कोटा हाईवे का श्राप: ट्रक ड्राइवर की खौफनाक आपबीती
कोटा हाईवे का श्राप: ट्रक ड्राइवर की खौफनाक आपबीती
ट्रक अपनी पूरी रफ्तार में था, लेकिन दिल की धड़कन उससे भी तेज़ चल रही थी। मैंने और विजय ने एक-दूसरे को देखा—हम दोनों के चेहरे पर साफ़ डर लिखा था। उस सफेद साड़ी वाली औरत ने हमारे अंदर अजीब सा खौफ भर दिया था। लेकिन एक सवाल मेरे ज़ेहन में घूम रहा था—आखिर ये सब हमारे साथ ही क्यों हुआ?
विजय कांपती आवाज़ में बोला, "भाई, वो जो कुछ था... अब तक पीछा तो नहीं कर रही?"
मैंने झिझकते हुए रियर-व्यू मिरर में देखा, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं था। मैंने राहत की सांस ली, "शायद अब सब ठीक है।"
लेकिन ये सिर्फ हमारी भ्रम था... कयामत तो अभी बाकी थी।
एक अनजान ढाबा
करीब आधे घंटे बाद, हमने सोचा कि कहीं रुककर पानी पी लिया जाए और थोड़ा खुद को संभाल लिया जाए। अचानक, हमें हाईवे के किनारे एक पुराना ढाबा दिखाई दिया।
ढाबा कुछ ज्यादा ही सुनसान था। वहाँ बस एक बुजुर्ग चाय वाला बैठा था, और दो-तीन ट्रक किनारे खड़े थे। मैंने ट्रक एक तरफ़ लगाया और विजय को नीचे उतरने का इशारा किया।
जैसे ही हम ढाबे में पहुंचे, बुजुर्ग ने हमें घूरकर देखा।
"कहाँ से आ रहे हो?" उसने सीधे सवाल किया।
मैंने कहा, "कोटा से... दिल्ली जा रहे हैं।"
उसने गहरी सांस ली और हमारी तरफ ध्यान से देखा, फिर बोला, "तुम दोनों बहुत डरे हुए लग रहे हो। रास्ते में कुछ देखा क्या?"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। ये कैसे जानता था कि हमें कुछ दिखा है?
विजय ने झिझकते हुए कहा, "हाँ... हमने एक औरत देखी थी। सफेद साड़ी में, जले हुए चेहरे वाली..."
बुजुर्ग अचानक खामोश हो गया। उसका चेहरा सख्त हो गया।
"वो औरत... आज फिर दिखी?" उसने बुदबुदाते हुए कहा।
सालों पुराना एक राज़
मैंने उससे पूछा, "आपको उसके बारे में कुछ पता है?"
बुजुर्ग ने लंबी सांस ली और कहा, "ये जो इलाका है ना, ये श्रापित है। सालों पहले, इस सड़क पर एक हादसा हुआ था। एक औरत—जो अपने पति के साथ इस हाईवे पर जा रही थी—एक ट्रक ने उसे कुचल दिया था। लेकिन..."
उसने एक पल के लिए रुककर हमें घूरा।
"उस औरत को मारा नहीं गया था। उसे ज़िंदा जला दिया गया था।"
हम दोनों के जिस्म में झुरझुरी दौड़ गई।
"किसने जलाया था?" विजय ने कांपती आवाज़ में पूछा।
बुजुर्ग ने हमारी तरफ देखा और धीरे से कहा, "ट्रक ड्राइवरों ने..."
हमारी साँसें अटक गईं।
"तब से, वो आत्मा सिर्फ ट्रक वालों को ही दिखती है। कोई अगर उसकी नज़र में आ जाए, तो वो उसे कभी नहीं छोड़ती..."
दरवाज़े पर कोई था...
हम अभी इस बात को पचा भी नहीं पाए थे कि अचानक ढाबे का दरवाज़ा ज़ोर से हिलने लगा!
धड़ाम! धड़ाम!
कोई बाहर से खटखटा रहा था... लेकिन ढाबे के बाहर कोई नहीं था!
बुजुर्ग तेजी से उठा और मंत्र पढ़ने लगा।
"तुम दोनों जल्दी से यहाँ से निकलो!" उसने गुस्से से कहा।
हमने एक-दूसरे को देखा और बिना कोई और सवाल किए ट्रक की ओर भागे।
जैसे ही हम ट्रक में बैठे, मेरी नजर साइड मिरर में पड़ी...
वो औरत फिर से वहीं खड़ी थी, लेकिन इस बार... वो हंस रही थी।
ट्रक का हिलना
इंजन स्टार्ट करते ही ट्रक अचानक हिलने लगा, जैसे कोई भारी चीज़ उस पर चढ़ रही हो। मेरी साँसें थम गईं। विजय चीख पड़ा, "भाई, जल्दी निकाल इसे यहाँ से!"
मैंने पूरी ताकत से क्लच और एक्सीलेरेटर दबाया, ट्रक ने एक झटका खाया और आगे बढ़ गया। लेकिन तभी...
धड़ाम!
जैसे ही हमने हाईवे पर स्पीड बढ़ाई, अचानक पीछे जोरदार धमाका हुआ, मानो किसी ने पूरे जोर से ट्रक पर मुक्का मारा हो। पीछे देखने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं।
विजय ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाई, वो हमारे ट्रक पर आ गई थी... मैंने शीशे में देखा था।"
मेरा हाथ स्टेयरिंग पर जकड़ गया। "अब? अब कहाँ है?"
"पता नहीं... लेकिन भाई, हमें ये रास्ता छोड़कर कहीं और से जाना चाहिए..."
जंगल का अंधेरा रास्ता
हमें लगा कि अब हाईवे पर रहना सही नहीं, इसलिए हमने एक पुराने कच्चे रास्ते से निकलने का सोचा, जो जंगल से होकर दूसरी सड़क से जुड़ता था।
ट्रक धीमे-धीमे अंधेरे जंगल में बढ़ने लगा। चारों ओर घना सन्नाटा था। बस इंजन की आवाज़ और हमारे धड़कते दिलों की ध्वनि।
अचानक...
"भाई... देख!" विजय की आवाज़ घबराई हुई थी।
सामने सड़क पर कोई खड़ा था।
मैंने ट्रक की हेडलाइट तेज की।
वो वही सफेद साड़ी वाली औरत थी।
लेकिन इस बार... वो अकेली नहीं थी।
उसके साथ और भी साये खड़े थे।
भागने का कोई रास्ता नहीं
मेरी उंगलियाँ स्टेयरिंग पर जम गईं। हम कहाँ फँस गए थे?
विजय तेजी से बड़बड़ाने लगा, "भाई, ये क्या है? ये कौन लोग हैं?"
वो साये धीरे-धीरे ट्रक की ओर बढ़ने लगे।
मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी, लेकिन मुझे कुछ करना था। मैंने क्लच छोड़ा, गियर बदला और ट्रक को पूरी ताकत से दौड़ा दिया।
साये हिलने लगे।
औरत ने अपनी काली, लंबी बाहें फैलाकर चिल्लाना शुरू किया।
लेकिन मैं रुका नहीं। ट्रक की रफ्तार बढ़ी... और अचानक वो सब गायब हो गए!
हम दोनों की सांसें तेज़ हो गईं।
क्या हम बच गए थे...? या ये सिर्फ़ शुरुआत थी?
मेरे हाथ अब भी स्टेयरिंग पर पसीने से भीगे हुए थे। इंजन की गड़गड़ाहट के अलावा ट्रक में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी। विजय अब भी घबराया हुआ था, बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था। मैंने उसे डांटा, "पीछे मत देख, बस सामने ध्यान दे!"
विजय कांपती आवाज़ में बोला, "भाई, ये जो भी था, वो हमारा पीछा छोड़ने वाला नहीं... मुझे लग रहा है, हमसे कोई बहुत बड़ी गलती हो गई है!"
मैंने गहरी सांस ली, लेकिन सच कहूं तो मेरे खुद के पैर भी क्लच और एक्सीलेटर पर कांप रहे थे। हाईवे अब भी सुनसान था। सड़क के दोनों ओर घना जंगल था, और दूर-दूर तक कोई दूसरी गाड़ी नहीं दिख रही थी।
रात का वक्त था, लेकिन अजीब बात ये थी कि घड़ी की सुई जैसे अटक गई हो। वक्त आगे ही नहीं बढ़ रहा था। मैं जितनी देर से ट्रक चला रहा था, उतना तो कोटा पहुंच जाना चाहिए था, लेकिन रास्ता जैसे खिंचता ही जा रहा था।
विजय धीरे से बोला, "भाई, ऐसा लग रहा है कि हम बार-बार एक ही जगह घूम रहे हैं..."
मेरा दिमाग चकरा गया। मैंने ट्रक धीमा किया और साइड में खड़ा कर दिया। बाहर उतरकर देखा, सब कुछ ठीक ही लग रहा था। लेकिन जब मैंने सड़क के किनारे पड़ी एक टूटी हुई पटरी देखी, तो मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
यही पटरी मैंने कुछ देर पहले भी देखी थी।
हम सच में एक ही जगह घूम रहे थे।
विजय ट्रक से उतरकर मेरे पास आ गया। "भाई, हमें कुछ गलत दिख रहा है... हमें यहां से निकलना होगा!"
अचानक, हवा में एक अजीब सी सरसराहट हुई। जैसे कोई बहुत तेज़ी से हमारे पास से गुज़रा हो। हमारे शरीर ठंडे पड़ गए।
फिर... ट्रक के अंदर से किसी के हंसने की आवाज़ आई।
ट्रक में कोई था।
हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर धीरे-धीरे ट्रक के दरवाजे की ओर बढ़े।
विजय ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला। अंदर झांककर देखा तो ड्राइवर सीट पर कोई बैठा था—लंबे बालों वाली एक काली परछाई।
वो हमारी ओर मुड़ी... और उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी।
विजय ज़ोर से चिल्लाया और पीछे हट गया। मेरे कदम भी जड़ हो गए थे। ट्रक की ड्राइवर सीट पर बैठी वो परछाई अब भी हमें घूर रही थी। उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं, जैसे उनमें कोई गहरा राज़ छिपा हो।
मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने हिम्मत जुटाकर ट्रक के अंदर झांककर देखा। लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने मेरी रूह कंपा दी।
वो परछाई अचानक मेरी ही शक्ल में बदल गई!
विजय ने घबराई आवाज़ में कहा, "भाई... ये क्या हो रहा है? ये... ये तुम कैसे हो सकते हो?"
मैं खुद समझ नहीं पा रहा था कि मेरी ही शक्ल का कोई और ट्रक में कैसे बैठा हो सकता है। वो परछाई अब भी मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी—वो डरावनी थी, भयानक थी।
अचानक, ट्रक का हॉर्न अपने आप बजने लगा। तेज़, कान फाड़ देने वाली आवाज़ ने हमें झकझोर कर रख दिया। डर के मारे मेरे पैर लड़खड़ा गए। विजय हड़बड़ाकर पीछे भागा, लेकिन तभी...
दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
अब मैं और विजय ट्रक के बाहर खड़े थे, और वो रहस्यमयी परछाई ट्रक के अंदर थी। वो हमें ऐसे देख रही थी, जैसे हम उसके शिकार हों।
फिर, ट्रक अपने आप स्टार्ट हो गया।
हमने एक-दूसरे की तरफ देखा, हमारी साँसें तेज़ हो गई थीं। ट्रक अपने आप आगे बढ़ने लगा।
मैंने हिम्मत करके ट्रक के हैंडल को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही मेरा हाथ दरवाजे के पास पहुँचा, एक ठंडी लहर मेरे शरीर से टकराई और मैंने महसूस किया कि कोई अनदेखी ताकत मुझे धक्का देकर पीछे फेंक रही है।
मैं ज़मीन पर गिर गया। विजय ने मेरी तरफ देखा और चिल्लाया, "भाई, हम इसे रोक नहीं सकते! भागो यहाँ से!"
लेकिन मैं भाग नहीं सकता था। ये मेरा ट्रक था... मेरी रोज़ी-रोटी का जरिया।
मैंने खुद को संभाला और फिर से ट्रक के पास भागा। मैंने किसी तरह दरवाजा खोला, लेकिन जैसे ही मैंने अंदर झांका, वो परछाई अब भी मेरी शक्ल में थी... लेकिन इस बार उसके होंठ हिले और एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—
"तू अब इस हाईवे से जिंदा नहीं जाएगा..."
विजय ने मेरा हाथ पकड़ा और ज़ोर से खींचा, "भाई, छोड़ इसे! ये अब तेरा ट्रक नहीं रहा!"
मैंने देखा कि ट्रक की हेडलाइट्स अपने आप जलने-बुझने लगी थीं। सड़क पर अजीब सी हलचल थी, जैसे हम किसी अनदेखी दुनिया में फंस चुके थे।
फिर, एक जोरदार झटका लगा और ट्रक अचानक हवा में उठने लगा!
हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। कोटा हाईवे पर ऐसा कभी नहीं हुआ था...
लेकिन आज, कुछ ऐसा होने वाला था, जो हमें हमेशा के लिए बदलकर रख देगा।
विजय ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। हमारी आँखों के सामने वो नज़ारा था, जिसे देखकर हमारी रूहें काँप गईं।
ट्रक हवा में लगभग दो फीट ऊपर उठ चुका था! उसके नीचे से धूल और काले धुएँ का गुबार उठ रहा था। ट्रक का इंजन खुद-ब-खुद गरज रहा था, जबकि मैंने उसे स्टार्ट भी नहीं किया था।
विजय ने काँपती आवाज़ में कहा, "भाई... ये कौन कर रहा है?"
मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। मेरी जुबान मानो तालू से चिपक गई थी। लेकिन फिर, ट्रक के अंदर बैठी वो परछाई अचानक हँसने लगी—एक डरावनी, कँपकँपाने वाली हँसी!
"अब ये ट्रक तेरा नहीं... अब ये मेरा है!"
ट्रक ज़ोर से झटके खाने लगा, जैसे कोई उसमें जबरदस्ती घुसने की कोशिश कर रहा हो।
हम पीछे हटे, लेकिन तभी...
ट्रक ज़ोर से ज़मीन पर गिरा और एक तेज़ धमाके के साथ इंजन बंद हो गया।
चारों तरफ एक अजीब सी शांति छा गई। सिर्फ हमारे तेज़-तेज़ चल रहे साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी कि ट्रक के पास जाएँ। क्या वो चीज़ अब भी अंदर थी?
विजय ने धीरे से कहा, "भाई, हमें ये ट्रक छोड़कर भाग जाना चाहिए। ये अब हमारा नहीं रहा..."
लेकिन मैं जानता था, अगर मैं आज इस ट्रक को छोड़ दूँ, तो शायद मैं ज़िंदा नहीं बचूँगा।
मैंने हिम्मत जुटाई और ट्रक के दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन जैसे ही मैंने हैंडल पकड़ा...
दरवाजा अपने आप खुल गया।
ट्रक के अंदर अंधेरा था। कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था। लेकिन जब मैंने ध्यान से देखा, तो डैशबोर्ड पर किसी ने अपनी नाखूनों से खरोंचते हुए कुछ लिखा था।
मैंने टॉर्च निकाली और लाइट डाली।
लिखा था— "अब तू इस हाईवे का हिस्सा है..."
मेरा शरीर सुन्न हो गया। मैंने विजय की तरफ देखा, लेकिन उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
वो काँपती आवाज़ में बोला, "भाई, अब भी समय है... भाग चल यहाँ से..."
लेकिन मैं जानता था, अब भागने से भी कोई फ़ायदा नहीं था...
कोटा हाईवे का श्राप अब हमें घेर चुका था।
मैंने गहरी सांस ली और ट्रक के अंदर कदम रखा। अंदर घुसते ही मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं किसी और ही दुनिया में आ गया हूँ।
ट्रक के केबिन में अजीब सी ठंडक थी, जबकि बाहर गरम हवा चल रही थी। सीटें धूल से भरी हुई थीं, और हर जगह गहरे नाखूनों के निशान थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने यहाँ जानवरों की तरह पंजे मारे हों।
विजय बाहर खड़ा था, अंदर आने की हिम्मत नहीं कर रहा था। मैंने उसकी तरफ देखा, तो वो सहमे हुए बोला, "भाई, ये सही नहीं है। हमें यहाँ से भाग चलना चाहिए।"
लेकिन मैं जानता था कि भागना कोई हल नहीं था। ये मेरा ट्रक था, मेरी रोज़ी-रोटी थी। इसे यूँ ही छोड़कर जाना नामुमकिन था।
मैंने धीरे से स्टार्ट बटन दबाया। इंजन ने एक घुरघुराहट के साथ स्टार्ट होने की कोशिश की, लेकिन फिर बंद हो गया। फिर अचानक… ट्रक का हॉर्न बिना वजह बजने लगा!
विजय घबरा कर पीछे हट गया, और मैं भी डर से काँप उठा। हॉर्न की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कान के पर्दे फटने लगे। ट्रक का पूरा शरीर हिल रहा था, जैसे किसी ने इसे जबरदस्ती पकड़ रखा हो!
फिर अचानक... हॉर्न बंद हो गया।
हर तरफ एक अजीब सी शांति छा गई। विजय ने घबराकर कहा, "भाई, ये ट्रक अब सुरक्षित नहीं है। इस पर किसी चीज़ का साया है!"
मैंने कांपते हुए कहा, "अगर हम इसे छोड़कर चले भी जाएँ, तो क्या ये हमें छोड़ देगा?"
विजय चुप हो गया। उसे भी समझ आ चुका था कि अब हम फँस चुके हैं।
मैंने दोबारा ट्रक स्टार्ट करने की कोशिश की। इस बार इंजन चालू हो गया। मैंने राहत की सांस ली, लेकिन तभी... पीछे के शीशे में मैंने देखा कि कोई हमारे ट्रक के पीछे खड़ा था!
एक काली परछाई... लंबे बालों वाली... सफेद साड़ी पहने हुए...
मैंने ज़ोर से चिल्लाया, "विजय, देख पीछे!"
विजय ने जैसे ही मुड़कर देखा, वो चीख पड़ा।
"भाई, ये... ये कौन है?!"
मैंने शीशे से देखा—वो औरत धीरे-धीरे ट्रक के पास आ रही थी। उसकी चाल इतनी अजीब थी, जैसे वो ज़मीन पर चल नहीं रही थी, बल्कि हवा में तैर रही थी।
फिर उसने अपना सिर उठाया...
उसकी आँखें पूरी काली थीं! कोई सफेदी नहीं... कोई पुतली नहीं... बस गहरा, अंधकारमय खालीपन।
मेरा शरीर सुन्न पड़ गया। मैंने गियर बदला और तेज़ी से ट्रक आगे बढ़ा दिया। लेकिन वो औरत हिली भी नहीं!
ट्रक उसके आर-पार निकल गया, लेकिन वो अब भी वहीं खड़ी थी, जैसे हमने उसे छुआ ही नहीं!
विजय चीखते हुए बोला, "भाई, ये इंसान नहीं है! ये कुछ और है!"
मैंने एक्सीलेटर दबाया और ट्रक को जितनी तेज़ी से हो सकता था, भगाने लगा।
लेकिन तभी...
ट्रक के अंदर से किसी के हँसने की आवाज़ आई।
वो हँसी... वही डरावनी हँसी... जो हमने पहले सुनी थी!
हमारी रूहें काँप गईं। विजय ने कांपते हुए पूछा, "भाई, ये आवाज़ कहाँ से आ रही है?"
मैंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा...
वो औरत अब हमारे ट्रक के अंदर थी।
वो हमारी बीच की सीट पर बैठी थी, और उसकी काली आँखें सीधे मेरी तरफ देख रही थीं...
अब हमें कोई नहीं बचा सकता था...
हमारी साँसें अटक गईं। शरीर जैसे सुन्न पड़ गया हो। विजय काँपते हुए पीछे सरकने लगा, लेकिन ट्रक की सीट से आगे कोई जगह नहीं थी। मेरी उंगलियाँ स्टीयरिंग पर जमीं थीं, लेकिन उनमें हिलने की ताकत नहीं बची थी।
वो औरत बस हमें देखे जा रही थी—बिना पलक झपकाए। उसकी आँखों में सिर्फ गहरा अंधकार था, जिसमें मैं जैसे डूबता चला जा रहा था।
"भाई... ये कौन है?" विजय की आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे उसकी आत्मा भी डर के मारे उसके शरीर से बाहर निकलने को तैयार हो।
मैं कुछ नहीं बोल पाया। गला सूख चुका था।
फिर वो औरत मुस्कुराई...
नहीं, मुस्कुराई नहीं... हँसी!
एक ऐसी हँसी, जो इंसानों की नहीं होती। जैसे कई औरतों की हँसी एक साथ गूँज रही हो।
"कहाँ जा रहे हो?" उसकी आवाज़ जैसे हवा में गूँज उठी।
विजय ने ज़ोर से चीखकर कहा, "भाई, कुछ कर!"
मैंने कांपते हाथों से एक्सीलेटर दबाया और ट्रक पूरी रफ्तार से आगे बढ़ा दिया। लेकिन...
गियर अपने आप न्यूट्रल में चला गया!
हाथ अपने आप स्टेयरिंग से हट गए!
जैसे कोई ट्रक को रोकना चाहता था।
"ये ट्रक अब तुम्हारा नहीं है..."
वो औरत अब भी बीच में बैठी थी, लेकिन अब वो हमें देख नहीं रही थी। वो फ्रंट मिरर में खुद को देख रही थी... और उसके चेहरे पर अजीब सी खुशी थी।
"बहुत साल हो गए... मुझे भी सवारी करनी थी।"
मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, "तू... तू कौन है?"
उसका चेहरा अचानक मेरी तरफ घूम गया।
अब उसकी आँखें काली नहीं थीं... उनसे खून टपक रहा था!
"तू भी बहुत जल्द जान जाएगा..."
विजय अचानक काँपते हुए गुस्से में चिल्लाया, "तू हमारे साथ क्या चाहती है?"
वो औरत अब भी मुस्कुरा रही थी।
"सिर्फ... तुम्हारी जगह..."
अचानक... ट्रक अपने आप रुक गया।
और हम दोनों बेहोश हो गए।
जब आँखें खुलीं, तो सूरज निकल चुका था।
हम हाईवे के बीच में थे। ट्रक बंद था।
विजय काँपते हुए उठा, "भाई... वो औरत... कहाँ गई?"
मैंने इधर-उधर देखा।
वो औरत वहाँ नहीं थी।
लेकिन... ट्रक के फ्रंट शीशे पर खून से लिखा था—
"फिर मिलेंगे..."
