जम्मू-कश्मीर हाईवे: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती
जम्मू-कश्मीर हाईवे: ट्रक ड्राइवर की सच्ची आपबीती
सफर की शुरुआत
मेरा नाम रवि शर्मा है। उम्र 38 साल। पिछले 15 सालों से ट्रक चला रहा हूँ। मैंने ज़िंदगी के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर हाईवे की कहानियाँ कुछ अलग ही होती हैं। वहां का सफर हमेशा खतरनाक होता है—कभी मौसम की मार, कभी पुलिस चेकिंग, तो कभी अनजान खतरे। लेकिन जब पेट भरने के लिए काम ही यही हो, तो डरना कैसा?
मेरे साथ इस सफर में अजीम खान है—मेरा खलासी, यानी मेरा असली साथी। हम दोनों सालों से साथ सफर कर रहे हैं। अजीम मज़ाकिया है, चाय का शौकीन और ट्रकों की अच्छी जानकारी रखता है। वो मुस्लिम है, मैं हिंदू, लेकिन हमारी दोस्ती ऐसी है जैसे दो भाई। हाईवे पर मजहब से ज़्यादा भूख और नींद बड़ी चीज़ होती है।
ट्रक और सामान
इस बार हम दिल्ली से श्रीनगर का माल लेकर निकले हैं। ट्रक में इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स लोड हैं—टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन वगैरह। कुल वजन 18 टन, यानी पूरी तरह लोडेड ट्रक। गाड़ी है TATA 4018, नंबर RJ14 KB 786। राजस्थान में रजिस्टर हुई थी, लेकिन अब पूरे उत्तर भारत में दौड़ती है।
रास्ते की प्लानिंग
हमने दिल्ली से रात 10 बजे रवाना होने का प्लान बनाया था। ट्रक ड्राइवरों के लिए रात का सफर बेहतर होता है, क्योंकि ट्रैफिक कम रहता है।
रूट कुछ इस तरह होगा:
दिल्ली से करनाल (NH-44, 150 km) → पहला छोटा स्टॉप
करनाल से अमृतसर (NH-44, 310 km) → यहाँ थोड़ा लंबा ब्रेक
अमृतसर से जम्मू (NH-44, 215 km) → यहाँ पुलिस चेकिंग होती है
जम्मू से श्रीनगर (NH-44, 270 km) → सबसे मुश्किल और खतरनाक हिस्सा
कुल दूरी लगभग 950 किमी है, और हमें इसे दो दिन में पूरा करना है।
चेकपोस्ट और कागज़ात
एक ट्रक ड्राइवर के लिए सफर आसान नहीं होता। हर जगह पुलिस चेकपोस्ट, टोल नाके, और RTO इंस्पेक्शन होते हैं। अगर पेपर पूरे नहीं हुए, तो ट्रक वहीं रुक जाएगा। मैंने अपने सारे डॉक्यूमेंट्स चेक किए:
RC (रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट)
फिटनेस सर्टिफिकेट (ट्रक चलाने के लिए जरूरी)
इंश्योरेंस पेपर
परमिट (ऑल इंडिया परमिट)
जीएसटी इनवॉइस और बिल (माल के लिए)
सब कुछ सही था। अब हमें सिर्फ सफर शुरू करना था।
पहली रात – सफर की शुरुआत
रात के 10 बजे हम दिल्ली के संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर से निकले। ट्रक का इंजन गरजते हुए स्टार्ट हुआ, और सफर शुरू हुआ। हाईवे पर हल्की भीड़ थी, लेकिन रात जैसे-जैसे बढ़ी, सड़क खाली होती गई।
अजीम ने मुझसे कहा, "भाई, ढाबे पर चाय पीनी है क्या?"
मैंने मुस्कुराकर कहा, "अभी नहीं, करनाल में रोकेंगे।"
रास्ते में कुछ छोटे गाँव, फैक्ट्रियाँ और पेट्रोल पंप पड़े। हम लगातार चलते रहे।
रात 1 बजे – करनाल में पहला ब्रेक
करीब 150 किलोमीटर के बाद हमने करनाल के एक मशहूर ढाबे पर ट्रक रोका। वहाँ कुछ और ट्रक ड्राइवर भी थे। कुछ लोग खाना खा रहे थे, कुछ सो रहे थे।
मैंने आलू के पराँठे और दही मंगवाए, और अजीम ने चाय और सिगरेट ली। हम दोनों खाना खाते हुए बातें करने लगे। तभी एक बुजुर्ग ट्रक ड्राइवर हमारे पास आया और बोला:
"कहाँ जा रहे हो, भाइयों?"
मैंने कहा, "भाई, श्रीनगर जा रहे हैं, इलेक्ट्रॉनिक सामान लेकर।"
बुजुर्ग ड्राइवर ने गहरी साँस ली और धीरे से बोला:
"जम्मू-कश्मीर हाईवे पर रात में संभल कर जाना। वहाँ कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं, जो दिखती नहीं, पर महसूस होती हैं..."
मैं और अजीम एक-दूसरे को देखने लगे। हमने पहले भी कई डरावनी कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन उन्हें सच मानना मुश्किल था।
खैर, हमने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और खाना खत्म करके आगे बढ़ गए। लेकिन हमें नहीं पता था कि ये सफर हमारी ज़िंदगी का सबसे डरावना सफर बनने वाला था...
चेकिंग पॉइंट और अनजाना खतरा
रात के 1:30 बजे हम करनाल से रवाना हुए। अजीम ने एक सिगरेट सुलगाई और खिड़की से बाहर देखते हुए बोला, "भाई, वो बूढ़ा ट्रक ड्राइवर क्या बोल रहा था? कोई भूत-प्रेत की बात कर रहा था क्या?"
मैंने हंसते हुए कहा, "अरे छोड़ ना! ये ट्रक ड्राइवरों की पुरानी आदत होती है, डरावनी कहानियाँ सुनाने की। तूने सुना नहीं, हर रूट की अपनी एक कहानी होती है?"
अजीम हंसने लगा, लेकिन उसकी आँखों में हल्की चिंता थी।
अगला पड़ाव – अंबाला पुलिस चेकिंग
रात के 3 बजे, हम अंबाला पहुँचे। यहाँ एक पुलिस चेकपोस्ट था, जहाँ हर ट्रक की जाँच हो रही थी। जैसे ही हमारी बारी आई, एक हवलदार ने हमें हाथ दिखाकर रोक दिया।
"कहाँ जा रहे हो?" उसने सख्त आवाज़ में पूछा।
"साहब, दिल्ली से श्रीनगर, इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स का माल है।"
"कागज़ दिखाओ," उसने कहा।
मैंने दस्तावेज़ निकाले—RC, परमिट, इंश्योरेंस, और जीएसटी बिल। सब कुछ सही था।
तभी एक और अफसर आया और ट्रक की ओर देखने लगा। उसने धीरे से कहा,
"ट्रक में क्या-क्या लोड है?"
"टीवी, फ्रिज, और वॉशिंग मशीन, साहब।"
उसने टॉर्च जलाकर ट्रक के अंदर झाँका, फिर इशारा किया, "ओपन करो!"
मैंने ट्रक का पीछे का दरवाज़ा खोला। सामान सही से रखा था, लेकिन अजीब बात ये थी कि अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।
"इतनी ठंड क्यों है अंदर?" हवलदार ने पूछा।
मुझे खुद समझ नहीं आया। हमने कोई रेफ्रिजरेटेड सामान तो लोड नहीं किया था।
खैर, पुलिस ने सब कुछ देखकर हमें जाने दिया। लेकिन जाते-जाते हवलदार ने कहा,
"भाई, जम्मू-कश्मीर हाईवे पर संभलकर जाना। वहाँ कई बार ट्रक ड्राइवरों को अजीब चीजें महसूस होती हैं।"
मैंने मुस्कुरा कर कहा, "साहब, डराने का कोई फायदा नहीं, हम रोज़ इस रूट पर जाते हैं।"
लेकिन अजीम अब चुप था।
अमृतसर की ओर सफर और पहला डरावना इशारा
हमने 4 बजे अंबाला पार किया और अब हाईवे सुनसान था। चारों ओर घना कोहरा फैलने लगा था। अजीम ने एक और सिगरेट जलाई और धीमी आवाज़ में कहा,
"भाई, ये ठंडी हवा अंदर से क्यों आई थी?"
मैंने कहा, "मालूम नहीं, शायद अंदर कुछ गीला सामान रखा होगा।"
लेकिन सच कहूँ तो, मेरे मन में भी हल्की बेचैनी थी।
रात के 5 बजे, जब हम लुधियाना के पास थे, तब कुछ अजीब हुआ।
सामने सड़क पर एक आदमी खड़ा था, जिसने सफेद कपड़े पहने हुए थे। उसने ट्रक रोकने के लिए हाथ उठाया।
अजीम ने चौककर कहा, "भाई, इतनी रात को ये कौन खड़ा है?"
मैंने धीरे से ट्रक की रफ्तार कम की, लेकिन अंदर से अजीब-सा डर महसूस हो रहा था। जैसे ही मैं उसके करीब पहुँचा...
वो आदमी अचानक गायब हो गया!
"भाई! वो आदमी गया कहाँ?" अजीम लगभग चिल्ला उठा।
मैंने तेजी से ब्रेक मारा, ट्रक सड़क के किनारे रुक गया।
हम दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर अजीम ने धीरे से कहा, "भाई, ये कोई आम सफर नहीं होने वाला..."
खौफनाक इशारे
हमने करनाल ढाबे से निकलकर ट्रक दोबारा हाईवे पर डाल दिया। रात के 1:30 बज रहे थे और अब सड़क काफी खाली हो चुकी थी। हाईवे के दोनों ओर फैले खेत और बीच-बीच में सड़क किनारे खड़े ट्रक—ये नज़ारा किसी भी ट्रक ड्राइवर के लिए आम था। लेकिन उस रात कुछ अलग सा महसूस हो रहा था।
रात 3 बजे – अजीब साया
हम लगातार अमृतसर की ओर बढ़ रहे थे। अजीम ने रेडियो ऑन कर दिया, और उसमें पुराने गाने बजने लगे। माहौल हल्का हो गया था। तभी अचानक मैंने सड़क के किनारे एक लंबे कद की परछाई देखी।
वो परछाई इतनी ऊँची और पतली थी कि मुझे लगा, कोई बिजली का खंभा होगा। लेकिन अगले ही पल जब मैंने दोबारा देखा, तो वो हिल रही थी!
मैंने झट से ब्रेक मारा, और ट्रक हल्का झटका खाकर रुक गया।
अजीम: "क्या हुआ भाई? अचानक ब्रेक क्यों मारा?"
मैंने अजीम की ओर इशारा किया, लेकिन अब वहाँ कुछ नहीं था।
मैं: "तूने देखा? वहाँ कोई खड़ा था!"
अजीम ने शीशे से बाहर झाँककर देखा और हँस पड़ा।
अजीम: "भाई, तेरी नींद पूरी नहीं हुई क्या? कोई नहीं है वहाँ। चल, ट्रक बढ़ा!"
मुझे भी लगा कि शायद मेरी आँखों का धोखा था। मैंने फिर से ट्रक स्टार्ट किया और आगे बढ़ गया। लेकिन मन में अजीब बेचैनी थी।
रात 4 बजे – सुनसान टोल नाका
हम लुधियाना पार कर चुके थे और अब अमृतसर से करीब 70 किलोमीटर दूर थे। तभी हमें एक टोल प्लाजा दिखा, लेकिन अजीब बात ये थी कि वहाँ कोई भी गार्ड या कर्मचारी नहीं था!
टोल पर एक छोटा सा केबिन बना हुआ था, लेकिन अंदर लाइट बंद थी।
अजीम: "क्या यार, ये कैसा टोल है? यहाँ कोई आदमी नहीं दिख रहा!"
मैंने ट्रक धीमा किया और टोल के बूम बैरियर के पास आकर हॉर्न बजाया। लेकिन कोई भी बाहर नहीं आया।
तभी अचानक बैरियर अपने आप ऊपर उठ गया!
मैं और अजीम एक-दूसरे को देखने लगे।
अजीम: "भाई, यहाँ कुछ गड़बड़ है। जल्दी निकल!"
मैंने ट्रक की स्पीड बढ़ा दी और वहाँ से निकल गया। लेकिन जैसे ही टोल पार किया, मुझे पीछे टोल के केबिन में हल्की रोशनी जलती दिखी।
सुबह 6 बजे – अमृतसर ब्रेक
हमने अमृतसर के पास एक बड़े ढाबे पर ट्रक रोका। कई दूसरे ट्रक भी वहाँ खड़े थे।
हमने हाथ-मुँह धोया और गरमा-गरम पराँठे और चाय मंगवाई। अब सूरज निकल चुका था, लेकिन रात की अजीब घटनाएँ अब भी दिमाग में घूम रही थीं।
तभी, हमारे बगल में बैठे एक बुजुर्ग ट्रक ड्राइवर ने हमसे पूछा:
बुजुर्ग: "कहाँ जा रहे हो बेटा?"
मैं: "श्रीनगर।"
बुजुर्ग (धीमे स्वर में): "रात को हाईवे पर किसी अजीब चीज़ को तो नहीं देखा?"
मेरे हाथ से चाय का कप गिरते-गिरते बचा।
मैं: "आपको कैसे पता?"
बुजुर्ग ने लंबी साँस ली और बोला:
"बेटा, ये रास्ते सिर्फ इंसानों के लिए नहीं हैं..."
भटकती रूहों का इलाका
हमने अमृतसर के ढाबे पर बुजुर्ग ड्राइवर की बातें सुनीं, लेकिन उनकी बातों को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी। हालाँकि, मन में अजीब बेचैनी थी। रात को हाईवे पर जो हुआ था, क्या वो सिर्फ हमारा भ्रम था? या वाकई कुछ था वहाँ?
बुजुर्ग ड्राइवर ने सिर्फ इतना कहा:
"श्रीनगर जाने वाला हाईवे… ये हमेशा से भूतिया रहा है। रास्ते में मत रुको, और जो दिखे, उसे नजरअंदाज कर देना!"
हमने सिर हिलाया और नाश्ता करके ट्रक में बैठ गए। अब हमें जम्मू के जंगलों से गुजरना था, जहाँ कई पुराने किस्से प्रचलित थे।
दोपहर 2 बजे – जंगल की सुनसान सड़क
जम्मू की ओर बढ़ते हुए सड़क धीरे-धीरे वीरान होती जा रही थी। अब न तो ढाबे थे और न ही ज़्यादा ट्रक। सिर्फ घना जंगल और बीच में जाती सड़क।
अजीम ने रेडियो बंद कर दिया और बोला, "भाई, इस रास्ते पर अजीब सा सन्नाटा है। कोई और ट्रक क्यों नहीं दिख रहा?"
मैंने भी महसूस किया कि यहाँ कुछ अलग है। इतना बड़ा हाईवे, लेकिन कोई और गाड़ी नहीं?
