Dating App पर मिली... पर वो ज़िंदा नहीं थी 😱 |Vk Horror |
मुंबई की रात हमेशा से शोरगुल से भरी रहती है, लेकिन आदित्य शर्मा के उस छोटे से फ्लैट में जो माहौल था वो शहर के उस शोर से बिल्कुल अलग था — एक अजीब सी खामोशी, जो सिर्फ अकेलेपन में ही पैदा होती है। बांद्रा वेस्ट की उस तंग गली में तीसरी मंज़िल पर उसका एक कमरे का फ्लैट था, जिसमें एक पुरानी अलमारी, एक तह की हुई चादर वाला बिस्तर, एक लैपटॉप और चारों तरफ बिखरे हुए कोड की प्रिंटआउट शीट्स थीं। पच्चीस साल का आदित्य एक मझोली सॉफ्टवेयर कंपनी में जूनियर डेवलपर था — काम अच्छा था, तनख्वाह ठीक-ठाक थी, लेकिन जो नहीं था वो था — इंसानी रिश्ता, एक असली बातचीत, कोई जो उसका दिन पूछे। कॉलेज के दोस्त अपनी-अपनी जिंदगियों में व्यस्त हो गए थे, माँ-बाप पुणे में थे और हफ्ते में एक बार फोन आता था जिसमें "खाना खाया? शादी का क्या सोचा?" के अलावा कुछ खास नहीं होता था। उस शुक्रवार की रात वो अपने लैपटॉप पर एक बग फिक्स करते-करते थक चुका था, आँखें जल रही थीं, पीठ दर्द कर रही थी और मन में एक अजीब सी बेचैनी थी जिसे वो खुद भी ठीक से नाम नहीं दे पाता था। उसने लैपटॉप बंद किया, फोन उठाया और बिना किसी खास इरादे के Play Store खोल दिया। कुछ देर स्क्रॉल करते-करते उसकी नज़र एक ऐप पर पड़ी — "Connect: Real People, Real Stories." ऐप का आइकन एक नीले रंग का दिल था जिसमें दो हाथ मिले हुए थे। आदित्य ने सोचा, क्या फर्क पड़ता है, और डाउनलोड का बटन दबा दिया। प्रोफाइल बनाना उसे हमेशा अजीब लगता था — खुद के बारे में लिखना, खुद की तस्वीर लगाना, खुद को "बेचना" जैसा। उसने एक सादी सी फोटो लगाई जिसमें वो ऑफिस की छत पर खड़ा था, बायो में लिखा "Software developer. Music lover. Looking for real conversations." और ऐप खोल दिया। पहले कुछ प्रोफाइल्स देखकर उसका मन ही नहीं लगा — सब एक जैसी लगीं, एक जैसे फिल्टर्ड फोटो, एक जैसी "I love travel and food" वाली बायो। वो स्वाइप करता रहा, बाएँ, बाएँ, बाएँ — और फिर एक प्रोफाइल पर उसका अँगूठा रुक गया। प्रोफाइल का नाम था "Riya" — उम्र लिखी थी 23 साल। फोटो में एक लड़की थी जिसने सफेद कुर्ता पहना हुआ था, बाल खुले थे, और वो किसी पुरानी इमारत की सीढ़ियों पर बैठी मुस्कुरा रही थी। मुस्कुराहट में एक अजीब सी उदासी थी — वो किस्म की उदासी जो किसी खूबसूरत चीज़ को और खूबसूरत बना देती है। बायो में लिखा था: "पुराने गाने, पुरानी किताबें, और वो लोग जो अभी भी चिट्ठियाँ लिखते हैं। अगर तुम समझ सको तो बात करो।" आदित्य के होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान आई। उसने दाएँ स्वाइप किया। कुछ सेकंड बाद स्क्रीन पर "It's a Match!" का नोटिफिकेशन आया। आदित्य थोड़ा हैरान हुआ — आमतौर पर लड़कियाँ पहले मैसेज नहीं करतीं, लेकिन जब उसने चैट खोला तो रिया का एक मैसेज पहले से आया हुआ था। "तुमने पहले स्वाइप किया, तो पहला मैसेज भी तुम ही करते।" आदित्य हँसा। उसने