विजय की आँखें उस खून से लिखे शब्दों पर अटक गईं। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था। मैंने कांपते हाथों से शीशे को छूने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उंगलियाँ उस खून के पास पहुँचीं, एक ठंडी लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई।
"ये खून... अभी भी गीला है!" मेरी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।
विजय ने झट से मेरी कलाई पकड़ ली। "भाई, चल यहाँ से! ये जगह ठीक नहीं है!"
हमने ट्रक चालू किया और कोटा की ओर बढ़ गए। लेकिन मन में अजीब सा डर बैठ चुका था। हम दोनों को लग रहा था कि वो औरत अभी भी यहीं कहीं थी... हमारी नज़रों से छुपकर हमें देख रही थी।
रास्ते में एक ढाबा दिखा।
विजय ने जल्दी से कहा, "भाई, रोक ले! कुछ खा लेते हैं, दिमाग ठिकाने आएगा!"
मैंने ट्रक रोक दिया। ढाबा सुनसान था। बस एक बूढ़ा आदमी तंदूर के पास बैठा बीड़ी पी रहा था।
"आओ बाबू, चाय पी लो!"
हम दोनों ढाबे के पास बैठे और चुपचाप चाय का इंतजार करने लगे।
बूढ़े ने हमें घूरते हुए पूछा, "कहाँ से आ रहे हो?"
विजय ने डरते-डरते जवाब दिया, "हाईवे से..."
बूढ़े ने एक गहरी साँस ली और फिर धीरे से बोला, "रात में देखा उसे?"
हम दोनों सन्न रह गए।
"क... किसे?" मैंने मुश्किल से पूछा।
बूढ़े ने बीड़ी का एक लंबा कश लिया और अंधेरे में घूरते हुए बोला—
"हाईवे वाली चुड़ैल को..."
हमारे गले सूख गए। विजय ने घबराकर पूछा, "आपको कैसे पता?"
बूढ़े ने एक लंबी साँस ली और कहना शुरू किया—
"बहुत साल पहले, इस हाईवे पर एक औरत का कत्ल हुआ था।"
"कहते हैं, वो किसी से मिलने जा रही थी... लेकिन रास्ते में किसी ने उसे मार दिया।"
"तब से उसकी आत्मा इस हाईवे पर भटकती है।"
"कभी किसी के ट्रक में बैठती है... कभी सड़क पर खड़ी दिखती है..."
"जिसे दिख जाए, उसकी मौत पक्की!"
हम दोनों के रोंगटे खड़े हो गए। विजय के हाथ से चाय गिरने ही वाली थी कि बूढ़े ने एक और बात जोड़ दी—
"तुम लोग जिंदा हो, इसका मतलब उसने तुम्हें छोड़ दिया।"
"पर याद रखना...
अगर उसने दोबारा तुम्हें देख लिया... तो फिर कोई नहीं बचा सकता!"
ढाबे से निकलकर हम फिर ट्रक में बैठे, लेकिन अब माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
हर परछाई में वो औरत नजर आ रही थी... हर झटके में लग रहा था कि कोई ट्रक के ऊपर बैठा है।
रात धीरे-धीरे गहरा रही थी...
और हमें लग रहा था कि वो फिर हमारे आसपास थी...
ट्रक का इंजन गुर्राया, लेकिन हमारे दिल की धड़कन उससे भी तेज़ थी। विजय ने घबराकर मुझसे पूछा, "भाई, ये बूढ़ा सच बोल रहा था ना?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस ट्रक चलाता रहा। लेकिन सच कहूँ तो मेरे हाथ भी स्टीयरिंग पर काँप रहे थे।
आसमान में बादल घिर चुके थे। हल्की बारिश शुरू हो गई थी, जिससे सड़क पर धुंध छा गई थी। सामने का रास्ता अब साफ़ नहीं दिख रहा था। सड़क के दोनों तरफ़ सूखे पेड़ ऐसे खड़े थे जैसे अंधेरे में कोई हाथ फैलाए हमें बुला रहा हो।
"रुक, रुक, रुक!"
विजय की आवाज़ सुनकर मैंने झट से ब्रेक मारा।
"क्या हुआ?" मैंने हड़बड़ाकर पूछा।
"वो देख...!" विजय ने काँपते हुए सामने इशारा किया।
सड़क के बीचों-बीच एक औरत खड़ी थी।
लंबे काले बाल... सफेद साड़ी... और नंगे पैर...
बारिश में भीग रही थी, लेकिन हिली भी नहीं। उसका सिर थोड़ा झुका हुआ था, और चेहरे पर बाल बिखरे थे।
"भाई... ये वही है ना?"
विजय के चेहरे का रंग उड़ चुका था।
मेरे हाथ पसीने से भीग चुके थे।
"अब क्या करें?" विजय ने घबराकर पूछा।
मेरे दिमाग में बस बूढ़े की बात गूँज रही थी—
"अगर उसने दोबारा तुम्हें देख लिया... तो फिर कोई नहीं बचा सकता!"
और अब वो हमारे ठीक सामने थी!
मैंने बिना सोचे ट्रक का हॉर्न बजा दिया।
"पों... पों... पोंnnn!!!"
लेकिन वो औरत हिली तक नहीं।
विजय ने काँपते हुए कहा, "भाई, वापस मोड़ लेते हैं!"
"नहीं!" मैंने गहरी सांस ली।
"अगर हमने पीछे मुड़ने की कोशिश की, तो वो हमारे पास आ सकती है!"
विजय का मुँह सूख चुका था।
"फिर क्या करें?"
"बस... आँख बंद कर और ट्रक तेज़ कर!"
मैंने क्लच दबाया, गियर बदला और एक्सीलेटर पूरा नीचे कर दिया।
ट्रक गड़गड़ाया और हम उस औरत की तरफ़ बढ़ने लगे।
अब बस कुछ ही सेकंड में हम उससे टकराने वाले थे!
3... 2... 1...
और तभी—
वो अचानक हवा में गायब हो गई!!!
"भाई... भा... भाई, वो गई कहाँ?" विजय के गले से मुश्किल से आवाज़ निकली।
मैंने कांपते हाथों से ट्रक के शीशे में देखा।
औरत अब हमारे ठीक पीछे खड़ी थी...
ट्रक की लाल लाइट में उसका चेहरा दिख रहा था... और उसकी आँखें खून जैसी लाल थी!!!
"भाई!!! भाग!!!"
मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दिया।
ट्रक धड़धड़ाते हुए आगे बढ़ गया...
लेकिन मेरी आँखों के सामने बस एक ही सवाल था—
"क्या वो सच में चली गई है?"
या वो अभी भी हमारे साथ ट्रक में मौजूद है...?
ट्रक का इंजन गरजता रहा, लेकिन मेरी धड़कन उससे भी ज़ोर से सुनाई दे रही थी।
पीछे देखने की मेरी हिम्मत नहीं थी, लेकिन विजय के चेहरे की हालत देखकर मुझे समझ आ रहा था कि कुछ तो बहुत गड़बड़ था।
"भाई... वो अभी भी पीछे है!"
विजय की काँपती हुई आवाज़ सुनकर मेरा खून ठंडा पड़ गया।
मैंने धीरे से रियर-व्यू मिरर में देखा—
और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
वो औरत अब हमारे ट्रक के ठीक पीछे दौड़ रही थी!
"भाई... ये इंसान नहीं हो सकती!!!" विजय ने घबराकर मेरा कंधा झकझोरा।
मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दिया।
80... 90... 100...
लेकिन वो औरत अब भी हमारे पीछे दौड़ रही थी... और उसकी चाल वैसी ही थी—धीमी, लेकिन खतरनाक!
"भाई!!! वो आ रही है!!!"
मैंने एक झटके से ट्रक का स्टीयरिंग घुमाया और स्पीड और बढ़ा दी।
लेकिन तभी—
"धप्प!!!"
ट्रक के ऊपर कोई ज़ोर से कूदा।
हमारे सिरों के ऊपर केबिन की छत गड़गड़ाने लगी...
"भाई, वो ऊपर चढ़ गई!!!"
विजय की आवाज़ अब लगभग चीख में बदल चुकी थी।
मैंने काँपते हुए कहा, "खिड़की मत खोलना... दरवाज़ा मत खोलना..."
लेकिन तभी—
"ठक... ठक... ठक..."
खिड़की के शीशे पर किसी ने दस्तक दी।
मेरी साँसें थम गईं।
विजय की आँखें फटी की फटी रह गईं।
हमारे ठीक बगल में वो औरत खिड़की पर हाथ रखकर खड़ी थी...!!!
सफ़ेद साड़ी से टपकता पानी... चेहरे पर बिखरे हुए गीले बाल... और खून जैसी लाल आँखें!
वो धीरे से झुकी और शीशे में झाँककर हमें देखने लगी...
"भाई... अब क्या करें?" विजय की आवाज़ अब बस एक फुसफुसाहट थी।
मैंने होंठ भींचे और धीरे से कलमा पढ़ना शुरू किया।
विजय ने घबराकर हनुमान चालीसा बुदबुदाना शुरू किया।
और तभी—
वो औरत अचानक ग़ायब हो गई!!!
हम दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
"क्या वो चली गई...?"
मैंने कांपते हुए शीशे में देखा—
ट्रक के ऊपर अब कोई नहीं था।
विजय ने काँपती आवाज़ में कहा, "शायद हमें बचाने के लिए भगवान ने हमारी सुन ली..."
"शायद..." मैंने धीरे से कहा।
लेकिन तभी—
ट्रक का स्टेरिंग अचानक खुद-ब-खुद घूमने लगा!!!
मैंने पूरी ताकत लगाकर उसे सीधा करने की कोशिश की, लेकिन ट्रक बेकाबू हो चुका था।
हमें सीधे खाई की तरफ़ ले जाया जा रहा था!!!
"भाई!!! ब्रेक मारो!!!"
मैं ब्रेक पर पूरी ताकत से पैर रख चुका था—पर ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया था!!!
ट्रक की स्पीड बढ़ती जा रही थी...
सामने सड़क खत्म हो रही थी...
और अगले ही पल—
हम ट्रक समेत खाई में गिरने वाले थे...!!!
ट्रक पूरे वेग से खाई की तरफ बढ़ रहा था।
मेरे हाथ स्टेयरिंग पर जमे थे, लेकिन मैं उसे रोक नहीं पा रहा था।
विजय एक कोने में सिमट कर हनुमान चालीसा पढ़ रहा था।
मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा… शायद आज हमारी ज़िन्दगी यहीं खत्म होने वाली थी।
लेकिन तभी—
"धड़ाम!!!"
एक ज़ोरदार झटका लगा और ट्रक अचानक रुक गया।
हम खाई में गिरने से बाल-बाल बच गए थे!!!
मेरी साँस तेज़ी से चल रही थी।
विजय ने कांपती हुई आवाज़ में पूछा, "भाई… ये कैसे रुका?"
मैंने हिम्मत जुटाकर नीचे झाँका—
ट्रक के नीचे कोई छाया-सी लिपटी हुई थी…
मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
वो वही औरत थी!!!
उसके गीले, उलझे हुए बाल ट्रक के टायर से लिपटे हुए थे… और उसके नाखून मिट्टी में धंसे हुए थे, जैसे उसने ट्रक को ज़बरदस्ती रोका हो।
"भाई… वो फिर से आ रही है!!!"