तभी अचानक ट्रक की हेडलाइट्स अपने आप ऑन-ऑफ होने लगीं!
अजीम: "अबे ये क्या हो रहा है? कहीं वायरिंग तो खराब नहीं?"
मैंने ट्रक की बैटरी और स्विच चेक किए, सब कुछ सही था। फिर ये अपने आप क्यों हो रहा था?
फिर ट्रक का इंजन बंद हो गया!
दोपहर 3 बजे – सन्नाटे में फंसे
हमने ट्रक कई बार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन एकदम मरा पड़ा था।
चारों तरफ़ सिर्फ घना जंगल और अजीब सी हवा की सायं-सायं।
अजीम नीचे उतरा और बोला, "मैं देखता हूँ, शायद बैटरी लूज़ हो गई हो।"
मैंने भी नीचे उतरकर ट्रक का बोनट खोला, लेकिन तभी…
झाड़ियों में कुछ सरसराने की आवाज़ आई!
हम दोनों चौकन्ने हो गए।
मैं: "अजीम, जल्दी काम कर, कुछ है वहाँ!"
अजीम पसीने-पसीने हो गया। उसने हड़बड़ी में बैटरी के तार चेक किए और जल्दी से ट्रक में बैठ गया।
अजीम (डरते हुए): "भाई, जल्दी ट्रक चालू कर!"
मैंने जैसे ही चाबी घुमाई, इंजन एक ही बार में स्टार्ट हो गया!
हमने चैन की सांस ली, लेकिन तभी ट्रक के शीशे पर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी!
धप! धप! धप!
दोपहर 3:15 – खौफनाक साया
हम दोनों का दिल धड़क उठा। मैंने धीरे-धीरे शीशे से बाहर झाँका…
कोई नहीं था!
लेकिन शीशे पर हाथ के निशान बने हुए थे, जैसे किसी ने गंदे हाथों से शीशे को छुआ हो।
अजीम: "भाई, अब बिना देखे भाग निकलो!"
मैंने फौरन एक्सीलेरेटर दबाया और ट्रक हवा से बातें करने लगा। लेकिन तभी रियरव्यू मिरर में देखा… कोई ट्रक के पीछे दौड़ रहा था!
काला साया… लंबा और बहुत तेज़!
मैंने अपनी पूरी ताकत से ट्रक दौड़ा दिया!
शाम 6 बजे – सुरक्षित ठिकाना?
जैसे ही हम जम्मू शहर के पास पहुँचे, ट्रक सामान्य हो गया।
हमने पहली ही होटल पर ट्रक रोका और राहत की सांस ली।
अजीम: "भाई, जो भी था… वो जंगल तक ही सीमित था, शायद!"
लेकिन मेरे मन में एक सवाल था—क्या ये सब अभी खत्म हो गया? या असली खौफ अभी बाकी है?
जंगल के श्रापित रास्ते
हम जम्मू शहर के एक होटल में बैठकर चाय पी रहे थे, लेकिन दिल अब भी धड़क रहा था। जो कुछ जंगल में हुआ, वो सिर्फ भ्रम नहीं था।
अजीम: "भाई, ट्रक के शीशे पर वो हाथ के निशान... अगर कोई होता तो दिखता भी!"
मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में डर था, लेकिन वो ज़ाहिर नहीं कर रहा था।
मैं: "कुछ तो था वहाँ... लेकिन हमें आगे बढ़ना होगा।"
हमने रात वहीं गुजारने का फैसला किया और अगली सुबह श्रीनगर के लिए निकलने का तय किया।
सुबह 6 बजे – वापसी उसी जंगल से
सूरज निकल चुका था, लेकिन जंगल में घुसते ही फिर वही अजीब सा सन्नाटा था।
कोई ट्रक नहीं, कोई गाड़ी नहीं, बस हम और ये सुनसान सड़क।
अजीम: "भाई, मुझे अच्छा नहीं लग रहा... ये रास्ता सही नहीं है!"
मैंने ट्रक की स्पीड बढ़ा दी।
लेकिन तभी...
ट्रक के अंदर से किसी के हंसने की आवाज़ आई!
खिलखिलाहट...
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
ये हमारी आवाज़ नहीं थी!
सुबह 6:45 – पीछे वाली सीट पर कोई था!
अजीम ने धीरे-धीरे पीछे देखा और जमीन पर गिरते-गिरते बचा।
उसने थरथराती आवाज़ में कहा, "भाई... सीट के पीछे कोई बैठा है!"
मैंने भी शीशे में देखा और मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
एक औरत, सिर झुकाए बैठी थी, काले कपड़े में लिपटी हुई। उसके लंबे बाल सीट पर बिखरे थे!
हमारे सामने से कोई गाड़ी नहीं आ रही थी, लेकिन ट्रक अपने आप धीमे होने लगा।
जैसे किसी ने ब्रेक दबा दिए हों!
"निकल यहाँ से!!!"
मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेरेटर दबाया।
ट्रक आगे बढ़ा, लेकिन वो औरत धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगी!
सुबह 7:00 – मौत का सफर
अजीम ने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया।
मैंने जल्दी से रियरव्यू मिरर की तरफ देखा—
वो औरत अब पूरी तरह दिख रही थी।
उसकी आँखें पूरी काली थीं, और उसके होठों से काला धुआँ निकल रहा था!
वो धीरे-धीरे ट्रक के आगे बढ़ने लगी, जैसे हवा में तैर रही हो।
फिर अचानक...
वो एक झटके में गायब हो गई!
हम दोनों बुरी तरह कांप रहे थे।
अजीम ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाई, ये रास्ता श्रापित है... यहाँ कुछ बहुत बुरा हुआ होगा!"
मैंने बिना रुके ट्रक भगाया।
सुबह 8 बजे – होटल पर रुकने का फैसला
आखिरकार, हम जंगल से बाहर निकल आए। सामने एक पुराना होटल दिखा, तो हमने वहाँ ट्रक रोका।
होटल का मालिक हमारी हालत देखकर हैरान था
होटल मालिक: "क्या हुआ? तुम दोनों का चेहरा ऐसा क्यों सफेद पड़ा है?"
हम कुछ कह पाते, उससे पहले एक बूढ़ी औरत पास आ गई।
उसने धीमे से कहा—
"तुम दोनों जंगल में रात को तो नहीं गए थे?"
हमने एक-दूसरे को देखा और सिर हिलाया।
बूढ़ी औरत ने जो कहानी सुनाई, वो हमारे रोंगटे खड़े कर देने वाली थी।
(…
जंगल का श्राप
होटल की बूढ़ी औरत हमें घूर रही थी। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, जिससे सांसें थम जाएँ।
"तुम लोग सही-सलामत बाहर आ गए, ये किसी चमत्कार से कम नहीं!"
मैंने घड़ी देखी— सुबह के 8:15 बजे थे।
मैं: "बुजुर्ग अम्मा, आपको कैसे पता कि उस जंगल में कुछ... गड़बड़ है?"
बूढ़ी औरत ने एक लंबी सांस ली।
"क्योंकि ये जंगल... श्रापित है!"
एक पुरानी दास्तान
बूढ़ी औरत ने हमें जो बताया, उसने हमारी रीढ़ की हड्डी में ठंडक दौड़ा दी।
"बहुत साल पहले, इस जंगल में एक राजकुमारी का कत्ल हुआ था। उसकी शादी जबरदस्ती एक क्रूर राजा से करवाई जा रही थी, लेकिन उसने मना कर दिया।"
"राजा ने गुस्से में उसका गला काट दिया।"
"मरते वक्त राजकुमारी ने श्राप दिया— जो भी इस जंगल से गुजरेगा, उसे मेरी पीड़ा का एहसास होगा!"
"लोगों का कहना है कि वो अब भी यहाँ भटकती है... अपने हत्यारों की तलाश में!"
हम दोनों के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
होटल का रहस्यमयी कमरा
होटल मालिक ने हमें ठहरने के लिए एक कमरा दिया, लेकिन उसमें घुसते ही अजीम ने सिहर कर दरवाज़ा पकड़ लिया।
"भाई, इस कमरे में कुछ... सही नहीं लग रहा।"
मैंने भी अजीब सी ठंड महसूस की।
कमरा खाली था, लेकिन ऐसा लगा जैसे कोई छुपा बैठा हो।
हमने फैसला किया कि थोड़ी देर आराम करेंगे और फिर आगे बढ़ेंगे।
लेकिन... हमें नहीं पता था कि इस कमरे में कोई इंतज़ार कर रहा था!
रात के 2:00 बजे – दरवाज़े पर दस्तक
थकान के मारे हम गहरी नींद में चले गए।
अचानक...
"ठक... ठक... ठक..."
दरवाज़े पर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी।
अजीम झटके से उठ बैठा।
"भाई... किसने खटखटाया?"
मैंने धीमे से दरवाज़ा खोला— बाहर कोई नहीं था!
लेकिन तभी...
कमरे के अंदर अलमारी से धीमी-धीमी सिसकियों की आवाज़ आने लगी!
अलमारी का रहस्य
अजीम डर के मारे बिस्तर से कूद पड़ा।
"भाई, वहाँ मत जा!"
लेकिन मेरे पैरों को जैसे किसी ने जकड़ लिया था।
मैंने कांपते हाथों से अलमारी का दरवाज़ा खोला—
अंदर... कोई नहीं था!
लेकिन अलमारी की पिछली दीवार पर खून से लिखा था:
"तुम यहाँ नहीं बचोगे!"
हमारे शरीर से जैसे जान निकल गई।
अजीम ने काँपते हुए कहा, "भाई, ये जगह छोड़नी होगी... अभी!"
भागने का वक्त
हमने होटल मालिक को सब बताया, लेकिन उसने हमारी बात पर हंस दिया।
"इस जंगल और होटल में जो कुछ भी होता है, उसे भूल जाओ... वरना ये जगह तुम्हें कभी जाने नहीं देगी!"
हमें महसूस हुआ कि हम फंस चुके थे।
अब सवाल ये था— क्या हम इस श्रापित जगह से जिंदा निकल पाएंगे?
क्या ट्रक में फिर से कुछ अजीब होगा? जंगल का रहस्य और गहरा होता जा रहा था...
जंगल के पार - खतरा और नज़दीक आ रहा था
हमारी स्थिति हर पल और भी ख़तरनाक होती जा रही थी। होटल मालिक की बातें हमारे दिमाग में गूंज रही थीं। अजीम और मैं दोनों जानते थे कि हमें जल्द से जल्द इस जगह से निकल जाना चाहिए
, लेकिन क्या पता था कि हमें यहाँ से निकलने में भी कितना समय लगेगा।
हमने जम्मू की ओर जाने के लिए ट्रक को स्टार्ट किया, लेकिन अचानक अजीम ने जोर से मुझे आवाज़ दी।
"भाई, देखो!"
हमने देखा... हमारे ट्रक के सामने कोई खड़ा था। एक महिला—मांग में सिंदूर, साड़ी पहने, बालों में घना काजल। वो आँखों में एक अजीब सी चमक लेकर हमारे सामने खड़ी थी। उसकी आँखों में जैसे कुछ अनकहा था।
मैंने गाड़ी का शीशा उतारा और पूछा, "मैम, क्या आप ठीक हैं?"
लेकिन उसने जवाब नहीं दिया। बस एक जोर से चीख़ मारी, और एक पल में गायब हो गई।
हम दोनों हैरान रह गए। अजीम के मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे।
"भाई, कुछ तो गड़बड़ है!" अजीम ने डरते हुए कहा।
मैंने ट्रक की स्पीड बढ़ा दी, लेकिन वो रहस्यमयी महिला हमसे हमेशा एक कदम आगे थी।
रात का घना अंधेरा और वो डरावनी शांति
हमारे आगे बढ़ने के साथ-साथ अंधेरा गहरा हो रहा था। चारों ओर से घना जंगल था, और उस जंगल की सिसकियाँ जैसे हमारे कानों में गूंज रही थीं। हमें ऐसा लग रहा था जैसे जंगल हमें निगलने के लिए तैयार है। घना धुंआ और झीलों की गहरी आवाजें हमें और भी परेशान कर रही थीं।
अचानक, हमारे ट्रक के इंजन में कुछ खराबी आ गई।
"भाई, गाड़ी को रोक दो!" अजीम ने चिल्लाकर कहा।
मैंने गाड़ी रोकी और दोनों नीचे उतरे। इंजन की जांच करते हुए, हमें महसूस हुआ कि हमें एक अजीब सी सर्दी महसूस हो रही थी, जैसे पूरी हवा ही बदल गई हो। मैं सोच रहा था कि कहीं कोई मौसम परिवर्तन तो नहीं हो रहा, लेकिन फिर मैंने देखा— ट्रक के आसपास कुछ हलचल हो रही थी।
सामने आया रहस्यमयी धुंआ
हमने देखा कि हवा में हलका धुंआ उठ रहा था, जो धीरे-धीरे हमारे आसपास घेरने लगा। पहले तो लगा, कोई साधारण धुंआ होगा, लेकिन जैसे-जैसे वो बढ़ा, हमें एहसास हुआ कि ये कोई सामान्य धुंआ नहीं था— यह कुछ और था।
"भाई, जल्दी ट्रक स्टार्ट करो!" अजीम घबराए हुए बोला।
हमने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन ट्रक एक बार फिर स्टार्ट नहीं हुआ। इस बार धुंआ और तेज़ हो गया था। ट्रक के चारों ओर अजीब सी सर्द हवा और हड्डी कंपकंपाने वाली ठंडक थी।
इसी दौरान, अचानक ट्रक के सामने से किसी का छायामूर्ति तेजी से भागते हुए दिखाई दी। उसकी सफेद साड़ी और काले बाल हवा में लहराते हुए जैसे एक पागल के रूप में दौड़ रहे थे।
दूर से आती एक अजीब सी आवाज़
हम दोनों ने एक साथ आवाज़ सुनी— "तुम नहीं बचोगे!"
हम दोनों में से कोई भी हिल नहीं सका। फिर वो आवाज़ और करीब आ गई, लेकिन इस बार हम नहीं देख पाए कि आवाज़ कहां से आ रही थी। अजीम का चेहरा डर से सफेद हो चुका था।
"चल, भैया, यहां से निकलते हैं।" मैंने अजीम से कहा और गाड़ी को स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन ट्रक में अब कोई दम नहीं बचा था।
इसी वक्त, अचानक गाड़ी के इंजन से ज़ोर से आवाज़ आई। जैसे किसी ने गाड़ी को हिला दिया हो। हमें समझ में ही नहीं आया कि ये क्या हो रहा था।
अजीब घटनाएँ और सच्चाई का पता
हमने हिम्मत जुटाई और ट्रक को धकेलते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की। लेकिन अचानक हमें समझ में आया कि हम अब जंगल से बाहर निकलने की बजाय ज्यादा अंदर घुसते जा रहे थे। हम उस रहस्यमयी महिला की तलाश में ही बढ़ रहे थे, जिसका चेहरा हर पल हमारे सामने आ रहा था।
क्योंकि अब हमें यकीन हो गया था कि यह सब कुछ एक भ्रम नहीं, बल्कि एक खौ़फनाक हकीकत है।
क्या हम इस अजीब जंगल से बाहर निकल पाएंगे? क्या हम उस महिला के रहस्य का खुलासा कर पाएंगे?
