी तरह बंद हो जाती है।"
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है?"
भूत ने हल्की आवाज़ में कहा—
"रघुवीर... ये ट्रक पहले मेरा था।"
रामलाल और फैज़ल ने एक-दूसरे को देखा।
तो क्या ये भूत पहले का ड्राइवर था?
लेकिन उससे पहले ही भूत ने कुछ ऐसा कहा जिससे दोनों के रोंगटे खड़े हो गए—
"इस ट्रक में फंसे रहोगे... तो तुम्हारी भी वही हालत होगी जो मेरी हुई थी!"
खौफनाक सच
रामलाल ने हिम्मत करके पूछा, "तुम्हारे साथ क्या हुआ था?"
रघुवीर की आँखें भर आईं।
"इस ट्रक को मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी दी थी। लेकिन एक रात... कुलधरा गाँव के पास... इस ट्रक के अंदर मेरी मौत हो गई।"
"कैसे?" फैज़ल ने कांपते हुए पूछा।
रघुवीर ने धीरे-धीरे कहा—
"इस ट्रक में सिर्फ़ मैं अकेला नहीं था... कोई और भी था। वो मुझसे कहता था कि ट्रक मत रोको, बस चलते रहो।"
रामलाल और फैज़ल का गला सूख गया।
"मैंने ट्रक रोकने की कोशिश की... लेकिन ब्रेक काम नहीं कर रहे थे।"
"और फिर, ट्रक एक मोड़ पर खुद-ब-खुद रुक गया... और मुझे पीछे से किसी ने धक्का दे दिया!"
"मैं खाई में गिर गया... और वहीं मेरी मौत हो गई।"
रामलाल और फैज़ल की आंखें फटी रह गईं।
भूत ने धीरे से कहा—
"अब ये ट्रक तुम्हारा है। और अब... तुम्हारी बारी है!"
रामलाल और फैज़ल की साँसें अटक गईं।
ट्रक के अंदर ठंड बढ़ती जा रही थी, जैसे किसी ने अभी-अभी बर्फ से लदा दरवाज़ा खोल दिया हो।
रघुवीर का भूत अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी, जैसे वो अंदर तक झाँक सकता हो।
रामलाल ने घबराकर ट्रक के दरवाज़े की ओर देखा।
"हमें यहाँ से भागना होगा!"
लेकिन फैज़ल ने उसे रोका।
"अगर हम इसे छोड़कर गए, तो ये श्राप हमारे साथ रहेगा!"
रघुवीर हँसने लगा।
"अब समझ में आया? इस ट्रक से भागने का कोई रास्ता नहीं है।"
"जो भी इसे छोड़ने की कोशिश करता है, वो जिंदा नहीं बचता!"
रामलाल और फैज़ल की रूह काँप गई।
लेकिन रामलाल ने हिम्मत जुटाई।
"हमें इस श्राप को तोड़ना होगा।"
भूत का भयानक रहस्य
रामलाल ने भूत से पूछा, "क्या इस श्राप को खत्म करने का कोई तरीका है?"
रघुवीर का चेहरा सख्त हो गया।
"हाँ, एक तरीका है... लेकिन वो बहुत खतरनाक है।"
फैज़ल ने जल्दी से पूछा, "क्या करना होगा?"
रघुवीर ने धीरे-धीरे कहा—
"तुम्हें इस ट्रक को उसी जगह वापस ले जाना होगा, जहाँ मैंने अपनी आखिरी साँसें ली थीं।"
"कुलधरा गाँव के पास, वो जगह जहाँ इस ट्रक ने मेरी जान ले ली थी।"
रामलाल और फैज़ल एक-दूसरे को देखने लगे।
क्या वो वाकई उस डरावनी जगह पर जा सकते थे?
लेकिन उनके पास और कोई चारा नहीं था।
अगर वो इस ट्रक को वहीं नहीं ले गए, तो यह श्राप उनकी भी जान ले लेगा!
मौत की ओर बढ़ते कदम
रामलाल ने ट्रक स्टार्ट किया।
इंजन की गड़गड़ाहट पूरे हाईवे पर गूँज उठी।
फैज़ल ने कांपते हुए पीछे देखा—
रघुवीर का भूत अब ट्रक के पीछे बैठा था, उसकी आँखें जल रही थीं।
"चलो... मेरे साथ!"
ट्रक कुलधरा की ओर बढ़ने लगा...
और उनके साथ-साथ, मौत भी उनके पीछे थी!
रामलाल और फैज़ल का ट्रक अब उस रास्ते की ओर बढ़ रहा था, जहाँ एक श्रापित आत्मा अपने बदले की आग में जल रही थी।
"भाई, हम ये क्या करने जा रहे हैं?" फैज़ल ने धीरे से पूछा।
रामलाल की आँखों में दृढ़ता थी। "हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है। अगर इस श्राप को तोड़ना है, तो हमें ये करना ही होगा।"
ट्रक जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, हवा में अजीब-सी घुटन बढ़ने लगी। रात और गहरी हो गई थी, लेकिन हाईवे के उस हिस्से में अजीब सन्नाटा था।
फैज़ल ने अचानक ट्रक के शीशे से बाहर देखा—
एक औरत सफेद साड़ी में सड़क के किनारे खड़ी थी।
उसका चेहरा नहीं दिख रहा था, लेकिन उसके बाल लंबे और बिखरे हुए थे।
"भाई, वो औरत कौन है?" फैज़ल की आवाज़ काँप गई।
रामलाल ने देखा और उसकी भी रूह काँप गई।
वो औरत धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी!
भूतिया साया
रामलाल ने ट्रक की स्पीड बढ़ा दी। लेकिन जैसे ही ट्रक उसके पास से गुज़रा, औरत हवा में उड़कर ट्रक के ऊपर चढ़ गई!
"अल्लाह बचाए! ये क्या था?" फैज़ल ने काँपते हुए कहा।
अचानक ट्रक का स्टेयरिंग जाम हो गया!
रामलाल पूरी ताकत से स्टेयरिंग घुमाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन ट्रक अब उनके कंट्रोल में नहीं था।
"कोई इसे चला रहा है... ये हमारे हाथ में नहीं है!"
फैज़ल ने हिम्मत करके पीछे मुड़कर देखा—
वो औरत अब ट्रक के ऊपर बैठी थी। उसका चेहरा सड़ा हुआ था, और आँखों से खून बह रहा था!
"तुम लोग इसे वापस क्यों ला रहे हो?" औरत की आवाज़ गूँज उठी।
रघुवीर का भूत और नई मुसीबत
"हमें श्राप तोड़ना है, हमें जाने दो!" रामलाल ने हिम्मत करके कहा।
औरत ने डरावनी हँसी हँस दी।
"इस ट्रक का श्राप इतना आसान नहीं है, ये सिर्फ रघुवीर का नहीं... मेरा भी बदला है!"
रामलाल और फैज़ल की रूह काँप गई।
अब उन्हें समझ में आया कि ये सिर्फ रघुवीर की आत्मा नहीं थी, बल्कि एक और आत्मा इस श्राप से जुड़ी थी!
लेकिन वो कौन थी? और उसका क्या रिश्ता इस भूतिया ट्रक से था?
अब सवाल यह था—
क्या वो इस रहस्य को सुलझा पाएँगे, या खुद भी इस श्राप का हिस्सा बन जाएँगे?
ट्रक अब पूरी तरह रामलाल और फैज़ल के नियंत्रण से बाहर था। वो सफेद साड़ी वाली औरत हवा में तैरते हुए ट्रक के ऊपर बैठी थी, और उसके सड़े-गले चेहरे से टपकता खून अंधेरे में चमक रहा था।
"तुम लोग इसे वापस क्यों ला रहे हो?" उसकी आवाज़ गूँजी, और ट्रक अचानक झटके से हिल गया।
रामलाल ने पूरी ताकत से स्टेयरिंग पकड़ रखा था, लेकिन ट्रक अपने आप किसी अनदेखी ताकत से चल रहा था।
फैज़ल ने हिम्मत करके पीछे देखा—
पीछे की सीट पर एक आदमी की छाया बैठी थी!
वो छाया धीरे-धीरे आकार लेने लगी…
रघुवीर!
दो आत्माओं का बदला
रामलाल और फैज़ल की आँखों के सामने वो खौफनाक दृश्य था।
"रघुवीर…? तुम ज़िंदा हो?" रामलाल की आवाज़ काँप गई।
रघुवीर की आत्मा ने धीरे से सिर हिलाया।
"मैं कभी मरा ही नहीं था… मुझे श्राप दिया गया था… मैं इस ट्रक में ही फँसा हूँ!"
फैज़ल ने डरते हुए पूछा, "और… ये औरत कौन है?"
रघुवीर की आत्मा ने धीरे से उस औरत की ओर इशारा किया, और उसकी आँखों में डर झलकने लगा।
"ये… मेरी पत्नी थी। इसे भी इसी श्राप ने निगल लिया!"
रामलाल और फैज़ल की साँसें रुक गईं।
"इस ट्रक पर सिर्फ एक नहीं, दो आत्माओं का श्राप है!"
कुलधरा की तरफ बढ़ता ट्रक
ट्रक अब अपनी पूरी रफ़्तार से कुलधरा गाँव की ओर बढ़ रहा था।
चारों तरफ सन्नाटा था, हवाएँ बहुत तेज़ चल रही थीं, और अंधेरे में एक खौफनाक एहसास पनप रहा था।
अचानक ट्रक खुद-ब-खुद रुक गया।
रामलाल और फैज़ल ने देखा—
सामने एक पुराना, टूटा-फूटा मकबरा था।
रघुवीर की आत्मा फुसफुसाई, "यहीं… यहीं से ये श्राप शुरू हुआ था!"
रामलाल ने चारों ओर देखा।
चारों तरफ परछाइयाँ घूम रही थीं।
अचानक वो सफेद साड़ी वाली औरत ज़ोर से चीख पड़ी—
"तुम लोग मुझे यहाँ वापस क्यों ला रहे हो?! यह श्राप कभी खत्म नहीं होगा!"
क्या वे श्राप से बच पाएँगे?
अब सवाल यह था—
रघुवीर और उसकी पत्नी की आत्मा को क्या मुक्ति मिलेगी?
क्या ट्रक का श्राप खत्म होगा या रामलाल और फैज़ल भी इसकी चपेट में आ जाएँगे?
क्या कुलधरा गाँव में इस भूतिया ट्रक की आखिरी कहानी लिखी जाएगी?
रामलाल और फैज़ल अब पूरी तरह घबरा चुके थे। ट्रक अब उस मकबरे के ठीक सामने खड़ा था, और हवा में अजीब-सी सरसराहट थी।
रघुवीर की आत्मा अब पूरी तरह प्रकट हो चुकी थी। उसकी आँखों में एक अजीब-सा दुःख था।
"मैं इस श्राप से बच सकता था… पर मैं डर गया। मैंने जो किया, उसकी सजा अब तक भुगत रहा हूँ।"
रामलाल ने घबराकर पूछा, "तुमने किया क्या था?"
रघुवीर की आत्मा ने धीरे-धीरे सिर झुकाया और बोला—
"मैंने ग़लती से इस गाँव के श्रापित खजाने को छू लिया था!"
खजाने का रहस्य
फैज़ल की आँखें चौड़ी हो गईं।
"खजाना?! कैसा खजाना?"
रघुवीर ने मकबरे की ओर इशारा किया।
"ये सिर्फ एक मकबरा नहीं… इसके नीचे सोने और चाँदी का वो खजाना दबा है, जिसे कुलधरा के अंतिम ब्राह्मणों ने श्राप देकर दफनाया था।"
रामलाल को अब धीरे-धीरे समझ आ रहा था।
"तो तुमने वो खजाना लेने की कोशिश की?"
रघुवीर ने सिर हिलाया।
"हाँ… और जैसे ही मैंने उस पर हाथ रखा, मुझे इस ट्रक से बंधन में बाँध दिया गया। मैं इस ट्रक से कभी बाहर नहीं निकल सकता।"
फैज़ल ने काँपती आवाज़ में पूछा, "और… वो औरत?"
रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।
"वो मेरी पत्नी थी… उसने मुझे बचाने की कोशिश की… लेकिन वो भी श्रापित हो गई। अब हम दोनों इस ट्रक में फँसे हुए हैं… जब तक कोई इस श्राप को तोड़ न दे!"
श्राप को तोड़ने का तरीका
रामलाल और फैज़ल ने एक-दूसरे की ओर देखा।
"श्राप को तोड़ने का कोई तरीका नहीं है?"
रघुवीर ने कुछ देर सोचा, फिर बोला—
"अगर वो खजाना वापस उसकी जगह पर रख दिया जाए… तो शायद हमें मुक्ति मिल सकती है!"
रामलाल ने डरते हुए पूछा, "लेकिन खजाना कहाँ है?"
रघुवीर ने धीरे से ट्रक के पिछले हिस्से की ओर इशारा किया।
"वो खजाना इस ट्रक में है!"
फैज़ल और रामलाल के रोंगटे खड़े हो गए।
"मतलब… इस ट्रक पर सिर्फ आत्माएँ ही नहीं, एक श्रापित खजाना भी है?"
रघुवीर ने धीरे से सिर हिलाया।
अब सवाल यह था—
क्या वे इस खजाने को मकबरे में वापस रख पाएँगे?
क्या श्राप तोड़ने के बाद ट्रक से आत्माएँ मुक्त हो जाएँगी?
या फिर यह ट्रक हमेशा के लिए मौत का ट्रक बन जाएगा?
(अगले भाग में होगा सबसे बड़ा रहस्योद्घाटन!)
रामलाल ने खजाने से भरे बक्से को मजबूती से पकड़ लिया और ट्रक से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा, लेकिन दरवाजे अब भी बंद थे।
फैज़ल ने पूरी ताकत से दरवाजों को धक्का दिया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
"ये हमें बाहर नहीं जाने देंगे!" उसने घबराकर कहा।
रामलाल ने झट से जेब से अपनी माँ की दी हुई ताबीज निकाली और दरवाजे पर रख दी।
ताबीज रखते ही दरवाजे में तेज़ कंपन हुआ और अचानक खुद-ब-खुद खुल गए!