विजय की चीख से मैं पीछे मुड़ा—
और मैंने देखा…
वो औरत अब ट्रक के सामने खड़ी थी।
उसकी लाल आँखें हम पर गड़ी थीं… चेहरा पीला और मरे हुए इंसान जैसा…
उसके होंठ हिले और एक धीमी, सिसकती हुई आवाज़ आई—
"मुझे… घर जाना है…"
हम दोनों सुन्न पड़ गए।
"घर…?" विजय ने फुसफुसाकर पूछा।
मैंने हिम्मत करके कहा, "त… तुम्हारा घर कहाँ है?"
औरत की गर्दन एक अजीब-से कोण पर मुड़ी और उसने दूर पहाड़ियों की तरफ इशारा किया।
"उधर… कुलधरा…"
विजय के चेहरे का रंग उड़ गया।
"भाई… कुलधरा गाँव तो श्रापित है!!!"
"हमें यहाँ से भागना चाहिए!!!"
लेकिन मैं जानता था—
अब हम चाहकर भी भाग नहीं सकते थे।
क्योंकि वो औरत…
अब हमारे ट्रक के अंदर बैठ चुकी थी…!!!
"भाई... ट्रक में मत बैठना, वो अंदर है!!!" विजय ने काँपती आवाज़ में कहा।
लेकिन मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए थे। मेरी आँखें धीरे-धीरे ट्रक की ड्राइवर सीट की तरफ उठीं—
और मैं वहीं सुन्न खड़ा रह गया।
वो औरत अब ड्राइवर सीट पर बैठी थी!!!
उसकी उलझी लटें उसके चेहरे को आधा ढके हुए थीं, और उसकी आँखें… एक मरी हुई आत्मा की तरह खाली थीं।
लेकिन सबसे डरावनी बात ये थी—
वो स्टेयरिंग घुमा रही थी… जैसे ट्रक चलाने की कोशिश कर रही हो!!!
"भाई… ये क्या कर रही है?" विजय ने घबराकर पूछा।
मैंने काँपते हुए ट्रक के दरवाजे को पकड़ा, लेकिन जैसे ही मैंने उसे खोलने की कोशिश की—
"भड़ाम!!!"
दरवाजा ज़ोर से खुद-ब-खुद बंद हो गया।
"वो हमें कुलधरा ले जा रही है!!!" विजय चीख पड़ा।
और अगले ही पल…
ट्रक खुद-ब-खुद स्टार्ट हो गया।
इंजन गरजा, और ट्रक आगे बढ़ने लगा।
लेकिन इस बार…
मैंने स्टेयरिंग को हाथ भी नहीं लगाया था।
विजय सड़क के किनारे खड़ा रह गया, और मैं… ट्रक के अंदर…
उस औरत के साथ अकेला था।
"तुम कौन हो…? हमें क्यों मारना चाहती हो?" मैंने हिम्मत करके पूछा।
औरत ने धीरे से गर्दन घुमाई, और उसकी पीली, बेजान आँखें मुझ पर टिकीं।
"मैं… नहीं मरना चाहती थी…" उसकी आवाज़ जैसे किसी गहरे कुएँ से आ रही थी।
"लेकिन उसने मुझे मार डाला…"
"क… कौन?" मैंने काँपते हुए पूछा।
"मेरा पति…"
ट्रक की रफ़्तार और तेज़ हो गई। पहाड़ों की घुमावदार सड़कें पार होती जा रही थीं।
"उसने मुझे मारा… और मेरे बच्चे को भी… उसने हमें इस हाईवे पर फेंक दिया… अब मैं घर जा रही हूँ…"
मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
"भाई… ट्रक रोक!!!" विजय सड़क के किनारे दौड़ता हुआ चिल्ला रहा था।
लेकिन ट्रक अब मेरे कंट्रोल में नहीं था।
और फिर सामने कुलधरा गाँव का टूटा-फूटा गेट दिखने लगा…
क्या हम बच पाएंगे?
या इस बार… ये हाईवे हमें भी निगल जाएगा?
ट्रक की हेडलाइट्स टूटी-फूटी सड़क पर पड़ रही थीं।
मेरे माथे से पसीना टपक रहा था। मैंने पूरी ताकत से ब्रेक दबाने की कोशिश की, लेकिन…
ब्रेक फेल हो चुके थे।
"अल्लाह के वास्ते… ट्रक रोक दे!!!" मैंने कांपती आवाज़ में कहा।
लेकिन वो औरत…
अब ड्राइवर सीट से उठकर मेरी तरफ मुड़ रही थी।
उसके सफेद कपड़े हवा में लहरा रहे थे, उसके बाल जैसे किसी अंधेरे गुफा से बाहर निकलते नाग हो।
"तुम मुझे नहीं रोक सकते…"
उसकी बेजान आँखें मुझ पर टिकी थीं।
मेरे हाथ अब भी स्टेयरिंग पर जमे हुए थे, लेकिन ट्रक अब मेरे कंट्रोल में नहीं था।
"भाई!!!"
विजय की चीख सुनाई दी।
वो अब भी सड़क के किनारे भाग रहा था, उसकी आँखों में डर साफ झलक रहा था।
ट्रक कुलधरा गाँव के अंदर दाखिल हो चुका था।
चारों तरफ उजड़े हुए घर… टूटी हुई दीवारें… और घुप्प अंधेरा।
"ये जगह… शापित है!!!"
मेरे दिमाग में वो बूढ़े साधु की आवाज़ गूँजी, जिसने हमें इस हाईवे पर न रुकने की चेतावनी दी थी।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
अचानक ट्रक अपने-आप रुक गया।
मेरी सांसें तेज़ चल रही थीं।
मैंने काँपते हुए चारों तरफ देखा—
कोई नहीं था।
वो औरत…
गायब हो चुकी थी।
मैंने हड़बड़ाकर ट्रक का दरवाजा खोला और बाहर कूद गया।
"विजय!!!" मैंने उसे आवाज़ दी।
लेकिन जवाब नहीं आया।
चारों तरफ सिर्फ…
सन्नाटा था।
"भाई… पीछे देख…"
किसी ने मेरे कान में फुसफुसाया।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
धीरे-धीरे, मैंने अपना सिर घुमाया…
और जो मैंने देखा—
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मेरे ठीक पीछे… वही औरत खड़ी थी।
उसकी आँखें अब जल रही थीं— एक अजीब से नीले और लाल रंग में।
मैं एक कदम पीछे हटा, लेकिन मेरा पैर किसी चीज़ से टकराया और मैं ज़मीन पर गिर पड़ा।
"क… कौन हो तुम?" मेरी आवाज़ कांप रही थी।
"जिसका बदला अभी बाकी है…"
उसकी आवाज़ किसी गहरी गुफा में गूंजते प्रतिध्वनि जैसी थी।
विजय अब भी गायब था।
मैंने झट से उठने की कोशिश की, लेकिन मेरा शरीर जैसे भारी हो चुका था।
तभी—
ट्रक का इंजन खुद-ब-खुद स्टार्ट हो गया।
"गड्ड… गड्ड… गड्ड…"
स्टेयरिंग अपने-आप घूमने लगा, गियर अपने-आप बदल रहे थे।
ट्रक अब धीरे-धीरे मेरी तरफ आ रहा था।
कोई था जो उसे चला रहा था… लेकिन कोई दिख नहीं रहा था।
"विजय!!!"
मैंने पूरी ताकत से चिल्लाया, लेकिन…
कोई जवाब नहीं आया।
"तुम बच नहीं सकते…"
उस औरत ने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।
उसकी लंबी, पतली उंगलियाँ जैसे मेरी गर्दन तक पहुँचने ही वाली थीं—
तभी…
"अल्लाह का नाम लो, भाई!!!"
विजय की आवाज़ कहीं दूर से आई।
मेरा दिमाग सुन्न था, लेकिन मेरी ज़ुबान पर सिर्फ एक ही शब्द आया—
"बिस्मिल्लाह…"
औरत अचानक ज़ोर से चीखने लगी।
उसकी आँखों से खून टपकने लगा, उसका शरीर धुंए में बदलने लगा।
"नहीं… नहीं… तुम मुझे फिर नहीं रोक सकते…!!!"
उसकी चीखों के साथ ही अचानक सब-कुछ शांत हो गया।
ट्रक का इंजन बंद हो गया।
वो औरत…
गायब हो चुकी थी।
मैं हांफते हुए खड़ा हुआ। मेरी टांगें कांप रही थीं।
विजय कहीं दूर से भागता हुआ आया।
"भाई… हम यहां से निकलते हैं!" उसने घबराई आवाज़ में कहा।
मैंने ट्रक का दरवाजा खोला और स्टार्ट करने की कोशिश की—
इंजन एक बार में ही स्टार्ट हो गया।
विजय मेरे पास बैठते ही बुदबुदाया, "भाई, ये जगह सही नहीं है।"
मैंने गियर बदला और तेजी से ट्रक को पीछे मोड़ा।
हम कुलधरा के उस भूतिया हाईवे से दूर जा रहे थे, लेकिन मेरा मन अब भी बेचैन था।
क्योंकि…
मेरे बैक मिरर में…
वो औरत अब भी खड़ी थी।
विजय कांपते हुए बोला, "भाई, हमें जल्द से जल्द ये जगह छोड़नी होगी!"
मैंने ट्रक की स्पीड बढ़ा दी, लेकिन बैक मिरर में उस औरत का अक्स अब भी दिख रहा था।
"भाईजान, वो अभी भी हमें देख रही है…" विजय की आवाज़ डर से भर गई थी।
मैंने बैक मिरर की तरफ नहीं देखा, सिर्फ सड़क पर ध्यान देने की कोशिश की।
लेकिन तभी…
"धड़ाम!"
ट्रक के अगले शीशे पर जोरदार धमाका हुआ।
हम दोनों ने एक साथ देखा—
वो औरत अब हमारे ट्रक के बोनट पर बैठी थी!
उसकी आँखें खून जैसी लाल थीं, बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसका चेहरा…
चेहरा जैसे सड़ चुका था… गला कटा हुआ…
मेरे हाथ कांपने लगे।
"भाई, ब्रेक मारो!" विजय चिल्लाया।
मैंने झट से ब्रेक दबाया, लेकिन…
ब्रेक काम ही नहीं कर रहे थे।
"हा… हा… हा… तुम बच नहीं सकते!"
वो औरत ज़ोर से हँसी, और उसकी हँसी पूरे ट्रक में गूंजने लगी।
ट्रक की स्पीड अब और तेज़ हो गई।
गियर अपने आप बदल रहे थे, स्टेयरिंग घूम रहा था, और ट्रक ऐसे भाग रहा था जैसे कोई और उसे चला रहा हो।
मैंने अपनी पूरी ताकत लगाकर ट्रक को काबू में करने की कोशिश की, लेकिन…
स्टेयरिंग जाम हो चुका था।
विजय ने घबराकर दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन…
दरवाजा भी लॉक हो चुका था।
हम किसी अदृश्य शक्ति के कब्जे में थे।
"हमें मार देगी, भाईजान!"
विजय ने अपनी जेब से एक छोटा सा भोलेनाथ का लॉकेट निकाला और जोर-जोर से मंत्र बुदबुदाने लगा।
मैंने भी तुरंत कलमा पढ़ना शुरू किया।
"ला इलाहा इलल्लाह…"
ट्रक की स्पीड अचानक घटने लगी।
वो औरत, जो अब भी बोनट पर बैठी थी, ज़ोर से चीखने लगी।
"नहीं… नहीं… तुम मुझे फिर नहीं रोक सकते…!!!"