टाइप किया — "ठीक है, तो बताओ — आखिरी बार किसे चिट्ठी लिखी थी?" जवाब तुरंत आया, जैसे वो पहले से तैयार बैठी हो। "आखिरी बार? बहुत पहले। किसी ऐसे को जो कभी मिला नहीं।" आदित्य ने थोड़ा सोचकर लिखा — "और क्या उसे मिली?" कुछ देर चुप्पी रही, फिर जवाब आया — "नहीं। कुछ चिट्ठियाँ पहुँचती नहीं हैं।" उस रात आदित्य और रिया की बातें देर तक चलती रहीं। रिया बात करने में बहुत अलग थी — उसके जवाब छोटे थे लेकिन हर जवाब में एक गहराई थी। वो पुराने हिंदी गानों की बात करती थी जैसे किसी ने उन्हें कल ही गाया हो — "तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं", "आने वाला पल जाने वाला है" — आदित्य को खुद इन गानों का शौक था क्योंकि उसके नाना इन्हें सुनते थे, लेकिन उसकी उम्र के किसी को यह गाने याद हों, यह उसे अजीब लगा। "तुम्हें इतने पुराने गाने कैसे पता?" उसने पूछा। "कुछ गाने उम्र से बड़े होते हैं," रिया ने जवाब दिया। रात के दो बज गए थे जब आदित्य को नींद आने लगी। उसने लिखा — "कल भी बात करोगी?" रिया का जवाब आया — "मैं हमेशा यहाँ हूँ।" अगले हफ्ते दोनों की बातें रोज़ होने लगीं। आदित्य का दिन अब एक रूटीन में बँध गया था — ऑफिस, घर, रिया के साथ बातें। रिया की बातों में एक अजीब खिंचाव था जो उसे हर बार और ज़्यादा खींचता था। वो पुरानी फिल्मों के डायलॉग्स जानती थी जो आदित्य ने सिर्फ यूट्यूब पर देखे थे — "गुरुदत्त की प्यासा" के, "मदर इंडिया" के, "Mughal-e-Azam" के। वो मुंबई की उन जगहों का ज़िक्र करती थी जो अब बदल गई थीं या बंद हो गई थीं। एक बार उसने Marine Lines के एक पुराने बेकरी का ज़िक्र किया जो 1980 में बंद हो गई थी — आदित्य ने जब पूछा कि उसे कैसे पता, तो रिया ने कहा "मैंने किसी किताब में पढ़ा था।" आदित्य ने ज़्यादा नहीं सोचा। एक दिन आदित्य ने पूछा — "वीडियो कॉल करें?" रिया ने कुछ देर बाद जवाब दिया — "नहीं। मेरे पास कैमरा नहीं है।" "ठीक है, फोन पर बात करें?" "मेरे पास फोन नहीं है।" आदित्य थोड़ा रुका। "तो फिर ऐप कैसे चलाती हो?" "लैपटॉप पर।" यह जवाब थोड़ा अटपटा था लेकिन आदित्य ने सोचा — शायद वो बहुत प्राइवेट इंसान है, शायद उसके कोई कारण हों। उसने ज़्यादा नहीं कुरेदा। रिया की बातों में एक और चीज़ थी जो धीरे-धीरे आदित्य को नोटिस होने लगी — वो कभी-कभी "था" और "थी" की जगह "है" और "हूँ" गलत जगह इस्तेमाल करती थी, जैसे समय का बोध उसे थोड़ा अलग हो। एक बार उसने लिखा — "Marine Lines वाला वो पुराना Café Blue बहुत अच्छा है।" आदित्य ने लिखा — "है मतलब? वो तो बंद हो गया ना?" जवाब आया — "हाँ... हाँ, था। मेरा मतलब था।" लेकिन फिर उसी बातचीत में थोड़ी देर बाद उसने फिर लिखा — "उस café की खिड़की से समुद्र दिखता है।" आदित्य मुस्कुरा दिया — उसे लगा शायद वो nostalgia में बोल रही है। दस दिन बीत गए। आदित्य को खुद से हैरानी हो रही थी — वो रिया के बारे में सोचने लगा था। उसकी एक भी तस्वीर नहीं देखी थी उसने — बस वो