जंगल का श्राप – मौत के साए में फंसे हम
ट्रक का इंजन अब पूरी तरह ठप हो चुका था। हम दोनों ट्रक से नीचे उतरकर आसपास के माहौल को समझने की कोशिश कर रहे थे। चारों ओर गहरा अंधेरा था, और हवा में एक अजीब सी ठंडक घुली हुई थी।
अचानक, हमारे पीछे किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे कोई बहुत धीरे-धीरे हमारी ओर बढ़ रहा हो।
"कौन है वहाँ?" मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा।
लेकिन जवाब में सिर्फ़ खामोशी थी।
अजीम की साँसें तेज़ हो चुकी थीं। वो मेरे करीब खड़ा था, उसकी आँखों में डर साफ झलक रहा था।
ट्रक के शीशे में दिखा खौफनाक चेहरा
मैंने ट्रक की तरफ देखा, तो अचानक मेरी नज़र साइड मिरर पर पड़ी। उसमें कुछ अजीब सा दिखा— एक महिला का चेहरा!
"अजीम! देखो!" मैं लगभग चिल्ला पड़ा।
हम दोनों ने शीशे में देखा— वही सिंदूर वाली महिला, जिसकी आँखें लाल थीं, और चेहरा जैसे किसी जलती हुई लाश की तरह विकृत था।
और फिर, अचानक ट्रक के शीशे पर खून के निशान उभर आए।
अजीम डर के मारे पीछे हट गया और बोला, "भाई, ये जगह छोड़नी होगी!"
हमने बिना कुछ सोचे-समझे ट्रक स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन अब भी नहीं चला।
जंगल के अंदर अजीब घटनाएँ
हमने फैसला किया कि अगर ट्रक नहीं चल रहा, तो पैदल ही जंगल से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। जैसे ही हम कुछ कदम बढ़े, हमें किसी के हँसने की आवाज़ सुनाई दी।
वो हँसी… मानो किसी ने हमारे कानों में ज़हर घोल दिया हो।
हवा में घुली उस अजीब सी गंध से हमें चक्कर आने लगे थे। पेड़ों के पीछे से सफेद कपड़ों में कुछ आकृतियाँ दिखाई देने लगीं, जो कभी पास आतीं, कभी दूर चली जातीं।
"भाई, ये जगह सही नहीं है," अजीम बुदबुदाया।
लेकिन अब पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं था। हमें बस आगे बढ़ते जाना था।
रास्ते में मिले अजीब निशान
हम जंगल के गीले रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे, जब अजीम के पैर के नीचे कुछ अटका।
"ये क्या है?" अजीम ने नीचे देखा।
वो एक टूटी हुई चूड़ियों से भरी थैली थी। उसमें लाल सिन्दूर और अधजले कपड़े भी थे।
"भाई, ये किसी की तांत्रिक पूजा का सामान लगता है," मैंने कहा।
अभी हम ये सब देख ही रहे थे कि अचानक पीछे से किसी ने हमें पुकारा— "रुको!"
हम दोनों की रूह कांप गई।
हमने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था… लेकिन हवा में किसी के कदमों की आहट अब भी थी।
अजीम का अचानक गायब हो जाना
हमने तेजी से जंगल से बाहर निकलने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही मैंने अजीम की ओर देखा, वो वहाँ नहीं था!
"अजीम! अजीम!" मैंने जोर से आवाज़ लगाई।
कोई जवाब नहीं आया।
मेरी साँसे तेज़ हो गईं। मैं चारों ओर देखने लगा, लेकिन मुझे बस अंधेरा और पेड़ों की सरसराहट सुनाई दी।
और फिर…
मैंने देखा—अजीम एक पेड़ के पास खड़ा था, लेकिन अजीब ढंग से।
उसकी गर्दन झुकी हुई थी, आँखें बंद थीं, और वो बुदबुदा रहा था—
"वो आ रही है... वो आ रही है..."
"अजीम, होश में आ!" मैंने उसे जोर से हिलाया।
लेकिन जैसे ही उसने आँखें खोलीं, उसकी आँखें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं!
क्या अजीम किसी शक्ति के वश में आ चुका है? क्या हम इस जंगल से बाहर निकल पाएंगे? या यह जंगल ही हमारी कब्र बन जाएगा?
मौत का साया – अजीम की चीखें
अजीम की आँखें सफेद हो चुकी थीं, और उसकी जुबान पर अजीब-सी बड़बड़ाहट थी। उसका शरीर काँप रहा था, जैसे कोई शक्ति उसे जबरदस्ती अपने वश में कर रही हो।
"अजीम! होश में आ!" मैंने उसे जोर से हिलाया, लेकिन वो वैसे ही खड़ा रहा, बुत की तरह।
तभी अचानक—
"आआआआह्ह्ह्ह!"
अजीम ने जोर से चीख मारी और ज़मीन पर गिर पड़ा।
मैं घबरा गया। उसकी आँखें अब भी सफेद थीं, लेकिन उसके मुँह से झाग निकल रहा था। उसने अपने नाखूनों से ज़मीन खोदनी शुरू कर दी, जैसे किसी चीज़ की तलाश कर रहा हो।
"भाई... यहाँ कुछ... दफन है..."
उसकी आवाज़ गूँजती हुई लगी, जैसे किसी और दुनिया से आ रही हो।
जंगल के नीचे छुपा भयानक सच
मैंने ध्यान से ज़मीन की तरफ देखा। वहाँ मिट्टी गीली थी, मानो हाल ही में कोई गड्ढा खोदा गया हो।
अजीम अचानक उठ खड़ा हुआ और जोर से चिल्लाया, "यहाँ कोई गड़ा हुआ है!"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
क्या सच में यहाँ किसी की कब्र थी?
हमने काँपते हाथों से ज़मीन हटाना शुरू किया। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, हमारे सामने एक पुरानी लकड़ी की संदूक दिखाई दी।
संदूक पर लाल रंग से कुछ लिखा था:
"इसे मत खोलना… वरना श्राप तुम्हें भी निगल जाएगा!"
संदूक के अंदर का खौफ
मैंने अजीम की तरफ देखा, वो अब भी किसी नशे में लग रहा था।
"भाई, इसे मत खोल... यह अपशगुन है," मैंने डरते हुए कहा।
लेकिन अजीम ने मेरी बात नहीं सुनी।
उसने कांपते हाथों से संदूक का ढक्कन खोला—
"धड़ाम!"
जैसे ही संदूक खुला, अंदर से एक धुआं उठा, और उसी के साथ भारी-भरकम साँसों की आवाज़ें आने लगीं।
फिर अचानक...
संदूक के अंदर से एक जली हुई लाश निकली!
लाश की आँखें खुल गईं!
हम दोनों कुछ कह भी नहीं पाए थे कि वो जली हुई लाश अचानक हिलने लगी।
उसके कंकाल जैसे हाथ उठे, और उसकी बंद आँखें धीरे-धीरे खुल गईं— खून से भरी लाल आँखें!
"तुमने मेरी कब्र खोल दी..."
"अब तुम दोनों बच नहीं पाओगे..."
जंगल में गूँजती खतरनाक हँसी
उस लाश की आवाज़ सुनते ही पूरा जंगल हिलने लगा। पेड़ झूमने लगे, और हवा में अजीब-सी घुटन फैल गई।
"भागो, भाई!" मैंने अजीम का हाथ पकड़कर दौड़ लगाई।
लेकिन जैसे ही हम कुछ कदम चले—
वो जली हुई लाश हवा में उठ गई और जोर से हँसने लगी!
उसकी हँसी इतनी डरावनी थी कि हमारे कानों में सीटी जैसी आवाज़ गूंजने लगी।
भूतिया ट्रक की वापसी!
हम दोनों बदहवास होकर भाग रहे थे।
तभी अचानक, सामने कुछ चमका—
हमारा ट्रक!
लेकिन यह कैसे हो सकता था? हमने तो इसे काफी पीछे छोड़ दिया था!
ट्रक की हेडलाइट्स अपने आप जल गईं, और इंजन बिना चाबी के स्टार्ट हो गया।
तभी…
ट्रक के शीशे में वही लाल आँखों वाली औरत दिखी!
उसके चेहरे पर एक खौफनाक मुस्कान थी, और उसने धीरे-से कहा:
"अब कोई नहीं बच सकता..."
क्या ट्रक में कोई आत्मा आ चुकी है? क्या हम इस जंगल से जिंदा बाहर निकल पाएंगे, या यह मौत की साजिश थी?
मौत के पंजे में जकड़ा ट्रक
हमारे सामने ट्रक अपने आप स्टार्ट हो चुका था। हेडलाइट्स अजीब तरीके से टिमटिमा रही थीं, और उसके शीशे में वही लाल आँखों वाली औरत दिख रही थी।
"अजीम, जल्दी ट्रक में बैठ!" मैंने चीखते हुए कहा।
लेकिन अजीम किसी पत्थर की मूर्ति की तरह वहीं खड़ा रहा।
"भाई… ये ट्रक अब हमारा नहीं रहा…" उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"क्या बकवास कर रहा है! जल्दी अंदर आ!" मैंने उसका हाथ खींचा और जबरदस्ती ट्रक में धकेल दिया।
जैसे ही मैं खुद ट्रक में घुसा, दरवाजे अपने आप बंद हो गए।
और फिर…
ट्रक अपने आप चलने लगा!
स्टेयरिंग पर अदृश्य हाथ
मैंने स्टेयरिंग पकड़ने की कोशिश की, लेकिन किसी अदृश्य ताकत ने मुझसे पहले ही उस पर कब्ज़ा कर लिया था।
स्टेयरिंग अपने आप घूम रहा था, और ट्रक पूरी रफ्तार से जंगल से बाहर निकल रहा था।
"भाई, ये ट्रक हमें कहीं ले जा रहा है!" अजीम घबराकर बोला।
हमने शीशे से बाहर झाँका, और जो देखा, उससे हमारे होश उड़ गए—
ट्रक उसी सुनसान कब्रिस्तान की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ हमने संदूक खोला था!
कब्रिस्तान का रहस्यमयी दरवाजा
ट्रक अचानक रुक गया। सामने एक पुराना टूटा-फूटा दरवाजा था, जिस पर अजीब-से निशान बने हुए थे।
दरवाजा धीरे-धीरे अपने आप खुलने लगा…
भीतर अंधेरा था, लेकिन उसकी गहराई में लाल-लाल आँखें चमक रही थीं।
तभी एक भारी-भरकम आवाज़ आई—
"अब पीछे मत हटो… अंदर आओ…"
मौत का जाल
मुझे लगा जैसे हमारे पैरों में किसी ने बेड़ियाँ डाल दी हों।
हम चाहकर भी ट्रक से बाहर नहीं निकल सकते थे।
तभी ट्रक की खिड़की पर खून से सना हुआ एक हाथ आकर चिपक गया!
"बचो! कोई तो हमें बचाओ!" अजीम बुरी तरह रो पड़ा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था… सिवाय उन डरावनी लाल आँखों के, जो हमें घूर रही थीं।
अजीम का रहस्यमयी गायब होना
अचानक अजीम ने ज़ोर से चीख मारी—
"भाई! ये… ये हाथ मुझे अंदर खींच रहे हैं!"
मैंने देखा—
वो हाथ अजीम के गले पर कसकर लिपट चुके थे, और धीरे-धीरे उसे खींच रहे थे!
"नहीं! अजीम, पकड़!"
मैंने उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन वो हाथ इतने ठंडे थे कि मेरी उंगलियाँ सुन्न पड़ गईं!
और फिर…
"भाई!!!"
एक आखिरी चीख के साथ अजीम उस अंधेरे दरवाजे के भीतर समा गया!
दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
और मैं… अकेला रह गया।
क्या अजीम हमेशा के लिए खो गया? ट्रक अब किस दिशा में जाएगा?
क्या मैं इस भूतिया जाल से बाहर निकल पाऊँगा?
अंधेरे में कैद
अजीम के गायब होते ही दरवाजा ज़ोरदार धमाके के साथ बंद हो गया।
चारों तरफ़ सन्नाटा था।
मैंने ट्रक का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वो जाम हो चुका था।
"अजीम!! सुन रहा है??"
कोई जवाब नहीं।
सामने सिर्फ़ वही भूतिया दरवाज़ा था, जिसके पीछे अजीम ग़ायब हो गया था।
भूतों की परछाइयाँ
अचानक, ट्रक के शीशे पर कुछ दिखा।
कोई परछाइयाँ… झिलमिला रही थीं।
कई आकृतियाँ… आधी जली हुई, कटी-फटी…
वो शीशे पर अपने नाख़ून घिस रही थीं, जैसे अंदर घुसने की कोशिश कर रही हों!
"बिस्मिल्लाह… बिस्मिल्लाह…" मैंने पढ़ना शुरू किया।
तभी…
एक कंकाल जैसी उंगलियाँ शीशे के अंदर घुस आईं!
ट्रक का इंजन और रहस्यमयी सफर
अचानक, ट्रक का इंजन अपने आप स्टार्ट हो गया।
और फिर…
ट्रक पीछे हटने लगा, बिना किसी ड्राइवर के!
दरवाज़े और शीशे बंद थे, लेकिन मुझे लगा जैसे मैं किसी अंधे कुएँ में गिर रहा हूँ।
आगे सड़क नहीं थी… बस घना अंधेरा था।
रहस्यमयी गली
ट्रक अंधेरे से निकलकर एक संकरी, पुरानी गली में जा पहुँचा।
ये गली मुझे जानी-पहचानी लग रही थी…
जहाँ भी देखो, टूटी-फूटी हवेलियाँ थीं।
और उनके झरोखों से कोई मुझे देख रहा था…
लाल आँखें।
वो कौन था?
ट्रक धीरे-धीरे रुक गया।
मैंने बाहर झाँका…
सामने एक बुज़ुर्ग आदमी खड़ा था।
वो सफ़ेद कपड़े पहने था, लेकिन उसके चेहरे पर अजीब-सा साया था।
"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…" उसने कहा।
"क… कौन हो तुम?" मैंने काँपते हुए पूछा।
वो आदमी मेरे करीब आया, उसकी आँखें अंधेरे में जल रही थीं।
और फिर उसने कहा—
"ये तुम्हारी आखिरी रात हो सकती है।"
क्या मैं इस गली से निकल पाऊँगा? वो बुज़ुर्ग आदमी कौन है? क्या अजीम ज़िंदा है?