ट्रक अचानक झटका खाकर रुक गया।
हमने तुरंत दरवाजा खोला और कूद पड़े।
हमारी सांसें तेज़ चल रही थीं।
विजय कांपते हुए बोला, "भाई… वो कहां गई?"
मैंने धीरे-धीरे ट्रक की तरफ देखा।
बोनट पर कोई नहीं था।
सड़क पर… सिर्फ अंधेरा था।
हम कुछ देर तक चुपचाप खड़े रहे।
फिर मैंने धीरे से कहा, "विजय, अब हमें यहां एक पल भी नहीं रुकना चाहिए।"
विजय ने सिर हिलाया।
हमने ट्रक स्टार्ट किया और बिना पीछे देखे हाईवे छोड़ दिया।
लेकिन मेरे दिल में अब भी एक सवाल था—
क्या वो औरत वाकई चली गई थी?
या फिर…
वो अब भी हमारी मौत का इंतज़ार कर रही थी?
ट्रक हाईवे पर दौड़ रहा था, लेकिन दिल में डर अब भी दौड़ रहा था।
विजय चुपचाप बैठा था, उसकी आँखें अब भी सहमी हुई थीं। मैंने कुछ देर बाद उससे पूछा, "भाई, तू ठीक है?"
वो धीरे से बोला, "भाईजान, हमें अब इस रास्ते से कभी नहीं जाना चाहिए। ये जगह अपशकुनी है… मुझे यकीन है, वो औरत कोई आम आत्मा नहीं थी।"
मैंने गहरी सांस ली और ट्रक की स्पीड कम कर दी। अब हम एक सुनसान इलाके से गुजर रहे थे। आसपास कोई बस्ती नहीं थी, ना कोई होटल, ना कोई ढाबा। सिर्फ घना अंधेरा और हाईवे के किनारे सूखी झाड़ियों की खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी।
विजय ने कहा, "भाई, कुछ दूर पर एक पुराना ढाबा है। वहाँ रुककर पानी पी लेते हैं, थोड़ा सुकून मिलेगा।"
मैंने हाँ में सिर हिलाया और ट्रक आगे बढ़ाया।
कुछ किलोमीटर बाद हमें ढाबा दिख गया।
ये एक बहुत पुराना ढाबा था, जंग लगे बोर्ड पर नाम लिखा था— "शंकर ढाबा"।
ढाबा सुनसान पड़ा था, बस एक पुराना बल्ब झूम रहा था।
हम ट्रक से नीचे उतरे और अंदर गए।
"कोई है?" मैंने आवाज़ लगाई।
अंदर एक बूढ़ा आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। उसने हमें देखा और कहा, "आओ बेटा, क्या लोगे?"
हमने पानी और चाय का ऑर्डर दिया।
जब हम बैठकर चाय पी रहे थे, तो बूढ़ा आदमी हमें घूरने लगा।
मैंने पूछा, "बाबा, आप ऐसे क्यों देख रहे हैं?"
उसने गहरी सांस ली और धीरे से बोला, "तुम दोनों उस रास्ते से आ रहे हो ना?"
मैंने और विजय ने एक-दूसरे की ओर देखा।
"हाँ बाबा, पर आपको कैसे पता?"
बूढ़े आदमी ने बीड़ी फेंकी और धीमी आवाज़ में कहा,
"क्योंकि जो उस रास्ते से आते हैं, उनके चेहरे पर हमेशा डर लिखा होता है।"
हम चौंक गए।
"बाबा, आप इस जगह के बारे में जानते हैं?" विजय ने जल्दी से पूछा।
बूढ़े ने सिर हिलाया। "हाँ बेटा, ये जगह श्रापित है। वो औरत जो तुमने देखी… वो कोई आम आत्मा नहीं है।"
हम दोनों सन्न रह गए।
"बाबा, आप उसके बारे में जानते हैं?"
उसकी आँखों में एक अजीब सा डर था।
"हाँ, बेटा… और मैं तुम्हें बताऊंगा भी… लेकिन पहले ये बताओ… उसने तुम्हें जाने कैसे दिया?"
मैंने धीरे से कहा, "हमने भगवान का नाम लिया था… विजय ने भोलेनाथ का जाप किया और मैंने कलमा पढ़ा… बस तभी सबकुछ रुक गया।"
बूढ़ा आदमी चुप हो गया।
फिर उसने कहा,
"तुम बहुत किस्मत वाले हो, बेटा… क्योंकि वो औरत बहुतों को नहीं छोड़ती।"
मैंने गहरी सांस ली और पूछा, "बाबा, वो औरत कौन थी?"
बूढ़े आदमी ने कांपते हाथों से एक गिलास उठाया और पानी पीकर कहा—
"ये कहानी बहुत पुरानी है… सालों पहले की… जब इस हाईवे पर एक बड़ा हादसा हुआ था…"
"उस हादसे में एक औरत की मौत हुई थी। लेकिन वो बस मरी नहीं थी… उसे किसी ने जिंदा जला दिया था!"
हमारी रूह काँप गई।
"क…किसने जलाया था?" विजय ने घबराकर पूछा।
बूढ़े ने हमें घूरा और धीरे से कहा—
"एक ट्रक ड्राइवर ने…"
बूढ़े की कहानी
उसकी आँखों में एक अजीब सा डर था। उसने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया,
"ये बात करीब 20 साल पुरानी है… एक औरत थी, जिसका नाम 'सुमित्रा' था। वह यहीं, इसी हाईवे के पास के एक गाँव में रहती थी।"
हम दोनों चुपचाप सुन रहे थे।
"सुमित्रा बहुत खूबसूरत थी, पर उसकी किस्मत बहुत खराब थी। उसका पति एक शराबी था, जो आए दिन उसे मारता-पीटता था। पर गाँव में औरतों की कोई सुनी नहीं जाती थी।"
बूढ़े ने बीड़ी सुलगाई और एक लंबा कश खींचकर बोला,
"फिर एक रात, वो हादसा हुआ जिसने इस हाईवे को श्रापित बना दिया।"
हमने उत्सुकता से पूछा, "कैसा हादसा?"
बूढ़े ने हमें देखा और बोला,
"वो रात अमावस्या की थी। सुमित्रा के पति ने शराब पी थी और गुस्से में उसे बहुत पीटा। वह तंग आ चुकी थी। दर्द से कराहती हुई वो गाँव से भागकर इस हाईवे पर आ गई।"
"तभी, दूर से एक ट्रक आता दिखा।"
वो आखिरी चीख
बूढ़ा थोड़ा रुका, जैसे उस कहानी को याद करके उसकी भी रूह काँप गई हो।
"सुमित्रा ने सोचा कि कोई तो उसकी मदद करेगा। वो सड़क के बीचों-बीच खड़ी हो गई, हाथ जोड़कर ट्रक वाले से मदद की भीख माँगी।"
"पर ट्रक नहीं रुका… बल्कि उसकी स्पीड और बढ़ गई!"
हमारी साँसें तेज हो गईं।
"ट्रक सीधा उसके ऊपर चढ़ गया…"
"पर ये मौत आसान नहीं थी।"
"ड्राइवर ने उसे सिर्फ कुचला ही नहीं… बल्कि, अपनी दरिंदगी दिखाने के लिए… ट्रक रोककर उसके अधमरे शरीर को पेट्रोल डालकर जला भी दिया!"
हम दोनों के रोंगटे खड़े हो गए।
श्राप का जन्म
बूढ़ा आदमी थूक निगलकर बोला,
"उसकी चीखें पूरे हाईवे पर गूँज उठी थीं। उसने उस ड्राइवर को श्राप दिया कि जो भी इस रास्ते से गुजरेगा, उसकी मौत ऐसे ही दर्दनाक होगी!"
बूढ़े की आवाज़ भारी हो गई थी।
"कहते हैं, उस रात के बाद से यहाँ अजीब घटनाएँ होने लगीं। बहुत से ट्रक ड्राइवरों ने शिकायत की कि रात के वक्त हाईवे पर एक औरत खड़ी दिखती है, जो हाथ जोड़कर उनसे मदद माँगती है।"
"अगर कोई उसकी मदद के लिए रुक जाए, तो वो अचानक गायब हो जाती है…"
"लेकिन अगर कोई नहीं रुकता…" बूढ़े ने हमें घूरते हुए कहा,
"तो उसकी मौत निश्चित होती है!"
हमने क्या देखा था?
हम दोनों सन्न रह गए।
विजय ने कांपती आवाज़ में कहा, "भाईजान… ये तो वही औरत थी, जो हमें रास्ते में मिली थी!"
मेरे अंदर एक सिहरन दौड़ गई।
"बाबा, वो हमें क्यों नहीं मार पाई?"
बूढ़े ने हमारी तरफ देखा और बोला,
"तुम दोनों बहुत किस्मत वाले हो। उसने अब तक कई लोगों को मार दिया है, पर तुम बच गए…"
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा, "क्यों बाबा?"
बूढ़े ने गहरी सांस ली और कहा,
"क्योंकि तुमने भगवान का नाम लिया था। उसने देखा कि तुम डर नहीं रहे… इसलिए वो चली गई। लेकिन ये मत भूलो बेटा…"
"वो अभी भी इसी हाईवे पर भटक रही है… और अगली बार वो किसी और को नहीं छोड़ेगी!"
अभी भी इंतजार कर रही है…
हमने झटपट चाय खत्म की और ट्रक में बैठ गए।
जब मैंने इंजन स्टार्ट किया, तो बूढ़े ने कहा,
"बेटा, ये मत भूलना… अगर इस रास्ते से फिर गुजरना पड़े… तो कभी भी उस औरत से नज़र मत मिलाना!"
ट्रक आगे बढ़ने लगा, लेकिन हमारी रूह अब भी उसी हाईवे पर अटकी हुई थी।
वो औरत… अभी भी किसी और की जान लेने के इंतजार में थी…
ट्रक के पीछे साया
हमने ट्रक स्टार्ट किया और तेजी से हाईवे पर आगे बढ़ने लगे। दिल की धड़कनें अब भी तेज थीं। आँखों के सामने बार-बार वही मंजर घूम रहा था—वो औरत, उसके बिखरे हुए बाल, उसकी काली, गहरी आँखें, और वो अजीब-सी मुस्कान।
विजय ने घबराई हुई आवाज़ में कहा, "भाईजान, ये रास्ता छोड़कर कहीं और से चलते हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है।"
मैंने लंबी सांस ली और जवाब दिया, "इतना सामान लोड है, अगर दूसरे रास्ते से गए तो घंटों लग जाएंगे। बस, अल्लाह का नाम लो और चलते रहो।"
लेकिन मेरे खुद के अंदर भी अजीब सा डर बैठा हुआ था।
अचानक पीछे से आ रही थी कोई आहट
रात के तीन बज रहे थे। हम दोनों खामोशी से ट्रक चला रहे थे।
हाईवे सुनसान था, सिर्फ हमारे ट्रक की हेडलाइट्स आगे के रास्ते को रोशन कर रही थीं।
तभी…
ट्रक के ऊपर कुछ गिरने की जोरदार आवाज़ आई!