"भागो!" रामलाल चिल्लाया।
वे दोनों तुरंत ट्रक से बाहर कूदे और कुलधरा के मंदिर की ओर भागने लगे।
पीछा करती श्रापित आत्माएँ
जैसे ही वे भागे, उनके पीछे तेज़ हवाएँ चलने लगीं। रेत के गुबार उठने लगे, और उन गुबारों में कई परछाइयाँ बनने लगीं।
"तुम लोग खजाना लेकर नहीं जा सकते!"
पीछे मुड़कर देखा तो अंधेरे में कई चमकती हुई लाल आँखें उनका पीछा कर रही थीं।
फैज़ल लड़खड़ाया, लेकिन रामलाल ने उसे पकड़ लिया।
"तेज़ भागो! हमें बस मंदिर तक पहुँचना है!"
सामने एक टूटी-फूटी हवेली दिख रही थी। रघुवीर की आत्मा वहीं खड़ी थी और उसने इशारा किया—
"इसमें घुस जाओ!"
हवेली में फँसे!
रामलाल और फैज़ल ने बिना सोचे-समझे हवेली का दरवाजा धक्का दिया और अंदर घुस गए।
अंदर अंधेरा था। हवा में सीलन और कुछ सड़ी-गली चीजों की गंध थी।
फैज़ल ने थूक गटका। "अब आगे क्या?"
रामलाल ने चारों ओर देखा। दीवारों पर अजीब आकृतियाँ बनी थीं—कुछ इंसानों के चेहरे जैसे, जो दर्द में चिल्ला रहे थे।
रघुवीर की आत्मा उनके सामने आई।
"अब ये आत्माएँ बाहर ही नहीं, अंदर भी हैं। अगर बचना है, तो मंदिर तक सुरंग से जाना होगा।"
रामलाल चौंका। "कैसी सुरंग?"
रघुवीर ने एक दीवार की ओर इशारा किया, जिस पर हल्का-सा दरार थी।
रामलाल ने जैसे ही उस दीवार पर हाथ फेरा, अचानक वहाँ एक दरवाज़ा खुल गया!
सुरंग में मौत का साया
रामलाल और फैज़ल सुरंग में उतरने लगे। अंदर घुप अंधेरा था।
सिर्फ उनके कदमों की आहट और किसी के दूर फुसफुसाने की आवाज़ें आ रही थीं।
फैज़ल ने सरगوشी में कहा, "रामलाल भाई, ये सही कर रहे हैं ना?"
रामलाल ने कोई जवाब नहीं दिया।
पर तभी...
उनके पीछे तेज़ क़दमों की आवाज़ आने लगी!
"कोई हमारा पीछा कर रहा है!" फैज़ल घबराया।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा—
एक काली छाया सुरंग में दौड़ती हुई उनकी ओर आ रही थी!
क्या वे सुरक्षित मंदिर तक पहुँच पाएँगे? क्या ये खजाना सही में श्रापित है?
रामलाल और फैज़ल सुरंग में तेजी से आगे बढ़ रहे थे, लेकिन पीछे से आती तेज़ क़दमों की आवाज़ उनकी धड़कनों को और तेज कर रही थी।
"ये कोई इंसान नहीं हो सकता!" फैज़ल ने घबराकर कहा।
"बिना रुके भागते रहो!" रामलाल ने बक्से को कसकर पकड़ते हुए जवाब दिया।
सुरंग संकरी होती जा रही थी। ऊपर की छत से पानी टपक रहा था और दाईं ओर कुछ अजीब-सी मूर्तियाँ बनी थीं, जिनके चेहरे घिनौने और विकृत थे।
फैज़ल ने एक झलक देखा और सिहर उठा—उन मूर्तियों की आँखें हिल रही थीं!
पीछे आती भयानक परछाई
अचानक, फैज़ल का पैर किसी चीज़ से टकराया और वह गिर पड़ा।
"फैज़ल उठो!" रामलाल ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी—
सामने से एक काली परछाई ज़मीन से उठने लगी।
उसका आकार इंसानों जैसा था, लेकिन चेहरा धुंधला और आँखें जलते कोयले जैसी लाल थीं।
"तुमने हमारा श्रापित खजाना चुरा लिया..."
भयानक आवाज़ गूँजी।
फैज़ल काँप उठा। "रामलाल भाई, ये जिन्न जैसा लग रहा है!"
सुरंग में फँसे!
रामलाल ने बिना कुछ सोचे बक्से को कसकर पकड़ लिया और फैज़ल को उठाकर फिर से दौड़ने लगा।
परछाई पीछे नहीं हट रही थी, बल्कि अब वह सुरंग की दीवारों पर चिपककर उनके आगे पहुँच गई!
सामने दीवार पर अचानक से एक डरावना चेहरा उभर आया और चीखने लगा—
"वापस जाओ, वरना मर जाओगे!"
रामलाल और फैज़ल एकदम रुक गए। उनकी साँसें तेज़ हो गईं।
सामने का रास्ता अब बंद हो चुका था।
फैज़ल ने काँपते हुए कहा, "अब क्या करें? ये रास्ता तो खत्म हो गया!"
एक रहस्यमयी संकेत
रामलाल ने गौर से दीवार को देखा। उस पर कुछ अजीब-सी आकृतियाँ बनी थीं।
रघुवीर की आत्मा अचानक उनके पास आई और कहा—
"अगर आगे बढ़ना है तो 'मंत्र' पढ़ो, वरना तुम भी इस सुरंग का हिस्सा बन जाओगे।"
रामलाल ने अपनी माँ द्वारा दिया गया ताबीज निकाला और उसे दीवार पर स्पर्श किया।
अचानक, दीवार चमकने लगी और उसमें एक दरवाजा बन गया।
दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया...
मंदिर तक का रास्ता खुला! या नई मुसीबत?
जैसे ही दरवाज़ा खुला, सामने एक घना जंगल दिखा।
"जल्दी बाहर चलो!" रामलाल ने कहा।
दोनों सुरंग से निकलकर जंगल में आ गए, लेकिन यहाँ भी सन्नाटा था।
परछाई अब नहीं दिख रही थी, लेकिन ठंडी हवा उनके आसपास बह रही थी।
तभी एक घंटी की आवाज़ गूँजी—
मंदिर पास ही था!
पर यह सच में सुरक्षा का स्थान था? या यहाँ कोई और डरावनी ताकत उनका इंतज़ार कर रही थी?
क्या वे खजाने के श्राप से बच पाएँगे? मंदिर में क्या होगा?
(अगले भाग में जानिए इस रहस्य का पर्दाफाश!)
रामलाल और फैज़ल जंगल में तेज़ी से बढ़ रहे थे। पीछे छूट चुकी सुरंग की ठंडी हवा अब भी उनकी रीढ़ में सिहरन पैदा कर रही थी। मंदिर के घंटे की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी, लेकिन हर कदम के साथ डर और बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
"भाई, ये जंगल कुछ अजीब लग रहा है… ऐसा लग रहा है जैसे कोई हमें देख रहा हो," फैज़ल ने धीरे से कहा।
रामलाल ने इधर-उधर देखा। पेड़ों की छाँव में कहीं-कहीं परछाइयाँ हिलती दिख रही थीं। ठंडी हवा में एक अजीब-सी फुसफुसाहट थी, मानो कोई छुपकर उन्हें बुला रहा हो।
मंदिर के दरवाजे पर…
कुछ ही मिनटों में वे मंदिर के विशाल पत्थर के दरवाजे तक पहुँच गए। यह मंदिर बाकी मंदिरों से अलग था—दरवाजा टूटा हुआ था, और उस पर लाल रंग के हाथों के निशान थे।
फैज़ल एकदम पीछे हट गया। "भाई, ये तो भूतिया जगह लग रही है…"
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर दरवाजे को धक्का दिया।
दरवाजा चरमराते हुए खुल गया, और अंदर घुप अंधेरा था।
मंदिर के अंदर की खौफनाक मूर्तियाँ
रामलाल और फैज़ल ने मंदिर में कदम रखा। अंदर का माहौल बेहद अजीब था। दीवारों पर बनी मूर्तियाँ टूटी-फूटी थीं, लेकिन उनके चेहरे पर डरावनी हँसी जमी हुई थी।
फैज़ल ने धीरे से कहा, "ये मूर्तियाँ हमें घूर क्यों रही हैं?"
तभी एक मूर्ति के होंठ हिले और धीमी आवाज़ में कहा—
"तुम यहाँ नहीं आ सकते…"
रामलाल और फैज़ल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
एक और दरवाजा और छुपा हुआ खजाना
मंदिर के बीच में एक और दरवाजा था, जिस पर संस्कृत में कुछ लिखा था।
रामलाल ने धीरे से पढ़ा—
"जो इस खजाने को ले जाएगा, वह मौत को गले लगाएगा।"
फैज़ल की आँखें चौड़ी हो गईं। "भाई, ये वही खजाना तो नहीं, जो हमने बक्से में लिया था?"
जैसे ही उन्होंने बक्से को देखा, वह हल्के-हल्के हिलने लगा।
मौत का साया
अचानक, मंदिर के चारों ओर से अजीब-सी परछाइयाँ प्रकट होने लगीं।
उनके चेहरे काले थे, आँखें लाल, और उनके हाथ लंबे-लंबे थे।
"खजाना वापस रखो, वरना यहाँ से कोई जिंदा नहीं जाएगा!" एक डरावनी आवाज़ गूँजी।
रामलाल और फैज़ल काँप उठे।
"अब क्या करें?" फैज़ल ने घबराकर पूछा।
रामलाल के पास दो ही रास्ते थे—या तो वे खजाना वापस रखें और खुद को बचाएँ, या फिर इस श्राप को तोड़ने का कोई तरीका निकालें।
अगले भाग में:
क्या रामलाल और फैज़ल श्राप से बच पाएँगे?
मंदिर का रहस्य क्या है?
खजाने का असली सच क्या है?
मंदिर के भीतर अजीब सी घुटन थी। रामलाल और फैज़ल के चारों ओर काली परछाइयाँ तेजी से घूम रही थीं। हवा में सड़ांध भरी गंध थी, और वह रहस्यमयी बक्सा अब और ज़्यादा हिलने लगा था।
"हम इस जगह को छोड़ क्यों नहीं देते, भाई?" फैज़ल की आवाज़ कांप रही थी।
रामलाल ने बक्से को घूरते हुए कहा, "अगर हमने इसे ऐसे ही छोड़ दिया, तो ये आत्माएँ हमें छोड़ेंगी नहीं। हमें इसका सच जानना होगा!"
बक्से का रहस्य खुला
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर बक्से का ढक्कन खोला। अंदर एक पुरानी तांबे की प्लेट रखी थी, जिस पर कुछ संस्कृत में लिखा था।
फैज़ल ने हल्के से पढ़ने की कोशिश की—
"जो इस श्रापित खजाने को छुएगा, वह मौत का शिकार बनेगा। इसे मुक्त करने के लिए पवित्र अग्नि चाहिए!"
"मतलब, जब तक इसे जलाया नहीं जाएगा, ये आत्माएँ हमें नहीं छोड़ेंगी!" रामलाल समझ गया।
आत्माओं का हमला
जैसे ही उन्होंने प्लेट को छुआ, काली परछाइयाँ जोर से चीखने लगीं।
"तुमने इसे छूने की हिम्मत कैसे की!" एक भयानक आवाज़ गूँजी।
मंदिर की दीवारें हिलने लगीं, मूर्तियाँ गिरने लगीं, और ज़मीन पर बड़ी दरारें उभर आईं।
"भागो, फैज़ल!" रामलाल ने चिल्लाया।
दोनों जान बचाकर मंदिर से बाहर भागने लगे, लेकिन दरवाजा अचानक अपने आप बंद हो गया।
श्राप से मुक्ति का रास्ता
फैज़ल ने हड़बड़ाकर अपनी जेब टटोली और माचिस निकाली।
"भाई, इसे जलाने के लिए यही तो चाहिए!"
रामलाल ने प्लेट को ज़मीन पर रखा, और फैज़ल ने बिना वक्त गँवाए उसे आग लगा दी।
प्लेट जलते ही मंदिर की दीवारों से तेज़ लाल रोशनी निकली।
आत्माएँ ज़ोर से चीखने लगीं और एक-एक करके धुएँ में बदलकर गायब होने लगीं।
दरवाजा खुल गया।
सुरक्षित बाहर निकलने के बाद…
रामलाल और फैज़ल हाँफते हुए बाहर निकले। मंदिर अब शांत था, कोई अजीब आवाज़ नहीं आ रही थी।
"लगता है, हमने इस श्राप से मुक्ति पा ली," रामलाल ने राहत की सांस ली।
फैज़ल ने आसपास देखा और मुस्कुराया, "हाँ, भाई, लेकिन अगली बार, किसी अजीब जगह में रुकने से पहले सौ बार सोचेंगे!"
अगले भाग में:
क्या यह सच में अंत था, या फिर कोई और रहस्य बाकी है?
रामलाल और फैज़ल के ट्रक में अब भी कुछ अजीब घटित क्यों हो रहा है?
क्या वे सच में सुरक्षित हैं?
रामलाल और फैज़ल मंदिर से बाहर तो आ गए थे, लेकिन दोनों के दिलों में अब भी डर बैठा हुआ था। रात के सन्नाटे में हाईवे पर खड़े उनके ट्रक के पास जाने से पहले वे कुछ देर सड़क के किनारे बैठकर अपनी साँसें सामान्य करने लगे।
फैज़ल ने काँपती आवाज़ में कहा, "भाई, हमें अब यहाँ से निकल जाना चाहिए। ये जगह ठीक नहीं है!"
रामलाल भी सहमत था, लेकिन जैसे ही वे ट्रक के पास पहुँचे, उनके रोंगटे खड़े हो गए।
ट्रक के अंदर कोई था!