मौत की गली
मैंने ट्रक का इंजन बंद करने की कोशिश की, लेकिन वो अपने आप चलता रहा।
सामने खड़ा बुज़ुर्ग आदमी मुझे घूर रहा था। उसकी आँखों में अजीब-सा अंधेरा था, जैसे किसी गहरी खाई में झाँक रहा हो।
"ये तुम्हारी आखिरी रात हो सकती है…"
उसके ये शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे।
गली के रहस्य
मैंने चारों तरफ़ देखा।
यह कोई आम सड़क नहीं थी—बल्कि एक सदियों पुरानी सुनसान गली।
दीवारों पर अजीब-सी निशानियाँ बनी थीं, मानो किसी ने अपने नाख़ून घिस-घिसकर कुछ लिखा हो।
झरोखों से झांकती लाल आँखें अब और भी पास आ रही थीं।
बुज़ुर्ग की चेतावनी
वो आदमी धीरे-धीरे मेरे ट्रक के पास आया और बोला—
"यह गली मौत का दरवाज़ा है… यहाँ से जिसने भी गुजरने की कोशिश की, वो लौटकर नहीं आया!"
मैंने घबराकर पूछा, "लेकिन मैं यहाँ कैसे आया?"
वो गंभीर स्वर में बोला,
"तुमने उस शापित दरवाज़े को छुआ… और अब ये जगह तुम्हें अपने भीतर खींच रही है!"
मुझे अचानक अजीम याद आया!
"मेरा दोस्त! वो कहाँ है??"
बुज़ुर्ग ने मेरी ओर देखा, फिर इशारा किया।
अजीम की झलक
मैंने सामने देखा…
गली के अंत में एक पुराना मकान था, और उसकी खिड़की से कोई झांक रहा था।
अजीम!
मैंने ज़ोर से पुकारा, "अजीम!!"
लेकिन तभी…
वो खिड़की खुद-ब-खुद बंद हो गई!
भूतों का हमला
तभी ट्रक के चारों ओर भूतिया आकृतियाँ दिखने लगीं।
कुछ अधजले थे, कुछ के चेहरे गायब थे, और कुछ के सिर उलटे थे!
उन्होंने ट्रक को घेर लिया…
"तुम यहाँ नहीं बच सकते… अब तुम्हारी आत्मा हमारी है!"
उनकी फुसफुसाहट से मेरी रूह काँप गई।
बुज़ुर्ग आदमी ने कहा, "अगर तुम्हें बचना है, तो वो दरवाज़ा फिर से खोलना होगा… वरना तुम हमेशा के लिए फँस जाओगे!"
अब क्या होगा?
क्या मैं अजीम को बचा पाऊँगा?
क्या वो शापित दरवाज़ा दोबारा खुलेगा?
क्या मैं इस गली से जिंदा बाहर निकल पाऊँगा?
भूतों का असली रहस्य, अजीम की आवाज़, और मौत का दरवाज़ा!
ये गलती से टेक्स्ट रिपीट हो गया, मैं इसे ठीक कर देता हूँ।
मौत का दरवाज़ा
बुज़ुर्ग की बात सुनकर मेरे हाथ-पाँव सुन्न हो गए। अगर मैंने वो दरवाज़ा नहीं खोला, तो मैं और अजीम हमेशा के लिए इस गली में फँस जाएंगे। लेकिन अगर खोला, तो पता नहीं दूसरी तरफ़ क्या होगा।
"तय करो… समय बहुत कम है!" बुज़ुर्ग ने चेतावनी दी।
मैंने झटके से ट्रक का दरवाज़ा खोला और नीचे कूद पड़ा। आसपास की भूतिया आकृतियाँ सरसराती हवा के साथ घूम रही थीं। उनके मुँह से अजीब-सी आवाज़ें निकल रही थीं, मानो कोई पुराना शाप दोहरा रही हों।
अजीम की आवाज़
गली के अंत से फीकी रोशनी आ रही थी। वहाँ वही मकान था, जिसकी खिड़की में मैंने अजीम को देखा था।
तभी…
"भाई... बचाओ!"
अजीम की काँपती हुई आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
मैंने बिना सोचे दौड़ लगा दी।
शापित दरवाज़ा
जैसे ही मैं मकान के पास पहुँचा, उसके दरवाज़े पर अजीब आकृतियाँ उभरीं। ऐसा लग रहा था, जैसे वो दरवाज़ा किसी और ही दुनिया का हिस्सा हो।
दरवाज़े पर खून से कुछ लिखा था—
"जो आया, वो वापस नहीं गया…"
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा।
बुज़ुर्ग पीछे से चिल्लाया, "उस दरवाज़े को खोलने से पहले पीछे मत देखना! अगर देखा, तो तुम भी उनमें से एक बन जाओगे!"
भयानक मंजर
मैंने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े को जोर से धक्का दिया।
दरवाज़ा खुलते ही एक ठंडी, बर्फीली हवा मेरे चेहरे पर पड़ी। अंदर घुप्प अंधेरा था, लेकिन जैसे ही मैंने कदम रखा, जमीन हिलने लगी। लगा जैसे मैं किसी और ही दुनिया में पहुँच गया हूँ।
मौत की छाया
दरवाज़े के खुलते ही एक ठंडी हवा का तेज़ झोंका मेरे चेहरे पर पड़ा। अंदर घुप्प अंधेरा था, लेकिन मुझे महसूस हुआ कि वहाँ कोई या कुछ मेरी ओर देख रहा है।
"भाई... जल्दी अंदर आओ!"
अजीम की घबराई हुई आवाज़ अंदर से आई। बिना कुछ सोचे मैं अंदर कूद गया और दरवाज़ा अपने पीछे बंद कर दिया। लेकिन जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, मुझे लगा कि मैंने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है।
अंधेरे का कैदी
मैंने चारों ओर देखने की कोशिश की, लेकिन कुछ भी साफ नज़र नहीं आ रहा था। अजीब-सी ठंडी हवा पूरे कमरे में घूम रही थी। मैंने अपने फोन की टॉर्च जलाई,
लेकिन जैसे ही रोशनी फैली, दीवारों पर भूतिया आकृतियाँ उभर आईं। वे इंसानों जैसी थीं, लेकिन उनके चेहरे विकृत और आँखें खोखली थीं।
तभी अजीम अचानक सामने आ गया। उसका चेहरा डर और सदमे से भरा हुआ था।
"यहाँ से निकलना होगा भाई! यह जगह हमें जिंदा नहीं छोड़ेगी!"
मैंने सिर हिलाया, लेकिन तभी...
छत से लटकती परछाईं
हमारे सिर के ऊपर से एक परछाईं धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी। उसका शरीर हवा में झूल रहा था, और उसकी आँखें सीधी हम पर थीं। अचानक, वह भयानक आवाज़ में बड़बड़ाने लगी—
"जो इस घर में आएगा, वो अपनी परछाईं छोड़कर जाएगा..."
अचानक, अजीम के शरीर से एक धुंधली परछाईं निकलने लगी। वह छटपटाने लगा, उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। मैं हिल भी नहीं पाया।
भागने का रास्ता?
मुझे महसूस हुआ कि अगर हम ज़्यादा देर यहाँ रुके, तो हम भी इन भूतिया परछाइयों का हिस्सा बन जाएंगे। मैंने तुरंत अजीम को पकड़कर खींचा और दरवाज़े की ओर भागा। लेकिन दरवाज़ा...
वो गायब हो चुका था!
"अब कोई रास्ता नहीं है..." एक सिसकती हुई आवाज़ पीछे से आई।
हमने मुड़कर देखा—
वो परछाईं अब हमारे बहुत करीब थी!
मौत का फंदा
परछाईं अब हमारे बिल्कुल करीब थी। उसका विकृत चेहरा हमारी आँखों में झाँक रहा था, जैसे हमारी आत्मा को चूस लेना चाहता हो। अजीम की साँसें तेज़ हो गईं, उसका शरीर काँप रहा था। मैं खुद भी सुन्न पड़ चुका था।
"अब कोई रास्ता नहीं बचा... हम फँस चुके हैं!" अजीम के होंठ काँपते हुए बोले।
लेकिन मैंने हार मानने से इनकार कर दिया। मुझे एहसास हुआ कि अगर हम यहीं खड़े रहे, तो यह परछाईं हमें जिंदा नहीं छोड़ेगी।
भागने की कोशिश
मैंने अपने चारों ओर देखने की कोशिश की, लेकिन कमरा अब एक बंद सुरंग जैसा लगने लगा था। दीवारें अचानक सिकुड़ने लगीं, जैसे यह जगह हमें निगल जाना चाहती हो।
तभी, मुझे कोने में एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखा!
"अजीम, जल्दी वहाँ भागो!"
हम दोनों पूरी ताकत से उस दरवाज़े की ओर दौड़े, लेकिन जैसे ही हमने दरवाज़े को धक्का दिया, वो हिल भी नहीं रहा था।
"खुल जा साले!" मैंने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया, लेकिन तभी...
छत से झूलता शव
दरवाज़ा खुलने की बजाय, छत से एक लाश झूल गई!
एक आदमी की सूखी हुई लाश, उसकी गर्दन रस्सी से बँधी हुई थी। उसकी आँखें गहरी काली थीं, और उसके मुँह से खून टपक रहा था।
"तुम भाग नहीं सकते..."
लाश की गर्दन मरोड़कर सीधी हमारी ओर घूम गई।
"तुम भी मेरी तरह मरोगे... और इसी जगह सड़ोगे..."
अजीम के मुँह से चीख निकल गई। मैंने उसकी कलाई पकड़ी और उसे पीछे खींचा।
रास्ता खुल गया!
तभी एक ज़ोरदार धमाके की आवाज़ हुई और वह लकड़ी का दरवाज़ा अपने आप खुल गया!
दरवाज़े के पीछे घनघोर अंधेरा था, लेकिन हमारे पास कोई और विकल्प नहीं था। हम दोनों उस अंधेरे में कूद पड़े...
लेकिन जैसे ही हमने दरवाज़ा पार किया, हमें महसूस हुआ कि हम अब भी उस मौत के खेल से बाहर नहीं निकले थे।
मौत की सुरंग
हम जैसे ही उस दरवाज़े के पार पहुँचे, चारों ओर घना अंधेरा छा गया। वहाँ न कोई दीवारें दिख रही थीं, न ही कोई ज़मीन का ठिकाना। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी अंतहीन सुरंग में गिर रहे हों।
"अजीम! तुम ठीक हो?" मैंने घबराहट में उससे पूछा।
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
अचानक, मेरे सामने अजीम का चेहरा उभरा। उसकी आँखें बंद थीं, और उसका शरीर हवा में तैर रहा था, जैसे किसी अनदेखी शक्ति ने उसे अपने कब्ज़े में ले लिया हो।
"अजीम! होश में आओ!" मैंने उसके चेहरे पर ज़ोर से थप्पड़ मारा।
जैसे ही मैंने उसे छुआ, मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।
छायाएँ जीवित हो उठीं
चारों ओर अंधेरा गहराता जा रहा था। तभी, उस घने अंधेरे के बीच से कई लंबे, टेढ़े-मेढ़े हाथ बाहर निकलने लगे। वे हमारे चारों ओर लहरा रहे थे, जैसे हमें पकड़ने की कोशिश कर रहे हों।
"ये... ये क्या है?" मैंने डर से अजीम की तरफ देखा।
तभी, एक छाया ने अजीम के पैर को पकड़ लिया!
वो दर्द से चीख उठा, "अरे बचाओ! ये मुझे खींच रहे हैं!"
मैंने तुरंत उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मेरे हाथों से वो फिसलता चला गया।
पुराने ट्रक की आहट
उसी वक्त, कहीं दूर से एक पुराने ट्रक की इंजन की आवाज़ सुनाई दी।
गुर्रर्रर्र... गुर्रर्रर्र...
मैंने सिर उठाकर देखा—दूर कहीं एक पुराना, टूटा-फूटा ट्रक खड़ा था। उसके हेडलाइट्स जल-बुझ रहे थे, जैसे वो हमें बुला रहा हो।
"शायद यही हमारा आखिरी रास्ता है!"
मैंने पूरी ताकत से अजीम को खींचा और उसकी तरफ दौड़ा, लेकिन वो छायाएँ उसे छोड़ने को तैयार नहीं थीं।
तभी...
भूतिया चेहरा सामने आया
हमारे ठीक सामने एक भयानक चेहरा उभरा—बिल्कुल काले रंग का, आँखों की जगह गहरी गुफाएँ, और मुँह से रिसता काला लार।
"तुम बच नहीं सकते... यह ट्रक तुम्हारा ताबूत बन जाएगा!"
चेहरा अचानक अजीम के सामने झपट पड़ा!
"नहीं!!!"
मैंने ज़ोर से चीखते हुए अजीम का हाथ खींचा और ट्रक की ओर कूद पड़ा।
एक नया रहस्य
जैसे ही हमने ट्रक के दरवाज़े को छुआ, हमें एक ज़बरदस्त झटका लगा।
और अचानक, सब कुछ बदल गया।
हम अब किसी दूसरी जगह थे।
लेकिन यह जगह कोई आम जगह नहीं थी... यह वही भूतिया हाईवे था, लेकिन अब और भी ज़्यादा डरावना और सुनसान।
"हम बचे तो नहीं... बल्कि मौत के और करीब आ गए हैं!"
ट्रक का नया श्राप
हम दोनों हाँफते हुए ट्रक के अंदर गिर पड़े। बाहर अंधेरे में वो छायाएँ अब भी मंडरा रही थीं, लेकिन जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, उनकी चीखें अचानक थम गईं।
"क्या... ये सब खत्म हो गया?" अजीम ने काँपती आवाज़ में पूछा।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ़ बाहर झाँकने की कोशिश की। लेकिन खिड़की के बाहर सिर्फ़ घना धुआँ और एक अजीब सी निस्तब्धता थी।
ट्रक की अजीब हालत
मैंने ट्रक के अंदर इधर-उधर देखा।
ये हमारा ट्रक नहीं था।
डैशबोर्ड पर धूल जमी थी, स्टीयरिंग घिस चुका था, और सीटों पर कहीं-कहीं खून के दाग़ थे।
"अजीम, ये वही ट्रक नहीं है जिससे हम आए थे।"
अजीम ने भी सीट पर हाथ फेरा और डर से बोला, "ये तो किसी और का है... पर किसका?"
हम दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। हमारी साँसें तेज़ हो गईं।
पुराना रेडियो और वह संदेश
अचानक, ट्रक के पुराने रेडियो से साँय-साँय की आवाज़ आने लगी।
"गुर्ररररर.... कर्ररररर...."
फिर एक भारी, खुरदुरी आवाज़ गूँजी:
"...तुम लोग यहाँ से ज़िंदा नहीं जा सकते..."
अजीम डर से स्टीयरिंग के पास सरक गया। मैंने काँपते हाथों से रेडियो बंद करने की कोशिश की, लेकिन वह खुद-ब-खुद और तेज़ आवाज़ में गूँज उठा।
"यह ट्रक अब तुम्हारा नहीं है... यह श्रापित है... यह एक क़ैद है..."