एक प्रोफाइल फोटो — लेकिन उसकी बातें, उसका तरीका, उसकी सोच — इन सबने आदित्य के मन में एक जगह बना ली थी। एक शाम रिया ने खुद पहल की — "आदित्य, मिलना चाहती हूँ तुमसे।" आदित्य का दिल एक पल के लिए तेज़ धड़का। "सच में? कहाँ?" "Marine Lines। Café Blue। कल शाम छह बजे।" आदित्य ने लिखा — "लेकिन Café Blue तो बंद है ना?" थोड़ी देर के चुप्पी। फिर जवाब आया — "वो जगह जहाँ Café Blue था। वहाँ एक नया café खुला है उसी नाम से। तुम आओगे?" आदित्य ने बिना ज़्यादा सोचे लिखा — "हाँ, आऊँगा।" उस रात आदित्य बहुत excited था। उसने अपने दोस्त विनय को फोन किया और पूरी बात बताई। विनय हँसा — "यार, online app पर मिली लड़की है, पता नहीं कौन है, कहाँ से है, फोटो एक है — और तू मिलने जा रहा है? सोच कर जाना।" आदित्य ने कहा — "तू नहीं समझेगा। वो अलग है।" रात को सोते वक्त उसका फोन पास में था। अचानक रात के तीन बजे एक मैसेज आया। आदित्य गहरी नींद में था, फोन की स्क्रीन जली, मैसेज आया — उसने अगली सुबह देखा।
नमस्ते दोस्तों... आज की रात कुछ अलग है। आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने वाला हूँ जो सिर्फ एक horror story नहीं है — यह एक अधूरी मोहब्बत की दास्तान है, एक ऐसी रूह की कहानी है जो पचास साल से किसी का इंतज़ार कर रही थी। दोस्तों, आज का ज़माना digital है — हम dating apps पर लोगों से मिलते हैं, online बातें करते हैं, online प्यार हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिससे आप online बात कर रहे हो — वो सच में कौन है? वो इस दुनिया का है भी या नहीं? आदित्य ने भी नहीं सोचा था। उसने Connect app पर एक लड़की को swipe किया — नाम था रिया, उम्र थी 23 साल, बातें थीं पुराने गानों की, पुरानी फिल्मों की। आदित्य को लगा — यह लड़की अलग है। और वो सच में अलग थी। बहुत अलग। इस कहानी का नाम है — "Online Wali: 50 Saal Purani Mohabbat।" यह कहानी आपको डराएगी, रुलाएगी, और सोचने पर मजबूर करेगी। तो दोस्तों अगर आप पहली बार हमारे channel पर आए हैं तो अभी subscribe करें और bell icon दबाएं — क्योंकि इस तरह की कहानियाँ हम रोज़ लाते हैं। और जो पहले से हमारे साथ हैं — आपका शुक्रिया। अब बिना देर किए — शुरू करते हैं।
मैसेज था — "मत आना। मैं कोई और हूँ।" आदित्य ने वो मैसेज देखा और एक पल के लिए दिल में कुछ अजीब सा हुआ। उसने तुरंत रिया को मैसेज किया — "यह क्या मतलब है? कौन हो तुम?" घंटे भर बाद जवाब आया — "माफ करना। रात को नींद में कुछ भी टाइप हो गया। बस तुमसे मिलना है। आना ज़रूर।" आदित्य ने राहत की साँस ली। लेकिन वो मैसेज — "मत आना, मैं कोई और हूँ" — वो कहीं ना कहीं उसके दिमाग के किसी कोने में चिपक गया था।