हम दोनों चौंक गए।
"भाईजान! ये क्या था?" विजय लगभग चीख पड़ा।
मैंने रियर-व्यू मिरर में देखा, लेकिन कुछ नजर नहीं आया।
"शायद कोई पत्थर गिरा होगा," मैंने खुद को तसल्ली देने की कोशिश की।
लेकिन अगले ही पल, ट्रक के ऊपर फिर से कोई ज़ोर से चला।
अब तो मेरी भी रूह काँप गई।
पीछे की खिड़की से झांकता चेहरा
विजय ने कांपते हुए कहा, "भाईजान… ट्रक मत रोको… बस तेज़ चलाओ!"
लेकिन मैं हिम्मत करके पीछे देखने लगा।
पीछे की खिड़की से हल्का सा पर्दा हिला… और जैसे ही मैंने गौर से देखा…
कोई वहाँ खड़ा था!
एक चेहरा… बिखरे हुए बाल… सफ़ेद सूखा चेहरा… आँखें बिलकुल काली…
वो हमें घूर रही थी!
मेरे हाथ से स्टेयरिंग लगभग छूटने वाला था। विजय की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"भाईजान! वो… वो औरत!"
मैंने घबराकर नज़रे फेर लीं और ट्रक की स्पीड और तेज़ कर दी।
लेकिन फिर…
"ठक! ठक! ठक!"
कोई ट्रक के अंदर आना चाहता था!
तेज़ी से भागने की कोशिश
मैंने बिना कुछ सोचे एक्सीलेरेटर पर पूरा पैर रख दिया। ट्रक तेज़ी से दौड़ने लगा। लेकिन वो ठक-ठक की आवाज़ बंद नहीं हुई।
विजय ने रोते हुए कहा, "भाईजान, कुछ करो! ये हमें मार डालेगी!"
तभी, मैंने अपने गले में पड़ा तावीज़ कसकर पकड़ा और जोर से बिस्मिल्लाह पढ़ा।
अचानक, वो ठक-ठक की आवाज़ बंद हो गई।
मैंने पीछे देखने की हिम्मत जुटाई…
वो चेहरा अब खिड़की से गायब था।
गांव का मंदिर और पुजारी
सुबह की पहली किरण फूटने लगी थी। जैसे ही हम एक छोटे से गाँव में पहुंचे, मैंने तुरंत ट्रक रोका और विजय को लेकर वहाँ के मंदिर की ओर भागा।
पुजारी हमें देखकर चौंक गया, "बेटा, क्या हुआ?"
हम दोनों हांफते हुए बोले, "बाबा… इस हाईवे पर… वो औरत…"
पुजारी का चेहरा गंभीर हो गया। उसने हमारी ओर देखा और धीरे से कहा,
"तुम लोग उसकी नज़र में आ गए हो। अब तुम्हें जल्दी इससे छुटकारा पाना होगा, वरना अगली बार वो तुम्हें छोड़ने वाली नहीं।"
अभी भी पीछा कर रही है?
पुजारी ने हमें कुछ मंत्र दिए और कहा कि इन्हें हमेशा अपने पास रखना। हमने राहत की सांस ली और ट्रक में वापस आ गए।
लेकिन जब मैंने ट्रक स्टार्ट करने के लिए चाबी घुमाई…
पीछे के शीशे पर धूल में कुछ लिखा हुआ था।
"मैं अभी भी यहीं हूँ…"
हम दोनों के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
वो औरत हमें अब भी देख रही थी… शायद अगली बार वो हमें छोड़ने वाली नहीं थी…
आखिरी रात की शुरुआत
मेरे हाथ स्टीयरिंग पर जमे हुए थे, लेकिन दिमाग सुन्न हो चुका था। विजय मेरे बगल में कांप रहा था।
"भाईजान… कोई पीछे है न?" उसकी आवाज़ डरी हुई थी।
मैंने धीमे से सिर हिलाया, लेकिन मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। मेरी आँखें सिर्फ सड़क पर जमी थीं, लेकिन दिल की धड़कनें रियर-व्यू मिरर में उस काली परछाई को महसूस कर रही थीं।
ट्रक अब 80 की स्पीड से भाग रहा था। बाहर की ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन ट्रक के अंदर पसीने से भीगा माहौल था।
तभी अचानक, एक ठंडी सांस मेरे कान के पास महसूस हुई।
"मुझे यहाँ से ले चलो…"
वो आवाज़… वो औरत की थी!
विजय का डर और मेरी हिम्मत
विजय अब बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। वो एक झटके में मुझसे चिपक गया, "भाईजान, कुछ करो… ये क्या हो रहा है?"
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए। तभी ट्रक के शीशे पर लंबी उंगलियों के निशान उभरने लगे। मानो कोई अदृश्य ताकत बाहर से अंदर आने की कोशिश कर रही हो।
मैंने हिम्मत जुटाई और पीछे देखा।
वो औरत वहाँ नहीं थी… लेकिन उसकी परछाई अब भी थी!
मेरी सांसें तेज़ हो गईं। "अल्लाह का नाम ले, कुछ नहीं होगा," मैंने विजय से कहा, लेकिन खुद मेरी आवाज़ कांप रही थी।
हाईवे का श्राप
ट्रक अब भी तेज़ दौड़ रहा था, लेकिन अचानक ऐसा लगा जैसे स्टीयरिंग मेरे हाथ से छूट रहा हो।
ट्रक की हेडलाइट्स बंद हो गईं!
पूरा रास्ता घुप अंधेरे में डूब गया।
विजय चीख पड़ा, "भाईजान, कुछ दिख नहीं रहा!"
मैंने पूरी ताकत लगाकर ब्रेक दबाया, लेकिन ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया। ट्रक अंधेरे में किसी अनजान दिशा में दौड़ने लगा।
तभी सामने एक पुराना लोहे का पुल दिखा।
एक झलक मौत की
ट्रक की हेडलाइट्स अचानक चालू हुईं… और जो हमने देखा, उसने हमारी रूह तक जमा दी!
सामने सड़क के बीचों-बीच वही औरत खड़ी थी!
उसकी आँखें लाल थी, बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसका चेहरा जला हुआ लग रहा था।
विजय ने आँखें बंद कर लीं, लेकिन मैं चाहकर भी नजरें नहीं हटा पाया।
वो धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ने लगी…
मैंने पूरी ताकत से स्टेयरिंग घुमाया, लेकिन ट्रक का कंट्रोल मेरे हाथ में नहीं था।
"अब तुम नहीं बचोगे…"
अचानक ट्रक के अंदर खुशबू बदल गई। पहले जले हुए मांस की बदबू आ रही थी, अब गुलाब की भीनी महक आने लगी।
विजय ने फुसफुसाकर कहा, "भाईजान, ये हमारे साथ खेल रही है!"
मैंने गियर बदला और पूरी ताकत से एक्सीलरेटर दबाया। ट्रक तेजी से घूमा और पुल से पहले रुक गया।
वो औरत अब गायब थी…
लेकिन ट्रक के शीशे पर किसी ने अपनी उंगलियों से एक शब्द लिख दिया था – "फिर मिलेंगे..."
ये अंत नहीं था…
हमने उस रात कोटा हाईवे छोड़ दिया, लेकिन ये एहसास कि वो हमें देख रही थी, अब भी हमारे साथ था।
क्या अगली बार हम बच पाएंगे?
भूतिया सफर जारी
ट्रक अभी भी सड़क के किनारे खड़ा था। इंजन बंद था, लेकिन मेरी धड़कनें अब भी तेज़ थीं। विजय की हालत और भी खराब थी। वो सीट से चिपका हुआ था, उसकी आँखों में अब भी खौफ झलक रहा था।
"भाईजान, अब क्या करेंगे?"
मैंने गहरी सांस ली और चारों ओर देखा। चारों तरफ अंधेरा था, सिर्फ दूर एक मटमैली स्ट्रीट लाइट जल रही थी, जिसकी रोशनी में धुंधली सड़क नज़र आ रही थी।
"हम यहाँ नहीं रुक सकते," मैंने कहा।
मैंने ट्रक का इंजन चालू किया और धीरे-धीरे एक्सीलेटर दबाया। लेकिन जैसे ही ट्रक आगे बढ़ा, स्टेयरिंग अपने आप घूमने लगा!
हवा में तैरती परछाई
"ये क्या हो रहा है भाईजान?" विजय लगभग रोने को था।
ट्रक की हेडलाइट्स अचानक फुल बीम में जल उठीं, और हमने सड़क पर कुछ देखा—एक काली परछाई हवा में तैर रही थी!
वो कोई इंसान नहीं था… उसके पैर ज़मीन से ऊपर थे।
विजय ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, लेकिन मेरी नज़रें उसी पर थीं।
"चलो यहाँ से, जल्दी!" मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दिया।
ट्रक झटके से आगे बढ़ा, और जैसे ही हम उस परछाई के करीब पहुँचे, वो अचानक हवा में घुल गई।
लेकिन तब…
ट्रक के अंदर से किसी के रोने की आवाज़ आई!
ट्रक के अंदर कोई था…
"भाईजान… पीछे कोई बैठा है!" विजय ने कांपती आवाज़ में कहा।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने धीरे से रियर-व्यू मिरर में देखा…
पीछे वाली सीट पर एक औरत बैठी थी!
उसके लंबे, गीले बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे। उसका सफेद सूट धुंधला पड़ चुका था।
उसकी हल्की-हल्की सिसकियाँ ट्रक के अंदर गूँज रही थीं।
"भाईजान… हमें रोकना नहीं चाहिए था," विजय ने फुसफुसाया।
मैंने अपनी पूरी हिम्मत जुटाई और धीरे से पूछा, "क-कौन हो तुम?"
वो औरत धीरे-धीरे मेरी तरफ झुकी और धीरे से फुसफुसाई…
"मुझे बचाओ…!"
भूत का खेल या सच्चाई?
ट्रक की हेडलाइट्स अचानक बुझ गईं।
ट्रक रुक चुका था। लेकिन इंजन अब भी चालू था।
विजय कांप रहा था, और मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था।
पीछे बैठी औरत अब धीरे-धीरे आगे की सीट के करीब आ रही थी।
उसके बाल अब हवा में लहराने लगे।
मैंने पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबाया, लेकिन ट्रक नहीं चला!
तभी अचानक, वो औरत ज़ोर से चिल्लाई—
"यहाँ से जाओ!"
ट्रक झटके से पीछे धकेल दिया गया। स्टेयरिंग अपने आप घूमने लगा।
और फिर…
वो औरत गायब हो गई।
क्या ये सच में खत्म हुआ?
ट्रक अब तेज़ी से दौड़ने लगा। मैं और विजय कुछ भी समझने की हालत में नहीं थे।
हमें नहीं पता था कि हमने क्या देखा… और क्यों देखा।
लेकिन इतना तय था—
ये सफर अब भी खत्म नहीं हुआ था।
मौत की परछाई
ट्रक तेज़ रफ़्तार से कोटा हाईवे पर दौड़ रहा था। मेरी हथेलियाँ पसीने से भीग चुकी थीं, और विजय की हालत अब भी खराब थी। हमने जो देखा, वो कोई सपना नहीं था। वो औरत सच में हमारे ट्रक के अंदर थी… और फिर अचानक गायब हो गई।
लेकिन क्या ये सब यहीं खत्म हो गया था?
नहीं… क्योंकि हमें अब भी ऐसा लग रहा था जैसे कोई हमें देख रहा हो…!