ट्रक की खिड़की से किसी की हल्की झलक दिखी। कोई अंदर बैठा था।
"ये कौन हो सकता है?" रामलाल ने फैज़ल की तरफ देखा।
फैज़ल ने तुरंत छड़ी उठाई और धीरे-धीरे ट्रक की तरफ बढ़ा।
रामलाल ने झिझकते हुए दरवाजा खोला…
जैसे ही दरवाजा खुला, अंदर का नज़ारा देखकर उनकी आत्मा तक काँप गई।
भूतिया साया
ड्राइवर की सीट पर एक काली परछाई बैठी थी। उसकी आँखें लाल अंगारे जैसी जल रही थीं।
"तुम लोग हमारी शांति भंग कर चुके हो!" वह परछाई गरजी।
फैज़ल हड़बड़ाकर पीछे हट गया। रामलाल ने तुरंत जेब से हनुमान चालीसा का छोटा-सा कागज निकाला और पढ़ने लगा।
जैसे ही उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया, ट्रक में ज़ोर का झटका लगा। इंजन अपने आप स्टार्ट हो गया, और ट्रक खुद-ब-खुद पीछे जाने लगा।
"भागो!" रामलाल चिल्लाया।
दोनों ट्रक से दूर हट गए, और देखते ही देखते ट्रक का दरवाजा बंद हो गया। अंदर बैठी परछाई ज़ोर से चीखी, और ट्रक का पूरा केबिन काले धुएँ में बदल गया।
रहस्यमयी धुएँ का खेल
फैज़ल घबराकर बोला, "भाई, इस ट्रक में अब कुछ बहुत बड़ा खतरा है। हमें इसे छोड़ देना चाहिए!"
रामलाल भी डरा हुआ था, लेकिन उसने फैसला किया, "नहीं! यह मेरा ट्रक है, मेरी रोज़ी-रोटी। हम इसे ऐसे नहीं छोड़ सकते!"
वह धीरे-धीरे ट्रक की ओर बढ़ा और अंदर झाँकने की कोशिश की। ट्रक का पूरा केबिन अब खाली था। काली परछाई गायब हो चुकी थी, लेकिन सीट पर राख जैसी कोई चीज़ पड़ी हुई थी।
ट्रक के साथ रहस्यमयी घटनाएँ
रामलाल और फैज़ल ने हिम्मत करके ट्रक में बैठने का फैसला किया।
इंजन चालू होते ही अजीब घटनाएँ होने लगीं—
स्पीडोमीटर अपने आप तेज़ चलने लगा।
रेडियो से किसी औरत की धीमी हँसी सुनाई देने लगी।
साइड मिरर में कोई परछाई दिखाई देने लगी।
फैज़ल ने डरकर कहा, "भाई, हमें किसी मौलवी या पंडित से इसका उपाय करवाना पड़ेगा। ये ट्रक अब पहले जैसा नहीं रहा!"
रामलाल ने गहरी सांस ली और ट्रक चलाना शुरू किया, लेकिन उसका मन बहुत बेचैन था।
क्या होगा आगे?
क्या रामलाल और फैज़ल इस श्राप से बच पाएंगे?
क्या ट्रक अब भी भूतिया ताकतों के कब्जे में है?
अगला पड़ाव उन्हें कहाँ ले जाएगा?
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर ट्रक को चलाना शुरू किया, लेकिन हर गियर बदलने के साथ उसे अजीब-सा डर महसूस हो रहा था। फैज़ल बगल में बैठा बुरी तरह घबराया हुआ था। ट्रक की हेडलाइट्स हाईवे के अंधेरे को चीर रही थीं, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे रास्ता कहीं खत्म ही नहीं हो रहा।
"भाई, ये रास्ता कुछ अजीब नहीं लग रहा?" फैज़ल ने घबराकर पूछा।
रामलाल ने सिर हिलाया, "हाँ... मुझे भी ऐसा लग रहा है कि हम कहीं फँस चुके हैं। ये वही रास्ता क्यों लग रहा है बार-बार?"
ट्रक की स्पीड 50 पर थी, लेकिन खिड़की के बाहर का नज़ारा वैसा ही दिख रहा था जैसे वे एक ही जगह पर घूम रहे हों।
भूतिया माया जाल
कुछ ही देर में फैज़ल ने डरते हुए सामने इशारा किया।
"भाई, वो देखो!"
रामलाल की आँखें बाहर निकलने को हो आईं। सड़क के किनारे वही पुराना मंदिर दिख रहा था जिससे वे कुछ घंटों पहले निकले थे।
"नामुमकिन! हम तो बहुत आगे आ चुके थे। हम फिर से मंदिर के पास कैसे पहुँच गए?"
ट्रक के ब्रेक लगाकर दोनों नीचे उतरे। हवा एकदम ठंडी हो चुकी थी, और मंदिर के अंदर धीमा-धीमा दीया जल रहा था।
"भाई, मुझे लगता है हम किसी चक्कर में फँस गए हैं," फैज़ल ने घबराकर कहा।
मंदिर के पुजारी की चेतावनी
रामलाल को अचानक याद आया कि मंदिर में जो पुजारी था, उसने कुछ कहा था। वे तुरंत मंदिर की ओर दौड़े।
अंदर वही बूढ़ा पुजारी बैठा था। उसने उनकी हालत देखकर कहा,
"मैंने कहा था ना, यहाँ से निकल जाओ! अब तुम इस रास्ते में फँस चुके हो।"
रामलाल ने हाथ जोड़कर पूछा, "बाबा, हमें इससे बाहर निकालने का कोई उपाय बताइए। हम बार-बार यही रास्ता देख रहे हैं।"
पुजारी ने लंबी सांस ली और बोला,
"तुमने हाईवे की आत्मा को जगा दिया है। अब तक जो हुआ, वो सिर्फ शुरुआत थी। असली डर अभी बाकी है!"
फैज़ल ने कांपते हुए पूछा, "बाबा, हमें क्या करना होगा?"
पुजारी ने एक थैली दी जिसमें राख थी और कहा,
"इस राख को ट्रक के चारों ओर डाल दो। अगर तुम्हारी किस्मत अच्छी रही, तो तुम बच सकते हो। वरना... रास्ता खुद तय करेगा कि तुम्हारा क्या हश्र होगा!"
मौत की आहट
रामलाल और फैज़ल ने जल्दी से राख लेकर ट्रक के चारों ओर घेरा बनाया।
लेकिन जैसे ही आखिरी चुटकी राख डाली, ट्रक के अंदर ज़ोर की आवाज़ आई—
"धम्म!"
जैसे कोई दरवाजा ज़ोर से खुला हो।
दोनों ने डरकर ट्रक के केबिन में झाँका... और वहाँ जो था, उसने उनकी रूह तक हिला दी!
क्या था ट्रक के अंदर?
क्या वे इस भूतिया चक्कर से बाहर निकल पाएंगे?
आगे क्या होगा?
रामलाल और फैज़ल ने काँपते हाथों से ट्रक का दरवाजा खोला। अंदर अंधेरा था, लेकिन जैसे ही हेडलाइट की रोशनी अंदर पड़ी, दोनों की सांसें अटक गईं।
ड्राइवर की सीट पर कोई बैठा था!
वो आकृति हल्के-हल्के हिल रही थी, जैसे कि ट्रक चला रही हो। उसके लंबे, बिखरे बाल हवा में लहरा रहे थे। सफेद चादर में लिपटा उसका शरीर धीरे-धीरे उनकी ओर मुड़ रहा था।
"भा... भाई! ये... ये क्या है?" फैज़ल की आवाज़ काँप रही थी।
रामलाल ने हिम्मत कर के हिलते हुए हाथ से उसे छूने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियां उस पर पड़ीं—
"छपाक!"
वो आकृति गायब हो गई, लेकिन अगले ही पल...
ट्रक की सीट पर खून के निशान
ड्राइवर की सीट पर ताज़ा खून के धब्बे थे, जैसे अभी-अभी किसी की हत्या हुई हो। खून धीरे-धीरे सीट से टपक रहा था, लेकिन जब उन्होंने नीचे देखा, तो वहाँ कुछ नहीं था।
"रामलाल भाई, हमें ये ट्रक छोड़ देना चाहिए!" फैज़ल बुरी तरह डर चुका था।
लेकिन रामलाल जानता था कि अगर वे ट्रक छोड़कर भागते, तो उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाती।
"नहीं! हम इसे छोड़ नहीं सकते। हमें किसी भी तरह इस रास्ते से बाहर निकलना होगा!"
उन्होंने जल्दी से ट्रक स्टार्ट किया और आगे बढ़ने लगे। लेकिन कुछ दूर जाते ही उन्हें महसूस हुआ कि ट्रक का वज़न बढ़ रहा था, जैसे कि कोई और भी उसमें बैठा हो।
शीशे में दिखती परछाईं
फैज़ल ने पीछे मुड़कर देखा और उसकी आँखें फटी रह गईं।
पीछे के शीशे में साफ दिख रहा था—कोई ट्रक के अंदर बैठा था!
वो आकृति धीरे-धीरे पास आ रही थी।
उसकी आँखें गहरी काली थीं, होंठों से खून टपक रहा था और उसका चेहरा...
वो वही थी जिसे उन्होंने कुछ देर पहले ड्राइवर की सीट पर देखा था!
"रामलाल भाई, देखो!
वो हमारे पीछे है!"
रामलाल ने जल्दी से शीशे की ओर देखा और उसके हाथ स्टीयरिंग से छूटने ही वाले थे।
वो औरत अब उनके ठीक पीछे खड़ी थी... और उसने अपना हाथ बढ़ाकर फैज़ल के कंधे पर रख दिया!
अब क्या होगा?
क्या रामलाल और फैज़ल इस डरावनी आत्मा से बच पाएंगे?
क्या ये हाईवे छोड़ने का कोई रास्ता है?
इस भूतनी का राज़ क्या है?
रामलाल और फैज़ल के रोंगटे खड़े हो गए। फैज़ल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे लगा कि उसका दिल अभी फट जाएगा। वह कांपते हुए धीरे-धीरे पीछे मुड़ा…
"अल्लाह! ये... ये क्या है?!" फैज़ल के मुँह से घुटी-घुटी चीख निकली।
ट्रक की पिछली सीट पर वही सफेद साड़ी में लिपटी औरत बैठी थी, जो पहले ड्राइवर की सीट पर थी। उसके गालों से खून बह रहा था, आँखें गहरी काली थीं और चेहरा ऐसा जैसे सदियों से मरा पड़ा हो।
रामलाल ने जैसे ही शीशे में देखा, उसके हाथों से स्टेयरिंग छूटते-छूटते बचा।
"क.. कौन हो तुम?!" उसने हिम्मत जुटाकर पूछा।
औरत का सिर धीरे-धीरे एक तरफ झुका और उसकी आँखें एकदम ठंडी थीं। उसने होंठ खोले और एक सरसराती आवाज़ में बोली—
"तुम यहाँ नहीं बचोगे…"
भूतनी का खौफनाक हमला
इतना कहते ही औरत की गर्दन अचानक से अजीब तरीके से लहराने लगी। उसके नाखून बढ़ने लगे, और उसका मुँह खून से भर गया।
फैज़ल चीखते हुए पीछे हट गया, लेकिन ट्रक में अब कोई जगह नहीं थी!
रामलाल ने पूरी ताकत से ट्रक की स्पीड बढ़ा दी।
"ये जो भी है, इसे हमें पकड़ने मत देना!" उसने चिल्लाते हुए फैज़ल से कहा।
फैज़ल काँपते हुए कुरान की आयतें पढ़ने लगा। लेकिन तभी…
"चटाक!!"
भूतनी ने अपना लंबा नाखून फैज़ल के हाथ पर चला दिया, और खून की धार फूट पड़ी!
"आहहह! भाई, ये मुझे मार देगी!"
रामलाल ने अब हिम्मत नहीं हारी। उसने एक हाथ से ट्रक चलाया और दूसरे हाथ से लोहे की रॉड उठाई, जो गियर के पास रखी थी।
जैसे ही भूतनी ने फिर हमला करने के लिए हाथ उठाया—
"धड़ाम!!!"
रामलाल ने पूरी ताकत से उस पर वार कर दिया।
भूतनी का रहस्य
लोहे की रॉड लगते ही भूतनी तेज़ चीखने लगी। उसकी चीख इतनी भयानक थी कि ट्रक का शीशा चटकने लगा।
फैज़ल ने तुरंत अपना दुपट्टा उठाया और रामलाल को पकड़ा दिया।
"इसे उसके ऊपर डाल दो!"
रामलाल ने बिना सोचे समझे दुपट्टा उठाया और भूतनी की तरफ उछाल दिया।
जैसे ही दुपट्टा उसके ऊपर गिरा, वह तुरंत धुएँ में बदल गई और ट्रक के अंदर एक अजीब-सी दुर्गंध भर गई।
आगे क्या होगा?
क्या भूतनी हमेशा के लिए चली गई?
ट्रक ड्राइवर और खलासी अब सुरक्षित हैं या कोई और खतरा आने वाला है?
आखिर ये भूतनी कौन थी और क्यों उन पर हमला कर रही थी?
रामलाल और फैज़ल की सांसे बेतहाशा चल रही थीं। ट्रक के भीतर अभी भी उस भूतनी की जलने जैसी दुर्गंध फैली हुई थी।
"भाई… क्या वो गई?" फैज़ल ने कांपती आवाज़ में पूछा।
रामलाल ने रियरव्यू मिरर में झाँका। बाहर घना अंधेरा था, लेकिन उसे कुछ दूर सड़क किनारे एक धुंधला-सा साया खड़ा दिखा।
"नहीं… वो अभी भी हमें देख रही है!"
फैज़ल ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा। सड़क के किनारे सफेद कपड़ों में वही औरत खड़ी थी। उसकी आँखें अब और भी गहरी और डरावनी हो गई थीं।
फैज़ल ने कांपते हुए कुरान की आयतें पढ़नी शुरू कर दीं।
"भाई, ट्रक रोको मत! अगर ये हमारे करीब आ गई, तो हम बचे नहीं रहेंगे!"
रामलाल ने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दिया। ट्रक अब 100 की स्पीड पर दौड़ रहा था।
सुनसान सड़क और रहस्यमयी चीखें
हाईवे अब पूरी तरह वीरान हो चुका था। चारों ओर सन्नाटा था, लेकिन ट्रक के अंदर एक अजीब-सी सरसराहट गूँज रही थी।
"भाई… ये आवाज़ कैसी है?" फैज़ल ने धीरे से कहा।
रामलाल ने ध्यान दिया—ट्रक के डैशबोर्ड से धीमी-धीमी फुसफुसाहट की आवाज़ आ रही थी।
"बच नहीं पाओगे… बच नहीं पाओगे…"
रामलाल का खून जम गया। उसने हिम्मत जुटाकर फैज़ल को इशारा किया।
"डैशबोर्ड खोलकर देख!"
फैज़ल ने काँपते हाथों से डैशबोर्ड का लॉक घुमाया।
"टन्न!"