अगली शाम आदित्य ने अपनी नीली शर्ट पहनी — वो जो उसे सबसे ज़्यादा पसंद थी — बालों में थोड़ा जेल लगाया, आईने में खुद को देखा और मन में कहा "यह बेवकूफी है।" फिर भी निकल गया। Marine Lines का वो इलाका मुंबई के पुराने हिस्सों में से एक है — समुद्र के किनारे की वो सड़क जहाँ शाम को लोग टहलने आते हैं, जहाँ पुरानी इमारतें हैं जिनकी दीवारों पर समय की परतें चढ़ी हुई हैं। आदित्य ने Uber ली और रास्ते भर रिया के पुराने मैसेज पढ़ता रहा — उनकी बातें, उनकी हँसी, वो एक मैसेज जो रात को आया था। Café Blue का पता उसने Maps पर ढूँढा था — एक पुरानी इमारत की ground floor पर, Marine Lines की मुख्य सड़क से थोड़ा अंदर। जब वो वहाँ पहुँचा तो पहली नज़र में उसे लगा कि वो गलत जगह आ गया। café का बोर्ड था — नीले रंग के पुराने अक्षरों में "Café Blue" — लेकिन दरवाज़े पर ताला लगा था। शीशे से अंदर देखा तो अंदर कुर्सियाँ उल्टी मेज़ों पर रखी हुई थीं, जैसे काफी दिनों से बंद हो। आदित्य ने रिया को मैसेज किया — "यहाँ तो café बंद है।" कोई जवाब नहीं आया। उसने आसपास देखा — कोई नहीं था। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, मन में वापस जाने का विचार आया, तभी उसने देखा कि दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था — बस भिड़ा हुआ था, ताला नहीं लगा था। उसने हल्के से धक्का दिया और दरवाज़ा खुल गया। अंदर पैर रखते ही आदित्य को एक अजीब सी sensation हुई — जैसे तापमान एकदम से बदल गया हो, बाहर की शाम की उमस की जगह अंदर एक ठंडी, बासी हवा थी। और जो उसने अंदर देखा वो उसने उम्मीद नहीं किया था। café का अंदरूनी हिस्सा बिल्कुल पुराना था — 1970s का decor, गहरे भूरे रंग की लकड़ी की कुर्सियाँ और मेज़ें, दीवारों पर पुराने पोस्टर जिनके रंग उड़ गए थे, एक कोने में एक पुरानी gramophone, और काउंटर पर धूल जमी हुई थी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि वो कुर्सियाँ जो बाहर से उल्टी दिखी थीं — वो अब सीधी थीं। मेज़ों पर पानी के गिलास रखे थे। जैसे café खुला हो। आदित्य ने एक बार पीछे मुड़कर देखा — बाहर सड़क, गाड़ियाँ, लोग — सब सामान्य था। उसने अंदर कदम रखा। "आ गए।" आवाज़ सुनकर आदित्य का दिल धक से रह गया। एक लड़की खिड़की के पास वाली मेज़ पर बैठी थी — सफेद कुर्ता, खुले बाल, और वही मुस्कुराहट जो प्रोफाइल फोटो में थी — लेकिन अब सामने देखी तो उसमें एक और चीज़ थी जो फोटो में नहीं थी — एक अजीब सी पारदर्शिता, जैसे उसके पीछे की रोशनी थोड़ी ज़्यादा दिख रही हो। "रिया?" आदित्य ने धीरे से कहा। "हाँ," उसने कहा। आवाज़ थी लेकिन उसमें एक echo था, जैसे किसी बड़े खाली कमरे में बोला जाए। आदित्य उसके सामने की कुर्सी पर बैठ गया। रिया की आँखें गहरी काली थीं और उनमें एक चमक थी जो normal नहीं लगती थी — जैसे किसी पुरानी तस्वीर में रंग भर दिया हो। "तुम बहुत अलग लग रही हो," आदित्य ने कहा। "कैसी लग रही हूँ?" "खूबसूरत," आदित्य ने सच में कहा, और फिर हल्का शर्माया। रिया मुस्कुराई। उन्होंने बातें कीं — वही बातें जो ऐप पर होती थीं, लेकिन अब सामने बैठकर। आदित्य ने देखा कि रिया ने कुछ नहीं मँगाया — न पानी, न चाय। उसने जब waiter को