पीछे कोई था…
ट्रक के रियर-व्यू मिरर में अचानक एक धुंधली आकृति नज़र आई। पहले तो मुझे लगा कि ये सिर्फ मेरी आँखों का धोखा है, लेकिन जैसे ही मैंने ध्यान से देखा, विजय चीख पड़ा।
"भाईजान! कोई ट्रक के पीछे लटका हुआ है!"
मैंने कांपते हाथों से मिरर को सीधा किया…
और जो देखा, उससे मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
कोई बिना सिर का आदमी ट्रक के पीछे लटका हुआ था।
उसका धड़ हिल रहा था, लेकिन उसका सिर नहीं था। विजय ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन मैं उसे लगातार देख रहा था।
और फिर…
वो ट्रक की खिड़की के पास आ गया।
दरवाजा खटखटाने की आवाज़
"भाईजान… ये क्या हो रहा है?" विजय की आवाज़ काँप रही थी।
मैं कुछ बोलता, इससे पहले ही ट्रक के दरवाजे पर ज़ोर से "ठक… ठक… ठक…" की आवाज़ गूंज उठी।
जैसे कोई दरवाजा खटखटा रहा हो…
मैंने हिम्मत करके शीशे की ओर देखा—
वो बिना सिर वाला आदमी दरवाजा खटखटा रहा था!
उसकी उंगलियाँ काली और सूजी हुई थीं, जैसे कोई सड़ा-गला शव हो।
"बिस्मिल्लाह…" मेरे मुँह से बस यही निकला।
रास्ते का भूतिया मोड़
ट्रक की रफ़्तार तेज़ थी, और हम एक मोड़ के करीब पहुँच रहे थे। लेकिन स्टेयरिंग जैसे जाम हो चुका था।
"भाईजान, ब्रेक मारो!" विजय चिल्लाया।
मैंने पूरी ताकत से ब्रेक दबाया… लेकिन ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया।
ट्रक सीधा उस मोड़ की ओर बढ़ रहा था, और सामने एक गहरी खाई थी!
अगर ट्रक नहीं रुका, तो हम सीधे नीचे गिर जाते।
और तभी…
ट्रक के सामने अचानक वही औरत आ गई, जो पहले ट्रक के अंदर थी!
भूत या हमारी रक्षक?
उसके दोनों हाथ हवा में उठे हुए थे। उसकी आँखें चमक रही थीं, और उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।
"रुको!"
उसकी ज़ोरदार चीख गूँजी, और ट्रक अचानक झटके से रुक गया।
मैं और विजय पूरी ताकत से स्टेयरिंग और ब्रेक को पकड़ चुके थे, लेकिन…
ट्रक अपने आप रुक गया था।
हमारी साँसें तेज़ चल रही थीं। हम पूरी तरह पसीने से भीग चुके थे।
और जब हमने चारों ओर देखा…
ना तो वो औरत थी… और ना ही वो बिना सिर वाला आदमी।
क्या ये सब सच था?
विजय अब भी काँप रहा था।
"भाईजान… ये क्या था?"
मैंने लंबी सांस ली और कहा, "हमें इस जगह से निकलना होगा।"
मैंने ट्रक को वापस स्टार्ट किया और धीरे-धीरे एक्सीलेटर दबाया। इस बार स्टेयरिंग भी कंट्रोल में था और ब्रेक भी सही से काम कर रहे थे।
लेकिन एक बात तय थी—
हमने उस रात कोटा हाईवे पर जो देखा, वो सिर्फ एक हादसा नहीं था…
वो एक श्राप था… जो अब भी इस रास्ते पर मंडरा रहा था।
रात का आखिरी पहर
ट्रक अब धीरे-धीरे कोटा हाईवे की सुनसान सड़क पर आगे बढ़ रहा था। चारों ओर घना अंधेरा फैला था, और रास्ता वीरान था। विजय ने अपने कांपते हाथों से पानी की बोतल निकाली और एक लंबा घूंट भरा।
"भाईजान… क्या ये सब हमारी कल्पना थी?" विजय की आवाज़ अब भी काँप रही थी।
मैंने बिना उसकी ओर देखे कहा, "अगर कल्पना होती, तो ट्रक के ब्रेक अपने आप खराब नहीं होते। और वो बिना सिर वाला आदमी? वो भी कल्पना थी?"
विजय चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।
हम दोनों अब सिर्फ यही चाहते थे कि जल्दी से हाईवे पार कर लें और किसी ढाबे तक पहुँच जाएँ। लेकिन हमारी ये उम्मीद भी ज्यादा देर तक नहीं टिक पाई।
आगे का रास्ता बंद था
जैसे ही हमने अगले मोड़ पर ट्रक को घुमाया, सामने का दृश्य देखकर हमारे होश उड़ गए।
पूरी सड़क पर बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ और पत्थर बिखरे हुए थे, जैसे किसी ने जानबूझकर रास्ता बंद किया हो।
"अब क्या करें?" विजय ने घबराकर पूछा।
मैंने ट्रक रोका और धीरे से बाहर निकलने लगा।
"देखते हैं, अगर लकड़ियाँ हटा सकें तो रास्ता साफ हो सकता है।"
विजय भी मेरे पीछे-पीछे उतरा। लेकिन जैसे ही हम आगे बढ़े, अचानक हमें पीछे से किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी।
"खट... खट... खट..."
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा। आवाज़ साफ़ पीछे से आ रही थी।
"कोई है?" मैंने ज़ोर से पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
हमने टॉर्च जलाकर पीछे देखा… लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
कदमों के निशान
लेकिन जब हमने ज़मीन की ओर टॉर्च डाली, तो हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वहाँ गीली मिट्टी पर किसी के पैरों के निशान बने हुए थे… और वो हमारे ट्रक की ओर जा रहे थे!
विजय ने घबराकर मेरा हाथ पकड़ा, "भाईजान, ट्रक में कोई घुस गया है!"
हमने बिना एक पल गंवाए ट्रक की ओर दौड़ लगाई। लेकिन जैसे ही दरवाजा खोला…
ट्रक की ड्राइविंग सीट पर कोई बैठा हुआ था।
उसकी पीठ हमारी ओर थी, और उसका सिर नीचे झुका हुआ था।
"त.. तुम कौन हो?" विजय की आवाज़ अब डर से लरज रही थी।
वो आकृति धीरे-धीरे सिर उठाने लगी।
और जैसे ही हमने उसका चेहरा देखा…
हमारे शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
वो वही औरत थी!
वही औरत, जिसे हमने पहले ट्रक में देखा था।
लेकिन इस बार, उसका चेहरा और भी भयानक लग रहा था। उसकी आँखों से काला धुआँ निकल रहा था, और उसका चेहरा जलने के निशानों से भरा हुआ था।
"भागो!" विजय चिल्लाया।
मैंने तुरंत ट्रक का दरवाजा बंद किया और उसे स्टार्ट करने की कोशिश की। लेकिन इंजन ने जैसे काम करना बंद कर दिया था।
वो औरत अब धीरे-धीरे हमारी ओर बढ़ने लगी।
हमने पूरी ताकत से ट्रक को स्टार्ट करने की कोशिश की। और आखिरकार…
"गड्डड्डड्ड... गड्डड्ड... ट्रक स्टार्ट हो गया!"
मैंने एक्सीलेटर दबाया और ट्रक को पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ा दिया।
विजय ने पीछे मुड़कर देखा—
वो औरत अब भी सड़क के बीच में खड़ी थी… और हमें जाते हुए घूर रही थी।
श्रापित रास्ता
हम दोनों ने बिना कुछ बोले ट्रक को तेज़ी से आगे बढ़ाया। अब हमारा बस एक ही मकसद था— इस रास्ते से जितनी जल्दी हो सके, बाहर निकलना।
लेकिन ये श्रापित रास्ता इतनी आसानी से हमें छोड़ने वाला नहीं था…
शापित रास्ते का अंत नहीं
हमारी धड़कनें तेज़ थीं, और ट्रक हाईवे पर पूरी रफ्तार से दौड़ रहा था। लेकिन डर अभी भी हमारे दिलों में जिंदा था।
विजय बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था, लेकिन वो औरत अब कहीं नहीं दिख रही थी।
"भाईजान, लगता है पीछा छूट गया," विजय ने राहत की सांस लेते हुए कहा।
मैंने सिर हिलाया, लेकिन मन में अब भी बेचैनी थी। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ बहुत बड़ा होने वाला है।
और मेरी ये आशंका सही साबित हुई।
आगे का रास्ता ख़तरनाक था
कुछ किलोमीटर बाद हमने देखा कि सड़क के किनारे एक पुरानी टूटी-फूटी बस खड़ी थी।
वो इतनी जली हुई थी कि उसकी असली पहचान कर पाना मुश्किल था।
विजय ने कहा, "ये बस यहाँ कैसे आई?"
मैंने ट्रक की गति थोड़ी धीमी की और गौर से देखने लगा।
तभी…
बस के अंदर किसी की परछाई हिलती हुई दिखी।
"भाईजान… अंदर कोई है!" विजय की आवाज़ कांप रही थी।
मैंने गहरी सांस ली और ट्रक रोका।
"चल, देखते हैं।"
विजय हिचकिचा रहा था, लेकिन मेरे साथ उतर आया।
जैसे ही हम बस के पास पहुँचे, एक तेज़ ठंडी हवा चली।
बस के जले हुए दरवाजे पर पुराने खून के धब्बे थे।
"कोई है अंदर?" मैंने ज़ोर से पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
लेकिन… बस का दरवाजा खुद-ब-खुद धीरे-धीरे खुलने लगा!
भूतिया बस
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
बस के अंदर अंधेरा था, लेकिन टॉर्च की रोशनी में हमने जो देखा… उसने हमारी रूह काँप दी।
सीटों पर जले हुए इंसानों की आकृतियाँ बैठी थीं!
उनके कंकाल अब भी सीट बेल्ट से बंधे थे, और उनकी आँखों के गड्ढे हमें घूर रहे थे।
"भाईजान, चलो यहाँ से!" विजय घबराकर पीछे हटने लगा।
लेकिन तभी…
बस की पिछली सीट से किसी ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
वो वही औरत थी!
इस बार उसका चेहरा पूरी तरह जला हुआ था, और उसकी आँखों से खून बह रहा था।
"तुम बच नहीं सकते..." उसकी फुसफुसाहट सुनकर हमारी साँसें रुक गईं।
बस अचानक ज़ोर से हिलने लगी, और उसमें से डरावनी चीखें आने लगीं!
अब हमें कोई और रास्ता नहीं दिखा।
हम जान बचाकर ट्रक की ओर दौड़े और पूरी ताकत से उसे स्टार्ट किया।
बस की सच्चाई
जब हम सड़क पर भाग रहे थे, विजय ने काँपते हुए पूछा, "भाईजान, वो कौन थी?"
मैंने गहरी सांस ली और कहा, "शायद इस बस से जुड़ी कोई आत्मा…"
तभी मुझे एक पुरानी कहानी याद आई।
"कई साल पहले, इसी हाईवे पर एक बस जलकर राख हो गई थी। बताया जाता है कि बस में बैठे सारे यात्री जिंदा जल गए थे। और तब से… जो भी इस रास्ते से गुजरता है, उसे वो आत्माएँ दिखती हैं।"
विजय ने काँपते हुए कहा, "तो क्या… हम उस बस के भूतों से टकरा गए?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि हमें पता था… ये रात अभी खत्म नहीं हुई थी।
रूह कंपा देने वाली रात
ट्रक अपनी पूरी रफ्तार से कोटा हाईवे पर दौड़ रहा था, लेकिन हमारे दिलों की धड़कनें उससे भी तेज़ थीं। हम दोनों चुप थे—जैसे डर ने हमारी ज़ुबानें सिल दी हों। पीछे मुड़कर देखने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन महसूस हो रहा था कि कोई हमारे पीछे-पीछे चला आ रहा है…
विजय ने घबराकर कहा, "भाईजान, ये रास्ता कब खत्म होगा?"