जैसे ही डैशबोर्ड खुला, अंदर से एक पुराना, जला हुआ तावीज़ गिरा।
तावीज़ का रहस्य
फैज़ल ने झट से तावीज़ उठाया और गौर से देखा।
"भाई, ये तो किसी ने जलाया हुआ है!"
रामलाल को अचानक एक पुरानी घटना याद आ गई।
"याद है, जब हमने पहली बार इस ट्रक को खरीदा था, तो सीट के नीचे से एक अजीब-सा तावीज़ मिला था?"
फैज़ल की आँखें चौड़ी हो गईं।
"हाँ भाई! और हमने उसे निकालकर डैशबोर्ड में रख दिया था!"
रामलाल ने ज़ोर से ब्रेक मारा।
"इस तावीज़ का कोई ना कोई कनेक्शन ज़रूर है! हमें इसे नष्ट करना होगा!"
भूतनी का प्रकट होना
जैसे ही उन्होंने तावीज़ को हाथ में लिया, ट्रक के चारों ओर अजीब-सी गूँज सुनाई देने लगी।
"क्यों… मेरा तावीज़ छूआ…?"
रामलाल और फैज़ल ने घबराकर इधर-उधर देखा, लेकिन कोई नजर नहीं आया।
तभी…
"धड़ाम!"
ट्रक के ऊपर अचानक ज़बरदस्त झटका लगा, जैसे कोई उस पर कूद पड़ा हो।
फैज़ल ने कांपते हुए ऊपर देखा।
"भाई… वो ऊपर है!"
ट्रक की छत पर वही सफेद साड़ी वाली औरत बैठी थी। उसका चेहरा अब और भी भयानक हो गया था। उसकी आँखों से खून बह रहा था, और उसके नाखून तेज़ होकर लोहे के पंजों जैसे दिख रहे थे।
"तुम मुझे नहीं रोक सकते… मैं आ रही हूँ!"
क्या होगा आगे?
क्या तावीज़ ही इस भूतनी की शक्ति का स्रोत है?
ट्रक ड्राइवर और खलासी इस मुसीबत से बच पाएंगे या नहीं?
भूतनी की कहानी क्या है, और वो रामलाल और फैज़ल को क्यों मारना चाहती है?
ट्रक के ऊपर से आ रही भयानक आवाज़ें रामलाल और फैज़ल के दिलों को दहला रही थीं। ट्रक पूरी रफ्तार से दौड़ रहा था, लेकिन ऊपर बैठी वह रहस्यमयी औरत ज़रा भी हिली नहीं।
"भाई, अगर ये अंदर आ गई तो?" फैज़ल ने डरते हुए पूछा।
रामलाल ने तेजी से स्टियरिंग घुमाया, जिससे ट्रक हल्का झटका खाकर दाएं-बाएं हुआ।
"अगर हम इसे गिरा नहीं पाए, तो ये हमें मार डालेगी!"
भूतनी का हमला
अचानक, एक ज़ोरदार धमाके के साथ ट्रक की छत पर एक पंजा अंदर घुस आया!
"चर्र्र्र्र!"
लोहे की चादर खरोंचने की आवाज़ से
दोनों की रूह कांप गई। वो औरत अब अपने तेज़ नाखूनों से ट्रक की छत को फाड़ने लगी थी।
"भाई, वो अंदर आने वाली है!"
रामलाल ने घबराते हुए हॉर्न दबाया और ट्रक को और तेज़ कर दिया।
लेकिन तभी…
"स्स्स्स्स… क्यों बचने की कोशिश कर रहे हो?"
एक डरावनी फुसफुसाहट ट्रक के अंदर गूंज उठी। फैज़ल ने देखा—डैशबोर्ड के शीशे में किसी का चेहरा झलक रहा था।
"भाई… शीशे में देखो!"
रामलाल ने कांपते हुए शीशे में झांका, और उसकी आँखें फटी रह गईं।
शीशे में वही औरत दिख रही थी… लेकिन इस बार उसका चेहरा जला हुआ था!
तावीज़ का रहस्य खुला
फैज़ल ने कांपते हुए जेब से तावीज़ निकाला।
"भाई, ये तावीज़ ही हमारी आखिरी उम्मीद है!"
रामलाल ने तुरंत ट्रक रोक दिया और बाहर कूद पड़ा। फैज़ल भी जल्दी से उतरा और दोनों ने ट्रक की छत की ओर देखा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था!
"वो कहाँ गई?"
तभी, ट्रक का इंजन अचानक ज़ोर से गरजने लगा।
"गुर्रर्रररर्र!!"
हॉर्न अपने आप बजने लगे, और ट्रक की हेडलाइट्स बिना वजह जल-बुझ रही थीं।
फैज़ल की नज़र अचानक ट्रक के दरवाज़े पर पड़ी।
"भाई… देखो!"
दरवाज़े पर खून से लिखा था—
"मेरा बदला अभी पूरा नहीं हुआ!"
रात का खौफनाक मोड़
रामलाल और फैज़ल को समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। तभी पास के जंगल से किसी के रोने की आवाज़ आई।
"कोई मदद करो…"
रामलाल ने टॉर्च जलाकर उधर देखा।
सामने एक टूटी-फूटी सड़क थी, और वहाँ एक साया झुका हुआ बैठा था।
"भाई, वहाँ कोई बैठा है!"
फैज़ल ने धीरे से कहा।
दोनों ने हिम्मत जुटाकर उस साये के पास जाने का फैसला किया। जैसे ही वे पास पहुंचे, वह आकृति अचानक खड़ी हो गई।
"तुम लोग यहाँ से चले जाओ!"
आवाज इतनी भारी और गूंजती हुई थी कि दोनों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"भाई… ये इंसान नहीं है!"
रामलाल और फैज़ल पीछे हटने लगे, लेकिन तभी वो आकृति हवा में उठने लगी।
"तुम लोगों ने मेरे तावीज़ को छुआ… अब मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी!"
अब आगे क्या होगा?
ट्रक खुद ब खुद क्यों चल रहा है?
भूतनी उस तावीज़ से क्यों जुड़ी है?
क्या रामलाल और फैज़ल इस मौत के खेल से बच पाएंगे?
रात गहरी होती जा रही थी। सड़क पर चारों तरफ़ अंधेरा पसरा था, सिर्फ़ ट्रक की हेडलाइट्स और जंगल में जुगनुओं की हल्की चमक रहस्यमयी माहौल बना रही थी।
रामलाल और फैज़ल के सामने हवा में तैरती हुई वह डरावनी आकृति धीरे-धीरे उनके करीब आ रही थी। उसके पैर ज़मीन से कुछ इंच ऊपर थे, और आँखें सुर्ख लाल।
"तुम लोगों ने मेरी दुनिया में कदम रखा है… अब बचकर नहीं जा पाओगे!"
उसकी आवाज़ किसी टूटी हुई रेडियो जैसी थी—धीमी, डरावनी और कंपकंपा देने वाली।
फैज़ल का गला सूख गया। उसने कांपते हुए रामलाल का हाथ पकड़ लिया।
"भाई… हम मर जाएंगे!"
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर जवाब दिया, "नहीं! हम इस चक्कर में नहीं फंसेंगे!"
लेकिन तभी…
"घड़ाम!"
ट्रक के दरवाज़े खुद-ब-खुद खुल गए, और अचानक इंजन ज़ोर से गरजने लगा।
"गुर्रररररर्र!!"
भूतनी का रहस्यमयी अतीत
रामलाल और फैज़ल तेजी से पीछे हटे, लेकिन वह आत्मा अब हवा में घूमते हुए उनके चारों ओर मंडराने लगी।
"तुम जानते हो… तुम किसकी दुनिया में आ गए हो?"
उसने एक हाथ हवा में उठाया, और एक जलती हुई मशाल अचानक जमीन से निकल आई। उसकी रोशनी में फैज़ल ने देखा—वह औरत लाल जोड़े में थी।
"ये कौन है?" फैज़ल ने फुसफुसाते हुए कहा।
और तभी… औरत की परछाईं जंगल के बीच एक पुरानी हवेली पर जा गिरी।
रामलाल की आँखें फैल गईं, "भाई, ये कोई आम आत्मा नहीं है। ये किसी बड़ी कहानी का हिस्सा है!"
मौत का सौदा
औरत ने धीरे से कहा, "अगर जिंदा रहना चाहते हो, तो मेरी शर्त मानो!"
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "क्या चाहती हो?"
वह औरत अचानक गायब हो गई, लेकिन हवा में उसकी आवाज़ गूंज रही थी,
"मेरी कब्र खोदकर वो चीज़ निकालो जो मैं चाहती हूँ!"
फैज़ल का बदन ठंडा पड़ गया।
"भाई… कहीं ये हमें अपनी मौत के जाल में तो नहीं फंसा रही?"
रामलाल ने सोचा, "अगर हमने मना किया, तो ये हमें मार डालेगी… और अगर हामी भरी, तो पता नहीं क्या होगा!"
अब आगे क्या होगा?
रामलाल और फैज़ल क्या शर्त मानेंगे?
भूतनी की कब्र में क्या छिपा है?
क्या वे इस भयानक खेल से बच पाएंगे?
रामलाल और फैज़ल के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। ट्रक की हेडलाइट्स अभी भी उस पुरानी हवेली की तरफ़ टिकी थीं, जहां औरत की परछाईं गई थी। हवा में उसकी आवाज़ गूंज रही थी—
"मेरी कब्र खोदकर वो चीज़ निकालो जो मैं चाहती हूँ!"
रामलाल ने फैज़ल की तरफ़ देखा, "क्या हमें सच में ये करना चाहिए?"
फैज़ल का चेहरा सफेद पड़ चुका था, "भाई, अगर हमने मना किया तो वो हमें छोड़ने वाली नहीं। लेकिन अगर मान लिया, तो पता नहीं हम किस मुसीबत में फंस जाएंगे!"
"कोई और चारा भी तो नहीं है…" रामलाल ने धीरे से कहा।
ट्रक धीरे-धीरे अपने आप आगे बढ़ने लगा, जैसे कोई अदृश्य ताकत उसे खींच रही हो। सड़क अब पूरी तरह धुंध में छिप चुकी थी, और चारों तरफ़ एक अजीब सी सिहरन थी।
हवेली का खौफ
हिचकिचाते हुए, रामलाल और फैज़ल ट्रक से उतरे। उनके कदम भारी थे, और हर तरफ़ सिर्फ़ सन्नाटा था। हवेली की टूटी-फूटी दीवारों से अजीब-सी सरसराहट की आवाज़ें आ रही थीं।
"भाई… ये जगह सही नहीं लग रही," फैज़ल ने फुसफुसाकर कहा।
"चुप! कोई हमें देख रहा है…" रामलाल ने कान लगाकर सुना।
वह सही कह रहा था। पास के एक खंडहर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
"खट… खट… खट…"
वे दोनों तेजी से पलटे, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था—सिर्फ़ गहरी परछाइयाँ।
भूतनी का इंतकाम
जैसे ही वे हवेली के अंदर गए, दीवारों पर अजीब आकृतियाँ उभरने लगीं। फर्श पर खून के धब्बे दिख रहे थे, और हर कोने में टूटी हुई चूड़ियाँ बिखरी थीं।
अचानक, हवा में वही डरावनी आवाज़ गूंज उठी—
"जल्दी करो… मेरी आत्मा को मुक्ति चाहिए!"
रामलाल ने एक कोने में देखा, जहाँ ज़मीन पर एक पुराना कब्र जैसा ढांचा बना था।
"भाई… लगता है यही वो जगह है,"
फैज़ल ने कांपती आवाज़ में कहा।
रामलाल ने पास पड़े एक पुराने फावड़े को उठाया और ज़मीन खोदने लगा। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, एक लकड़ी का संदूक़ बाहर आने लगा।
संदूक़ में क्या है?
रामलाल और फैज़ल ने कांपते हाथों से उस संदूक़ को खोला।
"धड़ाम!!"
संदूक़ खुलते ही एक ज़ोरदार झटका लगा, और हवेली की खिड़कियाँ खुद-ब-खुद ज़ोर से बंद हो गईं। अंदर एक लाल रंग की पुरानी साड़ी रखी थी, जो अब भीगी हुई लग रही थी।
"ये क्या है…?" फैज़ल ने डरते हुए पूछा।
रामलाल ने साड़ी को उठाया, और तभी…
"आssssssssssssssss!!"
एक कड़कती हुई चीख हवेली में गूंज उठी।
चारों तरफ़ अंधेरा छा गया, और एक सफेद धुंआ उनके चारों ओर घूमने लगा।
अब आगे क्या होगा?
भूतनी की साड़ी का रहस्य क्या है?
क्या वे दोनों इस खौफनाक हवेली से बाहर निकल पाएंगे?
ट्रक अपने आप क्यों चल रहा था?
रामलाल और फैज़ल के शरीर सुन्न पड़ चुके थे। उनके हाथों में वह लाल साड़ी थी, जो अब हवा में खुद-ब-खुद लहराने लगी थी। हवेली के अंदर अजीब-सी आवाज़ें गूंज रही थीं, मानो कोई औरत रो रही हो।
"हमें यह यहाँ से ले जाना होगा!" रामलाल ने कांपती आवाज़ में कहा।
फैज़ल ने घबराकर इधर-उधर देखा। "भाई, कहीं यह कोई श्रापित चीज़ तो नहीं? अगर इसे छूना हमारे लिए खतरनाक हुआ तो?"
लेकिन अब समय सोचने का नहीं था। हवेली की दीवारों से अजीब-सी परछाइयाँ बाहर निकलने लगी थीं। चारों ओर एक डरावनी घुटन थी, जैसे कोई भारी बोझ उनकी छाती पर रख दिया गया हो।
"भागो!"
रामलाल और फैज़ल ने संदूक़ बंद किया और उसे घसीटते हुए ट्रक की ओर भागे।
संदूक़ का बोझ
ट्रक तक पहुँचते ही, उन्होंने किसी तरह संदूक़ को पीछे लादा। लेकिन जैसे ही उन्होंने ट्रक स्टार्ट किया, अचानक—
"धड़ाम!"
ट्रक के शीशे पर एक खून से सना हाथ पड़ा!
फैज़ल की आँखें डर से फटी रह गईं, "भाई… पीछे देख!"