बुलाने की कोशिश की तो उसे एहसास हुआ कि café में कोई waiter नहीं था — काउंटर के पीछे कोई नहीं था। "यहाँ कोई नहीं है?" आदित्य ने पूछा। "है," रिया ने कहा, "बस दिखता नहीं।" आदित्य ने हँसकर कहा — "strange place है।" "हाँ," रिया ने धीरे से कहा, "बहुत पुरानी जगह है।" बातों के दौरान आदित्य ने अपना फोन निकाला। "एक selfie लेते हैं?" रिया का चेहरा एक पल के लिए बदला — कुछ जैसे डर, कुछ जैसे उदासी। "नहीं।" "क्यों?" "मुझे फोटो पसंद नहीं।" "बस एक?" आदित्य ने कहते हुए फोन उठाया और दोनों को frame में लेकर photo खींच ली। रिया ने कुछ नहीं कहा — बस उसकी आँखें बंद हो गईं। आदित्य ने photo देखी — और उसकी साँस रुक गई। photo में आदित्य था — अकेला। उसके बगल वाली कुर्सी खाली थी। रिया नहीं थी। आदित्य ने घबराकर ऊपर देखा — रिया सामने बैठी थी, बिल्कुल वैसे ही। "क्या हुआ?" उसने पूछा। "Photo में... तुम नहीं हो।" रिया ने एक लंबी साँस ली। "मैंने कहा था — फोटो मत खींचो।" "लेकिन क्यों — " "आदित्य।" उसने उसका नाम लिया और आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था। "कुछ सवाल मत करो। बस इस वक्त को महसूस करो।" आदित्य का दिमाग उस photo को process कर रहा था — camera glitch? lighting? कोई technical reason? उसने खुद को समझाया। बातें फिर शुरू हुईं। रिया ने उस दिन बहुत कुछ बताया — कि उसे समुद्र से डर लगता है लेकिन वो उसके पास रहना चाहती है, कि उसे लगता है कुछ लोग एक ज़िंदगी में अपनी मंज़िल नहीं पाते, कि मोहब्बत वो चीज़ है जो वक्त से आगे निकल जाती है। आदित्य ने उसकी हर बात को ध्यान से सुना। तभी café की दीवार पर लगी एक पुरानी घड़ी में आवाज़ हुई — टिक, टिक, टिक। आदित्य ने घड़ी की तरफ देखा — वो घड़ी चल रही थी, जो अजीब था क्योंकि café बंद था। और घड़ी में वक्त था — शाम के 6 बजकर 15 मिनट। लेकिन जब आदित्य ने अपने फोन में देखा — उसमें भी 6:15 ही था। तो फिर अजीब क्या था? आदित्य ने ध्यान से देखा — वो घड़ी, उसके dial पर "1974" लिखा था। "यह घड़ी — " आदित्य ने कहा। "मुझे जाना होगा," रिया ने एकदम से कहा। "वक्त हो गया।" "क्या? अभी तो मिले हैं — " "आदित्य," उसने उसकी आँखों में देखा, और उस नज़र में कुछ था — एक दर्द, एक पुरानी थकान — "कुछ वक्त होते हैं जो रोज़ नहीं आते। यह वक्त था। अब जाना होगा।" वो उठी। आदित्य भी उठा। "फिर कब मिलोगी?" "जब तुम तैयार होगे।" "किस चीज़ के लिए?" रिया मुड़ी — और उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कुराहट थी जो खूबसूरत भी थी और डरावनी भी — "सच जानने के लिए।" वो चली गई। आदित्य वहाँ खड़ा रहा — café में अकेला, उस पुरानी घड़ी की टिक-टिक के बीच। बाहर आया तो शाम का उजाला था। उसने फोन निकाला और Google पर टाइप किया — "Café Blue Marine Lines 1974." पहला result आया — एक पुराने अखबार का digital archive: "Marine Lines Café Blue: 14 February 1974 Fire Tragedy — 12 Dead, 1 Missing."