ट्रक का अपने-आप चलना
अचानक, बिना किसी चेतावनी के, ट्रक का इंजन अपने-आप स्टार्ट हो गया!
"गुर्रर्रर्रर्रर्रर्र...."
स्टेयरिंग घूमने लगा, गियर अपने-आप बदलने लगे, और ट्रक पूरी रफ़्तार से सड़क पर दौड़ने लगा।
हमने इसे चलाया ही नहीं था!
रास्ता जो कहीं नहीं जाता
हम जिस सड़क पर थे, वो किसी अज्ञात अंधकार में जा रही थी।
कोई लाइट नहीं, कोई मकान नहीं, कोई और गाड़ी नहीं...
बस एक अनंत, डरावनी सड़क जो हमें कहीं खींचे लिए जा रही थी।
मैंने ट्रक को रोकने की कोशिश की, ब्रेक पर ज़ोर से पैर मारा—
लेकिन ब्रेक फेल हो चुके थे।
"हम फँस चुके हैं, अजीम!" मैंने चीखकर कहा।
मृत आत्माएँ ट्रक के साथ थीं
अचानक, पीछे वाली सीट से एक गहरी, घुटी हुई सिसकी सुनाई दी।
हम दोनों ने धीरे-धीरे मुड़कर देखा।
पीछे कोई बैठा था।
एक साया... धीरे-धीरे स्पष्ट होता हुआ...
"तुम... अब... हमारे साथ हो..."
मौत का सफर
ट्रक की पिछली सीट पर बैठी परछाईं अब एक शक्ल ले रही थी—एक कंकाल जैसी झुलसी हुई लाश, जिसकी खाली आँखों से काले धुएँ की लहरें उठ रही थीं।
अजीम की चीख़ गले में ही घुट गई। मैं पूरी ताकत से ब्रेक पर पैर मारता रहा, लेकिन ट्रक रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
"तुम अब इस श्राप से बच नहीं सकते..."
वह परछाईं फुसफुसाई, और उसकी आवाज़ जैसे हज़ारों चीखों से बनी हो।
कहाँ जा रही थी सड़क?
सामने सड़क अब एक अजीब तरह के घने कोहरे में डूब चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि ट्रक किसी और दुनिया में जा रहा हो।
मैंने हैरत से देखा कि सड़क पर अब पुराने ज़माने की टूटी-फूटी बैलगाड़ियाँ और जले हुए ट्रक दिख रहे थे, जैसे कोई भूतिया कारवाँ साथ चल रहा हो।
"भाई... ये सब क्या है?" अजीम की आवाज़ काँप रही थी।
मैंने जवाब देने के लिए मुँह खोला, लेकिन तभी—
एक औरत बीच सड़क पर!
सामने अचानक एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी दिखी।
उसका चेहरा नहीं था—बस काली गहरी खाई जैसी जगह जहाँ आँखें और मुँह होना चाहिए था।
"रुक जा..."
उसकी आवाज़ ट्रक के इंजन से भी ज़्यादा भारी थी।
मैंने ट्रक को घुमाने की कोशिश की, लेकिन स्टेयरिंग अजीब तरह से अटक चुका था।
ट्रक हवा में उठा!
ट्रक ने जैसे ही उस औरत को पार किया, अचानक ज़मीन हिलने लगी।
"गुर्ररररररर..."
ट्रक हवा में उठने लगा!
नीचे झाँका तो सड़क अंधेरे में गायब हो रही थी। अब हम किसी शून्य में दौड़ते चले जा रहे थे।
अजीम ने ज़ोर से कुरान की आयतें पढ़नी शुरू कर दीं, लेकिन तभी—
कोई ट्रक में घुस आया!
पीछे से किसी ने मेरा कंधा पकड़ लिया।
मैंने मुड़कर देखा—
वही औरत अब हमारे ट्रक के अंदर थी।
उसका मुंह अचानक खुला और एक भयानक चीख निकली।
ट्रक पूरे जोर से हिलने लगा, खिड़कियाँ अपने-आप टूटने लगीं।
अचानक सब शांत हो गया
ट्रक एक झटके में रुक गया।
हम दोनों बुरी तरह हाँफ रहे थे। चारों तरफ़ अंधेरा था।
लेकिन...
हम वापस उसी सुनसान ढाबे के सामने खड़े थे।
वही ढाबा... जहाँ से यह सब शुरू हुआ था।
मौत का दरवाजा
ट्रक रुक चुका था, लेकिन इंजन अब भी गर्म लोहे की तरह दहक रहा था। मेरे हाथ स्टेयरिंग पर जमे हुए थे, और शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। अजीम ने धीरे-धीरे मेरी बाजू पकड़कर हिलाई।
"भाई... हम वापस यहीं कैसे आ गए?"
मैंने कांपते होंठों से ढाबे की तरफ़ देखा।
सब कुछ वैसा ही था, लेकिन फिर भी कुछ अलग लग रहा था।
ढाबे की रोशनी हल्की-हल्की जल रही थी, लेकिन कोई इंसान वहाँ नहीं था।
वो कौन था?
अचानक ढाबे के दरवाजे पर एक काली परछाईं दिखी।
वह धीरे-धीरे हमारी तरफ़ बढ़ रही थी। उसके कदमों की आवाज़ जैसे ट्रक के अंदर गूंज रही थी—ठक... ठक... ठक...
"भाई, गाड़ी मोड़! हमें यहाँ से निकलना होगा!" अजीम की आवाज़ में खौफ था।
लेकिन मेरा हाथ स्टेयरिंग पर जमे हुए था।
"तुम भाग नहीं सकते..."
एक भारी-भारी आवाज़ पूरे ट्रक में गूंज उठी।
दरवाजा खुद खुल गया!
ट्रक का दरवाजा अचानक ज़ोर से खुल गया, जैसे किसी ने उसे झटके से खींच लिया हो।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन...
फर्श पर खून की बूंदें टपक रही थीं।
मैंने सिर उठाया तो देखा—
ढाबे का दरवाजा अब धीरे-धीरे अपने-आप खुल रहा था।
अंदर जाने की आवाज़...
"अंदर आओ..."
एक अजनबी, लेकिन जानी-पहचानी आवाज़ मेरे कानों में गूंजी।
अजीम कांपते हुए कुरान की आयतें बुदबुदाने लगा।
लेकिन मेरे पैरों ने खुद-ब-खुद ट्रक से नीचे कदम रख दिया।
ढाबे का खौफनाक सच
मेरे पैरों ने जैसे खुद-ब-खुद ज़मीन पर कदम रख दिया था। ठंडी हवा ने मेरी रीढ़ में एक अजीब-सा कंपन पैदा कर दिया। अजीम ने पीछे से मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
"भाई, मत जाओ! ये जगह सही नहीं लग रही!"
लेकिन मेरे कानों में वही आवाज़ गूंज रही थी—"अंदर आओ..."
ढाबे का दरवाजा अब पूरा खुल चुका था। अंदर घना अंधेरा था, लेकिन जैसे ही मैंने एक कदम बढ़ाया, एक धुंधली रोशनी जल उठी।
भूतिया ढाबा
अंदर का नज़ारा अजीब था।
टेबल-कुर्सियाँ वैसे ही रखी थीं, लेकिन उन पर गंदगी की मोटी परत जमी हुई थी, जैसे सालों से किसी ने यहाँ कदम नहीं रखा हो।
काउंटर के पीछे एक पुरानी दीवार घड़ी टंगी थी, जो 3:15 पर रुकी हुई थी।
और तभी...
चायवाले की आवाज़ फिर सुनाई दी।
"बैठो, भाईजान। चाय पीकर जाओ!"
मेरी सांस अटक गई।
हमने साफ़-साफ़ देखा—काउंटर के पीछे वही चायवाला खड़ा था,
जिसका हमने पहले कत्ल होते देखा था!
वो मरा नहीं था... या शायद?
अजीम ने घबराकर मुझसे कहा, "भाई, ये मर चुका था! ये... ये जिंदा कैसे हो सकता है?"
चायवाले ने हमारी बात सुन ली। वह मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान बिल्कुल बनावटी थी, जैसे किसी मुर्दे के चेहरे पर हंसी खींच दी गई हो।
"तुम दोनों बहुत दूर निकल आए हो। अब लौटना नामुमकिन है।"
इतना कहते ही उसने अपना सिर हल्के से झुकाया... और सिर धड़ से अलग होकर काउंटर पर गिर पड़ा!
अजीम चीख पड़ा। मैंने तुरंत पीछे मुड़कर भागने की कोशिश की, लेकिन...
ढाबे का दरवाजा अपने-आप बंद हो गया था।
अब हम फंस चुके थे...
मौत का दरवाजा
दरवाजे पर मैंने पूरी ताकत से धक्का दिया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ।
पीछे से अजीम की घबराई हुई आवाज़ आई, "भाई, कुछ कर! ये जगह ठीक नहीं है!"
मैंने पलटकर देखा—काउंटर पर चायवाले का कटा हुआ सिर पड़ा था, लेकिन उसकी आँखें अब भी हमें घूर रही थीं!
और फिर, वो सिर धीरे-धीरे फर्श पर गिरने लगा और खुद-ब-खुद लुढ़कता हुआ हमारे पास आने लगा!
फर्श पर लहू की नदियाँ
हमने देखा कि पूरी ज़मीन खून से लथपथ हो चुकी थी। जैसे किसी ने यहाँ कई लोगों का कत्ल किया हो।
टेबलों पर बैठे साये अब धीरे-धीरे हमारी तरफ़ घूम रहे थे। उनकी आँखों में अजीब-सा अंधेरा था।
अचानक, पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा!
मैंने तेजी से पलटकर देखा… और मेरी चीख निकल गई।
खौफनाक चेहरा
मेरे सामने एक जलता हुआ आदमी खड़ा था!
उसका पूरा शरीर राख में तब्दील हो चुका था, लेकिन उसकी आँखें अब भी जल रही थीं।
उसने धीरे से फुसफुसाया, "तुम भी हमारे साथ जलोगे..."
"भागो!" मैंने अजीम को धक्का दिया। हम दोनों पूरी ताकत से भागे।
लेकिन तभी...
दरवाजा अपने-आप खुल गया।
बाहर गहरी धुंध थी। हवा में कुछ बुदबुदाने की आवाज़ें आ रही थीं, जैसे कोई हमें बुला रहा हो।
हमारे पास अब दो ही रास्ते थे—
या तो हम ढाबे के अंदर उन भूतों के बीच फंस जाएं...
या इस खौफनाक धुंध में छलांग लगा दें।
हमने बिना कुछ सोचे धुंध में कदम रख दिया... और फिर जो हुआ, वो हमारी सोच से भी परे था।
धुंध में छुपा अंधेरा
जैसे ही हमने धुंध में कदम रखा, चारों ओर एक अजीब-सा सन्नाटा छा गया।
हवा में कुछ whispers गूंज रही थीं—ऐसा लग रहा था जैसे कई लोग धीमी आवाज़ में कुछ बुदबुदा रहे हों।
अचानक, अजीम ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया, "भाई, ये जगह... ये जगह ठीक नहीं लग रही!"
मैंने इधर-उधर देखा, लेकिन हमें कुछ भी नहीं दिख रहा था। बस घनी सफेद धुंध और उसमें छिपी हुई परछाइयाँ।
कदमों की आवाज़
हम दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। अचानक, हमारे पीछे किसी के कदमों की आवाज़ आई!
ठक... ठक... ठक...
हमने पलटकर देखा—कोई नहीं था।
लेकिन वो आवाज़ अब भी आ रही थी... और तेजी से हमारे करीब आ रही थी!
अजीम ने डरकर मुझसे कहा, "ये क्या हो रहा है, भाई? कोई हमारे पीछे चल रहा है!"
साये जो हिल नहीं रहे थे
हम धुंध में थोड़ी और आगे बढ़े तो सामने कई अजीबो-गरीब आकृतियाँ खड़ी दिखीं।
उनकी आँखें गहरी काली थीं… लेकिन उनका शरीर बिल्कुल स्थिर था।
हमने उन्हें देखा… और वे हमें देख रहे थे…
लेकिन वो हिल भी नहीं रहे थे, न सांस ले रहे थे।
अचानक, उनमें से एक आकृति ने धीरे-धीरे अपना हाथ बढ़ाया…
और तभी…
एक डरावनी चीख!
पूरी धुंध में एक दिल दहला देने वाली चीख गूंज उठी!
वो आवाज़ इतनी तेज़ थी कि हमारे कान सुन्न हो गए।
और अगले ही पल…
हम ज़मीन के नीचे गिरने लगे!
जैसे किसी ने हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन खींच ली हो, हम अंधेरे में गिरते चले गए…
और फिर—
सब कुछ काला हो गया।
अंतहीन अंधकार
जब मेरी आँखें खुलीं, तो चारों ओर घना अंधेरा था।
मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं कहाँ हूँ… और क्या हो रहा है?
"अजीम?" मैंने डरते हुए पुकारा।
कोई जवाब नहीं आया।
मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
मैंने ज़मीन पर हाथ रखा—यह ठंडी और गीली मिट्टी थी। ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी गहरी सुरंग में गिर गया हूँ।
गूँजती हुई आवाज़ें
अचानक, दूर से अजीम की हल्की चीख सुनाई दी!
"भाई! बचाओ!!"
उसकी आवाज़ चारों ओर गूँज रही थी, जैसे वह किसी अंधेरे कुएँ में फँसा हो।
मैं घबराकर खड़ा हुआ और अंधेरे में हाथ बढ़ाकर रास्ता टटोलने लगा।
छूने पर हिलने वाली दीवारें
मैं जैसे ही आगे बढ़ा, दीवारों को छूकर रास्ता ढूँढने की कोशिश की। लेकिन…
ये दीवारें ठोस नहीं थीं!
जैसे ही मैंने हाथ लगाया, वो दीवारें हल्की-सी हिलने लगीं, मानो किसी चीज़ से बनी हों जो ज़िंदा थी।
एक अजीब-सा हल्का कंपन महसूस हुआ, जैसे कोई मेरे स्पर्श को महसूस कर रहा हो!
"ये दीवारें... ये ज़िंदा हैं?"
छाया जो मेरी तरह हिल रही थी
मैंने अंधेरे में अपनी छाया देखने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही मैंने हिलना शुरू किया, मेरी छाया ने भी मेरे जैसी हरकत की।
पर फिर…
वो रुक गई।
मैंने हाथ हिलाया, लेकिन छाया अब भी वहीं खड़ी थी—बिल्कुल स्थिर!
किसी ने मेरे कानों में फुसफुसाया...
"तुम यहाँ से नहीं निकल सकते..."
मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
ये आवाज़... कोई मेरे कानों के पास फुसफुसा रहा था!
मैंने तेजी से पीछे मुड़कर देखा—कोई नहीं था।
लेकिन हवा में किसी की सांसों की हल्की गर्माहट महसूस हो रही थी।
अजीम को बचाने का रास्ता?