रामलाल ने पीछे मुड़कर देखा, तो उसकी रूह कांप गई। एक सफेद साड़ी में लिपटी डरावनी औरत ट्रक के ऊपर झुकी हुई थी, उसके लहराते बाल हवा में उड़ रहे थे और उसकी आँखें जलती हुई कोयले की तरह लाल थीं।
डर का सफर शुरू
रामलाल ने पूरी ताकत से ट्रक का एक्सीलेरेटर दबा दिया। ट्रक पूरे वेग से सुनसान हाईवे पर दौड़ पड़ा। लेकिन ट्रक के शीशे में वो औरत अब भी दिख रही थी—
हँसती हुई…
चिल्लाती हुई…
अचानक, ट्रक का स्टीयरिंग खुद-ब-खुद घुमने लगा। ट्रक बेकाबू होकर इधर-उधर झूलने लगा।
"भाई, यह ट्रक अब हमारे काबू में नहीं!" फैज़ल ने डर से कहा।
रामलाल ने पूरी ताकत लगाकर ट्रक को संभालने की कोशिश की, लेकिन तभी…
"धप्प!"
कुछ भारी ट्रक की छत पर आ गिरा। अब तो छत से जोर-जोर से खटखटाने की आवाज़ें आने लगीं।
"ये कुछ ठीक नहीं हो रहा!" रामलाल ने कांपते हुए कहा।
कौन थी वो औरत?
फैज़ल ने धीरे-धीरे खिड़की से बाहर झाँका, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था। सिर्फ़ हवा में एक परछाई-सी लहराती दिख रही थी।
"रामलाल भाई, हमें यह संदूक़ कहीं फेंकना होगा, नहीं तो हम जिंदा नहीं बचेंगे!"
रामलाल के माथे पर पसीना था। "लेकिन यह किसका है? और इसे लेकर हमें कहाँ जाना है?"
तभी, संदूक़ से अचानक वही डरावनी आवाज़ आई—
"मुझे मेरे घर वापस ले चलो!"
अब वे दोनों समझ चुके थे—यह सफर आसान नहीं होगा!
आगे क्या होगा?
ट्रक की छत पर क्या गिरा था?
लाल साड़ी का रहस्य क्या है?
संदूक़ में क्या छुपा है?
ट्रक बेकाबू होकर सड़क पर तेज़ी से भाग रहा था। रामलाल ने पूरी ताकत से स्टीयरिंग को थाम रखा था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि कोई अनदेखी ताकत ट्रक को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रही थी।
"भाई, कुछ तो है इस संदूक़ में!" फैज़ल ने घबराते हुए कहा।
पीछे से अजीब-सी खरखराहट की आवाज़ें आ रही थीं, जैसे कोई संदूक़ को खरोंच रहा हो।
ट्रक के अंदर छाया डर
फैज़ल ने कांपते हुए पीछे की ओर देखा। ट्रक के अंदर अंधेरा घना हो चुका था। हेडलाइट्स के उजाले में सड़क तो दिख रही थी, लेकिन ट्रक के भीतर किसी अनजानी परछाई का अहसास हो रहा था।
अचानक…
"घ्रर्रर्रर्र!"
संदूक़ हिलने लगा, जैसे कोई अंदर से उसे खोलने की कोशिश कर रहा हो!
"रामलाल भाई, ये संदूक़ अपने आप हिल रहा है!"
रामलाल के माथे पर पसीना आ गया। "हमें इसे खोलकर देखना पड़ेगा, वरना ये हमसे पहले हमें ही खत्म कर देगा!"
संदूक़ खुलते ही…
ट्रक को एक वीरान जगह पर रोककर, दोनों ने हिम्मत जुटाई और संदूक़ की ओर बढ़े।
रामलाल ने कांपते हाथों से संदूक़ का ढक्कन खोला…
"धड़ाम!"
अचानक संदूक़ के अंदर से एक धूल भरा झोंका निकला और एक चुभती हुई गंध हवा में फैल गई।
संदूक़ के अंदर वही लाल साड़ी थी…
लेकिन इस बार, वह साड़ी हवा में खुद-ब-खुद लहराने लगी!
और तभी…
"तुमने इसे छूने की हिम्मत कैसे की?"
एक डरावनी, गूँजती हुई आवाज़ चारों ओर फैल गई।
भूतनी का प्रकोप
फैज़ल की आँखें डर से फटी रह गईं। साड़ी धीरे-धीरे हवा में ऊपर उठ रही थी और उसके बीच से एक औरत की आकृति उभर रही थी—
एक जली हुई, विकृत चेहरा…
लंबे, उलझे हुए बाल…
और लाल आँखें, जो आग की तरह जल रही थीं!
"तुम इसे यहाँ से ले जा रहे थे?"
भूतनी की आवाज़ इतनी खौफनाक थी कि फैज़ल घुटनों के बल गिर पड़ा।
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "तुम कौन हो? यह साड़ी तुम्हारी है?"
भूतनी ज़ोर से हँसी। "यह सिर्फ़ साड़ी नहीं, यह मेरी आखिरी निशानी है… मैं इसी में जलकर मरी थी!"
सच का खुलासा
भूतनी की आत्मा धीरे-धीरे हवा में लहराने लगी और उसके चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान उभरी।
"मुझे इंसाफ़ चाहिए… मेरी आत्मा को मुक्ति चाहिए… पर पहले, तुम दोनों को मेरी कहानी सुननी होगी!"
रामलाल और फैज़ल ने सहमकर एक-दूसरे की ओर देखा।
आख़िर, इस लाल साड़ी का सच क्या था?
क्यों भूतनी इस संदूक़ को लेकर इतनी हताश थी?
क्या रामलाल और फैज़ल इस प्रेतबाधा से बच पाएंगे?
रामलाल और फैज़ल के सामने भूतनी की आकृति धीरे-धीरे स्पष्ट होती जा रही थी। उसकी आँखें जलती हुई अंगारों की तरह चमक रही थीं, और उसकी आवाज़ में दर्द,
गुस्सा और बदले की भावना घुली हुई थी।
"तुम दोनों ने मेरी साड़ी छूकर बहुत बड़ी गलती कर दी..."
उसकी आवाज़ हवा में गूंज उठी, और ट्रक के चारों ओर अजीब-सी हलचल होने लगी।
एक खौफनाक कहानी
भूतनी ने कांपती हुई आवाज़ में अपनी कहानी सुनानी शुरू की:
"मेरा नाम विभा था। मेरी शादी एक क्रूर आदमी से हुई थी, जो मुझे हर दिन प्रताड़ित करता था। मैं हर रात उसकी यातनाओं से बचने की कोशिश करती, लेकिन कोई मेरी मदद करने वाला नहीं था।"
भूतनी के चेहरे पर दर्द उभर आया।
"एक रात, उसने मुझे इसी साड़ी में बांधकर जिंदा जला दिया। मेरी चीखों को सुनने वाला कोई नहीं था। मेरा शरीर जल गया, लेकिन मेरी आत्मा इसी साड़ी में क़ैद हो गई।"
साड़ी का श्राप
भूतनी की आँखों से आंसू नहीं, बल्कि खून की बूंदें टपकने लगीं।
"जो कोई भी इस साड़ी को छूता है, वह मेरी तकलीफ का हिस्सा बन जाता है। उसे वही दर्द झेलना पड़ता है, जो मैंने सहा था।"
रामलाल और फैज़ल का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
"तो... अब हमारे साथ क्या होगा?" फैज़ल ने डरते हुए पूछा।
भूतनी हंस पड़ी—
एक ऐसी हंसी, जिसने दोनों की रीढ़ की हड्डी तक में सिहरन भर दी।
"अब तुम दोनों मेरी कहानी के किरदार बन चुके हो… और यह कहानी बिना खून बहाए खत्म नहीं होगी!"
क्या रामलाल और फैज़ल इस श्राप से बच पाएंगे? या फिर वे भी इस साड़ी का हिस्सा बन जाएंगे? जानने के लिए इंतजार करें अगले भाग का…!
रामलाल और फैज़ल पसीने-पसीने हो चुके थे। ट्रक के अंदर की हवा भारी लग रही थी, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन पर हावी हो रही हो। भूतनी की लाल साड़ी हवा में लहराने लगी, मानो उसमें कोई अनदेखी आत्मा फंसी हो।
"इस श्राप से बचने का एक ही तरीका है…" भूतनी की खौफनाक आवाज़ गूंज उठी।
भूतनी की मांग
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "क्या तरीका है? हम कुछ भी करने को तैयार हैं!"
भूतनी की आँखें गहराई से चमक उठीं। "मुझे इंसाफ़ चाहिए। मुझे उस दरिंदे से बदला लेना है, जिसने मुझे इस हाल में छोड़ा।"
फैज़ल ने काँपती आवाज़ में पूछा, "वो आदमी… अभी भी जिंदा है?"
भूतनी का चेहरा और डरावना हो गया। "हाँ, वह जिंदा है… और मज़े की ज़िंदगी जी रहा है, जैसे कुछ हुआ ही न हो!"
एक खौफनाक यात्रा
भूतनी ने उन्हें एक गांव का नाम बताया, जहाँ उसका पति रहता था।
"अगर तुम मेरी आत्मा को शांति देना चाहते हो, तो उस आदमी को मेरे सामने लाना होगा।"
रामलाल और फैज़ल के पास कोई और रास्ता नहीं था। उन्होंने ट्रक स्टार्ट किया और बताए गए गांव की ओर चल दिए।
लेकिन जैसे-जैसे ट्रक आगे बढ़ा, अजीब घटनाएँ होने लगीं।
ट्रक का फ्यूल अचानक खत्म होने लगा, जबकि टैंक भरा हुआ था।
रेडियो से एक अजीब-सी औरत की सिसकियां सुनाई देने लगीं।
सामने की सड़क पर जलती हुई लाल साड़ी पड़ी थी, जो अचानक गायब हो गई।
आगे क्या होगा?
क्या रामलाल और फैज़ल इस श्राप से बचने में कामयाब होंगे? क्या वे भूतनी के पति तक पहुँच पाएंगे? या फिर यह सफर और भी भयानक मोड़ लेगा?
रामलाल और फैज़ल ने हिम्मत जुटाकर ट्रक आगे बढ़ाया, लेकिन माहौल और भी अजीब होता जा रहा था।
जैसे ही वे उस गाँव के करीब पहुंचे, जहाँ भूतनी का पति रहता था, ट्रक के चारों ओर घना कोहरा छा गया। हेडलाइट्स की रोशनी भी उस धुंध को चीर नहीं पा रही थी।
फैज़ल ने धीरे से कहा, "भाई, ये रास्ता तो पहले ऐसा नहीं था… ऐसा लग रहा है जैसे हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों!"
रामलाल ने खुद को संभालते हुए ट्रक धीमा कर दिया। लेकिन तभी, सड़क के बीचों-बीच एक कटा-फटा खौफनाक पेड़ आ गिरा। ट्रक एक झटके से रुक गया।
कोहरे में परछाइयाँ
फैज़ल नीचे उतरा ताकि रास्ता साफ कर सके, लेकिन जैसे ही उसने पेड़ को छूने की कोशिश की, कोहरे के बीच उसे कुछ आकृतियाँ दिखने लगीं।
सफेद कपड़ों में लिपटी कई औरतें… सभी के चेहरे झुलसे हुए थे… और उनकी आँखें सीधी फैज़ल को घूर रही थीं!
फैज़ल के हलक से चीख निकलने ही वाली थी कि उनमें से एक औरत अचानक बोल पड़ी,
"तुम उसे लेने आए हो? मत ले जाओ… वरना इस रास्ते से कभी वापस नहीं जा पाओगे!"
भूतनी की सच्चाई
तभी ट्रक के अंदर बैठी भूतनी जोर से हँसी।
"ये सब झूठ बोल रही हैं! मुझे उस आदमी तक पहुँचने दो!"
रामलाल अब तक चुप था, लेकिन अब उससे रहा नहीं गया। उसने काँपते हुए पूछा, "कौन झूठ बोल रहा है? तुम या ये?"
भूतनी का चेहरा एक पल के लिए और भी विकृत हो गया।
"अगर तुम मेरी मदद नहीं करोगे, तो तुम भी इन्हीं में शामिल हो जाओगे!"
आगे क्या होगा?
क्या रामलाल और फैज़ल भूतनी की सच्चाई जान पाएंगे?
क्या वे उस आदमी को खोज पाएंगे?
या फिर यह जाल उनके लिए मौत का कारण बनेगा?
भूतनी का असली मकसद
रामलाल और फैज़ल अब तक पूरी तरह से डर चुके थे। कोहरे में खड़ी उन औरतों की आँखें लगातार उन्हें घूर रही थीं। लेकिन सबसे ज्यादा डरावनी बात थी – भूतनी की हँसी!
फैज़ल ने हिम्मत जुटाकर कहा, "राम भाई, हमें इस झमेले से निकलना होगा! ये मामला हमारे बस से बाहर है!"
लेकिन रामलाल की नज़र अब भी उस ट्रक के शीशे पर थी। भूतनी के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी, जैसे वह कुछ छुपा रही हो।
"अगर हम इसे इसके पति तक ले भी जाएँ, तो क्या ये सच में हमें छोड़ देगी?"
"या फिर इसका असली मकसद कुछ और है?"
अचानक सब कुछ बदल गया
तभी, सड़क पर खड़ी वे औरतें धीरे-धीरे कोहरे में गायब होने लगीं। लेकिन इससे पहले कि वे पूरी तरह से अदृश्य होतीं, उनमें से एक ने फैज़ल की तरफ इशारा किया और कहा:
"मत भरोसा करो इस पर… यह तुम्हें धोखा देगी!"
इसके बाद सब कुछ शांत हो गया। कोहरा भी धीरे-धीरे छंटने लगा।
रामलाल और फैज़ल को अब यकीन हो गया कि यह भूतनी अपने पति से बदला लेना चाहती थी!
खौफनाक रास्ता
रामलाल ने ट्रक स्टार्ट किया और धीरे-धीरे उस गाँव की तरफ बढ़ने लगा जहाँ भूतनी का पति रहता था।
रास्ते में हवा अजीब-सी भारी हो गई थी, जैसे कोई उन पर नज़र रख रहा हो। अचानक, फैज़ल ने पीछे मुड़कर देखा तो उसकी रूह काँप गई—
ट्रक के पीछे एक आदमी लटका हुआ था!