आदित्य उस रात सो नहीं पाया। वो article उसने पाँच बार पढ़ा — हर बार उम्मीद करते हुए कि शायद कुछ बदल जाए, शायद उसने कुछ गलत पढ़ा हो। लेकिन हर बार वही words थे। "14 फरवरी, 1974 को Valentine's Day की शाम Café Blue में भीषण आग लगी। आग इतनी तेज़ी से फैली कि लोगों को निकलने का मौका नहीं मिला। बारह लोगों की मौत हुई। एक युवती — रेखा शर्मा, उम्र 23 साल — का शव कभी नहीं मिला। पुलिस ने मामला बंद किया।" रेखा शर्मा। 23 साल। आदित्य के हाथ काँप रहे थे। उसने रिया की profile खोली — Connect app पर। Profile थी — "Riya, 23." उसने वो पुरानी article की photo और रिया की profile photo को side-by-side रखा। वो नहीं थी article में — पर नाम, उम्र, वही गहरी काली आँखें जो उसने उस article के साथ linked newspaper की एक धुँधली तस्वीर में देखी थीं — सब मिलता था। आदित्य ने लैपटॉप पर और research की — National Library of India के digital archive में पुराने अखबारों की scan copies थीं। उसने 1974 का Mumbai Samachar खोजा। एक हफ्ते की मशक्कत के बाद — जो उसने अगले दो दिनों में ऑफिस से छुट्टी लेकर पूरी की — उसे एक article मिला जिसमें रेखा शर्मा की एक तस्वीर थी। तस्वीर धुँधली थी, पुरानी newsprint की quality, लेकिन उसमें जो चेहरा था — वो चेहरा आदित्य ने पहचाना। वो रिया थी। बिल्कुल वही। एक-एक नैन-नक्श। वही मुस्कुराहट जिसमें उदासी थी। आदित्य ने फोन रखा और कुछ देर छत को देखता रहा। उसके दिमाग में एक rational explanation ढूँढने की कोशिश हो रही थी — शायद रिया उस रेखा की नातिन है जो हूबहू दादी जैसी दिखती है? शायद यह सब एक coincidence है? शायद café में वो photo camera glitch थी? लेकिन जितना वो समझाने की कोशिश करता, उतना ही एक बात और उभरकर आती — रिया ने कभी video call नहीं की, कभी फोन पर बात नहीं की, café में कोई waiter नहीं था, और वो photo — उस photo में वो थी ही नहीं। तीसरे दिन आदित्य Marine Lines वापस गया — इस बार उस पुरानी इमारत को ठीक से देखने। Café Blue की जगह अब एक बंद दुकान थी — दरवाज़े पर ताला था, कोई नया signboard नहीं था। पड़ोस की एक पान की दुकान पर एक बुज़ुर्ग बैठे थे — सफेद बाल, झुकी कमर, लेकिन आँखें तेज़। आदित्य ने उनसे पूछा — "Uncle, यह Café Blue कब से बंद है?" बुज़ुर्ग ने उसे ऊपर से नीचे देखा। "तुम क्यों पूछ रहे हो?" "बस जानना था।" बुज़ुर्ग चुप रहे कुछ देर। फिर बोले — "1974 से। जब से आग लगी।" "तब से कोई नहीं आया यहाँ?" बुज़ुर्ग ने एक अजीब नज़र से देखा। "आते हैं कुछ लोग। जो उसे ढूँढते हैं।" "किसे?" "रेखा को।" आदित्य का दिल एक धड़कन के लिए रुका। "आप जानते हैं रेखा को?" बुज़ुर्ग ने धीरे से कहा — "मैं यहाँ 1972 से हूँ। रेखा को देखा था — उस दिन से पहले। वो बहुत खूबसूरत थी। और उसका एक आशिक था — राजेश। उन दोनों की Valentine's Day पर मिलने की बात थी उस café में। लेकिन राजेश कभी नहीं आया।" "क्यों नहीं आया?" "किसी को नहीं पता। वो उस दिन के बाद शहर छोड़ गया। रेखा उसका इंतज़ार करती रही — और तभी आग लगी।" बुज़ुर्ग