दूर, सुरंग के एक कोने से हल्की लाल रोशनी चमकती दिखी।
क्या ये बाहर निकलने का रास्ता था?
या ये एक और जाल था?
और अजीम?
मैंने गहरी सांस ली और आगे बढ़ने लगा…
लाल दरवाज़े का रहस्य
मैंने अंधेरे में घुटनों के बल चलते हुए उस हल्की लाल रोशनी की तरफ़ बढ़ना शुरू किया।
हर कदम के साथ मेरे दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी।
साँसें रोक देने वाली ठंडक
जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ा, हवा ठंडी होती गई। इतनी ठंडी कि मेरी उंगलियाँ सुन्न होने लगीं।
"ये जगह कौन सी है?"
दीवारों पर हाथ फेरते हुए मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। वो दीवारें अब भी हल्के-हल्के हिल रही थीं,
जैसे उनमें कोई हलचल हो रही हो।
और फिर, मैं उस लाल दरवाज़े के सामने पहुँचा।
दरवाज़े के पीछे की फुसफुसाहट
इस दरवाज़े से हल्की लाल रोशनी छनकर बाहर आ रही थी।
और...
अंदर से किसी के बोलने की आवाज़ें आ रही थीं।
कोई फुसफुसा रहा था, लेकिन शब्द साफ़ नहीं थे।
मैंने दरवाज़े पर कान लगाया—
"तुम... बच नहीं सकते..."
अजीम की चीख!
अचानक, मुझे अंदर से अजीम की तेज़ चीख सुनाई दी!
"भाई!!! बचाओ!!!"
मेरा खून जम गया।
मैंने झटके से दरवाज़े को धक्का दिया—पर वो टस से मस नहीं हुआ।
दीवारों से निकलते हाथ!
तभी, मुझे अपने पीछे हलचल महसूस हुई।
मैंने धीरे से गर्दन घुमाई—
दीवारों से हाथ निकल रहे थे!
काले, लंबे, टेढ़े-मेढ़े हाथ, जिनकी उंगलियाँ नुकीली और कटी-फटी थीं।
वे धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रहे थे!
दरवाज़े पर खून भरे निशान
मुझे एक ही रास्ता दिखा—दरवाज़े को तोड़ना!
मैंने पूरी ताकत से लात मारी।
धड़ाम!!
दरवाज़े पर खून से बने अजीब निशान उभर आए, जैसे किसी ने उसे बंद रखने के लिए कोई तंत्र-मंत्र किया हो।
पर मुझे अजीम को बचाना था!
मैंने फिर से पूरी ताकत से धक्का मारा...
और दरवाज़ा ज़ोर से खुल गया!
अंदर का दृश्य देख मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई...
दरवाज़े के अंदर...
अजीम ज़मीन पर बेहोश पड़ा था।
और उसके चारों ओर...
कुछ अजीब आकृतियाँ मंडरा रही थीं—लंबे, काले साये, जिनकी लाल चमकती आँखें मुझे घूर रही थीं!
उनमें से एक आकृति धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ने लगी…
"तुम्हारी बारी है..."
मौत की परछाइयाँ
मैं दरवाज़े के अंदर खड़ा था, मेरी साँसें तेज़ हो रही थीं।
अजीम ज़मीन पर बेहोश पड़ा था, और उसके चारों ओर मंडराती लंबी, काली परछाइयाँ मेरी ओर देख रही थीं।
उनकी आँखों से निकलती लाल चमक अंधेरे को चीर रही थी।
गूँजती हुई फुसफुसाहट
तभी, उन परछाइयों में से एक आगे बढ़ी।
उसका शरीर ठोस नहीं था, लेकिन उसका आकार इंसान जैसा था।
वो मेरे बहुत करीब आ गई और उसकी फुसफुसाती आवाज़ मेरे कानों में गूँजने लगी—
"अब तुम्हारी बारी है..."
मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
मौत का अहसास
मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर से सारी ताकत निकल रही हो।
मेरे पैरों में जान नहीं थी, हाथ ठंडे हो गए थे, और मेरी धड़कन धीरे-धीरे रुकने लगी।
"नहीं! मुझे यहाँ से निकलना होगा!"
मैंने हिम्मत जुटाई और अजीम की ओर दौड़ा।
लेकिन जैसे ही मैंने उसे उठाने की कोशिश की, उन परछाइयों में से एक ने मुझे पकड़ लिया!
छूने से पहले ही जलता हुआ एहसास
मुझे उसकी छुअन महसूस नहीं हुई, लेकिन जिस जगह उसने मुझे छूने की कोशिश की, वहाँ पर जलन होने लगी!
मानो मेरी आत्मा जल रही हो।
मैं ज़ोर से चिल्लाया—
"अल्लाह की पनाह!"
और तभी...
अचानक सुनाई दी अज़ान!
एक हल्की सी आवाज़ गूँजने लगी।
कहीं दूर से अज़ान की आवाज़ आ रही थी!
जैसे ही वो आवाज़ उन परछाइयों तक पहुँची, वे पीछे हटने लगीं।
उनकी लाल आँखों की चमक फीकी पड़ने लगी।
मुझे लगा जैसे कोई अदृश्य ताकत मुझे बचा रही थी।
बचने की कोशिश
मैंने बिना वक़्त गँवाए अजीम को ज़ोर से झकझोरा—
"अजीम! उठो!"
वो धीरे-धीरे होश में आया, उसकी आँखें डर से बड़ी हो गईं।
"भाई... हमें भागना होगा..."
मैंने उसकी बात सुनी भी नहीं, उसे अपने कंधे पर डाला और पूरी ताकत से दरवाज़े की ओर दौड़ा।
लेकिन...
दरवाज़ा बंद हो चुका था!
वो दरवाज़ा, जिससे मैं अंदर आया था, अब गायब था।
चारों ओर सिर्फ़ अंधेरा था... और पीछे से फिर वही डरावनी फुसफुसाहट गूँजने लगी—
"तुम बच नहीं सकते..."
जिन्न का अंधेरा
दरवाज़ा गायब हो चुका था।
मेरे चारों ओर सिर्फ़ काला धुआँ और भयानक परछाइयाँ थीं।
अजीम अभी भी बेहोशी की हालत में था, और मेरी सांसें तेज़ हो रही थीं।
तभी, मेरे कानों में वही डरावनी आवाज़ गूँजी—
"तुम बच नहीं सकते..."
धुआँ जो साँसों को रोक दे
अचानक, वो काली परछाइयाँ हवा में उठने लगीं और चारों ओर घना धुआँ भर गया।
मेरी साँसें जैसे बंद हो रही थीं।
धुएँ में एक अजीब सी गंध थी—
सड़ी हुई मांस जैसी, कफ़न जैसी।
मुझे अपनी ही धड़कनें सुनाई देने लगीं।
जिन्न का चेहरा
तभी, धुएँ के बीच से एक आकृति उभरी।
उसका चेहरा अजीब था—
लंबा, सफ़ेद, आँखों की जगह जलती हुई गहरी खाइयाँ।
उसके होंठ नहीं थे, लेकिन उसकी आवाज़ मेरे दिमाग़ में गूँज रही थी।
"तुम्हारी आत्मा हमारी हो चुकी है..."
क़ुरआन की आयतों का असर
मैंने कांपते हुए अपनी जेब टटोली।
मेरी माँ ने सफ़र से पहले क़ुरआन की एक छोटी किताब दी थी।
वो मेरी जेब में थी!
मैंने काँपते हाथों से उसे बाहर निकाला और ज़ोर से पढ़ने लगा—
"आयतुल कुर्सी..."
जैसे ही मैंने पहली आयत पढ़ी, वो जिन्न पीछे हटने लगा!
उसके जलते हुए काले हाथ हवा में कांपने लगे।
वो ग़ुस्से में चिल्लाया—
"बंद कर! इसे बंद कर!"
रास्ता खुला!
धुएँ में एक दरवाज़ा उभरने लगा।
वही दरवाज़ा जिससे मैं आया था!
मैंने अपनी आख़िरी हिम्मत जुटाई, अजीम को कंधे पर डाला और दरवाज़े की ओर भागा।
पीछे से जिन्न की चीख़ें गूँज रही थीं—
"तुम बच नहीं सकते! यह सिर्फ़ शुरुआत है!"
ट्रक के पास वापसी
मैं दरवाज़े से बाहर निकला और देखा कि हम फिर से अपने ट्रक के पास खड़े थे!
पीछे पलटकर देखा—
वो कोठी गायब हो चुकी थी।
मैंने अजीम को ट्रक की सीट पर गिराया और दरवाज़ा बंद कर दिया।
मेरा पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था।
अजीम ने हड़बड़ाते हुए पूछा—
"भाई... वो क्या था?"
मैंने कांपते हुए जवाब दिया—
"कुछ ऐसा... जो इंसानों के लिए नहीं था..."
लेकिन ये ख़त्म नहीं हुआ था।
क्योंकि...
ट्रक की खिड़की पर अभी भी किसी की परछाई थी।
जिन्न अभी गया नहीं
ट्रक की खिड़की पर जो परछाई थी, वो धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थी।
मैंने कांपते हुए देखा—
वो वही जिन्न था!
लेकिन इस बार, उसका चेहरा हमारे बिल्कुल पास था।
उसकी आँखों की जगह जलते हुए कोयले थे, और उसकी मुस्कान इतनी डरावनी थी कि मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
Complete voice
ट्रक स्टार्ट नहीं हो रहा था
मैंने झटके से चाबी घुमाई—
खररर... खररर...
ट्रक स्टार्ट ही नहीं हो रहा था!
अजीम बुरी तरह घबराया हुआ था—
"भाई, जल्दी करो! ये हमें छोड़ने वाला नहीं!"
मैंने दोबारा कोशिश की, लेकिन इंजन गड़गड़ाकर बंद हो गया।
पीछे से जिन्न की आवाज़ आई—
"तुम भाग नहीं सकते... अब ये ट्रक भी मेरा है..."
अल्लाह का नाम लिया
मैंने झट से बिस्मिल्लाह पढ़ी और आख़िरी बार चाबी घुमाई—
धड़धड़धड़...
ट्रक स्टार्ट हो गया!
हमने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबाया और हाईवे की ओर दौड़ पड़े।
लेकिन...
पीछे कुछ ऐसा हुआ, जिसे देखकर हमारे होश उड़ गए।
कोठी से उठती आग
जैसे ही ट्रक तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ा, हमने पीछे देखा—
वो पूरी कोठी जलने लगी!
चारों ओर से आग की लपटें उठ रही थीं, और उनके बीच...
वही जिन्न खड़ा था!
उसकी जलती आँखें हमारी ओर देख रही थीं, और उसके होंठ हिल रहे थे—
लेकिन अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
बस उसकी खौफ़नाक मुस्कान...
अजीब रास्ता
हम हाईवे पर तेज़ी से भाग रहे थे, लेकिन कुछ गड़बड़ थी।
ये रास्ता वो नहीं था जिससे हम आए थे!
सड़क अजीब लग रही थी—
बिल्कुल सुनसान, दोनों तरफ़ सूखे पेड़ और काले धुएँ जैसी हवा।
अजीम ने कांपते हुए पूछा—
"भाई... हम जा कहाँ रहे हैं?"
मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
हम किसी अनजान दुनिया में फँस चुके थे...
और अब, हमें बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था।
मौत का रास्ता
हमारी हालत ऐसी थी जैसे किसी भूलभुलैया में फँस गए हों।
ट्रक का एक्सीलेटर पूरा दबाए हुए था, लेकिन ऐसा लग रहा था हम कहीं नहीं पहुँच रहे।
सड़क के दोनों ओर वही सूखे पेड़, वही धुंआ और वही अजीब सन्नाटा…
मुझे लगा कि शायद मैं सपना देख रहा हूँ, लेकिन…
"भाई! ये देखो!" अजीम की डर से काँपती आवाज़ आई।
मैंने शीशे से बाहर झाँका और जो देखा…
सामने फिर वही कोठी!
हम पिछले पंद्रह मिनट से ट्रक चला रहे थे, मगर फिर से उसी जगह पहुँच गए!
वही जली हुई कोठी, वही टूटा फाटक… और…
"अल्लाह की कसम, ये कैसे हो सकता है?" अजीम का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।
मेरी आँखें भी डर से फैल गईं।
कोठी के बाहर खड़ी औरत
लेकिन इस बार…
कोठी के बाहर कोई खड़ा था।
एक औरत… पूरी तरह काले लिबास में।
उसका सिर झुका हुआ था, और उसके लम्बे बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे।
लेकिन जैसे ही हमारी नज़र उस पर पड़ी—
उसका सिर धीरे-धीरे उठा… और फिर…
उसका चेहरा… इंसानी नहीं था!
उसके चेहरे पर आँखों की जगह गहरे काले गड्ढे थे।
नाक की जगह एक छेद…
और उसके होंठ…
ऐसे सिल दिए गए थे जैसे किसी ने सुई-धागे से उसकी जुबान हमेशा के लिए बंद कर दी हो!
जिन्न की हँसी गूँजी
तभी, हमारे कानों में एक भारी, डरावनी हँसी गूँजी—
"तुम्हें लगा कि तुम बच जाओगे?"
ट्रक झटके से रुक गया।
बिना किसी वजह के…
इंजन खुद-ब-खुद बंद हो गया।
और फिर…
दरवाज़ा खुद खुल गया!
मेरा दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।
मानो कोई हवा नहीं, बल्कि कोई ताकत उसे ज़बरदस्ती खींच रही हो।
"भाई, भागो!" अजीम चीख पड़ा।
लेकिन…
अब भागना नामुमकिन था।
क्योंकि वो औरत हमारी तरफ़ बढ़ने लगी थी…
उसके पैर ज़मीन पर नहीं थे…
वो हवा में तैर रही थी…
और उसकी आँखों से काला खून बह रहा था…
हमारी सांसें रुक गईं।
अब मौत बहुत करीब थी…
जिन्न का कहर
ट्रक के अंदर दम घुटने जैसा माहौल बन गया था।
अजीम की साँसे तेज़ हो गईं, और मेरी उंगलियाँ स्टेयरिंग पर जमी रह गईं।
बाहर खड़ी वो औरत अब हमारी तरफ़ और करीब आ चुकी थी।
"अल्लाह की पनाह!" अजीम ने कांपती आवाज़ में कहा।
लेकिन जैसे ही हमने दुआ पढ़नी शुरू की—
वो औरत भयानक आवाज़ में हँसने लगी!
"हा… हा… हा…"
उसकी हँसी इतनी डरावनी थी कि हमारे रोंगटे खड़े हो गए।
फिर…
उसने धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर उठाया…
और अगले ही पल…
हमारा ट्रक हवा में उठ गया!
हाँ!
ट्रक अपने आप दो फीट हवा में ऊपर उठ गया!