उसका चेहरा धुंधला था, लेकिन उसकी आँखों में गुस्से की आग जल रही थी।
"रुको! उसे मेरे पास मत ले जाओ!" वह आदमी चीखते हुए बोला।
रामलाल ने तुरंत ब्रेक मारा। ट्रक जोर से झटका खाकर रुक गया।
"ये कौन है?" फैज़ल की आवाज़ काँप रही थी।
लेकिन इसके पहले कि कोई जवाब मिलता, वह आदमी गायब हो गया।
अब तो रामलाल और फैज़ल को समझ नहीं आ रहा था कि भूतनी सही बोल रही थी या ये आदमी!
आगे क्या होगा?
क्या रामलाल और फैज़ल भूतनी को उसके पति तक ले जाने का सही फैसला कर रहे हैं?
वह आदमी कौन था जिसने उन्हें रोकने की कोशिश की?
क्या वे इस खौफनाक सफर से जिंदा वापस लौट पाएंगे?
रामलाल और फैज़ल का दिमाग अब पूरी तरह उलझ चुका था। भूतनी कह रही थी कि उसे उसके पति के पास ले जाओ, और वह आदमी जो ट्रक के पीछे लटका था, वह उन्हें रोकना चाहता था।
कौन सच बोल रहा था?
कौन झूठा था?
फैज़ल ने घबराकर कहा, "राम भाई, अब हमें सोचना होगा! कहीं हम किसी धोखे में तो नहीं फँस रहे?"
रामलाल ने धीरे से ट्रक स्टार्ट किया और गहरी सोच में पड़ गया।
"अगर हम इस रास्ते पर
आगे बढ़े, तो हो सकता है कि हमारी मौत लिखी हो!"
रास्ते में अजीब घटनाएँ
ट्रक आगे बढ़ने लगा। रास्ते में सब कुछ अजीब लग रहा था। पेड़ बिना हवा के भी हिल रहे थे, सड़क पर परछाइयाँ दिख रही थीं, और ट्रक के अंदर ठंड बढ़ती जा रही थी।
अचानक, ट्रक के रेडियो से एक अजीब-सी आवाज़ आई।
"मुझे मत ले जाओ… वरना अंजाम बुरा होगा!"
रामलाल और फैज़ल ने डरकर रेडियो बंद कर दिया।
"भाई, ये क्या हो रहा है?" फैज़ल की आवाज़ काँप रही थी।
रामलाल ने पीछे मुड़कर देखा – भूतनी की आँखों में अजीब चमक थी।
भूतनी का असली रूप
जैसे ही ट्रक उस गाँव की सीमा के पास पहुँचा, भूतनी अचानक ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।
"हा...हा...हा...! तुम मूर्ख हो! तुमने मेरी बात मान ली!"
रामलाल और फैज़ल ने घबराकर ट्रक रोक दिया।
भूतनी की हँसी अब एक चीख में बदल चुकी थी। उसका चेहरा डरावना हो गया, आँखें काली पड़ गईं, और उसके बाल हवा में उड़ने लगे।
"मुझे मेरे पति के पास ले जाने की ज़रूरत नहीं... मैंने तो बस तुम्हें यहाँ तक लाने का जाल बिछाया था!"
फैज़ल चिल्लाया, "मतलब? तू झूठ बोल रही थी?"
भूतनी ने ज़ोर से सिर हिलाया।
"हाँ! मैंने जो आदमी ट्रक के पीछे भेजा था, वो तुम्हें सच्चाई बताने आया था… लेकिन तुमने उसकी बात नहीं मानी।"
अब ट्रक के चारों ओर अंधेरा छा गया। रामलाल और फैज़ल को महसूस हुआ कि वे एक भयानक जाल में फँस चुके थे।
क्या वे बच पाएंगे?
भूतनी ने उन्हें यहाँ क्यों बुलाया?
क्या वह सच में बदला लेना चाहती थी या उसका कोई और मकसद था?
अब रामलाल और फैज़ल का क्या होगा?
रामलाल और फैज़ल की साँसें थम गईं। भूतनी अब पूरी तरह अपने असली रूप में आ चुकी थी। उसकी लंबी, काली परछाईं ट्रक के अंदर तक फैल गई थी।
फैज़ल ने काँपते हुए कहा, "भाई, हमें यहाँ से भागना होगा!"
रामलाल ने झट से ट्रक का गियर बदला और तेजी से ट्रक भगाने की कोशिश की, लेकिन…
ट्रक के टायर ज़मीन में धँसने लगे!
जैसे किसी अनदेखी ताकत ने उसे जकड़ लिया हो।
चारों तरफ़ घना अंधेरा
अचानक, ट्रक के चारों ओर घना अंधेरा छा गया। कोई रोशनी नहीं, कोई रास्ता नहीं… बस ठंडी हवा और दिल दहला देने वाली फुसफुसाहटें!
"अब तुम मेरे मेहमान हो... भाग नहीं सकते!"
भूतनी की आवाज़ पूरी ट्रक में गूँज उठी।
रामलाल ने हारकर कहा, "तू क्या चाहती है?"
भूतनी मुस्कुराई, "तुमने मुझसे जो वादा किया था, उसे पूरा करो!"
फैज़ल गुस्से में बोला, "तूने हमसे झूठ बोला! तूने कहा था कि तेरा पति इस गाँव में है, लेकिन तू हमें धोखा देकर यहाँ फँसाना चाहती थी!"
"सही कहा... लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है!"
ट्रक के शीशे पर कुछ अजीब आकृतियाँ बनने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे कई आत्माएँ ट्रक के चारों ओर जमा हो रही थीं।
रामलाल और फैज़ल के रोंगटे खड़े हो गए। ट्रक के शीशे पर बनी आकृतियाँ अब ज़्यादा साफ़ होने लगीं। वे शक्लें उन लोगों की थीं जो पहले इस रास्ते से गुज़रे थे… और कभी वापस नहीं लौटे!
फैज़ल ने काँपते हुए कहा, "भाई, ये जगह हमें ज़िंदा नहीं छोड़ेगी!"
रामलाल ने पूरी ताकत लगाकर एक्सेलरेटर दबाया, लेकिन ट्रक जैसे किसी अदृश्य ज़ंजीर से बंध गया था।
फिर एक ठंडी फुसफुसाहट आई—
"तुम्हें भी हमारी तरह यहीं रहना होगा…"
तभी, भूतनी अचानक रोने लगी।
"मुझे इंसाफ़ चाहिए! मुझे धोखा मिला था, मेरी आत्मा को शांति नहीं मिली!"
रामलाल और फैज़ल ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गहरा दर्द और नफ़रत थी।
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "हमें छोड़ दे… हम तेरी मदद करेंगे!"
भूतनी चिल्लाई, "कोई मेरी मदद नहीं कर सकता!"
चारों ओर अंधेरा बढ़ता गया… ट्रक के अंदर भी ठंडी लहरें दौड़ने लगीं!
फैज़ल ने तुरंत कुरान की आयतें पढ़नी शुरू कर दीं। ट्रक ज़ोर से हिलने लगा… और फिर…
भूतनी चीख पड़ी!
रामलाल को समझ आ गया कि अगर उन्हें बचना है, तो इस आत्मा को मुक्ति दिलानी होगी।
"हमें तेरा बदला लेने में मदद करनी होगी, है ना?"
भूतनी ने धीरे से सिर हिलाया… और फिर उसकी परछाईं हवा में घुलने लगी…
लेकिन क्या वो सच में चली गई?
या फिर ये सिर्फ़ शुरुआत थी?
भूतनी की परछाईं धीरे-धीरे हवा में घुल रही थी, लेकिन उसकी आँखों की जलती हुई लाल चमक अभी भी मौजूद थी।
रामलाल और फैज़ल ने राहत की सांस ली, लेकिन ट्रक अब भी हिल नहीं रहा था।
तभी, फैज़ल की नज़र सड़क के किनारे लगे एक पुराने, जले हुए बोर्ड पर पड़ी। उस पर नाम अब भी हल्का सा दिख रहा था—
"कुसुमपुर गाँव"
रामलाल ने धीरे से कहा, "यही वो गाँव होगा जहाँ इसका अतीत छिपा है..."
फैज़ल ने हाँ में सिर हिलाया। "अगर हमें बचना है, तो इस गाँव की सच्चाई जाननी होगी।"
गाँव का अंधेरा सच
ट्रक जैसे ही गाँव की ओर बढ़ा, हवा और ठंडी हो गई।
गाँव वीरान था… टूटी-फूटी झोपड़ियाँ, सूखे कुएँ, और जगह-जगह राख के ढेर।
अचानक, एक बूढ़ी औरत दिखाई दी।
"तुम यहाँ क्यों आए हो?" उसने कराहते हुए पूछा।
रामलाल ने झिझकते हुए जवाब दिया, "हम… हम उस आत्मा की मुक्ति चाहते हैं, जो इस सड़क पर भटक रही है।"
बूढ़ी औरत की आँखों में डर उभर आया। "तुम्हें नहीं पता, उसने क्या किया था!"
फैज़ल और रामलाल सन्न रह गए।
"क्या भूतनी सच में एक पीड़ित आत्मा थी, या फिर उसने खुद कोई पाप किया था?"
रामलाल और फैज़ल की आँखों में सवाल थे। बूढ़ी औरत कांपते हुए बोली—
"यह गाँव… श्रापित है!"
फैज़ल ने हैरानी से पूछा, "क्यों? इस आत्मा ने क्या किया था?"
बूढ़ी औरत ने कांपती आवाज़ में बताया—
"वो लड़की, जिसका भूत इस सड़क पर भटकता है… उसका नाम कुसुम था।"
रामलाल चौक पड़ा, "तो गाँव का नाम उसी के नाम पर पड़ा है?"
बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया। "हाँ, लेकिन ये गाँव कुसुम की वजह से ही बर्बाद हुआ।"
50 साल पहले…
कुसुम एक अमीर साहूकार की बेटी थी। वह बेहद खूबसूरत थी, लेकिन अहंकारी और निर्दयी भी।
उसका दिल एक गरीब युवक 'रघु' पर आ गया था, लेकिन कुसुम सिर्फ उससे खेल रही थी।
रघु की शादी उसकी बचपन की दोस्त से तय थी, लेकिन कुसुम ने उसे जबरन अपने पास बुला लिया।
जब रघु ने शादी से इनकार किया, तो कुसुम ने झूठा इल्ज़ाम लगाकर उसे मरवा दिया।
गाँववालों को जब सच्चाई पता चली, तो उन्होंने कुसुम को उसी सड़क पर छोड़ दिया… अकेली, अंधेरे में।
भूख-प्यास से तड़पकर कुसुम ने वहीं दम तोड़ दिया।
मरने से पहले, उसने श्राप दिया— "जो भी इस सड़क से गुज़रेगा, उसे मेरी पीड़ा महसूस होगी!"
रामलाल और फैज़ल का फैसला
रामलाल और फैज़ल यह सुनकर कांप गए।
"मतलब... हम जिस आत्मा को मुक्ति देना चाहते थे, वो खुद श्रापित थी?" फैज़ल ने कहा।
"अब क्या करें?" रामलाल ने पूछा।
बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा, "अगर तुम सच में बचना चाहते हो, तो उसका श्राप तोड़ना होगा…"
"लेकिन यह आसान नहीं होगा!"
बूढ़ी औरत की आँखों में डर था। उसने कांपते हुए कहा,
"श्राप को तोड़ने का एक ही तरीका है… आत्मा से क्षमा माँगना और उसकी अधूरी इच्छा पूरी करना!"
रामलाल और फैज़ल एक-दूसरे को देखने लगे।
"लेकिन… उसकी अधूरी इच्छा क्या थी?" फैज़ल ने पूछा।
बूढ़ी औरत ने लंबी साँस ली, "कुसुम ने जिस व्यक्ति से प्रेम का नाटक किया, वह 'रघु' था। उसकी आत्मा भी अब भटक रही होगी। तुम्हें इन दोनों आत्माओं को मिलाना होगा!"
"अगर हम ऐसा न कर पाए तो?" रामलाल ने घबराते हुए पूछा।
बूढ़ी औरत ने उनकी आँखों में झाँका और धीरे से बोली, "तो तुम दोनों कभी इस गाँव से जिंदा बाहर नहीं जा पाओगे!"
खौफनाक रात की शुरुआत
रामलाल और फैज़ल ने डरते-डरते रघु की आत्मा को खोजने का फैसला किया।
"लेकिन हम उसे कैसे ढूंढेंगे?" फैज़ल ने घबराते हुए कहा।
बूढ़ी औरत ने इशारा किया, "शमशान घाट पर जाओ… वहां उसकी आत्मा तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी!"
रामलाल और फैज़ल टॉर्च लेकर शमशान घाट की ओर बढ़ने लगे।
रात के घने अंधेरे में सिर्फ उनके कदमों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
अचानक…
"कौन हो तुम?"
एक साया उनकी ओर बढ़ रहा था…
क्या यह रघु की आत्मा थी? या कोई और खौफनाक रहस्य उनका इंतज़ार कर रहा था?
रामलाल और फैज़ल की साँसें तेज़ हो गईं। सामने एक धुंधली परछाईं धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।
"कौन हो तुम?" फैज़ल ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
परछाईं अचानक थम गई। हल्की चाँदनी में अब उसकी आकृति साफ़ दिखाई दे रही थी—एक दुबला-पतला आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, आँखें एकदम लाल।
"मेरा नाम रघु है…"
रामलाल और फैज़ल ने एक-दूसरे की ओर देखा। तो यह वही रघु था, जिसकी आत्मा को चैन नहीं मिला था!
रघु की अधूरी कहानी
रघु ने भारी आवाज़ में बोलना शुरू किया,
"कुसुम से मैंने बेइंतहा प्यार किया था। मैं उससे शादी करना चाहता था। लेकिन उसने मेरे साथ छल किया। मुझे धोखा देकर किसी और से शादी कर ली। उसी ग़म में मैंने अपनी जान दे दी… और अब तक इस दुनिया में अटका हुआ हूँ।"
रामलाल ने धीरे से कहा, "लेकिन कुसुम की आत्मा भी यहाँ भटक रही है। शायद वह भी तुम्हें ढूँढ रही है।"
रघु की आँखों में एक पल को कोमलता आई, लेकिन फिर गुस्से की एक लहर दौड़ गई।
"नहीं! वह मुझे नहीं चाहती थी! उसने मुझसे झूठ बोला था!"