ने आसमान की तरफ देखा। "लोग कहते हैं कि उसकी आत्मा आज भी उस café में है — उसी इंतज़ार में।" आदित्य ने गहरी साँस ली। "आपने कभी... उसे देखा?" बुज़ुर्ग ने मुड़कर सीधे आदित्य की आँखों में देखा। "हाँ। और जो उसे देखते हैं — वो या तो उससे बच जाते हैं, या फिर वो उन्हें ले जाती है।" आदित्य घर लौटा। रास्ते में उसने रिया को मैसेज किया — "रिया, मुझे सच बताओ। तुम कौन हो?" कोई जवाब नहीं आया। घर पहुँचकर उसने खाना बनाया, थोड़ा खाया, और लैपटॉप खोलकर बैठ गया। रात के ग्यारह बज रहे थे। तभी उसके फोन पर एक notification आई — Connect app से। रिया का मैसेज। "तुमने ढूँढ लिया।" आदित्य ने काँपते हाथों से टाइप किया — "तुम रेखा हो?" कुछ देर कोई जवाब नहीं। फिर — "मैं वो हूँ जो रह गई। वो जो जाने का मौका मिला लेकिन मिला नहीं। वो जो आज भी उसी शाम में हूँ।" "रिया — रेखा — तुम — " "डरो मत।" "कैसे ना डरूँ? तुम — तुम — " "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, आदित्य।" यह तीन शब्द पढ़कर आदित्य रुक गया। एक भूत उससे प्यार करती है। यह हास्यास्पद था। यह डरावना था। यह... उसके दिल में कुछ था जो इन तीन शब्दों को सुनकर कुछ महसूस हुआ था — और वो feeling उससे भी ज़्यादा डरावनी थी। तभी उसके flat के दरवाज़े पर दस्तक हुई। रात के ग्यारह बजे। आदित्य ने सोचा — पड़ोसी होगा। दरवाज़ा खोला। बाहर रेखा खड़ी थी — सफेद कुर्ता, खुले बाल, और आँखों में आँसू। "तू वापस क्यों आया?" उसने रोते हुए कहा। "मैं — मैं वापस नहीं — " "राजेश। तू आ गया।" आदित्य ने महसूस किया कि उसके हाथ की मुट्ठी में कुछ है। उसने हाथ खोला — उसकी हथेली में एक अंगूठी थी — पुरानी, सोने की, जिस पर नक्काशी थी। एक vintage engagement ring। और उस पर खुदा था — "R & R — 14.02.1974."
आदित्य ने वो अंगूठी देखी और उसके हाथ काँप गए। यह अंगूठी उसके हाथ में कहाँ से आई? उसे याद नहीं था — कुछ देर पहले तक उसके हाथ खाली थे। रेखा अभी भी दरवाज़े पर खड़ी थी, आँसू उसके गालों पर थे लेकिन नीचे नहीं गिर रहे थे — जैसे time में freeze हो गए हों। "अंदर आओ," आदित्य ने हिचकिचाते हुए कहा — वो खुद नहीं जानता था उसने यह क्यों कहा।
रेखा अंदर आई। वो कमरे में खड़ी रही — चारों तरफ देखती रही जैसे किसी जानी-पहचानी जगह में आई हो। "तुमने मुझे राजेश क्यों कहा?" आदित्य ने पूछा। रेखा ने उसकी तरफ देखा — उसकी आँखों में एक गहरी पहचान थी। "क्योंकि तुम हो। वही आँखें, वही आवाज़ — बस शरीर अलग।" "मैं आदित्य हूँ। राजेश नहीं।" "राजेश भी एक बार आदित्य था। और उससे पहले कोई और था।" आदित्य ने एक कुर्सी पर बैठकर रेखा को सामने खड़े देखा। "तुम क्या कह रही हो?" रेखा बैठ गई — उसी तरह जैसे café में बैठी थी। "मैं तुम्हें 1974 की कहानी बताती हूँ। एक बार सुनो — फिर जो चाहो, करो।" और उसने बताया। 