हम दोनों सीट से चिपक गए।
स्टेयरिंग खुद घूमने लगा…
गियर खुद बदलने लगे…
ऐसा लग रहा था जैसे कोई अनदेखी ताकत हमारे ट्रक को अपने कब्ज़े में ले चुकी थी।
अजीम हवा में उड़ गया!
"भाई! बचाओ!"
अचानक…
अजीम खुद-ब-खुद हवा में उठा और ट्रक से बाहर फेंक दिया गया!
मैंने चीखते हुए उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन…
दरवाज़े अपने आप बंद हो गए!
अब मैं अकेला था…
जिन्न ट्रक में घुस चुका था!
मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे ठीक पीछे बैठा है।
ठंडी हवा का एक झोंका मेरे कान के पास से गुज़रा और…
"अब तुम बच नहीं सकते..."
कानों में एक गहरी, भारी, शैतानी आवाज़ गूँज उठी।
मैंने धीरे से रियर व्यू मिरर में देखा…
और मेरी रूह काँप गई!
पीछे की सीट पर वही काली औरत बैठी थी!
उसके होंठ अभी भी सिले हुए थे…
लेकिन इस बार…
उसकी आँखों की जगह तेज़ लाल आग जल रही थी!
वो धीरे-धीरे मेरी तरफ़ झुकने लगी…
मेरा पूरा शरीर जड़ हो गया।
मुझे महसूस हुआ कि अब मैं मरने वाला हूँ…
लेकिन तभी…
ट्रक के बाहर अजीम की चीख गूँजी!
"भाई! दुआ पढ़ो!"
मुझे झटका लगा।
अजीम अभी भी ज़िंदा था!
मैंने जितनी ताकत बची थी, उतनी से कलमा पढ़ना शुरू कर दिया…
और फिर…
जिन्न भयानक चीख के साथ ग़ायब हो गया!
"ग़ुर्रर्रर्रर्रर्र!!!"
ट्रक अचानक धर्राम! से नीचे गिरा।
दरवाज़े खुद-ब-खुद खुल गए…
और मैंने बिना समय गंवाए ट्रक से छलांग लगा दी!
हमने जल्दी से भागना शुरू कर दिया…
लेकिन…
कोठी की तरफ़ से फिर वही आवाज़ आई…
"तुम मुझसे बच नहीं सकते…"
अब हमें समझ आ गया था कि यहाँ से जिंदा निकलना आसान नहीं था…
मौत का फंदा
हमने पूरी ताकत से भागना शुरू किया।
पीछे से अब भी वो आवाज़ें आ रही थीं—
"हा… हा… हा… तुम बच नहीं सकते!"
हमने जैसे ही कोठी के बाहर की सड़क पर कदम रखा…
ज़मीन हिलने लगी!
मुझे लगा भूकंप आ गया है!
पेड़ ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे…
सड़क की मिट्टी अपने आप उठने लगी…
और फिर—
सामने एक खौफनाक परछाईं उभर आई!
वो कोई इंसान नहीं था…
वो एक जिन्न था…
एक भयानक जिन्न!
उसका कद लगभग 12 फीट लंबा था।
उसकी आँखें आग की तरह जल रही थीं।
उसके हाथों के नाखून इंसानी हड्डियों जितने बड़े थे!
उसके आते ही चारों ओर अंधेरा छा गया।
अजीम चिल्लाया, "भाई! अब क्या करें?!"
मैंने दुआ पढ़नी शुरू की…
लेकिन जिन्न ने अपने लंबे हाथ बढ़ाए और…
मेरे गले को पकड़ लिया!
मैं हवा में ऊपर उठ गया…
साँसें घुटने लगीं…
दिमाग सुन्न होने लगा…
मुझे लगा अब मैं मर जाऊँगा…
तभी अचानक…
पीछे से किसी ने ज़ोर से अज़ान दी!
"अल्लाहु अकबर… अल्लाहु अकबर…!"
और जिन्न जलने लगा!
उसके मुँह से भयानक चीख निकली—
"ग़ुर्रर्रर्रर्रर्रर्र!!!"
उसने मेरा गला छोड़ दिया और दूर जा गिरा।
मैं ज़मीन पर गिर पड़ा, दम घुटने से हाँफता हुआ।
अजीम ने मुझे संभाला, "भाई! उठो!"
हमने पीछे मुड़कर देखा कि अज़ान देने वाला कौन था…
और वो नज़ारा देखकर हमारे होश उड़ गए!
वो एक बुज़ुर्ग फकीर था, जो हवा में तैर रहा था!
उसके चारों ओर एक अजीब रौशनी थी…
उसकी आँखें ऐसी थीं, मानो वो सबकुछ देख चुके हों…
उन्होंने जिन्न की तरफ़ देखा और ज़ोर से बोले—
"अब यहाँ से दफ़ा हो जा! यह जगह इंसानों की है!"
जिन्न ने घबराकर हमारी तरफ़ देखा…
और फिर…
अचानक हवा में ग़ायब हो गया!
उसकी जगह सिर्फ़ गाढ़ा काला धुआँ बचा।
हम अभी भी सदमे में थे…
बुज़ुर्ग ने हमारी तरफ़ देखा और कहा—
"अगर आज तुमने मुझे नहीं पुकारा होता, तो ये जिन्न तुम्हें मार देता!"
अजीम ने हकलाते हुए पूछा, "आप… आप कौन हैं?"
बुज़ुर्ग ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"मैं वो हूँ, जिसे इस जिन्न ने बरसों पहले कैद किया था… और आज तुमने मुझे आज़ाद कर दिया।"
हम एक-दूसरे का मुँह देखने लगे…
तो क्या हमसे पहले भी कोई इस कोठी में फँसा था?
अब हमें समझ आ गया था कि ये सिर्फ एक भूतिया कोठी नहीं थी…
ये जगह एक खतरनाक काली ताकत का अड्डा थी…
जिन्न का असली रहस्य
हमने उस बुज़ुर्ग फकीर की तरफ़ देखा, जिनकी आँखों में एक गहरी रहस्यमयी चमक थी।
अजीम ने धीमे स्वर में पूछा, "बाबा… आप कौन हैं? और यह जिन्न कौन था?"
बुज़ुर्ग ने लंबी साँस ली और बोले,
"ये कोई आम जिन्न नहीं था…
**ये 'हाशिम' था, एक श्रापित जिन्न!"
हमने हैरानी से उनकी तरफ़ देखा।
"श्रापित जिन्न?"
बुज़ुर्ग ने सर हिलाया, "हाँ…
सदियों पहले यह एक आम जिन्न था, लेकिन इसे लालच ने श्रापित बना दिया।"
मैंने डरते हुए पूछा, "कैसा लालच?"
बुज़ुर्ग ने जो बताया, उसने हमारे रोंगटे खड़े कर दिए…
"बहुत समय पहले, यहाँ एक सूफी संत रहा करते थे। उनके पास एक रहस्यमयी ताबीज था, जिसे पहनने वाला मौत से भी बच सकता था।
हाशिम ने वो ताबीज हासिल करने की कोशिश की, लेकिन… संत ने उसे रोक दिया। ग़ुस्से में हाशिम ने उन्हें मार दिया, पर वो ताबीज फिर भी उसे नहीं मिला।
मरते समय संत ने उसे श्राप दे दिया—
"अब तू इस जगह पर कैद रहेगा, और जो भी यहाँ आएगा, तू उसे शिकार बनाएगा!"
"तब से यह जिन्न इस कोठी में फँसा हुआ है।"
बाबा ने हमारी तरफ़ देखा और गंभीर स्वर में कहा,
"तुम लोगों ने इस जगह पर कदम रखकर अपनी जान ख़तरे में डाल दी है!"
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
अजीम ने जल्दी से पूछा, "बाबा, अब हम क्या करें? यह जिन्न वापस तो नहीं आएगा न?"
बुज़ुर्ग ने अपनी आँखें बंद कीं और कुछ बुदबुदाए।
कुछ सेकंड बाद उन्होंने आँखें खोलीं और बोले—
"वो अभी गया है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं।"
"वो लौटेगा… और अगली बार पहले से भी ज़्यादा ताकतवर होकर आएगा!"
हम दोनों ने एक-दूसरे को घबराई नज़रों से देखा।
मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा, "तो बाबा, हमें क्या करना होगा?"
बुज़ुर्ग ने गहरी साँस ली और बोले,
"तुम्हें उस ताबीज़ को खोजना होगा…
वही इस जिन्न को हमेशा के लिए ख़त्म कर सकता है!"
मैंने अजीम की तरफ़ देखा, और अजीम ने मेरी तरफ़।
हम दोनों समझ चुके थे कि अब हमारी ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रहने वाली…
क्योंकि अब हमें एक खतरनाक रहस्य की गहराइयों में उतरना था…
ताबीज़ की खोज
बुज़ुर्ग फकीर की बातें सुनकर हमारे दिल में खौफ और सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा।
"ताबीज़ कहाँ मिलेगा, बाबा?" अजीम ने हड़बड़ाते हुए पूछा।
बुज़ुर्ग ने अपनी सफेद दाढ़ी सहलाई और धीमे स्वर में बोले,
"वो ताबीज़ अब इस हवेली में कहीं छुपा हुआ है... और वो जिन्न इसे छू भी नहीं सकता!"
"लेकिन यह हवेली तो बहुत बड़ी है," मैंने चिंतित होकर कहा। "कैसे पता चलेगा कि ताबीज़ कहाँ है?"
बुज़ुर्ग ने हल्की मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा।
"जिसने श्राप दिया, उसी के निशान ताबीज़ की राह दिखाएंगे।"
हमने एक-दूसरे को सवालिया नज़रों से देखा।
"मतलब?"
बुज़ुर्ग ने धीरे-धीरे जवाब दिया,
"जिस सूफी संत ने हाशिम जिन्न को श्राप दिया था, उसने अपने आखिरी समय में अपने खून से दीवारों पर संकेत छोड़े थे। वे संकेत तुम्हें ताबीज़ तक ले जाएंगे।"
अजीम ने गहरी सांस ली और इधर-उधर देखने लगा।
"लेकिन बाबा, आप यह सब कैसे जानते हैं?"
बुज़ुर्ग कुछ देर चुप रहे, फिर धीरे से बोले—
"क्योंकि मैं उसी सूफी संत का वंशज हूँ… और मेरा फ़र्ज़ है कि इस जिन्न को हमेशा के लिए कैद करूँ!"
हम दोनों सन्न रह गए।
"अगर यह आपका फ़र्ज़ है, तो आप खुद ताबीज़ क्यों नहीं खोजते?" मैंने हिम्मत करके पूछा।
बुज़ुर्ग फकीर के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी आ गई।
"मैं यह जगह नहीं छोड़ सकता… अगर मैं इस हवेली की सीमा पार करूँगा, तो जिन्न पूरी तरह आज़ाद हो जाएगा।"
"अब यह काम तुम्हें ही करना होगा!"
हम दोनों के चेहरे से खून उतर गया।
अंधेरे में छुपे संकेत
बुज़ुर्ग फकीर ने हमें हवेली की पुरानी दीवार की तरफ इशारा किया।
"दीवारों पर गौर से देखो… वहाँ खून से लिखे पुराने निशान होंगे। वो तुम्हें ताबीज़ की तरफ़ ले जाएंगे।"
हम डरते-डरते आगे बढ़े।
दीवारों पर हाथ फेरते हुए हम हर दरार को ध्यान से देख रहे थे।
अचानक अजीम रुक गया।
"अली! इधर देखो!"
मैं तेजी से उसकी ओर बढ़ा।
उसने दीवार की एक पुरानी ईंट पर उंगली रखी।
"यहाँ कुछ लिखा है…"
हमने अपनी मोबाइल टॉर्च जलाई।
हल्की रोशनी में हमें अरबी भाषा में कुछ लिखा नज़र आया—
"نور يتبع الظلام"
मैंने धीरे से पढ़ा, "नूर यत्बा अल-ज़ुल्मा…"
अजीम ने पूछा, "इसका क्या मतलब है?"
बुज़ुर्ग पीछे से बोले,
"जहाँ अंधेरा सबसे गहरा होगा, वहीं रोशनी तुम्हारा इंतज़ार करेगी।"
हम दोनों की सांसें तेज़ हो गईं।
इसका मतलब था कि ताबीज़ हवेली के सबसे अंधेरे कोने में छुपा हुआ है…
और वह कोना कहीं और नहीं, बल्कि उस तहखाने में था, जहाँ हमें जिन्न पहली बार मिला था!
अजीम ने धीरे से कहा, "हमें वापस उस तहखाने में जाना होगा…"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"क्या हम सच में वहाँ वापस जाने के लिए तैयार हैं?"
क्योंकि हम जानते थे…
इस बार वो जिन्न हमें रोकने के लिए ज़रूर आएगा!
तहखाने की दहलीज
हवेली की ठंडी दीवारों के बीच, हमारी साँसें किसी घड़ी की टिक-टिक की तरह चल रही थीं। हमें उस तहखाने में वापस जाना था, जहाँ पहली बार हमने जिन्न की परछाई देखी थी। लेकिन अब फर्क ये था कि वह हमें पहचान चुका था… और हमारी हर हरकत पर नज़र रख रहा था।
"अली, जल्दी करो!" अजीम ने फुसफुसाते हुए कहा।
बुज़ुर्ग फकीर ने हमें एक पुराना तांबे का दिया थमाया।
"इस दिए की लौ कभी बुझने मत देना… जब तक ये जलती रहेगी, जिन्न तुमसे दूर रहेगा।"
मैंने कांपते हाथों से दिया पकड़ा और हम दोनों धीरे-धीरे तहखाने की ओर बढ़ने लगे।
गहरी सीढ़ियों का सफर
जैसे ही हमने तहखाने की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर कदम रखा, चारों ओर अजीब-सी नमी और सड़ांध की बू आनी शुरू हो गई। अजीम के हाथ में टॉर्च थी, लेकिन अंधेरे का घना पर्दा उसकी रोशनी को भी निगल रहा था।
"कुछ महसूस हो रहा है?" मैंने धीरे से पूछा।
अजीम सिर हिलाकर बोला, "हाँ… जैसे कोई हमें देख रहा हो।"
हमारी छायाएँ दीवारों पर लहरा रही थीं, और हर कदम के साथ हवा और भारी होती जा रही थी।
दरवाज़े के पीछे की हलचल
तहखाने का पुराना लकड़ी का दरवाज़ा हमारे सामने था।
"तैयार?" अजीम ने पूछा।
मैंने सिर हिलाया और धीरे से दरवाज़ा खोला।
चीईईईईईईईईईईईईक—
दरवाज़े के खुलते ही अंदर की घनी स्याही हमारी टॉर्च की रोशनी को निगलने लगी।
अचानक, हमें लगा कि कोई चीज़ अंदर हिली है!