फैज़ल ने हिम्मत करके कहा, "अगर हम तुम्हारी आत्मा को कुसुम से मिलवा दें, तो क्या तुम इस जगह को छोड़ दोगे?"
रघु कुछ देर तक चुप रहा, फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, "अगर वह सच में मुझे चाहती थी, तो मैं उसे माफ़ कर दूँगा…"
अंधेरे में हलचल
तभी… अचानक तेज़ हवा चलने लगी। शमशान घाट में सूखे पत्ते उड़ने लगे।
"वह आ रही है…"
रघु की आवाज़ काँप उठी।
"कौन आ रही है?" रामलाल ने घबराकर पूछा।
"कुसुम की आत्मा!"
अचानक, दूर से एक साया धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगा…
क्या कुसुम और रघु की आत्मा सच में मिल पाएंगी? या फिर कोई और रहस्य सामने आने वाला है?
तेज़ हवाएँ चल रही थीं। शमशान घाट की राख उड़कर हवा में मिल रही थी। फैज़ल और रामलाल ने महसूस किया कि तापमान अचानक गिर गया था। एक साया, सफेद कपड़ों में लिपटा, धुंध के बीच से उनकी ओर बढ़ रहा था।
रघु की आत्मा काँप उठी। उसने थरथराते हुए कहा, "कुसुम… तुम सच में आ गई?"
कुसुम की पीड़ा
साया धीरे-धीरे और स्पष्ट हुआ। कुसुम की आत्मा अब पूरी तरह सामने थी। उसकी आँखों में दर्द और अफ़सोस था।
"रघु… तुम इतने सालों तक यहीं रुके रहे?"
रघु की आत्मा में गुस्सा उबल पड़ा। "तुमने मुझे धोखा दिया था! मुझे झूठे सपने दिखाए, और फिर किसी और के साथ चली गई!"
कुसुम की आत्मा ने धीरे से सिर झुका लिया। "नहीं, रघु… मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया…"
रामलाल और फैज़ल दोनों स्तब्ध खड़े थे। उन्होंने देखा कि कुसुम की आँखों में आँसू थे, लेकिन वह आत्मा थी—कैसे आँसू बह सकते थे?
रहस्य से पर्दा उठता है
कुसुम ने सिसकते हुए कहा,
"रघु, मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला। मेरी शादी ज़बरदस्ती करवाई गई थी। मैंने अपनी मर्ज़ी से तुम्हें नहीं छोड़ा। जिस दिन तुम्हारी मौत की खबर मिली, मैंने भी अपने प्राण त्याग दिए थे। लेकिन शायद मेरी आत्मा को भी चैन नहीं मिला…"
रघु की आत्मा काँपने लगी। उसके चेहरे पर ग़ुस्सा और दर्द दोनों झलक रहे थे।
फैज़ल ने धीरे से कहा, "इसका मतलब तुम दोनों को धोखा दिया गया था?"
कुसुम की आत्मा ने सिर हिलाया। "हाँ… और इसीलिए हमारी आत्माएँ इस दुनिया में भटक रही हैं।"
मुक्ति की राह
रामलाल ने आगे बढ़कर कहा, "अगर हम तुम्हारी आत्माओं को एक कर दें, तो क्या तुम इस जगह को छोड़ दोगे?"
रघु और कुसुम दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
धीरे-धीरे, एक सफेद रोशनी चारों ओर फैलने लगी।
फैज़ल ने महसूस किया कि यह रोशनी शुद्ध ऊर्जा थी—शायद इन दोनों आत्माओं की मुक्ति का समय आ गया था।
रघु ने कांपती आवाज़ में कहा, "कुसुम, अगर तुम्हें भी मेरी तरह प्यार था, तो मुझे माफ़ कर दो।"
कुसुम की आँखों में एक चमक आई। उसने धीरे से हाथ बढ़ाया। रघु ने भी अपना हाथ बढ़ाया… और जैसे ही उनके हाथ मिले, एक ज़ोरदार चमक फैली और दोनों आत्माएँ रोशनी में विलीन हो गईं।
सब कुछ शांत हो गया
रामलाल और फैज़ल ने महसूस किया कि हवा अब थम चुकी थी।
फैज़ल ने लंबी सांस ली और कहा, "शायद अब इस जगह को शांति मिल गई।"
रामलाल ने सिर हिलाया, "हाँ, लेकिन ये सब देखकर मैं यकीन से कह सकता हूँ कि कुछ आत्माएँ तब तक भटकती रहती हैं, जब तक उन्हें न्याय न मिले।"
दोनों ने एक आखिरी बार शमशान घाट की ओर देखा… अब वहाँ बस एक गहरी शांति थी।
रघु और कुसुम की आत्माएँ जैसे ही रोशनी में विलीन हुईं, चारों ओर एक गहरी खामोशी छा गई। फैज़ल और रामलाल को ऐसा लगा जैसे इस जगह का बोझ अब हल्का हो गया हो।
फैज़ल ने धीरे से कहा, "अब तो सब खत्म हो गया, ना?"
रामलाल ने कुछ देर सोचा और फिर सिर हिलाया, "शायद हाँ… लेकिन मैं अब भी महसूस कर सकता हूँ कि ये जगह पूरी तरह खाली नहीं हुई है।"
दूर कहीं उल्लू की आवाज़ गूँज उठी, और ठंडी हवा एक बार फिर बहने लगी।
ट्रक की वापसी
दोनों धीरे-धीरे वापस अपने ट्रक की ओर बढ़े। ट्रक अभी भी वहीं खड़ा था, लेकिन अब वह पहले जितना भूतिया नहीं लग रहा था।
फैज़ल ने ट्रक का दरवाज़ा खोला और अंदर झाँका। हर चीज़ वैसी ही थी, जैसे उन्होंने छोड़ी थी। लेकिन एक चीज़ अलग थी—डैशबोर्ड पर कुसुम का पुराना फोटो पड़ा था, जो पहले वहाँ नहीं था!
रामलाल ने फोटो उठाया और ध्यान से देखा।
"ये कहाँ से आया?"
फैज़ल ने एक लंबी सांस ली, "शायद ये इस बात का सबूत है कि वे अब शांति में हैं।"
आगे का रास्ता
रामलाल ने ट्रक स्टार्ट किया। इंजन की घरघराहट सुनकर दोनों को सुकून मिला।
"अब हमें निकलना चाहिए।" फैज़ल ने कहा, और ट्रक धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
जैसे ही ट्रक हाईवे पर दौड़ने लगा, फैज़ल ने पीछे मुड़कर देखा।
शमशान घाट अब धुंध में गायब हो चुका था।
रामलाल ने स्टीयरिंग पर हाथ कसते हुए कहा, "चलो, अब नई मंज़िल की ओर बढ़ते हैं।"
लेकिन क्या सच में सब खत्म हो गया?
जैसे ही ट्रक हाईवे पर तेज़ रफ्तार से दौड़ने लगा, अचानक फैज़ल को ऐसा लगा जैसे कोई ट्रक के पीछे वाली सीट पर बैठा हो!
उसने धीरे-धीरे शीशे में झाँका…
और फिर उसकी आँखें डर से फटी रह गईं!
फैज़ल की आँखें शीशे में अटक गईं। उसे पीछे की सीट पर किसी की परछाई दिखी!
उसका गला सूख गया। उसने कांपती आवाज़ में रामलाल से कहा, "भाई… ट्रक में कोई बैठा है!"
रामलाल ने तुरंत ब्रेक लगाया। ट्रक झटके से रुक गया।
दोनों ने डरते-डरते पीछे मुड़कर देखा—
पीछे की सीट खाली थी!
फैज़ल ने हकलाते हुए कहा, "मैंने सच में किसी को देखा था… कोई था वहाँ!"
रामलाल ने धीरे से कहा, "चलो नीचे उतर कर देखते हैं।"
रात की खामोशी में...
दोनों ट्रक से उतरे और टॉर्च जलाकर ट्रक के अंदर झाँकने लगे।
सब कुछ सामान्य था।
रामलाल ने गहरी सांस ली, "शायद थकान की वजह से तुम्हें ऐसा लगा होगा।"
लेकिन फैज़ल को अब भी अजीब सा अहसास हो रहा था, जैसे कोई उन्हें देख रहा हो।
तभी…
हवा में किसी के धीमे-धीमे हंसने की आवाज़ आई!
फैज़ल और रामलाल के रोंगटे खड़े हो गए।
"क… कौन है?" फैज़ल ने कांपती आवाज़ में पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
सड़क पर परछाइयाँ
दोनों जल्दी से ट्रक में बैठे और रामलाल ने इंजन स्टार्ट कर दिया।
ट्रक फिर से चलने लगा, लेकिन फैज़ल अब भी बेचैन था।
तभी, सड़क के किनारे उसे कुछ अजीब दिखा—
कई परछाइयाँ, जो बिना किसी शरीर के हिल रही थीं!
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने रामलाल से कहा, "भाई, तेज़ चलाओ… यहाँ कुछ ठीक नहीं है!"
रामलाल ने एक्सीलरेटर दबा दिया, और ट्रक हवा से बातें करने लगा।
लेकिन जैसे ही उन्होंने स्पीड बढ़ाई, सामने अचानक कोई आ गया!
"भाई! ब्रेक मारो!" फैज़ल चीख पड़ा।
रामलाल ने जोर से ब्रेक लगाया…
ट्रक झटके से रुक गया!
सामने जो खड़ा था, उसे देखकर दोनों की आत्मा काँप गई…
रघु!
रामलाल और फैज़ल का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। सामने रघु खड़ा था—वही रघु, जो दो साल पहले इसी रास्ते पर गायब हो गया था!
उसका चेहरा असामान्य रूप से सफेद था, आँखें गहरी काली और होठों पर एक अजीब सी मुस्कान।
फैज़ल ने कांपते हुए रामलाल से कहा, "भ… भाई, ये सच में रघु है या..."
रामलाल की जबान नहीं खुल रही थी। उसकी आँखें फैल गईं जब उसने देखा—
रघु के पैर ज़मीन से ऊपर थे!
भूतिया खेल शुरू...
रामलाल ने कांपते हाथों से हॉर्न बजाया, लेकिन रघु टस से मस नहीं हुआ।
फिर, उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और ट्रक की तरफ इशारा किया।
"उ… उलटा चलाओ!" रघु की फुसफुसाहट गूँजी।
फैज़ल का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।
रामलाल ने झट से ट्रक रिवर्स में डाला और तेजी से पीछे जाने लगा। लेकिन जैसे ही ट्रक पीछे गया…
पीछे वाली सीट पर फिर से कोई बैठ गया!
सीट पर कौन है?
फैज़ल ने धीरे से पीछे मुड़कर देखा और उसकी चीख निकल गई।
एक जली हुई औरत वहाँ बैठी थी!
उसकी आँखों से खून बह रहा था, और होंठों से एक डरावनी हंसी निकली।
"मुझे मेरे बच्चे वापस दो..."
फैज़ल की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा।
रामलाल ने उसे झकझोर कर कहा, "फैज़ल! होश में आ! ये सब मत देख!"
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी… ट्रक के चारों ओर साए घूमने लगे, हवा में किसी के रोने और हंसने की आवाजें गूंजने लगीं।
रामलाल ने पूरी ताकत से ट्रक आगे बढ़ाया और सड़क के आखिरी छोर तक पहुंच गया।
अचानक सब शांत...
जैसे ही ट्रक ने पुराने शिव मंदिर के पास प्रवेश किया, अचानक सब कुछ शांत हो गया।
न कोई परछाई, न कोई आवाज़।
रामलाल और फैज़ल ने घबराकर एक-दूसरे को देखा।
फैज़ल ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाई… हम जिंदा हैं?"
रामलाल ने लंबी सांस ली और धीरे से कहा, "शायद… लेकिन अभी भी सफर बाकी है!"
रामलाल और फैज़ल ने राहत की सांस ली, लेकिन उनके दिलों की धड़कनें अभी भी तेज थीं। ट्रक अब पुराने शिव मंदिर के पास खड़ा था, और वहाँ का वातावरण अजीब रूप से शांत था।
चारों तरफ घना अंधेरा था, मंदिर के पास जलती हुई एक मात्र दीया मंद-मंद रोशनी दे रहा था।
"भाई, अब क्या करें?" फैज़ल की आवाज़ अभी भी कांप रही थी।
रामलाल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "अब हमें जल्द से जल्द ये हाईवे छोड़ना होगा। ये जगह हमारे लिए सही नहीं है।"
फैज़ल ने खिड़की से झांककर बाहर देखा—चारों ओर धुंध छाई हुई थी। सड़क के दूसरी तरफ कोई हलचल नहीं थी।
लेकिन तभी…
"धड़ाम!"
ट्रक के पीछे से किसी चीज़ के गिरने की जोरदार आवाज़ आई!
पीछे कौन था?
रामलाल और फैज़ल की रीढ़ की हड्डी में ठंडक दौड़ गई।
फैज़ल ने डरते-डरते ट्रक के साइड मिरर में देखा…
सड़क पर वही जली हुई औरत खड़ी थी!
उसकी आँखों से आंसू गिर रहे थे, लेकिन वो खून जैसे लाल थे।
रामलाल ने घबराकर ट्रक को फुल स्पीड में आगे बढ़ाया।
लेकिन जैसे ही ट्रक ने रफ्तार पकड़ी, उसके सामने एक छोटा बच्चा आकर खड़ा हो गया!
फैसले की घड़ी...
रामलाल ने तेजी से ब्रेक लगाए, और ट्रक चीखता हुआ रुक गया।
फैज़ल ने कांपते हुए पूछा, "भाई, ये बच्चा कहाँ से आया?"
बच्चे के कपड़े फटे हुए थे, और उसकी आँखों में गहरी उदासी थी।
बच्चे ने धीरे से कहा, "मुझे मेरी माँ के पास जाना है..."
रामलाल और फैज़ल को समझ नहीं आया कि क्या करें।
फैज़ल ने डरते हुए पूछा, "कौन है तेरी माँ?"
बच्चे ने उंगली उठाकर ट्रक के ऊपर इशारा किया!
रामलाल और फैज़ल ने जैसे ही ऊपर देखा, उनकी रूह कांप गई—
जली हुई औरत ट्रक के ऊपर बैठी थी और धीरे-धीरे नीचे झुक रही थी!