1974 की वो कहानी — जो रेखा ने शब्द-शब्द सुनाई, जिसे सुनते हुए आदित्य को लगा जैसे वो किसी पुरानी film देख रहा हो, लेकिन उस film का दर्द असली था। रेखा एक middle-class परिवार से थी, Marine Lines में रहती थी, college में पढ़ती थी। राजेश उसका classmate था — intelligent, शायर, और उसकी हर बात में रेखा के लिए कुछ था। धीरे-धीरे दोस्ती मोहब्बत बन गई। दोनों ने decide किया — Valentine's Day, 14 फरवरी 1974 को Café Blue में मिलना है और राजेश रेखा को propose करेगा। रेखा उस दिन तैयार होकर गई थी — सफेद कुर्ता, खुले बाल, दिल में ख्वाब। वो café पहुँची, एक corner table पर बैठी, राजेश का इंतज़ार किया। शाम के पाँच बजे, छह बजे — राजेश नहीं आया। रेखा को लगा — ट्रैफिक होगा, आता होगा। उसी इंतज़ार में, उसी hope में वो बैठी रही। और फिर — किसी ने नहीं जाना कि कैसे — café में आग लग गई। लोग भागे, चीखे, निकले — लेकिन रेखा वहीं थी, उसी table पर — राजेश का इंतज़ार करते हुए। शायद उसे यकीन था कि राजेश आएगा। शायद वो जाना नहीं चाहती थी। या शायद — वो जा नहीं सकी। "मैं वहाँ से नहीं निकल पाई," रेखा ने कहा, "लेकिन मैं गई भी नहीं। मैं उसी शाम में रह गई — हमेशा के लिए।" "और राजेश?" रेखा की आँखों में वो frozen आँसू थे। "वो कभी नहीं आया। मुझे आज भी नहीं पता क्यों।" "फिर मैं — " "तुम पहले नहीं हो। हर कुछ दशकों में एक आता है — जो राजेश जैसा लगता है। उसी आवाज़ का, उन्हीं आँखों का। मैं उनसे बात करती हूँ, उन्हें मिलने बुलाती हूँ — लेकिन हर बार कुछ हो जाता है।" आदित्य का दिल भारी था। "क्या होता है उनके साथ?" रेखा ने जवाब नहीं दिया। आदित्य ने दोहराया — "रेखा — क्या होता है उनके साथ?" "वो भूल जाते हैं। सब कुछ। मुझे, खुद को, सब। जैसे कुछ था ही नहीं।" एक पल की चुप्पी। "या वो — " रुकी। "या?" "या मेरे साथ रह जाते हैं।" आदित्य ने उस रात रेखा को flat में नहीं रोका। वो चली गई — और जाते वक्त उसने कहा — "वो अंगूठी रखो। वो राजेश की थी। अब तुम्हारी है।" रात भर आदित्य सो नहीं पाया। सुबह उसने अपने एक पुराने दोस्त संदेश को call किया जो occult और paranormal में interest रखता था। संदेश ने सुना और कहा — "एक बाबा हैं — Dadar में। वो इन चीज़ों को समझते हैं। मिल उनसे।" अगले दिन आदित्य Dadar गया। बाबा एक छोटी सी गली में रहते थे — उम्र कोई पचहत्तर के आसपास, आँखें sharp, बात करने का तरीका बिल्कुल सीधा और logical — कोई नाटकबाज़ी नहीं। आदित्य ने पूरी कहानी बताई। बाबा ने सुना, फिर कहा — "यह भटकती आत्मा नहीं है।" "फिर क्या है?" "मोहिनी।" "मोहिनी?" "एक ऐसी आत्मा जो अपनी अधूरी मोहब्बत की वजह से इस दुनिया से बँधी रह जाती है। वो बुरी नहीं होती — लेकिन वो खतरनाक होती है। क्योंकि वो एक ऐसा इंसान ढूँढती है जो उसके आशिक जैसा हो — और उसे अपनी दुनिया में खींचने की कोशिश करती है।" "खींचने की — मतलब?" "मतलब यह कि अगर तुम उसके साथ रहे, उसकी मोहब्बत को accept किया — तो तुम धीरे-धीरे इस दुनिया से कटने लगोगे। तुम्हारी memories बदलेंगी, तुम्हें लगने लगेगा कि तुम राजेश हो। और एक दिन — तुम भी उसी 1974 की शाम में होगे।" आदित्य चुप रहा। बाबा ने कहा — "जा यहाँ से। उससे बात बंद करो। वो जगह दोबारा मत जाओ।"

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