"अली… वहाँ कुछ है!" अजीम की आवाज़ कांप रही थी।
हमने टॉर्च घुमाई, लेकिन वहाँ कुछ नहीं था… सिवाय उन पुरानी दीवारों के, जिन पर समय के गहरे घाव थे।
निशान जो ताबीज़ तक ले जाएंगे
हमने दीवारों को ध्यान से देखना शुरू किया।
और तभी, कोने में एक जगह हमें कुछ अजीब नज़र आया—
खून से बने हाथों के निशान!
"ये वही संकेत हैं!"
बुज़ुर्ग फकीर की बात याद आते ही हमारा डर थोड़ा कम हुआ।
अजीम ने धीरे से दीवार पर हाथ रखा और बोला, "ये निशान हमें ताबीज़ तक ले जाएंगे…"
लेकिन जैसे ही हमने आगे बढ़ना शुरू किया,
पीछे से किसी ने हमें ज़ोर से धक्का दे दिया!
हम दोनों लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़े, और टॉर्च हमारे हाथ से छूट गई।
अंधेरा… घना अंधेरा!
और तभी, एक डरावनी सरसराहट सुनाई दी—
"तुम्हें लगा कि मैं तुम्हें देख नहीं रहा?"
वो जिन्न जाग चुका था…
मौत का फ़रमान
अंधेरे में हमारी साँसें घुट रही थीं। टॉर्च ज़मीन पर पड़ी थी, लेकिन उसकी रोशनी बुझ चुकी थी। बस तांबे के दिए की धीमी लौ टिमटिमा रही थी, जो कभी भी बुझ सकती थी।
"तुम्हें लगा कि मैं तुम्हें देख नहीं रहा?"
वो आवाज़ ठंडी और गहरी थी, जैसे किसी पुराने कुएँ की गहराई से आ रही हो।
"क…कौन है वहाँ?" अजीम ने हकलाते हुए पूछा।
कोई जवाब नहीं… बस हवा में एक अजीब-सी फुसफुसाहट गूँज रही थी।
ताबीज़ का राज़
अचानक, तहखाने की दीवारों पर कुछ हलचल हुई। खून से बने हाथों के निशान धीरे-धीरे चमकने लगे।
"अली, देखो! ये निशान हमें कुछ बताना चाहते हैं!" अजीम ने इशारा किया।
मैंने घुटनों के बल चलते हुए दीवारों को गौर से देखा।
तभी…
एक कोने में धूल और मकड़ी के जालों से ढकी एक पत्थर की पट्टी दिखाई दी। उस पर कुछ उभरा हुआ था—
"जो इस ताबूत को खोलेगा, मौत उसका पीछा करेगी।"
हमने एक-दूसरे की ओर देखा। दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
वो परछाई जो हमारी नहीं थी
अचानक, तांबे के दिए की लौ काँप गई। जैसे किसी ने उसके पास से हवा में कोई चीज़ गुज़ारी हो।
"अली… देखो!"
अजीम ने कांपते हुए दीवार की ओर इशारा किया।
हमारी परछाइयाँ वहाँ थी… लेकिन उनके बीच एक और परछाई खड़ी थी!
वो परछाई हमसे लंबी थी… पतली और टेढ़ी… और उसकी आँखों की जगह दो जलते हुए कोयले चमक रहे थे।
मौत का फ़रमान
"तुमने इसे जगा दिया है। अब तुम नहीं बचोगे।"
वो आवाज़ इस बार और करीब से आई।
और तभी…
तहखाने के एक कोने से एक ताबूत खुद-ब-खुद खिसकने लगा!
लकड़ी की चरमराहट और लोहे की ज़ंजीरों की खटखटाहट गूँज उठी।
हमने दौड़ने की कोशिश की, लेकिन पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।
ताबूत का ढक्कन धीरे-धीरे खुल रहा था…
और अंदर से…
किसी ने हमारी तरफ़ हाथ बढ़ाया!
ताबूत के अंदर क्या था?
ताबूत का ढक्कन चरमराता हुआ पूरी तरह खुल गया। उसके अंदर जो था, उसे देखकर हमारे रोंगटे खड़े हो गए।
सड़े-गले, सूखे हुए हाथ… जैसे किसी ममी का हाथ हो…
लेकिन ये हाथ मर चुके इंसान का नहीं लग रहा था। इसकी उंगलियाँ लंबी और नुकीली थीं, नाखून किसी जानवर के पंजों की तरह बढ़े हुए थे। अंदर एक घना अंधेरा था, लेकिन उसमें से झांकती हुई दो जलती हुई आँखें हमें घूर रही थीं।
"भागो!" अजीम चीखते हुए पीछे हटने लगा।
लेकिन हम हिल भी नहीं पा रहे थे। पैर जैसे ज़मीन में धंस गए थे।
मृत आत्माओं का अड्डा
ताबूत के अंदर से हल्की-हल्की भयानक फुसफुसाहटें आ रही थीं, जैसे कई आवाज़ें एक साथ कुछ मंत्र बोल रही हों।
"तुमने इसे छेड़ा… अब ये तुम्हें छोड़ेगा नहीं…"
वो वही रहस्यमयी आवाज़ थी, जो हमें तहखाने में घसीट लाई थी।
अचानक, ताबूत के अंदर से धुएँ जैसी काली परछाइयाँ बाहर निकलने लगीं। ये कोई साधारण धुआँ नहीं था, ये ज़िंदा था… और हमारी तरफ़ बढ़ रहा था।
"अली, कुछ करो!" अजीम कांपती आवाज़ में चिल्लाया।
क़ुरआन की आयतें और मौत की चीखें
मुझे अचानक याद आया…
ताबीज़!
मैंने अपने गले में बंधे ताबीज़ को कसकर पकड़ा और कांपती आवाज़ में कुछ आयतें पढ़नी शुरू कीं—
"आउज़ु बिल्लाहि मिन अश-शैतानिर-राजीम…"
जैसे ही मैंने पढ़ना शुरू किया, वो धुआँ एकदम रुक गया। ताबूत के अंदर से एक दिल दहला देने वाली चीख निकली, जैसे कोई आत्मा दर्द में तड़प रही हो।
तभी…
ताबूत की लकड़ी खुद-ब-खुद जलने लगी! उस पर लगे खून के धब्बे लाल से काले पड़ गए। ज़मीन हिलने लगी।
तहखाने से भागने की कोशिश
"अब मौका है! भागो!"
मैंने अजीम का हाथ पकड़ा और सीढ़ियों की ओर भागा। लेकिन जैसे ही हमने ऊपर जाने की कोशिश की, वो लकड़ी की सीढ़ियाँ अचानक टूटने लगीं!
"अल्लाह! हम फंस गए!"
पीछे से वो काली परछाइयाँ फिर से हमारी तरफ़ बढ़ रही थीं… ताबूत के अंदर जो भी था, अब पूरी तरह जाग चुका था…
क्या हम बच पाएँगे?
मौत का दरवाज़ा
हम दोनों पीछे हटे। हमारे सामने एक ही रास्ता था—तहखाने की काली, ठंडी दीवारें। लेकिन पीछे वो साया हमारी तरफ़ बढ़ रहा था।
"कोई तो रास्ता होगा बाहर जाने का!" अजीम बौखलाकर दीवारें टटोलने लगा।
मैंने भी कोशिश की, लेकिन दीवारें ठोस थीं। कोई खिड़की, कोई दरवाज़ा नहीं था।
फिर अचानक...
दीवार के एक हिस्से पर हाथ रखते ही ज़मीन हिल गई।
गुप्त दरवाज़ा
"अली! ये देखो!"
अजीम ने ज़ोर से एक ईंट को धक्का दिया और पूरी दीवार अंदर धंस गई। हमारे सामने एक संकरा सुरंग खुल गया, जो अंधेरे में कहीं दूर जाता था।
"चलो! जल्दी!"
हमने बिना सोचे उस सुरंग में छलांग लगा दी। पीछे से वो आत्माएँ अब लगभग हम तक पहुँच चुकी थीं। उनकी फुसफुसाहटें कानों में गूँज रही थीं—
"तुम बच नहीं सकते... ये तुम्हारा क़ब्रिस्तान बनेगा..."
सुरंग का भूतिया रहस्य
सुरंग की दीवारें गीली और ठंडी थीं, जैसे सदियों से यहाँ नमी कैद हो। अंदर से अजीब सी बदबू आ रही थी—सड़ी हुई लाशों की बदबू।
हमें लगा कि हम बच गए, लेकिन हम गलत थे।
जैसे ही हम सुरंग में आगे बढ़े, वहाँ ज़मीन पर अजीबोगरीब शव पड़े थे—पुराने, सूखे हुए शरीर, जिनके चेहरे पर मौत के वक़्त की भयानक चीखें जमी हुई थीं।
वो कौन थे?
अचानक, उन लाशों में हरकत होने लगी।
"अली... ये... ज़िंदा हैं?" अजीम की आवाज़ काँप रही थी।
फिर...
एक लाश की आँखें खुल गईं—बिलकुल सफ़ेद, बिना पुतलियों के।
वो धीरे-धीरे उठने लगी... उसके हड्डियों से खाल चिपकी हुई थी, जैसे सदियों से मरा हुआ हो, लेकिन वो हमें देख रहा था।
"तुम यहाँ नहीं आ सकते... ये तुम्हारी मौत की जगह है..."
और फिर एक-एक कर सारी लाशें हिलने लगीं।
हमने अब तक की सबसे भयानक चीज़ देखी थी—मृतकों का जागना।
मृतकों का कहर
हमारी टाँगें काँपने लगीं। सामने ज़िंदा होते शव और पीछे अंधेरी सुरंग से आती आत्माओं की सरसराहट... बचने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था।
"भागो!" अजीम चीखा।
हम जैसे-तैसे आगे दौड़ने लगे। लेकिन वो हड्डियों के ढाँचे हमारे पीछे-पीछे सरक रहे थे। उनकी चाल भले ही धीमी थी, लेकिन उनकी फुसफुसाहट हमारे कानों में सीसे की तरह उतर रही थी।
"तुम बच नहीं सकते... हर कोई यहाँ फँस जाता है..."
सुरंग के आख़िरी छोर पर...
हम तेज़ी से भागते रहे, जब तक कि हमें आगे हल्की रोशनी नहीं दिखी।
"दरवाज़ा!" अजीम ने चिल्लाते हुए इशारा किया।
आगे एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा था, जो आधा टूटा हुआ था। हमने उसे ज़ोर से धक्का दिया, लेकिन वो हिला भी नहीं।
"जल्दी कर, अली! ये आ रहे हैं!"
पीछे देखने की हिम्मत नहीं थी। लेकिन उनकी बदबूदार साँसें अब हमारी गर्दन तक आ पहुँची थीं।
मैंने पूरी ताक़त लगाकर दरवाज़ा धक्का दिया... और फिर—
धड़ाम!
दरवाज़ा खुला और हम अंदर गिर पड़े।
मौत की भूलभुलैया
हमने जल्दी से दरवाज़ा बंद कर लिया। अंदर घुप अंधेरा था, लेकिन कम से कम हम उन लाशों से बच गए थे... या शायद नहीं।
"ये जगह... कुछ गड़बड़ है," अजीम ने डरते हुए कहा।
हमारे चारों ओर अजीबोगरीब आकृतियाँ उभरने लगीं। दीवारों पर खून से सने हाथों के निशान थे। और सबसे भयानक चीज़—मिट्टी से बाहर झाँकते इंसानी हाथ।
"क्या ये... कोई क़ब्रिस्तान है?" मैंने काँपते हुए पूछा।
अचानक, एक गहरी गूँजती हुई आवाज़ आई—
"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था..."
और फिर—ज़मीन हिलने लगी।
हमारी आँखों के सामने मिट्टी में दबी लाशें बाहर निकलने लगीं।
अब बचने का कोई रास्ता नहीं था।
श्राप की आख़िरी रात
हमारी साँसें तेज़ हो गईं। मिट्टी में दबी लाशें धीरे-धीरे बाहर आ रही थीं। उनकी आँखों में कोई सफेदी नहीं थी—बस गहरा, काला शून्य।
"अली, अगर हम यहाँ रुके तो मर जाएँगे!" अजीम ने मेरा हाथ खींचा।
हम तेजी से पीछे हटने लगे, लेकिन तभी ज़मीन काँपने लगी और हम नीचे गिर पड़े।
भूतों की दुनिया में क़ैद
अचानक सब कुछ अंधेरा हो गया। हमारे चारों ओर केवल अजीब सी गूँज थी—रोने, चीखने और सरसराने की आवाज़ें।
"तुम लोग हमारी जगह लेने आए हो..."
हमारे पैरों के नीचे ठंडी, चिपचिपी मिट्टी थी। सामने वही सुरंग के अंदर दिखने वाला बूढ़ा आदमी खड़ा था।
"अब तुम भी हमारे जैसे बन जाओगे," उसने फुसफुसाया और हवा में घुलने लगा।
आज़ादी की आख़िरी कोशिश
हमने इधर-उधर देखा। कोई रास्ता नहीं बचा था। फिर अचानक, अजीम को कुछ याद आया—
"क़ुरान की आयतें पढ़ो!"
मैंने थरथराती आवाज़ में सुरह फ़ातिहा पढ़नी शुरू की। अचानक, हवा में कंपन होने लगा। भूतों की चीख़ें बढ़ने लगीं। वो पीछे हटने लगे।
"और तेज़! पढ़ते रहो!"
हम ज़ोर-ज़ोर से आयतें पढ़ने लगे। तभी, हमारे सामने की ज़मीन धसने लगी और एक रोशनी का दरवाज़ा खुल गया।
भूतिया ट्रक से आख़िरी मुलाक़ात
हम बिना कुछ सोचे उस रोशनी में कूद पड़े। जैसे ही हम ज़मीन पर गिरे, हम वापस हाईवे पर थे।
हमारे चारों ओर अंधेरा था, लेकिन... वो भूतिया ट्रक वहीं खड़ा था!
हम भागने लगे, लेकिन तभी ट्रक का इंजन गरजने लगा और उसके अंदर से वही बूढ़े आदमी की हड्डियों वाली आकृति बाहर निकली।
"तुम भाग नहीं सकते..."
लेकिन इस बार, हमने बिना रुके अपनी जान लगा दी। जैसे ही हमने सड़क के दूसरी ओर छलाँग लगाई, भूतिया ट्रक अचानक जलने लगा और अंधेरे में समा गया।
श्राप का अंत... या एक नई शुरुआत?
हम ज़मीन पर पड़े हाँफ रहे थे। सब कुछ ख़त्म हो चुका था।
हमने वापस मुड़कर देखा—ट्रक ग़ायब हो चुका था।
अजीम ने मेरी ओर देखा, आँखों में डर और राहत का अजीब सा मिश्रण था।
"चलो, इस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दें," मैंने कहा।
और फिर, बिना पीछे देखे, हम वहाँ से चले गए।
लेकिन एक सवाल हमारे दिमाग़ में हमेशा के लिए रह गया—
क्या वो ट्रक वाकई नष्ट हो गया था? या फिर... किसी और मुसाफ़िर का इंतज़ार कर रहा था?
(समाप्त)