भागने का समय...
रामलाल ने बिना कोई और सवाल किए, एक्सीलेटर दबाया और ट्रक को पूरी ताकत से भगाने लगा।
पीछे से बच्चे की चीखती हुई आवाज़ आई, "माँ...!"
लेकिन अब पीछे देखने का कोई सवाल ही नहीं था।
ट्रक अब हाईवे के आखिरी मोड़ के पास पहुँच चुका था।
जैसे ही ट्रक ने मोड़ पार किया, अचानक सब कुछ शांत हो गया।
ना कोई चीख, ना कोई साया, ना कोई अजीब एहसास।
फैज़ल ने लंबी सांस लेते हुए कहा, "हम बच गए?"
रामलाल ने अभी भी ट्रक की स्पीड कम नहीं की थी। उसने धीरे से कहा, "अभी नहीं… अभी भी सफर बाकी है!"
रामलाल और फैज़ल ने राहत की सांस ली, लेकिन उनके दिल अब भी तेज़ी से धड़क रहे थे। ट्रक अपनी पूरी रफ्तार से हाईवे पर दौड़ रहा था।
"भाई, वो बच्चा… और वो औरत… क्या वो सच में थे?" फैज़ल ने कांपती आवाज़ में पूछा।
रामलाल ने बिना नज़र मिलाए जवाब दिया, "फैज़ल, अब हमें पीछे मुड़कर नहीं देखना। ये जगह हमारे लिए नहीं है। बस चलते रहना है।"
हाईवे अब घने जंगल के बीच से होकर गुजर रहा था। सड़क के दोनों किनारों पर लंबे, सूखे पेड़ खड़े थे, जो अंधेरे में भूतिया लग रहे थे।
ट्रक की हेडलाइट्स के अलावा दूर-दूर तक कोई रोशनी नहीं थी।
सड़क पर फिर से कोई था...
कुछ ही मिनटों बाद, फैज़ल ने घबराकर ट्रक की खिड़की से बाहर देखा।
सड़क के किनारे पर कोई खड़ा था।
एक काला साया, बिना हिले-डुले ट्रक की तरफ देख रहा था।
रामलाल ने कोई ध्यान नहीं दिया और ट्रक को तेज़ भगाने लगा।
लेकिन जैसे ही ट्रक आगे बढ़ा, वो साया अचानक सड़क के बीचों-बीच आ गया!
भयानक टकराव…?
"धड़ाम!"
ट्रक सीधा उस साये से टकरा गया, लेकिन कोई झटका महसूस नहीं हुआ।
ट्रक आर-पार निकल गया, जैसे वहां कुछ था ही नहीं।
फैज़ल ने कांपते हुए कहा, "भाई, वो आदमी कहाँ गया?"
रामलाल के माथे पर पसीना आ गया। उसने सिर्फ एक ही जवाब दिया, "बैठ जा, और कुछ मत बोल।"
लेकिन तभी ट्रक के डैशबोर्ड पर ठंडी हवा महसूस हुई।
पीछे से किसी के हंसने की आवाज़ आई।
कौन था पीछे?
फैज़ल ने हिम्मत करके पीछे मुड़कर देखा।
ट्रक की कैबिन में एक परछाईं बैठी थी।
धीरे-धीरे वो परछाईं शक्ल लेने लगी—
बिल्कुल उसी बच्चे जैसी, जो पहले हाईवे पर दिखा था!
उसके होंठों से सिर्फ एक शब्द निकला, "माँ..."
फैसला…
रामलाल और फैज़ल जमीन से उठते हुए धूल में खो गए।
अब उनके पास बस एक ही रास्ता था—ये रास्ता छोड़ देना।
रामलाल ने गाड़ी की रफ्तार और तेज़ कर दी, इस उम्मीद में कि शायद वो इस जगह से निकल सकें।
लेकिन अंधेरा और गहरा होता जा रहा था…
क्या वो इस सफर से बच पाएंगे? या कोई और रहस्य इंतज़ार कर रहा है?
रामलाल और फैज़ल की सांसे तेज़ हो गईं। ट्रक के अंदर का माहौल अब और भी ठंडा हो गया था। फैज़ल ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन रामलाल अब भी सड़क पर पूरा ध्यान दिए हुए था।
"भाई, अगर वो फिर से आ गया तो?" फैज़ल की आवाज़ काँप रही थी।
रामलाल ने कोई जवाब नहीं दिया, बस स्टेयरिंग को कसकर पकड़ लिया। उसकी नजरें सामने के काले, सुनसान हाईवे पर जमी हुई थीं।
अचानक...
ट्रक के सामने एक मोड़ आया, और जैसे ही उन्होंने मुड़ने की कोशिश की, ट्रक का स्टीयरिंग जाम हो गया!
"फैज़ल! ब्रेक दबा!"
फैज़ल ने घबराते हुए ब्रेक पर जोर डाला, लेकिन ट्रक की स्पीड और बढ़ने लगी।
हाईवे के किनारे लगे पुराने, जर्जर बोर्ड से टकराकर ट्रक थोड़ा झटका खा गया।
बोर्ड पर लिखा था—
"आगे मत जाओ... मौत निश्चित है!"
रामलाल और फैज़ल ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
"भाई, ये जगह हमें जाने नहीं देगी!" फैज़ल चिल्लाया।
अचानक, ट्रक के बोनट पर कुछ गिरा।
एक काला साया... बिल्कुल वही बच्चा!
उसकी आँखें सफेद हो गई थीं, और उसके होंठ हिल रहे थे, लेकिन उसकी आवाज़... कहीं और से आ रही थी!
"रुको..."
रामलाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "तुम क्या चाहते हो?"
बच्चे ने धीरे-धीरे सिर उठाया और धीरे से बोला—
"माँ..."
फिर अचानक ट्रक के अंदर हर तरफ औरत की चीखें गूंजने लगीं!
फैज़ल ने खुद को संभालते हुए माथे पर ताबीज़ रखा और दुआ पढ़नी शुरू कर दी।
जैसे ही उसके शब्द हवा में गूंजे, ट्रक तेज़ झटके से रुक गया!
बच्चा बोनट से गायब हो चुका था।
सामने एक पुराना, टूटा-फूटा मकान दिख रहा था...
फैज़ल ने कांपते हुए कहा, "भाई, शायद यही वो जगह है... जहाँ सब खत्म होगा!"
रामलाल ने लंबी सांस ली और ट्रक से उतरने के लिए दरवाजा खोला...
लेकिन तभी—
कोई उनके ठीक पीछे खड़ा था!
रामलाल ने जैसे ही ट्रक का दरवाजा खोला, उसे एक ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। फैज़ल की साँसे तेज़ हो गईं।
"भाई... हमारे पीछे कोई खड़ा है!" फैज़ल फुसफुसाया।
रामलाल ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई… और जैसे ही उसकी नजर पीछे गई, उसका खून जम गया!
वहाँ एक ऊँची कद-काठी वाली औरत खड़ी थी, जिसके बाल हवा में उड़ रहे थे। उसका चेहरा अधेरा था, लेकिन उसकी आँखें जलती हुई अंगारों की तरह चमक रही थीं!
रामलाल ने ट्रक से नीचे छलांग लगाई और फैज़ल को भी खींच लिया। दोनों अब सड़क पर खड़े थे, लेकिन वो औरत अब भी हवा में तैरती हुई उनकी तरफ बढ़ रही थी!
"भाग फैज़ल!"
दोनों दौड़ते हुए पास के पुराने, उजाड़ मकान में घुस गए।
अंदर घुसते ही दरवाजा अपने आप ज़ोर से बंद हो गया।
चारों तरफ सिर्फ धूल, टूटी-फूटी दीवारें, और पुराने जले हुए फोटो फ्रेम पड़े थे।
फैज़ल ने कांपते हुए एक दीवार पर हाथ रखा...
अचानक—
उसका हाथ किसी ठंडी चीज़ से टकराया।
फैज़ल ने नीचे देखा...
वहाँ खून से सनी एक पुरानी लाल साड़ी पड़ी थी!
तभी मकान के अंदर एक धीमी आवाज़ आई—
"मुझे मेरा बच्चा चाहिए..."
रामलाल और फैज़ल दोनों पीछे हट गए।
"भाई, ये वही औरत है!" फैज़ल की आवाज़ डर से कांप रही थी।
"जो बच्चा हमें हाईवे पर दिखता था... ये उसी की माँ है!"
"तो अब क्या करें?"
अचानक...
मकान के एक कोने में से एक परछाई हिलने लगी।
वो औरत धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी…!
क्या रामलाल और फैज़ल उस भूतिया औरत से बच पाएंगे? क्या ये सच में वही औरत थी जिसका बच्चा हाईवे पर भटक रहा था?
रामलाल और फैज़ल घबराकर पीछे हटे। उनके सामने वो भूतिया औरत अब और भी ज्यादा डरावनी लग रही थी। उसका चेहरा अब साफ दिख रहा था—फटे-फटे होंठ, काले जलते हुए आँखों के गड्ढे और चेहरा जले हुए चमड़े जैसा!
औरत की आवाज़ फिर से गूँजी—
"मेरा बच्चा... मुझे मेरा बच्चा चाहिए..."
रामलाल ने फैज़ल का हाथ पकड़ा, "हमें यहाँ से भागना होगा!"
"लेकिन कैसे भाई? दरवाजा तो अपने आप बंद हो गया!"
तभी मकान के कोने में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी। उस पर धूल जमी हुई थी और उसे छूते ही वो अपने आप खुल गई।
अंदर रखी थी... एक छोटी लाल चादर!
फैज़ल ने चादर को उठाया, और तभी उसे अजीब सा अहसास हुआ।
उसका दिमाग अचानक तेज़ी से घूमने लगा और उसे वो रात याद आने लगी...
रामलाल और फैज़ल इसी जोधपुर हाईवे पर ट्रक चला रहे थे। तेज़ तूफान के बीच उन्हें एक औरत भागती हुई दिखी थी, उसकी गोद में एक नन्हा बच्चा था।
पीछे से एक काली जीप तेज़ी से आई और औरत को टक्कर मार दी।
औरत हवा में उछलकर दूर जा गिरी, और बच्चा...
बच्चा सीधा उनके ट्रक के नीचे आ गया था!
रामलाल ने ब्रेक लगाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
बच्चा वहीं दम तोड़ चुका था।
फैज़ल की आँखों से आँसू गिरने लगे, "भाई... हमने उस औरत की मदद नहीं की थी... हम डर गए थे और वहाँ से भाग गए थे!"
रामलाल के हाथ भी काँप रहे थे।
"इसलिए वो आत्मा हमें हर जगह देख रही थी... हमें सजा दे रही थी!"
तभी मकान के अंदर हवा चलने लगी। वो औरत अब और गुस्से में दिखने लगी थी।
"तुमने मेरा बच्चा मारा था... अब तुम जियोगे नहीं!"
अचानक दीवारों से काले हाथ निकलने लगे। छत हिल रही थी, फर्श फटने लगा... मकान जैसे उन्हें ज़िंदा निगलने वाला था!
रामलाल और फैज़ल अब पूरी तरह डर के मारे जड़ हो चुके थे।
"अब हम बच नहीं सकते भाई!"
क्या रामलाल और फैज़ल इस श्राप से बच पाएंगे? या उनकी भी मौत इसी जगह लिखी जा चुकी है?
रामलाल और फैज़ल के चारों ओर मकान हिलने लगा। दीवारों से निकलते काले हाथ उनकी ओर बढ़ रहे थे। हवा में भयानक चीखें गूंजने लगीं।
"मेरा बच्चा… मुझे मेरा बच्चा दो!"
भूतिया औरत अब पूरी तरह आग की तरह जल रही थी। उसका चेहरा पिघल रहा था, और उसकी आँखों से खून के आँसू गिर रहे थे।
रामलाल ने कांपते हुए वो लाल चादर उठाई, जो उन्होंने अलमारी में देखी थी।
"फैज़ल, हमें प्रायश्चित करना होगा!"
फैज़ल ने कांपते हुए कहा, "भाई, हम उस रात भाग गए थे, लेकिन आज नहीं भाग सकते। हमें उसकी आत्मा को शांति देनी होगी!"
रामलाल ने लाल चादर को ज़मीन पर रखा और रोते हुए कहा,
"बहन, हमें माफ़ कर दो… हम डर गए थे, लेकिन हमने जानबूझकर तुम्हारे बच्चे को नहीं मारा!"
फैज़ल भी फूट-फूटकर रोने लगा, "तुम्हारा बच्चा अब हमारे गुनाह की सज़ा मत दो… हमें माफ़ कर दो!"
तभी मकान के अंदर की तेज़ हवाएँ रुक गईं। दीवारों से निकलते काले हाथ धीरे-धीरे गायब होने लगे।
भूतिया औरत अब धीरे-धीरे शांत होने लगी। उसकी आँखों में जलते हुए शोले अब ठंडी राख में बदल रहे थे।
उसने अपने कंकाल जैसे हाथ से लाल चादर को उठाया, अपने सीने से लगाया और अचानक हवा में घुलकर गायब हो गई।
रामलाल और फैज़ल ज़मीन पर गिर पड़े। उनके शरीर थकान से चूर हो चुके थे।
मकान अब एक खंडहर की तरह था। हर चीज़ शांत और ठंडी हो चुकी थी।
उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा—वे जिंदा थे!
रामलाल ने कहा, "भाई, ये सब हमारे पाप की वजह से हुआ। हमें अपनी ज़िंदगी अब नेक तरीके से बितानी होगी!"
फैज़ल ने सहमति में सिर हिलाया, "हाँ भाई, अब से हम किसी की तकलीफ को नज़रअंदाज नहीं करेंगे।"
अंत… लेकिन एक सवाल बाकी
रामलाल और फैज़ल ने हाईवे पर अपने ट्रक को स्टार्ट किया और वहाँ से निकल गए।
लेकिन जैसे ही ट्रक हाईवे से गुजर रहा था, उन्होंने देखा—
सड़क किनारे वही औरत खड़ी थी…
अब वो डरावनी नहीं थी, बल्कि शांत और मुस्कुराती हुई दिख रही थी।
क्या ये उनकी माफी का जवाब था?
या… कुछ और रहस्य अभी बाकी थे?
(अंत)

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