मैंने कुछ नहीं कहा। सामने सिर्फ घुप्प अंधेरा था, और बीच-बीच में हेडलाइट की रोशनी में हाईवे के किनारे लगे पुराने, टूटी-फूटी पट्टियाँ चमक उठती थीं। लेकिन उन पर कुछ अजीब लिखा था—शायद किसी का नाम, जो अब मिट चुका था।
तभी अचानक…
ट्रक का इंजन खुद-ब-खुद बंद हो गया!
"भाईजान!" विजय ने लगभग चीखते हुए कहा।
मैंने झट से स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन स्टेयरिंग अजीब तरीके से हिलने लगा, जैसे किसी ने पकड़ रखा हो!
हम दोनों को अब यकीन हो गया था कि हम अकेले नहीं थे…
कौन था वो?
ट्रक जैसे ही बंद हुआ, बाहर भयानक सन्नाटा छा गया। कोई हवा नहीं, कोई आवाज़ नहीं—बस एक गहरा, डरावना सन्नाटा।
विजय काँपते हुए खिड़की से बाहर देखने लगा।
फिर उसने जो देखा, उससे उसकी चीख निकल गई।
सामने सड़क के किनारे एक औरत खड़ी थी…
लेकिन ये वही जलती हुई औरत थी, जो हमें बस में मिली थी!
उसकी आँखों में खून उतर आया था, और उसका आधा चेहरा झुलसा हुआ था।
वो धीरे-धीरे हमारी तरफ़ बढ़ने लगी…
भागने का कोई रास्ता नहीं था
"भाईजान, कुछ करो!" विजय की आवाज़ कंपकपा रही थी।
मैंने पूरी ताकत से ट्रक स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन ज़ोर-ज़ोर से घरघराने लगा, जैसे कोई उसे जबरदस्ती बंद कर रहा हो।
औरत अब बिल्कुल ट्रक के सामने थी।
फिर…
उसने अपनी लंबी, जली हुई उँगलियाँ ट्रक के बोनट पर रख दीं।
अचानक ट्रक की बॉडी आग की लपटों में चमक उठी—लेकिन जल नहीं रही थी!
हमारा खून जम गया।
"भाईजान, उतरते हैं!" विजय ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन…
दरवाज़ा अंदर से लॉक हो चुका था!
डर का चरम
"बोलो, कलमा पढ़ें?" विजय ने काँपते हुए पूछा।
मैंने उसे देखा, लेकिन मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
अब वो औरत हमारे बिलकुल करीब थी।
फिर उसने जो किया, उसे देखकर हमारी रूह काँप गई।
उसने धीरे से अपनी जल चुकी उँगलियों से ट्रक के शीशे पर लिखा…
"तुम बच नहीं सकते..."
फिर एक ज़ोरदार झटका लगा, और ट्रक अपने-आप स्टार्ट हो गया!
मैंने बिना कुछ सोचे पूरी ताकत से एक्सीलेटर दबा दिया, और ट्रक ज़ोर की गर्जना के साथ आगे बढ़ गया।
पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी।
लेकिन जब मैंने साइड मिरर में देखा…
वो औरत अब भी वहाँ खड़ी थी, हमारी ओर देखते हुए।
उसकी आँखों में एक अजीब सी हंसी थी—जैसे ये सब अभी खत्म नहीं हुआ था…
साये जो पीछा नहीं छोड़ते
ट्रक अब अपनी पूरी रफ्तार में था। इंजन गरज रहा था, पहिए सड़क को काटते हुए दौड़ रहे थे, लेकिन मेरा दिल… वो अब भी वहीं अटका हुआ था—उस जलती हुई औरत की डरावनी आँखों में।
विजय खामोश था, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ा हुआ था। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, और न ही मैं हिम्मत कर पा रहा था। लेकिन मेरे दिमाग़ में अब भी वो अजीब-सा एहसास था—कोई हमें अब भी देख रहा है!
तभी अचानक, मैंने ट्रक के साइड मिरर में झाँका…
सामने मौत खड़ी थी!
ट्रक के ठीक पीछे एक परछाईं दौड़ रही थी!
हाँ, इंसान नहीं… सिर्फ़ एक परछाईं!
"भाईजान… वो चीज़ अभी भी हमारे पीछे है!" विजय की आवाज़ कांप रही थी।
मैंने एक्सीलेटर और दबा दिया, लेकिन ट्रक जितनी तेज़ी से भाग रहा था, वो परछाईं उतनी ही तेज़ी से हमारा पीछा कर रही थी।
फिर…
परछाईं हवा में कूद गई और ट्रक के ऊपर जा पहुँची!
"धड़ाम!!!"
छत पर ज़ोरदार धमाका हुआ, जैसे कोई भारी चीज़ गिर पड़ी हो!
हमारे होश उड़ गए।
कौन था वो? और वो अब हमारे ट्रक की छत पर क्या कर रहा था?
छत पर कोई था!
ट्रक के अंदर घुप्प सन्नाटा था, लेकिन ऊपर…
किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी!
"भाईजान, अब क्या करें?" विजय ने डर के मारे मेरा बाजू पकड़ लिया।
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ स्टेयरिंग को कसकर पकड़े रखा और ट्रक दौड़ाता गया।
लेकिन तभी…
"खटाक!"
ट्रक की छत पर किसी ने ज़ोर से वार किया!
फिर…
छत पर खरोंचने की आवाज़ आने लगी…
जैसे कोई अपने नाखूनों से ट्रक की बॉडी को चीर रहा हो!
अब हम बुरी तरह डर गए थे। ये चीज़ कोई आम आत्मा नहीं थी… ये कुछ और था!
दरवाज़ा खुल गया… अपने-आप!
"भाईजान, कुछ करो!" विजय लगभग रोने लगा था।
तभी अचानक…
ट्रक का पैसेंजर साइड का दरवाज़ा अपने-आप खुल गया!
मैंने घबराकर उधर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
फिर विजय चीखा, "भाईजान! देखो… देखो!!!"
मैंने जब खिड़की से बाहर झाँका, तो मेरा खून ठंडा पड़ गया।
वो औरत—जो जल रही थी—अब ट्रक के साथ-साथ दौड़ रही थी!
लेकिन अब उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
"तुम बच नहीं सकते…"
उसकी फुसफुसाती आवाज़ हमारे कानों में गूँज रही थी, लेकिन उसके होंठ नहीं हिल रहे थे!
अब हमें यकीन हो गया था—ये चीज़ इंसान नहीं थी!
अंत… या एक नई शुरुआत?
हमारा ट्रक अब शहर के करीब पहुँच रहा था। रोशनी दिखने लगी थी, लोग नज़र आने लगे थे, लेकिन…
जैसे ही हमने एक पुल पार किया, वो औरत गायब हो गई।
सिर्फ़ एक सेकंड में—जैसे कभी थी ही नहीं!
ट्रक की छत से भी अजीब आवाज़ें आना बंद हो गईं।
हम दोनों ने राहत की साँस ली, लेकिन दिल अब भी बेतरह धड़क रहा था।
क्या ये सब ख़त्म हो गया था?
या फिर…
ये तो बस एक शुरुआत थी?
साये जो पीछा नहीं छोड़ते (अंतिम भाग)
ट्रक अब धीरे-धीरे शहर के अंदर दाखिल हो रहा था। स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी में सबकुछ नार्मल लग रहा था, लेकिन हमारे दिमाग़ में अब भी वो डरावनी रात घूम रही थी।
विजय बुरी तरह काँप रहा था, उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था। मैंने खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन दिल की धड़कन अब भी तेज़ थी।
"भाईजान, ये सब क्या था?" विजय की आवाज़ में अब भी डर था।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस ट्रक चलाता रहा। लेकिन मेरे ज़ेहन में अब भी वही सवाल घूम रहा था—क्या वो औरत वाकई चली गई?
एक आखिरी इम्तिहान
हमने ट्रक को एक ढाबे के पास रोका। रात बहुत हो चुकी थी, और हमें अब आराम की सख्त ज़रूरत थी।
जैसे ही हम ट्रक से नीचे उतरे, मैंने ध्यान दिया कि ट्रक की बॉडी पर किसी ने गहरे नाखूनों के निशान छोड़ दिए थे!
विजय ने भी देखा और घबराकर बोला, "भाईजान… ये तो इंसान के हाथ के निशान नहीं लगते!"
मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला।
हम दोनों ढाबे के अंदर गए, खाना ऑर्डर किया, लेकिन न हम कुछ बोल रहे थे, न कुछ खा पा रहे थे। दिमाग़ बस एक ही चीज़ पर अटका था—वो कौन थी? और क्यों हमारे पीछे पड़ी थी?
अचानक… फिर वही एहसास!
मैंने एक घूँट पानी पिया, लेकिन जैसे ही गिलास नीचे रखा, मेरा दिल धड़क उठा।
ढाबे के शीशे में… पीछे एक परछाईं खड़ी थी!
मैंने तुरंत पलटकर देखा…
कोई नहीं था!
लेकिन शीशे में अब भी… वो जलती हुई औरत दिख रही थी!
"भाईजान, भागो!" विजय लगभग चिल्ला पड़ा।
हम दोनों दौड़कर ट्रक की तरफ भागे, लेकिन जैसे ही हमने दरवाज़ा खोला…
ट्रक के अंदर वही औरत बैठी थी!!!
अब उसकी आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं, चेहरा जलने की वजह से डरावना दिख रहा था, और उसकी मुस्कान…
"तुम मुझसे बच नहीं सकते…"
उसकी फुसफुसाहट हमारे कानों में गूँज रही थी।
आखिरी मुठभेड़
अब हमें समझ आ गया था—हमें भागना होगा!
हम दोनों ने बिना कुछ सोचे ट्रक को स्टार्ट किया और पूरी स्पीड में वहाँ से निकल पड़े। लेकिन जैसे ही हमने स्पीड बढ़ाई, ट्रक अपने-आप हिलने लगा…
"धड़ाम!"
कुछ ट्रक के ऊपर गिरा था!
अब हम पूरी तरह घबरा चुके थे।
मैंने एक्सीलेटर को पूरी ताकत से दबाया, ट्रक लगभग उड़ने लगा, लेकिन अचानक…
एक चीख गूँजी!!!
और ट्रक एक ज़ोरदार झटके के साथ रुक गया!
सबकुछ खत्म… या नहीं?
सामने देखा, तो कुछ नहीं था।
ट्रक की छत से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
हमने हिम्मत करके ट्रक से नीचे उतरकर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
वो औरत… गायब हो चुकी थी।
विजय ने मेरी तरफ देखा और कहा, "भाईजान, क्या ये सब सच था? या हमें कोई भ्रम हो रहा था?"
मैंने गहरी साँस ली और आसमान की तरफ देखा।
क्या सच में ये सब खत्म हो गया था?
या फिर…
ये भूतिया सफ़र अभी जारी था?
(समाप्त)

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें
सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]
<< मुख्यपृष्ठ